शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

प्राची - नवंबर 2016 / संस्मरण / त्रिलोचनः यादों के झरोखे से / अनिल जनविजय

संस्मरण

त्रिलोचनः यादों के झरोखे से

अनिल जनविजय

लेखक-परिचय

जन्म तिथि- 28 जुलाई 1957

जन्म स्थान- बरेली (उत्तर प्रदेश) में

शिक्षा- मास्को स्थित गोर्की साहित्य संस्थान से सृजनात्मक साहित्य विषय में एम. ए.

बचपन से ही साहित्य में दिलचस्पी रही 15-16 वर्ष की उम्र से ही हिन्दी की पुस्तकों की प्रूफ रीडिंग और सम््पादन करने लगे. फिर कई अखबारों में उपसं्पादक रहे.

सम्प्रति- साढ़े तीन दशक तक मास्को रेडियो में हिन्दी में प्रसारण. पिछले पन्द्रह साल से मास्को विश्वविद्यालय (रूस) में ‘हिन्दी साहित्य’ और ‘अनुवाद’ का अध्यापन

संपादकीय अनुभव- ‘कविता कोश’, ‘गद्यकोश’ और ‘भाषान्तर’ जैसी साहित्यिक वेबसाइटों के संपादक.

भोपाल से प्रकाशित ‘रचना समय’ के संपादक.

आजकल ‘रूस-भारत संवाद’ नामक रूस की एक हिन्दी वेबसाइट के सम््पादक.

कृतियां- चार कविता-संग्रह प्रकाशित.

अनुवाद- दुनिया-भर के सौ से ज्यादा कवियों की कविताओं के रूसी और अंग्रेजी भाषाओं से अनुवाद किए. अनुदित कविताओं की भी सात किताबें प्रकाशित. चेखफ और गोर्की की कहानियों के अनुवाद किए.

दरणीय त्रिलोचन जी का निधन हो गया, यह जानकर मैं बहुत उद्वेलित हुआ हूं. त्रिलोचन जी से कभी मेरी बहुत गहरी दोस्ती थी. तब मैं सिर्फ बीस-इक्कीस साल का था और त्रिलोचन जी साठ-इकसठ के. उनके साथ मेरी खूब घुटती थी. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ता था. और उन्हीं की तरह फक्कड़ था. उनसे मेरी मुलाकात बाबा नागार्जुन ने कराई थी. त्रिलोचन जी दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू-हिन्दी शब्दकोश की किसी परियोजना में काम कर रहे थे. बस, मैं रोज सवेरे उनके दफ्तर पहुंच जाता और देर शाम तक उन्हीं के साथ रहता. कितनी ही बार ऐसा हुआ कि मुझे चाय तक त्रिलोचन जी पिलाते थे क्योंकि उन दिनों मेरे पास चाय तक के पैसे नहीं होते थे. जब उनके पास भी पैसे नहीं होते थे, तो वे मुझे देख कर बड़े बेचैन हो जाते थे. उनकी वह बेचैनी मुझ से देखी नहीं जाती थी. लेकिन उनकी बातों का रस ही मेरा पेट भरने के लिए काफी होता था.

एक बार मैं दो दिन का भूखा था. पता नहीं कैसे यह बात त्रिलोचन जी भांप गए थे. उस दिन उन्होंने मुझे अपने साथ चलने और खाना खाने का निमंत्रण दिया. त्रिलोचन जी उन दिनों दिल्ली में मॉडल टाऊन में एक मकान के तिमंजिले पर किराए पर रहते थे. दो छोटे-छोटे कमरे थे, जिनमें से एक कमरा बहुत छोटा-सा था, जिसमें अम्मा (त्रिलोचन जी की पत्नी, जिन्हें मैं अम्मा कहकर ही पुकारता था) ने रसोई बना रखी थी. तो उस दिन हम दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय से पैदल चलकर जब त्रिलोचन जी के घर मॉडल टाऊन में पहुंचे तब-तक अंधेरा हो चुका था. समय होगा यही कोई आठ बजे का. अम्मा त्रिलोचन जी को देख कर कुछ बुड़बुड़ाने लगी थीं. त्रिलोचन जी ने पहले खुद अपने हाथ और मुंह धोया और फिर मुझ से हाथ-मुंह धोने को कहा. मैं हाथ-मुंह धो ही रहा था कि तब तक त्रिलोचन जी ने अम्मा को यह बता दिया-

‘अनिल भी आज हमारे साथ ही खाना खाएंगे’.

