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प्राची - नवम्बर - 2016 : त्रिलोचन की कविताएँ

त्रिलोचन शताब्दी वर्ष पर विशेष

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त्रिलोचन का परिचय

जन्म-तिथि : 20 अगस्त, 1917

जन्म स्थान : गांव- कटघरापट्टी-चिरानीपट्टी, जिला- सुल्तानपुर (उ.प्र.).

शिक्षा : अरबी-फारसी शिक्षा, साहित्य रत्न, शास्त्री, अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. (पूर्वार्द्ध) काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी.

हिंदी के वरिष्ठतम कवियों में से एक.

जीविका के लिए बरसों पत्रकारिता और अध्यापन-कार्य. हंस, कहानी, वानर, प्रदीप, चित्ररेखा, आज, समाज और जनवार्ता आदि पत्र-पत्रिकाओं में संपादन-कार्य.

1952-53 में गणेशराय नेशनल इंटर कॉलेज, जौनपुर में अंग्रेजी के प्रवक्ता रहे. 1967-72 के दौरान वाराणसी में विदेशी छात्रों को हिंदी, संस्कृत और उर्दू की व्यावहारिक शिक्षा प्रदान की. उर्दू विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय की द्वैभाषिक कोश (उर्दू-हिंदी) परियोजना में कार्य (1978-84). मुक्तिबोध सृजनपीठ, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) के अध्यक्ष रहे.

अनेक पुरस्कारों से सम्मनित- जिनमें प्रमुख हैं : साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान सम्मान-पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (म. प्र.), हिंदी अकादमी (दिल्ली) का श्लाका सम्मान, मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का भवानीप्रसाद मिश्र राष्ट्रीय पुरस्कार, सुलभ साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद् (कोलकाता) सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान.

प्रकाशित कृतियां : कविता-संग्रह : ‘धरती’ (1945), ‘गुलाब और बुलबुल (1956), ‘दिंगत’ (1957), ‘ताप के ताए हुए दिन’ (1980), ‘शब्द’ (1980), ‘उस जनपद का कवि हूं’ (1981), ‘अरघान’ (1984), ‘तुम्हें सौंपता हूं’ (1985), ‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’ (1985), ‘अमोला’ (1990), ‘मेरा घर’ (2002), ‘जीने की कला’ (2004). कहानी-संग्रह : ‘देशकाल’ (1986), डायरी : ‘रोजनामचा’ (1992), आलोचना : ‘काव्य और अर्थबोध’ (1995) संपादन : ‘मुक्तिबोध की कविताएं’ (1991).

अन्य : ‘प्रतिनिधि कविताएं’ (1985) सं. केदारनाथ सिंह, ‘साक्षात् त्रिलोचन’ (1990) लंबी बातचीत-दिविक रमेश/कमलाकांत द्विवेदी, ‘त्रिलोचन के बारे में’ (1994) सं. गोविंद प्रसाद, ‘त्रिलोचन संचयिता’ (2002) सं. ध्रुव शुक्ल, ‘मेरे साक्षात्कार’ (2004) बातचीत- सं. श्याम सुशील, ‘बात मेरी कविता’ (2009) त्रिलोचन की चुनी हुई अपनी कविताएं.

निधन : 9 दिसंबर, 2007

 

आलोचना

त्रिलोचन की कविताएं

नामवर सिंह

त्रिलोचन की कविता एक नए काव्यशास्त्र की मांग करती है. शास्त्रीयता की गंध के कारण ‘काव्यशास्त्र’ शब्द से परहेज हो तो जो चाहे काव्य-दृष्टि कह लीजिए, फर्क नहीं पड़ता. नई काव्य-दृष्टि से तात्पर्य है कविता संबंधी चालू धारणाओं के दायरे से बाहर निकलना. अंग्रेजी में जिसे ‘कैनन’ कहते हैं उसे चुनौती देना, बदलना. इस काव्य-दृष्टि के सूत्र, सौभाग्य से, स्वयं कवि के काव्य में सुलभ हैं. न भूलें कि त्रिलोचन कवि ही नहीं, शास्त्री भी हैं. कवि ने स्वयं कहा है-

मैं बहुत अलग कहीं और हूं,

खोज लो मैं कहां हूं

मुझे शब्द शब्द में देखो

मैं कहां हूं.

ये पंक्तियां ‘मैं-तुम’ शीर्षक कविता की हैं. सन् 1980 में प्रकाशित ‘ताप के ताए हुए दिन’ संकलन से. आग्रह ‘शब्द’ पर है, विशेष. उनके एक काव्य-संकलन का नाम ही है ‘शब्द’. जैसे सार्त्र की आत्मकथा का नाम. रचनाकार की सर्वश्रेष्ठ कृति भी उसी तरह. वैसे, ‘शब्द’ से मोह अज्ञेय को भी रहा है. त्रिलोचन का भाव भिन्न है. यह शब्द-मोह नहीं, लगाव है. लगाव भी इसलिए कि-

शब्दों में भी हाड़-मांस है, जीवन धरकर

वे भी जीवधारियों के स्वर-यंत्र संभाले

स्फुट, अस्फुट दो धाराओं में प्रवाहमान हैं.

