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प्राची - नवंबर 2016 / साहित्य समाचार

साहित्य समाचार

प्रलेस का उत्तर प्रदेश राज्य सम्मेलन

सभ्यता विकास की दीर्घ प्रक्रिया : वी एन राय

सभ्यता विकास की दीर्घ प्रक्रिया होती है. सभ्य वे कहलाते हैं जो कमजोर का ध्यान रखते हैं. हमारे जीन्स में सभ्यता नहीं है. हमजातीय आधार पर बंटे हुये हैं. अम्बेडकरवादी दुकानें भी जाति तोड़ने का नहीं, उनके विकास का काम कर रही हैंघ् पूर्व आई पी एस, महात्मागांधी अंतर्रष्ट्रीय हिंदी विश्व विध्यालय के पूर्व कुलपति तथा श्वर्तमान साहित्यश् के सम्पादक डा. विभूति नारायण राय का यह स्पष्ट मानना था. वे झाँसी में, 20-21 अगस्त को, प्रगतिशील लेखक संघ के उत्तर प्रदेश के दसवें राज्य सम्मेलन का, श्बुंदेलखंड महाविध्यालयश् के श्स्वर्ण जयन्ती सभागारश् में उद्घान करते हुये यह वक्तव्य दे रहे थे. उन्होंने कहा कि अपने समय के हालात में हस्तक्षेप से रचनाकार की पहचान होती है. प्रेमचंद-बाबू वृन्दावन लाल वर्मा जैसे रचनाकार ऐसे ही हस्तक्षेपकारी लेखक थे. वे समय परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल थेघ् यह कथाकार भीष्म साहनी जन्म शताबादी वर्ष भी चल रहा है. इस उपलक्ष्य में महाविध्यालय के प्राचार्य डा. बाबू लाल तिवारी, डा. नवेन्द्र सिंह डा. संजय सक्सेना, डा. मुहम्मद नईम, डा. मो. इकबाल खान के संयोजन में भीष्म साहनी के कथा संसार तथा उनके सामाजिक सरोकारों पर केन्द्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी भी रखी गई थी. भीष्म साहनी पर बोलते हुये डा. वी एन राय का कहना था कि यह चुनौती भरा समय है. देश की आजादी, आजादी के बाद के सपनों का टूटना जिसमें प्रतिगामी प्रवृत्तियां पैदा हो रही हैं, बुध्दिजीवियों को इसे समझना होगा. दधीचि की हड्डियों को परीक्षण, उनसे हथियार बनाने की सलाह, ऐसा अवैज्ञानिक सोच हमें कहाँ ले जायेगा. ऐसे समय में भीष्म साहनी को याद करना विवेक और तर्क की बात है.

सम्मेलन स्थल तक साहित्यकार तथा रंग-कर्मी शहीद चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर शांति-मार्च करते हुये पहुँचे थे. मार्च का नेतृत्व ट्रेड यूनियन समन्वय समिति के अध्यक्ष, जे एन पाठक तथा बीड़ी मजदूर नेता भगवानदास पहलवान ने किया. इप्टा, उरई के महासचिव राज पप्पन के निदेशन में नाट्य प्रस्तुति दी गई. सम्मेलन-स्थल पर प्रदर्शित पंकज दीक्षित की कविता-पोस्टर प्रदर्शनी तथा प्रगतिशील साहित्य केन्द्र का उद्घाटन झाँसी के निवर्तमान सांसद तथा केन्द्रीय राज्य मंत्री प्रदीप जैन श्आदित्यश् ने किया.

आरम्भ में प्रलेस उत्तर प्रदेश के महासचिव डा. संजय श्रीवास्तव ने सम्मेलन के उद्घाटन सत्र का संचालन सम्हाला. उन्होंने झाँसी के क्रान्तिकारी साहित्यकार डा. भगवान दास माहौर, मास्टर रूद्र नारायण, सदाशिवराव मलकापुरकर, आर बी धुलेकर, मैथिलीशरण गुप्त इत्यादि को याद करते हुये प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के उद्देश्य पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि शांति स्थापना राजनैतिक विकास से नहीं होती है. सैनिक हस्तक्षेप से भी नहीं होती है। किसी समाज के सांस्.तिक विकास से शांति स्थापित होती है... देश के आम आदमी में सांस्.तिक चेतना के विकास के उद्देश्य से ही 1936 में प्रेमचंद-सज्जाद जहीर जैसे साहित्यकारों ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी.

