शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

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आलेख

त्रिलोचन : एक नवीन कवि -व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति

डॉ. अजीत प्रियदर्शी

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जन्मः 1 जनवरी, 1978, चौरा, बलिया

(उ.प्र.)

शिक्षाः आरम्भिक एवं उच्च शिक्षा गृह जनपद में.

प्रगतिवादी कवि त्रिलोचन की कविता पर

शोधकार्य इलाहाबाद विश्वविद्याललय से.

पिछले दस वषरें से आलोचनात्मक लेखन. हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक अनेक लेख, शोध-आलेख, समीक्षाएं और साक्षात्कार प्रकाशित.

हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं- मुख्यतः कविता, लोक साहित्य (भोजपुरी, अवधी) में गहरी रुचि.

प्रकाशनः कवि त्रिलोचन (2012 आलोचना), साहित्य भंडार, इलाहाबाद से. आधुनिक कविता पर एक किताब प्रकाशनाधीन.

सम्प्रतिः लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से सहयुक्त महाविद्यालय में हिन्दी के एसोसिएट प्रोफेसर.

सम्पर्कः 1/358, विजयंत खंड, गोमती नगर, लखनऊ-226010

मोः 7376620633, 8687916800

त्रिलोचन का कवि-कर्म उनके जीवन-संघर्ष और व्यक्तित्व से कहीं बहुत गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ है. उनका व्यक्तित्व जितना साधारण है, उतना ही असाधारण भी. उनकी घुमक्कड़ी, अस्त-व्यस्त जीवनचर्या, रहन-सहन, भोजन-शैली, कई बार अनाहार होने के बावजूद मस्त फक्कड़ स्वभाव आदि के विषय में प्रचलित दन्तकथाओं का आवरण हटाकर देखा जाय तो उनके व्यक्तित्व में अत्यन्त संघर्षशीलता, घोर कष्टों में होने के बावजूद अद्भुत धैर्यशीलता और अपराजेय रहने वाली दृढ़ता साफ नजर आती है. 20 अगस्त, 1917 ई. को सुल्तानपुर (उ.प्र.) जिले के एक पिछड़े गांव ‘चिरानीपट्टी’ में जन्म होने और प्रतिकूल तथा अभावग्रस्त पारिवारिक परिस्थितियों के बावजूद ज्ञानार्जन की पिपासा के चलते और जीविकोपार्जन के लिए निरन्तर भाग-दौड़ उनकी जिन्दगी की नियति बन गई. उनके जीवन में बेरोजगारी और मुफलिसी का पलड़ा भारी रहा और नौकरी हमेशा ‘और डाल’ ही साबित हुई. उन्हें अपने जीवन में मिले अनेकानेक संघर्षों से शिकायत भी नहीं रही- ‘आभारी हूं मैं पथ के सारे आघातों का/मिट्टी जिनसे बज्र बनी उन फुटपाथों का.’ (‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’, पृष्ठ 63) अभावों, संघर्षों से भरी जीवन-यात्रा में वे अपराजेय बने रहे- ‘हार नहीं मैं जीते जी मानूंगा/और लडूंगा उत्पातों में.’ (‘ताप के ताए हुए दिन’, पृष्ठ 47). इस संघर्षमय जीवन की जद्दोजेहद में उनका ‘सक्रिय-जीवन’ से प्रेम उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया है.