इसी जीवंत शब्द की तलाश है कवि को. न काव्यात्मक शब्द की, न सुंदर शब्द की.

इस प्रसंग में त्रिलोचन का ‘जन-भाषा और काव्य-भाषा’ शीर्षक लेख (पूर्वग्रह-75, जुलाई-अगस्त, 1986) उल्लेखनीय है. उनकी स्पष्ट मान्यता है कि ‘‘पुरानी भाषा जिसे काव्य-भाषा कहकर पढ़ा या पढ़ाया जा रहा है, वर्तमान रचनाधर्मी के प्रयोजन की वस्तु कम ही है.’’ इस काव्य-भाषा की पूरी परंपरा पर उनकी टिप्पणियां दिलचस्प हैं. ‘‘छायावाद में काव्य का स्तर ऊंचा हुआ है किंतु भाषा घायल दिखाई देती है. संस्कृत-गर्भित वाक्यों में हिंदी का स्वरूप खुलता नहीं दिखाई देता. प्रगतिवाद ने भाषा की सरलता का आग्रह किया जो उथलेपन से कम बचा. विद्रोह भी बहुधा शब्दमय ही मिलता है...

प्रयोगवाद में वैयक्तिक आग्रह और शालीनता का विशेष मोह छायावादी प्रवृत्तियों से अधिक दूर नहीं है. 1950 के बाद के कवियों ने कुछ संभलकर डग भरने का प्रयास किया.’’

सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी द्विवेदी-काल के कवियों पर है. ‘‘काव्य की दृष्टि से तो नहीं पर भाषा के अर्थों की दृष्टि से द्विवेदी-युग के कवियों ने हिंदी के सहज रूप को रखा है. किसान जीवन की मार्मिक व्यंजना में रामनरेश त्रिपाठी जितने समर्थ मिलते हैं उतने मैथिलीशरण गुप्त नहीं. त्रिपाठी ने सहानुभूति के कारण किसानों पर कृपा नहीं की, बल्कि अभिन्न भाव से उनमें जीवन देखा. ध्यान देने की बात है कि अभिन्न भाव ही कविता को कविता बनाता है.’’

इस प्रकार ‘‘शब्द-शब्द से व्यंजित जीवन की तलाश में/कवि भटका करता है.’’ (शब्द, 45).

यह तलाश त्रिलोचन को उन जड़ों तक ले गई, जहां न तथाकथित ‘आधुनिकता’ की पहुंच है और न जिससे ‘प्रगति’ और ‘प्रयोग’ के उस ‘आधुनिकतावादी’ कर्मकांड का कोई सरोकार है. इसीलिए त्रिलोचन गैर-आधुनिक ही नहीं बल्कि प्राग्-आधुनिक प्रतीत होते हैं.

बहुत पहले सन् 1951 के एक सॉनेट में, जो ‘उस जनपद का कवि हूं’ में संकलित है, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपनी यह आकांक्षा व्यक्त की है-

यह तो सदा कामना थी, इस तरह से लिखूं

जिन पर लिखूं, वही यों अपने स्वर में बोलें,

परिचित जन पहचान सकें, फिर भले ही दिखूं

अपनापन थोपने में विफल, आकर खोलें

आमंत्रित जड़-चेतन अपने मनोभाव को,

उस स्वभाव को जो अभिन्नतम अभिव्यक्ति है

पूरी सत्ता की.

त्रिलोचन की शब्द-साधना यह है कि उन्होंने अपनी कविता के लिए कोई नई भाषा गढ़ी नहीं; बल्कि पहले से मौजूद जीवित भाषा को उसकी जीवंत में ग्रहण किया- उस भाषा में उन लोगों को अपने आप बोलने दिया, जिन्हें अभी तक बोलने का मौका नहीं मिला था. कविता की इस दुनिया में चेतन के साथ जड़ भी आमंत्रित हुए- पूरी सत्ता की अभिन्नतम के लिए. ‘पूरी’ सत्ता की अभिन्नतम अभिव्यक्ति’ वस्तुतः वह स्वभाव है जिसे त्रिलोचन कविता में पकड़ने का प्रयास करते रहे हैं- सभी स्तरों पर.

‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ शीर्षक कविता इस तरह का पहला प्रयास है. यह कविता सन् 1940-41 के आस-पास की है. हिंदी कविता के लिए उस समय यह एकदम नई भाषा थी. हर तरह की चालू काव्य भाषा से अलग. क्योंकि इसमें चम्पा स्वयं बोलती है- वह चम्पा जो ‘काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ और जिसे ‘बड़ा अचरज होता है : इन काले-काले चिह्नों से कैसे ये सब स्वर/निकला करते हैं.’

और कविता का कथ्य? स्वयं चम्पा के ही शब्दों में- ‘‘तो मैं अपने बालक को संग साथ रखूंगी/कलकत्ता मैं कभी न जाने दूंगी. कलकत्ते पर बजर गिरे.’’

स्मृति पर जरा-सा जोर डालें तो कासी-कोसल में प्रचलित एक लोकगीत की ये पंक्तियां याद आ जाएंगी-

रेलिया न बैरी, जहजिया न बैरी, पइसवा बैरी हो

सइयां के ले गै बिदेसवा, इ पइसवा बैरी हो.