प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव डा. अली जावेद का बहुत साफ कहना था कि आस्था तोड़ती नहीं, जोड़ती हैं. धर्म और जाति के नाम पर दंगे-फसाद, अलगाव राजनीतिबाजों के लिये खुद को सुरक्षित रखने के साधन होते हैं. इन्हें नीचे से जमीन खिसकती लगे तो आश्चर्य नहीं की देश को युध्द में झोंक दें लेकिन इनका मोहरा बनने से पहले हमें यह समझ लेना चाहिये कि सीमाओं पर लड़ने आम मजदूर-किसानों के बेटे जाते हैं. नेताओं, पूँजीपतियों के नहीं. विकास के नाम पर आज जो हालात पैदा किये जा रहे हैं, वे देश को कार्पोरेटर्स को सौंप देने की आधार भूमि है. भीष्म साहनी को याद करने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि हम इन खघ्तरों को पहचानें. आम आदमी को इनके प्रति आगाह करें तथा इनके विरुध्द संघर्ष छेड़ने के लिये तैयार करें.

भारतीय जन-नाट्य संघघ्इप्टाघ्के राष्ट्रीय महासचिव राकेशजी का कहना था कि कला जनता के नाम एक प्रेम-पत्र होती है लेकिन जुल्मी सत्ता के विरुध्द अभियोग-पत्र भी होती है. समाज का विकास धर्मिक या आस्थावादी सोच से नहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से होता है. प्रलेस तथा इप्टा समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि हम कबीर तथा बुध्द की परम्परा के लोग हैं. समाज के उत्थान के लिये सामाजिक सोच से लैस तथा जुझारू जनता का निर्माण हमारा लक्ष्य है.

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खगेन्द्र ठाकुर ने यह कर सत्र का सारांश प्रस्तुत किया कि भीष्म साहनी की अपने समय के समाज पर बहुत अच्छी पकड़ थी. वे अपने समय के सबसे बड़े कहानीकार थे.

श्भीष्म साहनी की कथा-यात्राश् सत्र की अध्यक्षता करते हुये साहित्यकार-पत्रकार श्याम कश्यप ने कहा कि लेखक समाजपरक विचारधारा के सापेक्ष होगा, तभी समाज को प्रगतिगामी साहित्य दे पायेगा. यह बात भीष्म साहनी के साहित्य में निरंतर देखने को मिलती है. कथाकार महेश कटारे ने भीष्म साहनी की रचना श्वांग्चूश्, श्चीफ की दावतश् इत्यादि का उल्लेख करते हुये कहा कि वे विलक्षण रूप से आम नहीं, निम्न वर्ग के साहित्यकार थे. उनके साहित्य में वाम राजनीति का प्रभाव स्पष्ट दिखता है. जन संस्.ति मंच के महासचिव राजेन्द्र राजन का कहना था कि वर्तमान समय में भीष्म साहनी को पढ़ना समाज को दिशा दे सकता है. जय प्रकाश श्धूमकेतुश् का कहना था कि भीष्म साहनी साहित्यकार के साथ-साथ बेहद सरल व्यक्ति तथा विचारक भी थे.

विचार- सत्र का विषय प्रस्तुतीकरण महात्मागांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्व विध्यालय, वर्धा के, इलाहाबाद केंद्र के प्रभारी डा. संतोष भदौरिया ने किया. इस सत्र में श्अभिव्यक्ति की चुनौतियांश् विषय पर बोलते हुये मुख्य अतिथि, राज्य सभा चौनल के कार्यकारी सम्पादक डा. उर्मिलेश ने आंकड़ों के साथ बताया कि भारत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्षेत्र में दुनिया के 180 देशों में से 133 वें स्थान पर है. उन्होंने खघ्ेद व्यक्त करते हुये कहा कि हमने देश के बड़े वर्ग को सामाजिक आजादी नहीं बख्शी है. हम शब्द और कर्म के क्षेत्र में ढोंगी हैं. अतीत गौरव में जीते हैं. इससे काम नहीं चलेगा. जरूरत विचार बदलने की है. समाज में सबसे पिछड़े आदमी से संवाद की आवश्यकता है. इन सब के अभाव में झंडे बदलने से काम नहीं चलेगा. उन्होंने भगत सिंह तथा डा. अम्बेडकर की तुलना करते हुये कहा कि भगतसिंह क्रान्तिकारी थे. अम्बेडकर सामाजिक सुधार के पक्षधर थे. वे हिंदू धर्म से जाति व्यवस्था समाप्त करना चाहते थे. डा. उर्मिलेश ने कहा कि देश के उत्थान के लिये भगत सिंह तथा डा. अम्बेडकर में समन्वय की आवश्यकता है. हालांकि डा. विभूति नारायण राय का स्पष्ट मत था कि भगत सिंह मार्क्सवादी विचारधारा से अनुप्राणित थे. देश का समाजोन्मुखी, प्रगतिगामी विकास भगत सिंह तथा कार्ल मार्क्स के समन्वय से ही सम्भव है. सत्र की अध्यक्षता कर रहे डा. चौथीराम ने इतिहास को चुनौती देते हुये कहा कि दावा किया जाता था कि इक्कीसवीं सदी नेहरू तथा गांधी की होगी लेकिन बीते दशकों का घटनाक्रम गवाही दे रहा है कि वर्तमान शताब्दी डा. अम्बेडकर को साबित करने जा रही है.

