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प्राची - नवंबर 2016 - काव्य जगत

काव्य जगत

दो गजलें

डॉ. मधुर नज्मी

शेर जब उभरते हैं संदली ख्यालों से

शाइरी महकती है तब नये सवालों से

अब अदब के गुलशन में फूल कम ही खिलते हैं

जहर फैलते हैं अब बे-अदब रिसालों से

छा रहा है सूरज पर आब का नया टुकड़ा

दूर कर न दे हमको तीरगी उजालों से

बे-परों की पर्वाजें बे-असर ही ठहरेंगी

बस्तियां ही आयेंगी आप की उछालों से

नफरतों का कद शायद छोटा होने वाला है

लोग हो गये वाकिफ रहबरों की चालों से

क्यूं चला नहीं जाता पांव रुक गये हैं क्यूं?

हर जवाब मिल जाता पूछते जो छालों से.

कद्र आदमीयत की अब कहां जमाने में

उन्सियत नहीं रखते लोग जाने वालों से

ऐ ‘मधुर’ अब उम्मीदें खाक हो गयीं सारी

वक्त का ‘मछेरा’ ही घिर गया है जालों से.

ये माना कि फन में भी आई कमी है

फजा में घुली आज भी शाइरी है

जो महरूम फल से है तनकर खड़ी है

सलीके से फलदार टहनी फली है

शबो-रोज की ये अजीयत बड़ी है

गले पर मेरे जिंदगी की छुरी है

उगाती है अब भी ये पौदे अदब के

गजल की जमीं में अभी तक नमी है

उसे चाहकर भी न मैं तोड़ पाऊं

मेरे हाथ में फूल की हथकड़ी है

घुमाये, नचाये, फरेबी बनाये

सियासी जमीं की अजब ये धुरी है

तराशा गया है करीने से जिसको

वही शाख गुलशन में फूली-फली है

बुलाती है देकर सदा ‘गोपियों’ को

अधर पर जो ‘कान्हा’ के इक बांसुरी है

करे क्यूं न रौशन ये दुनिया अदब की

कलम की नुमायां ‘मधुर’ रौशनी है

संपर्कः गोहना मुहम्मदाबाद, जिला- मऊ

पिन-276403 (उ. प्र.)

मोः 09369973494

अनुराधा चन्देल ‘ओस’ की कविताएं

लहरों सुनो

लहरों सुनो...

तेरे विरुद्ध तैरना है मुझे

सागर के गर्भ में छिपे

रत्न की तरह

कुछ सच्चे मोतियों

और शंख की तरह

उत्तर स्वयं के प्रश्न का

ढूंढ़ना है मुझे

लहरों सुनो...

बादल में छुप गये

चन्द्र की तरह

सागर तू मौन क्यों है

बुद्ध की तरह

निःशब्द है धरा

मौन है क्यों गगन

लहरों सुनो...

काशी में एक कबीर के

विद्रोह की तरह

मीरा के प्रेम गीत से

मोहन के राग की तरह

जो तुम नदी के भाव हो

प्रवाह दो मुझे

लहरों सुनो...

कोशिशें

कोशिशें नाकाम नहीं होती हैं

मुश्किलें आसान कहां होती हैं

तितलियों का पता ढूंढ़ती हूं

दिन कहीं, रात कहीं होती है

सांस लेने दो इन हवाओं को

बस्तियां आबाद जहां होती हैं

हम परेशां हैं खामोशियों से

महफिलें आबाद नहीं होती हैं

यूं न रूठा कीजे इश्क की गली में,

कौन आता है नफरतें जहां होती हैं.

वो बच्चा

वो रेत में लिपटा बच्चा

समंदर के किनारे

हड़बड़ाहट में

छूट गयी मां की उंगलियां...

आनेवाले अनेक सपनों को

सजाये हमेशा के लिये सो गया

नाम कुछ भी हो

किसी की आंख का तारा

नौ महीने तक

मां ने सजाया होगा ख्वाब

उसके आने का

एक जलजले ने मिटा दिया

सब कुछ

मां के आंचल की जगह

रेत का आगोश मिला

वो रेत में लिपटा बच्चा.

संपर्कः द्वारा अशोक कुमार सिंह,

ग्राम-पो.- मोहनपुर भवरख, जिला- मीरजापुर-231001 (उ.प्र.)

मो. 09451185136

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