सच पूछिए तो त्रिलोचन की चंपा कविता पढ़ते समय यह लोकगीत स्वतः याद नहीं आता और क्या यही इस कविता की विशेषता नहीं है? लोकगीत को आधुनिक कविता में इस खूबी से रूपांतरित किया गया है कि मूल लोकगीत का आभास भी नहीं मिलता. कहनेवाले यह भी कह सकते हैं कि यह कविता किसी लोकगीत का कायाकल्प नहीं, बल्कि एकदम स्वतंत्र नई कविता है. वही लोग यह भी कह सकते हैं कि कविता का मुख्य कथ्य तो है पढ़ने की सार्थकता, क्योंकि ध्रुवक के समान जिस पंक्ति की बार-बार आवृत्ति होती है वह है : चम्पा पढ़ लेना अच्छा है. यह भ्रम भी कविता की विशेषता- सर्जनात्मकता की ओर संकेत है. सृजन-प्रक्रिया में लोक-बोली का भी संस्कार हुआ है. लोकगीत के छंद का भी और लोकगीत के कथ्य का भी. भाषा खड़ी बोली है लेकिन उसमें ‘अच्छर’ ‘अक्षर’ नहीं हुआ न ‘बजर’ ‘वज्र’ और ‘चीन्हती’ क्रिया भी अपनी सहजता के साथ डटी हुई है. वाक्य-विन्यास गद्य का है लेकिन उसमें एक अंतर्निहित लय है- वर्णन में भी और संलाप में भी. चम्पा के लहजे में गंवई गांव के एक बेपढ़े-लिखे आदमी की स्वाभाविक सहजता और प्रामाणिकता है- धूमिल के मोचीराम से कहीं अधिक. बातचीत के क्रम में पढ़े-लिखे कवि की भाषा भी ‘हारे-गाढ़े काम सरेगा.’ वाली ठेठ मुहावरेदानी अपना लेती है और कथ्य में चोट भी अंततः उस कलकत्ता शहर पर है जो गांव के रहनेवालों को बेघर बनाकर हजम किए जा रहा है. कविता हर तरह से गैर-आधुनिक है, बल्कि प्रति-आधुनिकता-विरोधी. शहर के विरुद्ध गांव, पैसे के खिलाफ इनसानी रिश्ता. किंतु उस दौर की आधुनिकतावादी कविताओं के साथ इसे रखकर देखें तो प्रयोग और प्रगति के नाम पर लिखी जाने वाली कविताओं से कितनी अलग. हर तरह की अंग्रेजियत के खिलाफ. भाव में भी और भाषा में भी. यह है ठेठ हिंदी की कविता. हिंदी की नई कविता- हिंदी की अपनी परंपरा से निकली हुई. आधुनिक लेकिन भारतीय. न पश्चिम से आयातित, न आतंकित. यहां वह चौंकानेवाला प्रयोग नहीं जिसमें- ‘‘मूत्र-सिंचित मृत्तिका के वृत्त में/तीन टांगों पर खड़ा नवग्रीव/धैर्यधन गदहा’’ है. वह प्रगति भी नहीं जहां निराला के शब्दों में ‘‘श्रीयुत गिडवानी जी/बहुत बड़े सोशलिस्ट/मास्को डायलाग्स’ लेकर आए हैं’’ लेकिन उनकी हिंदी का यह हाल है कि लिखते हैंः ‘‘पृथ असनेहमयी स्यामा मुझे प्रेम है.’’

त्रिलोचन ने शुरू से ही इस पश्चिमी आधुनिकता को पीठ देकर अपनी काव्य-यात्रा की.

‘नगई महरा’ इसी काव्य-यात्रा की प्रौढ़ कृति है. रचना-काल चम्पा के लगभग तीस-बत्तीस साल बाद. ‘ताप के ताए हुए दिन’ में संकलित. भाषा में लोक-बोली का पुट कहीं गहरा. कहीं-कहीं अवधी शब्दों का आग्रह अतिरिक्त. गद्यात्मकता पर भी जोर ज्यादा. सायास. किंतु बातचीत का लहजा और भी स्वाभाविक. लय भी सुरक्षित, संतुलित. विषय पर एक पारंपरिक रिवाज के सहज नैतिक बोध का प्रकाशन. नगई जात का कहार. घरनी सेंदुर से नहीं मिली थी. घरौवा कर लिया था. पति रिश्ते में अपनी घरनी का दामाद. बिरादरी की पंचायत बैठी और जात गंगा ने उसे पावन कर दिया. धन्य हुआ और फिर भोज हुआ. नाच और नाटक हुए. अपने ऊंची जाति का समझने वालों के लिए जो काम अनैतिक था, उसे छोटी कही जानेवाली जाति के लोगों ने नैतिकता की सहज ही मर्यादा दे दी. प्रसंगवश बड़ों पर एक छींटा भीः ‘‘अपनी ओर ही निगाह करो’’