जीने की जद्दोजेहद में ‘सक्रिय-जीवन’ के प्रति अपार ललक एवं आसक्ति ही त्रिलोचन की सृजनशीलता का बीज-रहस्य है. उसे ही त्रिलोचन पर्त-दर-पर्त विभिन्न दिशाओं में ले जाते हैं और इस प्रकार अपनी रचना का एक संसार संगठित करते हैं. उनके रचना संसार में जीवन के गहरे वैषम्यों का ‘देखा-भोगा चित्र’ ही मिलता है. जीवन के तमाम क्रिया-व्यापारों से गहरा सरोकार रखने वाली कविताओं में उनकी अपनी अनुभूतियां बहुत संयम और तटस्थता के साथ प्रकट होती हैं; बिना किसी उत्तेजना या चीख-पुकार के. जीवन के गहरे मर्मों की अभिव्यक्त करने वाली उनकी कविताओं में न तो छायावादी कल्पना की उड़ान है, न प्रगतिवाद का आक्रोश अथवा आवेग, और न ही नयी कविता की रोमानियत. जो कुछ है उसमें सामान्य जीवन की गहरी सच्चाई की अभिव्यक्ति गहरे लगाव और तटस्थता के द्वन्द्व में अद्भुत संयम के साथ हुई है. उनकी कविता साधारण से साधारण चरित्र या घटना या जीवन-प्रसंग या बिम्ब को पूरे जतन से दर्ज करती है, मानो सब कुछ उनके पास-पड़ोस में ‘जीवन्त’ हो. इसीलिए नामवर सिंह ने उन्हें ‘साधारण का असाधारण कवि’ कहा है.

त्रिलोचन प्रतिबद्ध कवि हैं लेकिन उनकी प्रतिबद्धता का मतलब ‘सिद्धान्त-कथन’ या घिसे-पिटे लेखन से कतई नहीं है. उनके काव्य में ‘जार्गन’ और ‘क्लीशे’ आदि का सीधा प्रयोग प्रायः नहीं हुआ है. अभाव की जिन्दगी से गहरे जुड़े होने के कारण उनके काव्य में अभावग्रस्त ‘सामान्य जन’ के प्रति केवल बौद्धिक सहानुभूति की जगह एक सघन आत्मीयता या लगाव दिखता है. वस्तुतः उनकी कविता में- ‘भाव उन्हीं का सब का है जो थे अभावमय, पर अभाव से दबे नहीं जागे स्वभावमय’ (दिगंत, पृ. 68), इसी कारण उनकी कविता का चरित्र पूरी तरह से जनवादी हो गया है. त्रिलोचन की कविताई का स्रोत उस ‘लोक जीवन’ में है, जिसके वह आत्मीय ‘जन’ हैं. उनकी कविता में प्रकृति हो चाहे जीवन का उल्लास या अभाव, प्रेम हो चाहे जीवन-संघर्ष. इन सबकी संवेदना की जड़ें उस ‘लोक जीवन’ से कहीं बहुत गहरे जुड़ी हैं. गांव के अभावग्रस्त

साधारण जनों के बीच से उठाए गए ‘चरित्र’ त्रिलोचन की कविता में बहुत आये हैं. यथा- भोरई केवट, टेल्हू मुसहर, फेरू कहार, नगई महरा, पांचू, सुकनी बुढ़िया, भिखरिया, अतवारिया, हुब्बी आदि. अनेक कविताओं में त्रिलोचन ने मेहनतकश खेतिहर मजदूर एवं कर्मठ किसानी जीवन के सामूहिक श्रम तथा जीवन-संघर्ष के चित्रों को सहज, अनलंकृत और आत्मीय ढंग से उपस्थित किया है. किसानी जीवन से आत्मीयता तथा तादात्म्य-भाव रखने वाले त्रिलोचन की कविता का मिट्टी, बादल, वर्षा, खेत-खलिहान और गाय-बैलों से गहरा रिश्ता है.

त्रिलोचन की कविता में ‘जीवन-यथार्थ’ की स्वाभाविक अभिव्यक्ति मिलती है. यथार्थ को उन्होंने एक व्यापक जीवन-परिप्रेक्ष्य में स्वस्थ मन से देखा है. उनकी कविता में यथार्थ-प्रतिबिम्बन की एक और विशेषता है- यथार्थ का उसकी गतिमयता में चित्रण. इसलिए जहां उसमें यथार्थ जीवन की वर्तमान विषमताएं और विरूपताएं व्यक्त हुई हैं वहां उनके खिलाफ ‘लड़ता हुआ व्यक्ति और समाज की नई आशा-अभिलाषाएं’ भी व्यक्त हुई हैं. यही कारण है कि उनकी कविता का यथार्थ चित्रण निराशाजनक नहीं है. यहां यह भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि त्रिलोचन के काव्य में अमूर्त्तता की स्थिति नहीं है. उनके काव्य में यथार्थ-जीवन के चित्र, चरित्र, जीवन-प्रसंग और जीवनानुभव ही अधिक आते हैं, जिनमें बड़ी स्वाभाविकता, स्पष्टता और जीवन्त चित्रमयता होती है.