बस अम्मा का गुस्सा सातवें आसमान पर था. अम्मा जोर-जोर से त्रिलोचन जी को डांटने लगीं. पता यह लगा कि त्रिलोचन जी एक दिन पहले शाम को घर से यह कहकर निकले थे कि वे आटा लेने जा रहे हैं और उसके बाद फिर अगले दिन मेरे साथ ही घर में घुसे थे. वे भूल गए थे कि आटा भी लाना है. अम्मा दो दिन से भूखी थीं. और खुद त्रिलोचन जी भी. त्रिलोचन जी ने मुझे बताया कि बात यह नहीं है. उनका ख्याल था कि इतना आटा तो घर में था ही कि तीन चार दिन निकल जाए. इसलिए उन्होंने चिन्ता नहीं की. लेकिन अब क्या हो? न आटा ही घर में था और न ही जेब में कानी-कौड़ी. कुछ देर तक त्रिलोचन जी अम्मा से बहस करते रहे. फिर मुझे लेकर निकल पड़े. बोले- चलो, तुम्हें खाना खिलाकर लाता हूं. मैं मना करता रहा पर उन्होंने मेरी एक न सुनी. हम अजय सिंह के घर पहुंचे. रात के दस बज रहे थे. उन दिनों शमशेर जी अजय सिंह के साथ रहते थे. अजय सिंह भी वहीं माडल टाऊन में रहा करते थे. जब हम अजय जी के घर पहुंचे तो देखा कि उनके घर में सिर्फ एक ही कमरे की बत्ती जल रही है. त्रिलोचन जी ने डरते-डरते दरवाजा खटखटाया. एक बार कुंडी खड़खड़ाने पर ही तुरन्त ही दरवाजा खुल गया. दरवाजे पर अजय जी थे. त्रिलोचन जी को देखकर आश्चर्यचकित हुए और कहा-

‘अरे आप? इतनी देर से? क्या हो गया? सब ठीक तो है न?’

त्रिलोचन जी ने कहा- ‘हां, सब ठीक-ठाक है. शमशेर जी हैं क्या? जाग रहे हैं या सो रहे हैं? बस, उनसे मिलने का मन हुआ और हम चले आए. इनसे मिलिए. इन्हें जानते हैं? ये अनिल हैं. ये भी कविता लिखते हैं.’

अजय जी ने हमें अन्दर आने को कहा और शमशेर जी को बुलाने चले गए. शमशेर जी तब तक लेट चुके थे. लेकिन यह पता लगने पर कि त्रिलोचन जी मिलने आए हैं तुरन्त उठकर आए और पूछा- ‘क्या बात है, सब ठीक तो है न’

त्रिलोचन जी ने कहा- ‘हां, सब ठीक है. ये अनिल हैं.कविता लिखते हैं. आप से मिलना चाहते थे, इसलिए आपसे मिलवाने के लिए ले आया. फिर कुछ देर इधर-उधर की बातें होती रहीं.

त्रिलोचन जी ने पूछा- ‘खाना-वाना हो गया.’

अजय जी ने बताया- हां, सर्दियों के दिन हैं, इसलिए जल्दी ही खा लेते हैं. उसके बाद उन्होंने तुरन्त ही पूछा- और आप लोगों ने खाना खा लिया.

त्रिलोचन जी ने कहा- ‘हां, हमने भी जल्दी ही खा लिया था. इनका पता नहीं. इनसे पूछ लीजिए.’

मैंने भी यही बताया कि मैं खाना खा चुका हूं. हालांकि त्रिलोचन जी ने दो बार कहा मुझसे- ‘नहीं खाया हो तो खा लो.’

लेकिन मैंने दोनों बार यही कहा कि मैं खाना खा चुका हूं. थोड़ी देर और बैठ कर हम लोग वहां से निकल पड़े. बाहर निकल कर त्रिलोचन जी ने मुझ से कहा- ‘आप तो खा ही सकते थे.’

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मैंने कहा- ‘और आप भूखे रहते. घर पर अम्मा भी तो भूखी हैं’.

इस पर त्रिलोचन जी ने कहा- ‘तो क्या हुआ.’ और फिर मौन धारण कर लिया.’

रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे. त्रिलोचन जी के घर तक हम दोनों एकदम मौन लौटे. घर पहुंचे तो अम्मा जाग रही थीं.मुझे देखकर वे अपनी खाट से उठीं और रसोई में सोने के लिए चली गईं. रसोई में कोई चारपाई नहीं थी. उन्होंने जमीन पर ही अपनी दरी बिछा ली थी. यह देखकर मैं त्रिलोचन जी से कहता रहा कि मैं अपने घर चला जाऊंगा आप लोग सोइये. लेकिन त्रिलोचन जी ने मुझे नहीं लौटने दिया. कहा कि सवेरे चाय पी कर जाना. फिर मैंने कहा कि मैं जमीन पर दरी बिछा कर सो जाता हूं. चारपाई पर अम्मा सो जाएं. मेरी इस बात पर त्रिलोचन जी ने अपनी चारपाई अम्मा के लिए रसोई में बिछा दी. और अपनी दरी जमीन पर बिछा ली. फिर मेरे बार-बार कहने के बावजूद वे जमीन पर ही सोए. रात भर हम तीनों में से कोई नहीं सोया. कभी अम्मा उठतीं, कभी त्रिलोचन जी. मैं तो करवटें बदल ही रहा था. सुबह होते ही त्रिलोचन जी ने अम्मा से चाय बनाने को कहा. अम्मा ने बताया कि खांड नहीं है और दूध भी. लेकिन फिर भी अम्मा ने बिना चीनी और दूध की चाय मुझे पीने के लिए दी. मैंने वह चाय पी. सच मानिए उससे मीठी चाय मैंने आज तक नहीं पी है. उसमें स्नेह की जो मिठास घुली हुई थी, उस मिठास के लिए आज तक मन तरसता है. आज मैं पच्चीस बरस से मास्को में हूं. तब मैं मास्को भी त्रिलोचन जी की बात मानकर ही आया था. अगर तब यहां न आया होता तो न जाने आज कहां होता?

प्रेम, बतरस और कविताई

त्रिलोचन जी नहीं रहे. यह खबर इंटरनेट से ही मिली. मैं बेहद उद्विग्न और बेचैन हो गया. मुझे वे पुराने दिन याद आ रहे थे, जब मैं करीब-करीब रोज ही उनके पास जाकर बैठता था. बतरस का जो मजा त्रिलोचन जी के साथ आता था, वह बात मैंने किसी और कवि के साथ कभी महसूस नहीं की.

त्रिलोचन जी से बड़ा गप्पबाज भी नहीं देखा. गप्प को सच बना कर कहना और इतने यथार्थवादी रूप में प्रस्तुत करना कि उसे लोग सच मान लें, त्रिलोचन को ही आता था. नामवर जी त्रिलोचन के गहरे मित्र थे. वे उनकी युवावस्था के मित्र थे, इसलिए उनकी ज्यादातर गप्पों के नायक भी वे ही होते थे. शुरू-शुरू में जब उनसे मुलाकात हुई थी तो मैं उनकी बातों को सच मानता था लेकिन बाद में पता लगा कि ये सब उनकी कपोल-कल्पनाएं थीं.बाद में मैं भी उन्हें ऐसी ही कहानियां और किस्से बना-बना कर सुनाने लगा. हिन्दी के चर्चित कवियों, लेखकों और आलोचकों को लेकर वे किस्से होते थे. जिनमें दस से पन्द्रह प्रतिशत यथार्थ का अंश रहता था, बाकी कल्पना की उड़ान. बस, इसी बात पर मेरी उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और हम दोस्त हो गए.