कुल मिलाकर ‘नगई महरा’ चम्पा से अधिक सघन, समृद्ध और जीवंत कविता है. हर तरह से. हर स्तर पर. कविता तो क्या कहानी में भी इतने कम शब्दों में ऐसा जीवंत चित्र दुर्लभ है. नैसर्गिक जीवन के साथ नैसर्गिक भाषा. आधुनिक सभ्यता इन दोनों को प्रदूषित कर रही है, इसलिए त्रिलोचन शब्द की पवित्रता की रक्षा के लिए उस प्राग-आधुनिक जीवन-प्रणाली की जड़ों में जाते हैं, जहां सब कुछ के बावजूद सामाजिक जीवन की लय खंडित नहीं हुई है और मानवीय सामाजिक संबंधों की गरमाई के बीच मनुष्य की वैयक्तिकता भी अक्षुण्ण है. यह कोरा परम्परावाद नहीं है. इसमें परंपरा की समीक्षा भी सक्रिय है. यह समीक्षा स्वयं परंपरा के अंदर से ही उभरती है. परंपरा की अंतःसमीक्षा का सबसे प्रखर रूप ‘महाकुंभ’ संबंधी 25 सॉनेटों के कविता-क्रम में मिलता है. ये सॉनेट ‘अरधान’ नामक संकलन में प्रकाशित हैं. ‘महाकुंभ’ के प्रति त्रिलोचन का दृष्टिकोण अंग्रेजी पढ़े-लिखे आधुनिक प्रगतिशील बुद्धिजीवियों से अलग है. वे धर्मान्धता कहकर इसका मजाक नहीं उड़ाते. वे ‘महाकुंभ’ में आनेवाले जनसमूह को ‘सहसशीर्ष पुरुष’ मानकर नमन करते हैं और कहते हैं- ‘‘महाकुंभ में देखा मैंने मानव कानून. मानचित्र था भारत का रेखांकित आनन.’’ कवि का स्पष्ट मत है कि ‘‘आने दो, यदि महाकुंभ में जन आता है. कुछ तो अपने मन का परिवर्तन पाता है.’’

इसीलिए कविता-क्रम के शुरू के पांच सॉनेटों में इस रंगारंग जन-महोत्सव का सोल्लास वर्णन है. इस वर्णन में तन्मयता है. यह किसी तमाशबीन की रिपोर्ट नहीं. एक अंतरंग जन की अभिव्यक्ति है. लेकिन यह सब जैसे महाकुंभ की लोमहर्षक त्रासदी की पृष्ठभूमि है. त्रासदी का चित्रण बीस सॉनेटों में हुआ है. संकेत स्पष्ट है कि यह त्रासदी मानवकृत है, कोई दैवी अभिशाप नहीं. न कहीं आंसू, न करुणा का प्रदर्शन और न आक्रोश. नागा साधुओं के नंगे नाच की टिप्पणी अवश्य है और सुलफे का दम लगाने वाले साधुओं पर भी. लाखों की प्रदर्शनी लगाने वाली पुलिस पर और सहानुभूति प्रकट करने के लिए दौरे पर आए राजनीतिक नेताओं पर भी. इस प्रकार ‘महाकुंभ’ कविता-क्रम अंततः एक अंधविश्वास का महिमामंडन नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिक व्यवस्था के वर्तमान संबंध पर मार्मिक टिप्पणी है. ‘महाकुंभ’ में एक जीती-जागती संस्कृति भी है, उसकी वीभत्स विकृति भी और अंत में सामूहिक संहार भी. यह महाकाव्यात्मक गरिमा की ऐसी त्रासदी है जिसमें कवि ने करुणा और भय का अप्रतिम संयोग घटित किया है.

अंधविश्वास साधारण जन का ही क्यों न हो, त्रिलोचन के चाबुक से वह बच नहीं सकता. ‘दिगंत’ का एक सॉनेट है ‘मूर्तिपूजा’. वराहावतार की प्रतिमा औंड़िहार में. आए कुछ ग्रामीण, नत हुए. लेकिन पता नहीं कि कौन देवता हैं ये. कवि की टिप्पणी- ‘‘मैंने देखा प्रणति-भक्ति दोनों हैं छूछी/इनमें भाव कहां जो मूर्तिकार में जागे.’’ यदि यह दृष्टि आधुनिक है तो इसका जन्म स्वयं परंपरा की कोख से हुआ है- परंपरा की अंतः समीक्षा से.

परंपरा के साथ इस द्वंद्वात्मकता में ही त्रिलोचन के सृजन का बीज है. इसी प्रक्रिया में त्रिलोचन की काव्य-भाषा विशिष्टता ग्रहण करती है. शिष्टता नहीं, न अशिष्टता ही. विशिष्टता. निजता.

त्रिलोचन जायसी के उत्तराधिकारी नहीं हैं. नागार्जुनजी के कथन में सिर्फ आधी सच्चाई है. त्रिलोचन लोक-बोली का संस्कार करते हैं और इस मामले में वे तुलसी के अनुयायी हैं. त्रिलोचन अवध के चिरानीपट्टी गांव के लोककवि नहीं, बल्कि काशी के जनकवि हैं- और उनकी कविता हिंदी की जातीय कविता है.