गहन राग-भाव या ‘प्रेम’ त्रिलोचन की काव्य-संवेदना का एक महत्त्वपूर्ण अन्तःस्रोत के रूप में दृष्टिगत होता है. त्रिलोचन के लिए ‘प्रेम’ व्यक्ति को समाज से जोड़ने वाला सहज, अकुंठ, अकृत्रिम अनुभव है. उनकी स्वस्थ प्रणय-भावना उनकी जीवनासक्ति या जीवन-प्रेम का ही पर्याय है. त्रिलोचन के प्रणय-चित्रण में न तो रीतिकालीन अति शृंगारिकता है, न द्विवेदीयुगीन नैतिकतावाद; न तो छायावादी विरहाकुलता और अशरीरीपन है, न ही रूमानी कविता का वासनावाद; न तो प्रयोगवादी कविता का यौन-कुंठा है, न ही उसका एण्टी-रोमैण्टिसिज्म. उन्होंने अनेक प्रेम कविताएं सहधर्मिणी को लक्ष्य करके लिखा है, जिसमें साथीपन का व्यापक भाव मौजूद है. उसका ‘प्रेम’ उनमें जीवन की ललक को बढ़ाता है और जीवन-संघर्ष में संबल प्रदान करता है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि त्रिलोचन की कविता में ‘नारी’ की व्यथा, असहायता, हीन दशा और उसके ‘राग-दिप्त मानस’ की गहराई का पता देने वाले चित्र या चरित्र अधिक मिलते हैं. उनके यहां नारी के सौंदर्य चित्रों में उसके शारीरिक सौंदर्य की अपेक्षा हृदय के अनुराग और माधुर्य की अभिव्यक्ति अधिक हुई है. उनके काव्य में ‘नारी’ पुरुष की सहचरी, सहधर्मिणी के रूप में उसके जीवन-संघर्ष और शारीरिक श्रम में बराबर का हिस्सेदार दिखाई देती है.

त्रिलोचन के यहां ‘आत्म-परक’ कविताओं की संख्या बहुत अधिक है. शायद, आधुनिक हिन्दी कविता में सबसे

अधिक. लेकिन त्रिलोचन की कविता का ‘मैं’ भी, उनकी कविता के अन्य चरित्रों के समान, एक खास जीवन्त ‘चरित्र’ के रूप में ही मौजूद है. उनकी कविताओं में ‘मैं’ अक्सर चीर भरा पाजामा पहने, अनाहार, किन्तु अपना स्वाभिमान अक्षत रखे हुए हैं, उसका मन अदीन है. अपने ‘आत्म’ से अनात्म की हद तक तटस्थता बरतते हुए और अद्भुत आत्मनियंत्रण या आत्मसंयम का परिचय देते हुए, वे वैयक्तिक ‘मैं’ को ही ‘सामान्य भारतीय जन’ का लघुत्तम समापवर्तक बना देते हैं. अपनी आत्मपरक कविताओं में ‘त्रिलोचन’ नाम का प्रयोग प्रायः ‘अन्यपुरुष’ में करके, अपने ‘आत्म’ के प्रति गहरी निर्मम दृष्टि रखते हुए, वे कई बार मानो स्वयं की ही धज्जियां उड़ाते हैं. यथा- ‘भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल/जिसको समझे था है तो है यह फौलादी.’ (उस जनपद का कवि हूं, पृ. 13). अपने प्रति ऐसी अचूक निर्मम दृष्टि समकालीन साहित्य में दुर्लभ है.