संगठन सत्र की अध्यक्षता भी डा. चौथीराम ने की. इस अवसर पर हुये राज्य कार्यकारिणी के चुनाव में डा. संतोष भदौरिया अध्यक्ष तथा डा. संजय श्रीवास्तव महासचिव चुने गये.

प्रस्तुतिः दिनेश बैस, झांसी

 

भवेशचंद्र जायसवाल नहीं रहे

मीरजापुर। 22.6.2016 को सायं आकाशवाणी इलाहाबद से भवेशचंद्र जायसवाल की कविता उन्हीं की वाणी में प्रसारित हो रही थी और उनका परिवार, पड़ोसी व मित्रगण उन्हें लेकर डॉक्टर के यहां भागे जा रहे थे.

डॉक्टर ने भवेशचंद्र जायसवाल का परीक्षण करके कहा कि अब इनके जीवित बने रहने की कोई संभावना नहीं है. तुरंत करुण कुंदन का कोहराम मच गया.

भवेशचंद्र जायसवाल का जन्म 19 जून 1952 को मीरजापुर (उ.प्र.) में हुआ था. इलाहाबाद के ए.जी. ऑफिस से वे सेवा निवृत्त हुए थे. वे नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर थे. उनकी कविताएं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आकाशवाणी इलाहाबाद से प्रसारित होती रहती थीं. संयोग ही था कि उनकी मृत्यु के समय भी उनकी कविता रेडियो पर प्रसारित हो रही थी. उनका तीसरा काव्य संग्रह ‘‘संभावना सच हो सकती है’’ वर्ष 2015 में प्रकाशित हुआ, जो काफी चर्चा में रहा. कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उसकी चर्चा हुई थी.

भवेशचंद्र जायसवाल सौम्य, सहज, सुंदर गौर थे. हृदयाघात की कोई संभावना नहीं थी, पर इस तरह उनका अचानक सबको छोड़कर चले जाना सचमुच अच्छा नहीं लगा.

भवेशचंद्र जायसवाल अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र व 2 पुत्रियां छोड़ गये. अभी अपने किसी पुत्र-पुत्री का विवाह नहीं कर पाये थे. उनके छोटे भाई भूपेशचंद्र जायसवाल अभी इलाहाबाद बैं में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं.

पत्रिका परिवार की ओर से भवेशचंद्र जायसवाल के प्रति घोर शोक संवेदना और उनके परिवार को इस संकट से उबरने के लिए धैर्य व साहस की आकांक्षा है.

प्रस्तुतिः केदारनाथ सविता

 