चिरानीपट्टी त्रिलोचन की जन्मभूमि भले हो, रंगभूमि और कर्मभूमि तो काशी ही है- वह काशी जो बहुत-सी बातों में गांव ही है. चिरानीपट्टी की तरह. त्रिलोचन ने काशी पर अनेक कविताएं लिखी हैं. आरंभिक दिनों यानी सन् 1951 की लिखी एक कविता है-

काशी मुझे गांव-सी लगती है, शहराती

हवा यहां कम-से-कम है. सब आसपास से

घुले-मिले रहते हैं. अपना रंग दिखाती

प्रकृति मनुष्यों में है, धरती से अकास से

सहज मुक्त सम्बंध बना है. चोरी-डाका

यहां न हो, यह बात नहीं है. दुर्गण सारे

कम-बेशी हैं. जाग रही है, इसकी साका,

तीन लोक से न्यारी होने में. जो हारे

हैं वे जन भी मस्त मिलेंगे. ऐसी मस्ती

और कहीं तो नहीं मिलेगी. चना-चबेनी

और गंगाजल के मस्ताने हैं. यह हस्ती

और कहां है! झंखें तीरथराज त्रिबेनी.

रोज-रोज ताजा है कभी नहीं है बासी

आन-बान में, कबिरा तुलसी की यह काशी.

यह काशी आज का सच भले न हो लेकिन त्रिलोचन की ‘काशी’ यही है और वे इसी काशी की सृष्टि हैं. अच्छा हुआ जो वे चिरानीपट्टी से चलकर इलाहाबाद नहीं गए. वहां जाते तो वे अधिक-से-अधिक शमशेर हुए होते! या शमशेर जैसे. आधुनिक कवि. प्रयोगशील कवि. प्रगतिशील भी.

काशी में त्रिलोचन सुखी न थे. कष्ट कम न दिया काशी ने उन्हें. सताया भी. दुत्कारा भी. अंततः ठुकराया और भगाया भी. भैरों का सोंटा उन्हें भी लगा. अंततः. लेकिन उनके मन में जैसे एक काशी थी, वही उन्हें अपनी जमीन से जोड़े रही. अपनी परंपरा से जुड़ने का एहसास कराती रही.

काशी त्रिलोचन के लिए वैसे ही थी जैसे गांधीजी के लिए भारत का गांव. गांव की असलियत का पता था. गांव की गंदगी का, दरिद्रता का, बर्बरता का, छुआछुत और जात-पांत का, जहालत का. फिर भी मन में एक गांव बसा था. बसा ही नहीं था. सपनों का रूप ले रहा था. यह सपनों का गांव अकसर वास्तविक गांव में घुल-मिल जाता था. यही गांव गांधीजी की ताकत था. अंग्रेजी राज से लड़ने की ताकत. पश्चिमी सभ्यता के दूषित प्रभाव से बचने की ताकत. पूंजीवादी अभिशाप से मुक्त होने की ताकत. और अंततः भारतीय सभ्यता के विश्वव्यापी ऐतिहासिक मिशन को पूरा करने की ताकत. कविता की दुनिया में त्रिलोचन के लिए काशी का बहुत कुछ यही महत्त्व है.

इस प्रसंग में ‘चिरानीपट्टी’ पर लिखी हुई कविता का उल्लेख आवश्यक है. यह कविता भी उन्हीं दिनों की है. सन् 1951 की. ‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’ में संकलित.

हारे खीझे मन से मैंने कभी कहा था,

‘अगर जन्म लेने से मैं लाचार न होता

मुझे चिरानीपट्टी से कुछ प्यार न होता

पहला असंतोष जो कुछ भी रहा-सहा था

आज नहीं है. क्यों, इसका तो समुचित उत्तर

दे पाना आसान नहीं है.

फिर भी अंततः

लूटे सताए हुए आदमी जहां पड़े हों

अच्छा हो जाग्रत जन उनके लिए खड़े हों.

काशी के लिए भी यही बात कही जा सकती है. थोड़े हेर-फेर के साथ. लेकिन बात सिर्फ काशी या चिरानीपट्टी की नहीं है. बात अपनी जमीन और अपनी परंपरा की है. इन दोनों से अपने संबंध की. लगाव की. त्रिलोचन के लिए अपनी जमीन और परंपरा दो नहीं, एक हैं. इसके साथ उनका ‘प्रणय कलह’ है और इस ‘प्रणय-कलह’ में ही उनके काव्य का बीज है.

त्रिलोचन के काव्य में सिर्फ गांव नहीं है. गांव के साथ शहर भी है. गांव और शहर का द्वन्द्व भी. किंतु द्वन्द्व में भी मनुष्य और प्रकृति के बीच जैसे खून का रिश्ता है. इसीलिए प्रकृति सम्बंधी उनकी अनेक श्रेष्ठ कविताएं काशी की गंगा के इर्द-गिर्द ही लिखी गई हैं. ‘शब्द’ के तेरह सॉनेट इसी दृश्य के विविध रूप प्रस्तुत करते हैं और सभी एक-से-एक बढ़कर हैं. बतौर बानगी यहां सिर्फ एक-

देख रहा हूं गंगा के उस पार धूल की

धारा बहती चली जा रही है, चढ़-चढ़कर

वायु तरंगों पर, अपने बल से बढ़-बढ़कर

धूसर करती हुई क्षितिज को, वृक्ष-मूल की

अखिल शून्यता हरती है, छवि से मढ़-मढ़कर

मानव आकृतियां निःस्वन गति पढ़-पढ़कर

जीवन मंत्र कहानी देती शूल-फूल की.