त्रिलोचन के कवि की एक बड़ी विशेषता है, उसका संयमित स्वर. काव्य-रचना के क्रम में कवि प्रायः उद्विग्न नहीं होता. वह चाहे राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य कर रहा हो, चाहे अपनी देखी-भोगी गरीबी का बयान कर रहा हो अथवा मुक्ति का आह्वान, कहीं भी तीव्र भावाकुल आवेग, प्रहार या ललकार की मुद्रा नहीं अपनाता. आवेगों की रास तनी रहती है, वह उन्हें उन्मुक्त नहीं छोड़ता. यहां तक कि अपने ‘आत्म’ पर लिखते समय भी अद्भुत संयम और तटस्थता का निर्वाह करता है. वास्तव में, त्रिलोचन घटनाओं के प्रभाव में तीव्र आवेग के कवि नहीं हैं, बल्कि घटनाओं के मूल में स्थित जीवन-संवेगों के स्थिर आवेग के कवि हैं. इसीलिए उनकी कविता में सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं का चित्रण/वर्णन कम हैं और मानव-जीवन की दशाओं और अनुभवों की अभिव्यक्ति अधिक है. उनके यहां ‘तात्कालिक’ या प्रचलित अर्थ में राजनीतिक कविताएं अत्यल्प हैं. उनके काव्य में राजनीतिक संदर्भ को केवल कुछ शब्द-संकेतों और इशारों के जरिए ही पकड़ा जा सकता है.

कबीर, तुलसी, गालिब, निराला आदि की सामन्त-विरोधी, साम्राज्य-विरोधी, जनवादी और मानवतावादी स्वर प्रधान ‘जातीय’ परम्परा का ही विकास है त्रिलोचन की कविता. इन कवियों पर कविताएं लिखकर त्रिलोचन ने अपनी परम्परा को रेखांकित किया है. उन्होंने तुलसी को अपना ‘काव्य-गुरू’ माना है. तुलसीदास के समान त्रिलोचन के काव्य में ‘अवध’ जनपद- ‘भाषा, संस्कार, जीवन-संस्कृति, जनता के दुःख-दैन्य, हर्ष-उल्लास और आकांक्षाओं’ आदि के साथ समग्रता से उपस्थित होता है. कबीर और तुलसी की तरह त्रिलोचन अपने समय के लोककंठ से फूटी ध्वनियों के कवि हैं. उनका कहना है- ‘ध्वनिग्राहक हूं मैं. समाज में उठने वाली ध्वनियां पकड़ लिया करता हूं.’ (दिगंत, पृ. 25) इसी ‘ध्वनिग्राहकता’ के स्थापत्य से बुनी हुई हैं ‘चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’, ‘जीवन का एक लघु प्रसंग’, ‘नगई महरा’ और ‘छोटू’ जैसी अनेक कविताएं. ‘अमोला’ संग्रह में त्रिलोचन ने हिन्दी के अपने जातीय छन्द ‘बरवै’ में, अवध की जनपदीय बोली में युग की पीड़ा को ‘अनुभूत-निजता’ के साथ अभिव्यक्त किया है. इस संग्रह के बरवै ‘दाउद महमूद तुलसी’ की लोक-परम्परा में आते हैं. बानगी के लिए-‘घेरइं हेरइं गर्जइं बरसइं जाइं/बादर भुइं कर ताप ताकि अफनाइं.’ (अमोला, पृ. 11) त्रिलोचन की कविता में कबीर, तुलसी, सूर आदि के समान गहन आत्मविश्लेषण भी मौजूद है. उनका कहना है- ‘कड़ी से कड़ी भाषा में दोष बताओ/मुझ को मेरे, सदा रहूंगा मैं आभारी.’ (फूल नाम है एक, पृ. 69)