वे मुझ से पूरे चालीस साल बड़े थे. लेकिन उनका व्यवहार मुझ से हमेशा ऐसा रहा, मानों मैं ही उनसे बड़ा हूं. उन दिनों आदरणीय अशोक वाजपेयी मध्यप्रदेश सरकार में संस्कृति सचिव थे और यह समझिए कि भारत भर के कवियों, चित्रकारों, नाटककारों, नर्तकों, संगीतकारों सभी की मौज हो गई थी. जिन्हें भारत के सरकारी हल्कों में कोई टके को नहीं पूछता था, हिन्दी के उन लेखकों को, प्रतिष्ठित लेखकों को और कलाकारों को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा मान-सम्मान दिया जाने लगा. भोपाल में कलाओं के केन्द्र के रूप में अशोक वाजपेयी भारत-भवन का निर्माण करा रहे थे. तभी वाजपेयी जी ने एक आंदोलन-सा चलाया ‘कविता की वापसी’. मध्यप्रदेश का पूरा सरकारी संस्कृति विभाग कविता को वापिस लाने में जुट गया. वाजपेयी जी ने मध्यप्रदेश के हिन्दी के कवियों और हिन्दी के प्रतिष्ठित कवियों के कविता- संग्रहों की सौ-सौ प्रतियां खरीदने की घोषणा कर दी. बस, फिर क्या था. प्रकाशकों की बन आई. प्रकाशकों ने मध्यप्रदेश के कवियों को ढूंढ़ना शुरू किया और हर छोटे-बड़े कवि का कविता-संग्रह छप कर बाजार में आ गया. लेकिन ‘कविता की वापसी’ का फायदा यह हुआ कि हिन्दी के उन बड़े-बड़े कवियों के संग्रह भी छपे, जो मध्यप्रदेश सरकार द्वारा की जाने वाली उस खरीद में आ सकते थे. संभावना प्रकाशन, हापुड़ ने भी बहुत से कवियों को छापने की योजना बनाई. उन्हीं में बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन जी के कविता-संग्रह भी थे. मैं उन दिनों हिन्दी में एम.ए. कर रहा था और बेरोजगार था. संभावना प्रकाशन के मालिक और हिन्दी के बेहद अच्छे और प्रसिद्ध कहानीकार भाई अशोक अग्रवाल ने मेरी मदद करने के लिए पांच कविता-संग्रहों के प्रोडक्शन की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी. उनमें त्रिलोचन जी का कविता-संग्रह ‘ताप के ताये हुए दिन’ और बाबा नागार्जुन का कविता-संग्रह ‘खिचड़ी-विप्लव देखा हमने’ भी शामिल थे. त्रिलोचन जी का कविता संग्रह करीब तेईस साल बाद आ रहा था. इससे पहले 1957 में उनका ‘दिगंत’ छपा था. 1957 मेरा जन्म-वर्ष भी है. संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जिस दिन त्रिलोचन जी का कविता-संग्रह छप कर आया उस दिन मेरा जन्मदिन था. तो मैं बाइन्डर के यहां से ‘ताप के ताये हुए दिन’ की पहली प्रति लेकर त्रिलोचन जी के पास पहुंचा. किताब अभी गीली थी और उसकी बाइन्डिंग पूरी तरह से सूखी नहीं थी.

त्रिलोचन जी पुस्तक देखकर प्रसन्न हुए. उनके मुख पर मुस्कराहट छा गई. बड़ी देर तक वे अपने उस संग्रह को उलटते-पलटते रहे. फिर बोले- ‘पूरे तेईस साल बाद आई है किताब. मैंने कहा- ‘जी हां, मैं भी तेईस साल का हूं. आज ही मेरा जन्मदिन है. मेरे जन्मदिवस पर आपको मिला है यह उपहार.लेकिन आपका जन्मदिन भी तो आने वाला है जल्दी ही. यह समझिए कि आपके जन्मदिवस पर आपको यह उपहार मिला है.त्रिलोचन जी हंसे अपनी मोहक, लुभावनी हंसी. फिर बोले- ‘चलिए, इस खुशी में आपको पान खिलाते हैं. एक पंथ दो काज हो जाएंगे. आपका जन्मदिन भी मना लेंगे और इस किताब के आगमन की खुशी भी मना लेंगे.’

हम लोग पान वाले के ठीये पर पहुंचे. पान खाया. उन्होंने कुछ देर पान वाले से गप्प लड़ाई. उसके भाई का, बच्चों का और घरैतन का हाल-चाल पूछा. उसके बाद हम लोगों ने वहीं पास के दूसरे ठीये पर जाकर चाय पी. चाय पीने के बाद हम दोनों उनके दफ्तर में वापिस लौट आए. शाम को मुझे किताबों का बंडल लेकर हापुड़ जाना था. मैं जरा जल्दी में था. मैंने त्रिलोचन जी से विदा मांगी. त्रिलोचन जी ने कहा- ‘एक मिनट रुकिए. उसके बाद उन्होंने ‘ताप के ताये हुए दिन’ की वह पहली प्रति उठाई और उस पर लिखा- ‘अनिल जनविजय को, जो कवि तो हैं ही, बतरस के अच्छे साथी भी हैं.’ त्रिलोचन जी का वह कविता-संग्रह इस समय भी जब मैं उन्हें स्मरण कर रहा हूं, मेरे सामने रखा हुआ है. उस संग्रह पर सबसे अंतिम पृष्ठ पर मेरी लिखावट में छह पंक्तियां लिखी हुई हैं. उन्हीं दिनों कभी लिखी थीं मैंने. वे काव्य-पंक्तियां इस प्रकार हैं :

हिन्दी के संपादक से मेरी बस यही लड़ाई

वो कहता है मुझ से, तुम कवि नहीं हो भाई

तुम्हारी कविता में कोई दम नहीं है

जनता की पीड़ा नहीं है, जन नहीं है

इसमें तो बिल्कुल भी अपनापन नहीं है

नागार्जुन तो है, पर त्रिलोचन नहीं है.

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