मैं इस पार नहीं हूं, आंखें उसी पार को

दौड़-दौड़ जाती हैं, लहर-लहर से होकर

तट की सतत वक्र रेखाओं का अनुधावन

करती हुई, धूल धारा को, कृषि उभार को

पुनः क्षितिज की वृक्षशीर्ष रेखा को टोकर

नील व्योम में करती है अनुभव-सम्भावन.

इस चित्र में न बिंब है, न प्रतीक. रंगा मेजी भी नहीं. हैं तो कूंची के करतब. प्रकृति का अलंकार नहीं. बस एक अनुभव. ऐसा अनुभव जिसमें प्रकृति से मनुष्य अलग नहीं है. प्रकृति-चित्रण अवश्य है, पर वाल्मीकि जैसा, कालिदास जैसा नहीं. अनलंकृती पुनः क्वापि.

त्रिलोचन की प्रकृति-सम्बंधी कविताएं आभास देती हैं आदिम संवेदना का, लेकिन चित्रों का मूल में दृष्टि है आधुनिक. यह दृष्टि प्रायः अपने आस-पास के अतिपरिचित और साधारण दृश्यों पर टिकती है और रमती भी है. जैसे दो छोटे-छोटे चित्र-

1. आंख मूंदे, पेट पर सिर टेक

गाय करती है घमौनी बंधी जड़ से

पेड़ की छाया खड़ी दीवार पर.

2. मेमने फुदकते हैं

जाड़े की धूप को जीवन के खेल से

आंक-आंक देते हैं.

जीवन के प्रेमी त्रिलोचन प्रकृति में भी जीवन ही देखते हैं, बल्कि प्रकृति में उनकी दृष्टि वहीं जाती है जहां जीवन दिखता है. वस्तुतः त्रिलोचन के काव्य का एक बड़ा भाग जीवन का महोत्सव है.

कभी-कभी यह उत्सव-भाव नागरिक जीवन की कृत्रिम वर्जनाओं को तोड़कर अकुंठ स्वर में फट पड़ता है- निश्चय ही किंचित् पीड़ा के साथ- जैसे ‘शब्द’ एक सॉनेट की पहली दो पंक्तियां-

फिर भी त्रिलोचन यह लिखे बिना नहीं रहते कि ‘‘मेरे इस सुख को/अंतःस्पंदन नित्य रक्त से सींच रहा है.’’

त्रिलोचन की बाहरी धजा देखकर यह समझना ठीक नहीं कि वे बारीक काम करने वाले सुनार नहीं बल्कि अनगढ़ लुहार हैं. लोक में भी सिर्फ लुहार ही नहीं होते. दस्तकारी के महीन काम करने वाले कारीगर भी होते हैं. अकसर मशीन से काम करनेवालों से बेहतर और कुशल. त्रिलोचन की लोक-जीवन-सम्भव भाषा कभी-कभी ऐसी सूक्ष्म कारीगरी का करिश्मा भी दिखा जाती है.जैसे-

तुमको अगर सदेह चाहता हूं तो कहते

कहते आकर शब्द लाज से रुक जाते हैं.

या

और, थोड़ा और, आओ पास

मत कहो अपना कठिन इतिहास

मत सुनो अनुरोध, बस चुप रहो

कहेंगे सब कुछ तुम्हारे श्वास.

त्रिलोचन की यह तेज नजर आपसी रिश्तों की जटिलता को भी तार-तार करना जानती है. अकसर बड़ी निर्ममता के साथ. जैसे ‘शब्द’ के एक सॉनेट का आरंभिक अंश-

डर लगता है जीवन में उनसे जो अपने

होते हैं, अपनेपन का ज्ञापन करते हैं,

भावों और अभावों का मापन करते हैं,

तुलना द्वारा और अनंजित दृग के सपने

मुखरेखा से जान लिया करते हैं, छपने

से पहले ही उसका विज्ञापन करते हैं.

शायद कुछ लोग इसे आधुनिक भावबोध की संज्ञा देना चाहें. लेकिन सच्चाई यह है कि त्रिलोचन अपनी परंपरा के अंदर से अंतःसमीक्षा करते हुए ही कविता को आधुनिक बनाने का प्रयास करते रहे हैं. इस मामले में उनकी राह अपने हमउम्र और हमदम मुक्तिबोध से एकदम अलग हैं. मुक्तिबोध नई कविता की आधुनिकता के अंदर आत्मसंघर्ष करते हुए अपनी काव्य-सर्जना करते हैं, जबकि त्रिलोचन यही काम अपनी परंपरा के अंदर रहकर करते हैं. अलगाव का यह बोध त्रिलोचन में इतना दृढ़ है कि मात्र होते हुए भी मुक्तिबोध के बारे में अजीब ढंग से ठंडे दिखते हैं.