त्रिलोचन की कविता का प्राण-तत्त्व ‘सहजता’ है. ‘राग’ शीर्षक कविता में शमशेर ने कहा है- ‘‘सरलता का आकाश था/जैसे त्रिलोचन की रचनाएं.’ तुमने ‘धरती’ का पद्य पढ़ा है? उसकी सहजता प्राण है.’’ ‘सहजता’ त्रिलोचन के स्वभाव में है. जैसा सहज उनका व्यक्तित्व है, वैसी सहज उनकी अभिव्यक्ति-पद्धति और कविता है. आधुनिक शिल्प में जिस ‘रूपगत चमत्कार’ या कलात्मक निपुणता को तरजीह दी जाती है, वह त्रिलोचन की कविता के संदर्भ में, उसके आरम्भिक विकास-काल से ही, अप्रासंगिक है. सीधी-सादी अभिव्यक्ति-पद्धति, ‘स्वाभाविक’ कथन-भंगिमा और सीधी-सहज-निरलंकृत भाषा-शैली ही त्रिलोचन के कृति-व्यक्तित्व की विशिष्टता है. त्रिलोचन की कविता में- ‘सहजता का आलोक’ -स्पष्ट कथनों, पूरे-पूरे वाक्यों, लोक से जुड़ी भाषा और भाव-संवेदना आदि रूपों में दिखता है. भाषा की गद्यात्मकता और वर्णनात्मक तकनीक त्रिलोचन की कविता के सबसे विशिष्ट गुण हैं. उनकी कविता में सीधे-सीधे वर्णन की तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे वस्तुओं को उनके नैसर्गिक ‘वस्तुगत’ रूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि किसी ‘अन्य’ के प्रतीक रूप में. बिम्ब और प्रतीकों के प्रयोग से बुनी जटिल भाषा-शैली से अलग, त्रिलोचन की सीधी-कथन वाली शैली को शमशेर ने ‘सपाट’ ;ैजतंपहीजद्ध कहा है. ‘सपाट-बयानी’ की शैली, जो सातवें दशक में कविता की अतिशय बिम्बवादी रुझान से मुक्ति के लिए सामने आई, त्रिलोचन के यहां अपने आरम्भिक रूप में शुरू से ही मौजूद है. त्रिलोचन की कविता में ‘सपाट-बयानी’ की अपनी खास शैली में ठेठ या स्वाभाविक वर्णनात्मकता, कथात्मकता और ‘सबकी बोली-ठोली, लाग-लपेट, टेक, भाषा, मुहावरा, भाव’ से भरी-पूरी ‘संवादमयता’ की मौजूदगी है.

‘सब कुछ सब कुछ सब कुछ सब कुछ सब कुछ भाषा’ (दिगंत, पृ. 67)- कहने वाले त्रिलोचन के लिए ‘भाषा’ केवल अभिव्यक्ति का साधन-मात्र न होकर उस ‘जीवन’ को समग्रता से जानने का साधन भी है, जिसकी अभिव्यक्ति भाषा के जरिए वे कविता में करते हैं. उनके लिए ‘भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है,/गति में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है.’ (दिगंत, पृ. 67) अपनी कविता में ‘जीवन की हलचल युक्त भाषा’ देने के लिए ही वह समाज के बीच गहरे पैठते हैं और ‘ध्वनिग्राहक’ की तरह समाज में उठने वाली ध्वनियों को पकड़ लिया करते हैं. वे जीवन में घुले-मिले शब्दों को टोहते हैं और उन शब्दों के सहारे जीवन की तलाश करते हैं- ‘शब्द शब्द से व्यंजित जीवन की तलाश में कवि भटका करता है.’ (शब्द, पृ. 35), भाषा में त्रिलोचन ‘क्रिया’ को सबसे अधिक महत्त्व देते हैं, शायद इसलिए कि, ‘जीवन की हलचल’ की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त रूप ‘क्रिया’ ही होती है. ‘क्रिया’ पूरी करने के लिए ही शायद, वे कविता में हमेशा ‘एक पूरा वाक्य’ लिखने पर जोर देते हैं. त्रिलोचन की भाषा का गहरा सम्बन्ध जीवन की क्रियाशील एवं जीवित भाषा से सतत रहता है और वह भाषा जीवन के विपुल एवं विविध अनुभवों से निर्मित होती है. हिन्दी भाषा, अपनी जातीय स्मृतियों और असंख्य अन्तर्ध्वनियों के साथ, सचमुच उनका घर है.