फूल मसरूफ हैं कांटों की सनाआनी में

‘विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ’ की जनपदीय इकाई मऊ और ‘काव्यामुखी साहित्य अकादमी’ मुहम्मदाबाद गोहना मऊ के संयुक्त प्रयास से, एक अदबी मुशायरा-कवि सम्मेलन का आयोजन, शाह गोला दीवान प्राथमिक विद्यालय आदर्श नगर मुहम्मदाबाद के संवादहॉल में, बुजुर्ग मकबूल शादूर मुजीब बस्तवी की सदारत (अध्यक्षता) डॉ. कमर मुहम्मदबादी के कामयाब संचालन में, विगम 29 मई 2016 को, युवा कवि प्रेमगम आज़मी की वाणी वंदना और कामरान आदिल गाक्तिपुरी की नात से प्रारंभ हुआ. ‘काव्यमुखी’ के महानिदेशक, विश्वयात्री डॉ. मधुर नज्मी ने अपने उद्बोधन में ‘काव्य-समारोहों की उपादेयता’ पर प्रकाश डालते हुए इसके पतनशील स्तर पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा, ‘काव्य-समारोहों (हिंदी-उर्दू) का उत्थान लघु काव्य समारोहों को आयोजित करके किया जा सकता है. इसके लिये सतर्क श्रोताओं और सुलझे हुए अदीबों की दरकार है. काव्य-मंच कविता का समर्थक संप्रेषणीय माध्यम रहा है किंतु आज इसकी स्थिति शोचनीय है.’’ साहित्यिक प्रतिभा मंच फाउंडेशन संत कबीर नगर की ओर से डॉ. मधुर नज्मी, डॉ. कुमार मुहम्मदबादी को ‘प्रतिभा-मंच गौरव’ सम्मान से संस्था के महा-सचिव असद निजामी अध्यक्ष अतहर खान ने प्रतीक चिह्न देकर, अदबी सम्मान से विभूषित किया. आजमगढ़ संत कबीर नगर, मऊ, गोराखपुर बस्ती, सिद्धार्थ नगर आदि जनपदों से पधारे कवियों-शादूरों ने अपनी-अपनी प्रतिनिध रचनाओं का पाठ किया. समाज के विविध पलुओं अपने-अपने कलम की रंगिमा बुनते हुए शादूरों के कलाम बेहद पसंद किये गये-

‘‘सैंकड़ों निकलते हैं दाने एक दाने से-

रख दिया कमाल उसमने कितना एक दाने में’’ कामरान ‘आदिल’ गालिब पुरी.

‘‘गुमराह कर सकेगी कहां तीरगी मुझे-

अपनी पनाह में है किये रोशनी मुझे.’’ मतीन ख़ैराबादी

‘‘देखे थे उसने ख़्वाब महल्लात के मगर-

आई गरीबी चुपके से सपने बिखर गये.’’ डॉ. कमर मुहम्मदबादी

सामाजिक विसंगतियों पर नश्तरी चाकू की तरह चलते हुए शहरों के शरीर अपने मुल्क के परिदृश्य की अक्कासी कर रहे थे. श्रोता-सामयिन कवियों और शादूरों के ख्यालात की नर्मियों में डूबकर प्रशंसित दाद दे रहे थे. असद निजामी की कई-कई गजलों के ये शेर खूब प्रशंसित हुए.

‘‘हंसते-हंसते ही रो भी सकते थे-

हम अदाकार हो भी सकते थे-

हाथ छोड़ा नहीं बड़ों का कभी-

वर्ना मेले में खो भी सकते थे. असद निजामी

‘‘खाक सबकुछ हुआ है यहां देखिये-

राख बुझती नहीं है जहां देखिये.’’ महेश गोस्वामी

‘‘किन हवाओं ने बदल डाली चमन की तहज़ीब-

फूल मसरूफ हैं कांटों की सनासनी में.’’ एहसान एम.ए.

कविता चाहे जिस विधा की हो आज के तब्दील होते परिदृश्य पर कवि की दरवेशी दृष्टि से इन्कार नहीं किया जा सकता. आज कविता के हल्के में विसंगतियों की भरपूरगी है. गीतकार सुरेन्द्र सिंह ‘चांस’ ने अपने गीत के माध्यम से श्रोताओं को सोचने के लिये मजबूर कर दिया- ‘‘जो आंधियां बुझाती जलते दिये हमारे/ वो आंधियां जला दें तेरे दिये सहारे.’’ विक्रम शिला हिंदी विद्यापीठ के अंतर्राज्यीय कार्यदर्शी समन्वयक डॉ. मधुर जन्मी ने पढ़ा-

‘‘गजल के फूल खिले और शादूरी महके-

तेरे ख्याल की खुशबू से जिंदगी महके.’’ डॉ. मधुर नज्मी

‘‘हुस्ने-खुदसर को सुबुकसर करना आसां तो नहीं-

पत्थरों के शहर में शीशानगरी की बात है.’’ आज़म नज्मी

‘काव्यमुखी’ की ओर से वशिष्ठ शादूरी मुजीब बस्तवी और मिलन चौरसियो को स्मृति चिह्न डॉ. मधुर नज्मी, डॉ. कमर मुहम्मदाबादी, एहसान एम. ए., रण विजय मौर्य, आदिल गालिबदुरी के संयुक्त सहयोग से भेंट किया गया. शाहगोला दीवान विद्यालय के प्रबंधक एवम् ‘काव्यमुखी’ के महा-सचिव उपदेश कुमार चतुर्वेदी ने आभार व्यक्त किया.