मुक्तिबोध पर न उन्होंने कोई कविता लिखी, न कोई पुस्तक ही उन्हें समर्पित की, जबकि नागार्जुन और केदार पर उन्होंने कविताएं भी लिखीं और एक काव्य-संग्रह भी समर्पित किया. त्रिलोचन के प्रति स्वयं मुक्तिबोध के अनुकूल रुख को देखते हुए यह बात और भी हैरान करनेवाली लगती है. त्रिलोचन की ‘धरती’ का स्वागत करनेवालों में मुक्तिबोध पहले व्यक्ति हैं, जबकि केदार और नागार्जुन का रुख कुछ-कुछ आलोचनात्मक ही रहा है. फिर भी त्रिलोचन यदि मुक्तिबोध की अपेक्षा नागार्जुन और केदार से अधिक निकटता महसूस करते हैं तो निश्चय ही कोई बड़ी बात होनी चाहिए. प्रस्थान-भेद ही शायद वह बड़ी बात है. त्रिलोचन की जमीन अलग है. नितांत गैर-आधुनिक.

गैर-आधुनिक होते हुए भी त्रिलोचन में अपनी अस्मिता का- निजता का बोध मुक्तिबोध से किसी तरह कम नहीं है. कविता के अंदर स्पष्ट शब्दों में अपनी जितनी चर्चा त्रिलोचन ने की है, मुक्तिबोध तो क्या, किसी अन्य समकालीन कवि ने भी नहीं की. इतनी आत्मचर्चा इससे पहले या तो निराला ने की या फिर तुलसीदास ने. संयोग से ये भी अवध के ही हैं. यह आत्मचर्चा इतनी है कि कोई चाहे तो सिर्फ कविताओं के ही आधार पर त्रिलोचन का आत्म-चरित लिख सकता है. लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि इतना अनात्म और निर्वैयक्तिक कवि भी दूसरा नहीं है. वे अपनी कविता के विषय भी हैं और विषयी भी. विषयी से अधिक विषय. उसी तरह जैसे नगई महरा, भोरई केवट तथा अन्य दर्जनों जन. कुल मिलाकर उनकी कविता का विषय वह जीवन है, वह समाज है, जिसमें व्यक्ति और समाज के बीच कोई आत्यन्तिक अलगाव नहीं है. फिर भी हर एक का अपना अनुभव है, अपनी दृष्टि है और अपना मत. ‘मैं-तुम’ शीर्षक कविता का कथ्य यही है.

इसलिए विरोधाभास प्रतीत होते हुए भी यह सच है कि त्रिलोचन की निपट निर्वैयक्तिकता में भी गहरी वैयक्तिकता है. निर्वैयक्तिकता ठोस यथार्थ का निमर्म बोध कराती है तो वैयक्तिकता आत्मीयता का भाव जगाती है. इस प्रकार त्रिलोचन विडंबना और तन्मयता एक साथ पैदा करते हैं. उनके काव्य-शास्त्र का एक धरातल यह भी है.

काव्य-भाषा के स्तर पर यह वैयक्तिक निर्वैयक्तिकता कई रूपों में व्यक्त होती है. एक ओर वह बोलचाल की सामान्य सार्वजनिक भाषा है तो दूसरी ओर उसमें निजी सृजन का पुट भी है. कहीं-कहीं ‘यह सियनि सुहावनि टाट-पटोरे’ का अनूठा सौंदर्य स्पष्ट झलकता है. कहीं ‘अमृतस्पंदी बोल’ हैं तो कहीं ‘जीवन संचित मैल साज ये सुर बहार के’! ‘आंखों देखी है दौर्वीण झलक जीवन की’ पंक्ति लिखकर झलक के साथ ‘दौर्वीण’ के प्रयोग का साहस शब्दाकार त्रिलोचन ही कर सकते हैं. ‘कपोताभ बादल’, ‘प्रतीकाश है यह परिचय का’, ‘गति आकाशस्नुत’ और ‘सायंकालिक संगायन’ जैसे पदों की शब्द-सर्जना पर त्रिलोचन की अपनी छाप स्पष्ट है. यदि ‘एनस्वित् है विश्व, अपाप विद्वता जी की मनोराज्य है’ जैसे प्रयोग में शास्त्रीजी की संस्कृत चेतना मुखर हुई है तो ‘मृत्स्ना के अनुबंध तत्प हैं’ और ‘जिसमें नूतन मेघ रिरिक्षिषु घहराते हैं’ जैसे प्रयोगों में अपने कोश-ज्ञान का कहीं प्रदर्शन भी निहित है. इन विलक्षण संस्कृत प्रयोगों के साथ ‘हरियायध की गंध निराली’ और ‘कहने दो कहनाव कभी क्या कहीं रुका है’ जैसे ठेठ देशी शब्द भी त्रिलोचन के यहां ही मिल सकते हैं. ये सारे प्रयोग सिर्फ एक काव्य-संकलन ‘शब्द’ से अनायास चुने गए हैं. इन शब्दों से कवि के भाषा-संसार के विस्तार-प्रसार का पता चलता है. इस दृष्टि से त्रिलोचन का ‘शब्द’ काव्य-भाषा की ‘विनयपत्रिका’ है, जिसके अंदर आज की हिंदी देसी बोली से लेकर वैदिक भाषा तक यात्रा करती है और इस साहसिक अभियान में क्लासिकी संस्कृत से भी शब्द लेना नहीं भूलती. ‘प्रभामंडलित तुम्हें रोदसी में स्थित लखकर’ लिखने की धड़क संस्कृत-काव्य सृजन समर्थ नागार्जुन में भी कम ही मिलेगी.