त्रिलोचन के रचनात्मक व्यक्तित्व में एक विचित्र

विरोधाभास दिखता है. उनकी कविताओं में कई बार जीवन की स्वाभाविक अनगढ़ता या ऊबड़खाबड़पन दिखाई पड़ता है, जबकि बहुधा कला की दृष्टि से एक अद्भुत क्लासिक कसाव या अनुशासन भी मिलता है, खासकर सॉनेटों में. त्रिलोचन ने फार्म के स्तर पर सर्वाधिक प्रयोग किया है. गीत, गजल, सॉनेट, बरवै, कुण्डलिया, मुक्त छन्द, गद्य-कविता आदि फार्म का सफल उपयोग उन्होंने किया है. लेकिन इन सब में ‘एक पूरा वाक्य’ लिखने की त्रिलोचन की जिद बराबर बनी रही. उनके सॉनेटों में अद्भुत सृजनात्मक अनुशासन के साथ ही बातचीत की स्वच्छन्द गतिमयता भी मिलती है. सॉनेटों में शब्दों की जैसी मितव्ययिता, शिल्पगत कसाव और भाषा में बातचीत की स्वाभाविक गतिमयता मिलती है, वैसा निराला को छोड़कर

आधुनिक हिन्दी कविता में अन्यत्र मिलना मुश्किल है. सच तो यह है कि त्रिलोचन ने ‘सॉनेट’ जैसे विजातीय काव्यरूप को हिन्दी की भाषिक प्रकृति और जातीय छन्द ‘रोला’ की बोलचाल वाली ‘गद्यात्मक’ लय के अनुरूप ढालकर एक ऐसी नयी काव्य-विधा का आविष्कार किया है, जो लगभग हिन्दी की अपनी विरासत और त्रिलोचन की खास पहचान बन गया है.

जनपदीयता, साधारण की अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति में सच्चाई और सहजता या अनायसता, बेलाग सादगी और

असाधारण साधारणता, सेंटीमेंटेलिटी का अभाव एवं तटस्थ दृष्टि जैसे विशिष्टताएं त्रिलोचन के काव्य-व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं. इन विशिष्टताओं के कारण अपनी समकालीन कविता के बीच त्रिलोचन की अपनी काव्यभूमि सबसे अलग दिखती है. जन-जीवन के अंतरंग अनुभवों को एक व्यापक आधार देने वाली कविता-धारा में त्रिलोचन का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना रहेगा. त्रिलोचन इस दृष्टि से अनोखे और व्यक्तित्व-सम्पन्न कवि हैं कि आधुनिकतावाद के विरुद्ध उनका रचनात्मक संघर्ष बिना व्यवधान के ही समझ में आता है. उनका काव्य-स्वर स्पष्ट व प्रभावशाली है और उनकी जनसम्बद्धता को कलात्मक होने का न कोई दंभ है, और न कोई लोभ. विकट से विकटतर जीवन-स्थितियों में भी, हर हालत में उनका लेखन कुंठा पर आशा की, अधोगति पर उत्थान की, और पराभव पर उर्ध्वमुखी जीवन की विजय का उद्घोष करता हुआ जान पड़ता है. अनथक जीवन संघर्ष में उनका यह आत्मउद्बोधन सभी को प्रेरणा देता रहेगा-

... ... ... ... ... ... ... ...उठ, हियाव कर;

अभी सामने सारा रास्ता पड़ा हुआ है.

चमड़ा छिला, चोट काफ़ी घुटनों को आई.

मलकर पांव झटक दे, चल फिर, नये भाव भर;

मानव है तू, अपने पैरों खड़ा हुआ है.

(उस जनपद का कवि हूं, पृष्ठ 104)

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