प्रस्तुतिः उपदेश कुमार चतुर्वेदी

 

महा-सचिव ‘काव्यमुखी’

साहित्यकार डॉ. मधुर जन्मी हिंदी विद्यापीठ के प्रादेशिक कार्यदर्शी- समन्वयक नियुक्त

‘विक्रमशिला हिंदी-विद्यापीठ के कुल सचिव डॉ. देवेन्द्र नाथ साह ने अपने पत्रांक 5020 दिनांक 25-7-2016 के माध्यम से, उत्तर प्रदेश की प्रादेशिक शाखा की घोषणा करते हुए विश्वयात्री, गीतकार, गजलकार, समीक्षक डॉ. मधुर नज्मी को उत्तर प्रदेशीय इकाई का कार्यदर्शी, समन्वयक नियुक्त किया है. समन्वयक के माध्यम से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महा-सचिव, कोषपाल और नव सदस्यीय व्यक्तियों का चयन होगा.

अध्यक्ष, महा-सचिव और कार्यदर्शी समन्वय की सहमति से पांच साहित्यकारों को विद्यासागर (डी. बिट मानद) दस को विद्यावाचस्पति (पी.एच.डी. मानद) दी जायेगी. अन्य 50 उपाधियां विभिन्न संवर्ग से होंगी. यह निर्णय पहली बार उत्तर प्रदेश के लिये, डॉ. मधुर नज्मी के प्रयास से संभव हो सका है. अन्य राज्यों में विद्यापीठ की शाखा समिति का निर्णय विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के अक्टूबर-नवंबर की बैठक में होने की संभावना है. उत्तर प्रदेशीय शाखा के अध्यक्ष सुकवि डॉ. चंद्रभाल सुकुमार पूर्व जिला जज इलाहाबाद और महासचिव डॉ. अरविंद सिंह संपादक ‘शॉर्प रिपोर्टर’ आजमगढ़ होंगे ‘काव्यमुखी साहित्य-अकादमी’ मुहम्मदाबाद गोहना के महानिदेशक, ‘सृजन-संवाद-मंच’ के परिकल्पक, अध्यक्ष डॉ. मधुर नज्मी के इस कामयाब प्रयास के लिये अनेकशः प्रादेशिक साहित्यिक संस्थाओं ने बधाइयां दी हैं.

प्रस्तुतिः डॉ. मधुर नज्मी, मऊ (उ. प्र.)

 

डॉ. कुंवर प्रेमिल सम्मानित

जबलपुरः विगत दिनों जबलपुर में अखिल भारतीय साहित्यिक परिषद् के एक भव्य आयोजन में प्रतिनिध लघुकथाएं के संपादक डॉ. कुंवर प्रेमिल सहित नगर के साहित्यकार मणि मुकुल एवं प्रभा विश्वकर्मा शील को शॉल, श्रीफल एवं मोमेंटो भेंट कर उनके साहित्यिक अवदानों की भी चर्चा संस्था की ओर से की गई. इस शुभ अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर राजेन्द्र ऋषि का भी सम्मान उनके जन्म दिवस के उपलक्ष में किया गया. शहर की साहित्यिक संस्थाएं वर्तिका, जागरण, आंचलिक साहित्यकार परिषद्, अनेकांत सहित अनेक संस्थाओं के सदस्यों की उपस्थित उल्लेखनीय रही.

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की अध्यक्षता डॉ. गुमाश्ता तथा मुख्य अतिथि डॉ. अव्यक्त अग्रवाल के द्वारा संपन्न करायी गई.

श्री शरद अग्रवाल, राज सागरी, डॉ. अभिजात, कृष्ण त्रिपाठी, मनोज शुक्ल ने कार्यक्रम को अंजाम तक पहुंचाने में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराई.

श्री प्रेमिल को नाथद्वारा (राजस्थान) में आयोजित हिन्दी लाओ, देश बचाओ की भव्य आयोजना में ‘हिन्दी साहित्य शिरोमणि’ की मानद उपाधि से भी समाहत किया गया है. स्वास्थय कारणों से उनकी अनुपस्थिति में यह सम्मान डॉ. सुमित्र द्वारा स्वीकार किया गया. बधाई.

प्रस्तुतिः सुरेश तन्मय, उपाध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, जबलपुर

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