जैसा कि त्रिलोचन ने लिखा है, ‘‘कैसे और कहां से शब्द अनाहत पाऊं’’, उनका प्रयास ‘अनाहत शब्द’ की दिशा में रहा है. यह ‘अनाहत शब्द’ कबीर के ‘अनहद’ का आभास देता हुआ भी कोई रहस्यवाद नहीं है. अनाहत वह शब्द है जो कहीं से आहत न हुआ हो. आज की राजनीति के हाथों कितने ही शब्दों को आहत होते देखकर हम ‘अनाहत शब्द’ के प्रति कवि की लगन को सहज ही समझ सकते हैं. शायद इसीलिए ठेठ राजनीतिक कविता की ओर कम ही प्रवृत्त होते हैं.

नागार्जुन जी की राय है कि कविता में स्पष्ट राजनीति के अभाव ने त्रिलोचन का बहुत नुकसान किया है. नुकसान से आशय यदि सामयिक लोकप्रियता से है तो नागार्जुनजी की बात ठीक है. त्रिलोचन को नागार्जुन जैसी लोकप्रियता तो निश्चय ही नहीं मिली. लेकिन यदि काव्य के स्तर पर देखें तो स्पष्ट राजनीति के प्रभाव से नुकसान तो नागार्जुन को ही हुआ है, त्रिलोचन से अधिक, बल्कि त्रिलोचन बहुत-कुछ बच गए हैं. फिर भी हिंदी में सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक कविताएं अगर किसी ने लिखी हैं तो नागार्जुन ने ही. यह भी उतना ही सच है.

दरअसल अच्छी राजनीतिक कविता बहुत कठिन कला है, क्योंकि राजनीतिक काव्य रचना के स्पष्ट खतरे हैं. एक खतरा तो ‘क्लीशे’ और ‘जार्गन’ का ही है. इसलिए राजनीतिक भाषा के विरोध या विंडबनापूर्ण प्रयोग द्वारा ही अच्छी राजनीतिक कविता की रचना संभव है. इसके अलावा तो वही रास्ता बचा रहता है जो त्रिलोचन ने अपनाया. रोजमर्रा की राजनीति पर टिप्पणी करने के बजाय जीवन में गहरे पैठी हुई राजनीति का आलोचनात्मक अंकन. त्रिलोचन की शब्द-चेतना को यह रास्ता शायद रास आया. कविता की क्षति भी कुछ कम ही हुई. यहां भी त्रिलोचन के व्यक्तित्व की निजी विशेषता देखी जा सकती है.

नागार्जुन की तरह यदि त्रिलोचन की स्पष्ट पक्षधरता हर क्षण प्रकट नहीं होती और वे गुस्सा करने के अवसर पर गुस्सा पी जाते हैं तो एक तरह से वे भारतीय किसान के अधिक निकट हैं. इस मामले में वे प्रेमचंद के होरी की परंपरा में हैं. सहिष्णुता और धैर्य के आगार. करुणा उनका स्थायी भाव है और शायद एक प्रकार शांत पर्यवसायी निर्वेद भी. संघर्ष के गहरे अनुभव से ही यह पीड़ा-बोध, यह त्रासद चेतना उपलब्ध होती है. नागार्जुन को यदि इस पर मैत्रीपूर्ण सात्त्विक क्रोध आता है तो यह समझ में आनेवाली बात है. नागार्जुन का स्थायी भाव है घृणा-वर्ग घृणा. यह घृणा भी कम सर्जनात्मक नहीं. कभी यह सात्त्विक क्रोध का रूप लेती है और कभी मानवीय करुणा का. व्यंग्य इस भाव की सबसे सर्जनात्मक अभिव्यक्ति है. कविता में नागार्जुन इस व्यंग्य के एकच्छत्र अधिपति हैं. त्रिलोचन के यहां यह पक्ष दबा हुआ है. लेकिन इस भाव के कारण नागार्जुन जहां हड़बड़ी के शिकार हो जाते हैं और कभी-कभी एक अच्छी कविता को बिगड़ जाने देते हैं, त्रिलोचन का धैर्य उन्हें रोके रखता है.

ऐसा नहीं कि त्रिलोचन कभी खराब या कमजोर नहीं लिखते. कमजोर कविताएं उनके यहां भी कम नहीं हैं लेकिन उस कमजोरी का कारण हड़बड़ी नहीं, बल्कि अतिरिक्त सावधानी है. त्रिलोचन का धैर्य को विशेष प्रकार की गंवई या किसानी समझदारी प्रदान करता है. इस समझदारी की झोंक में वे कभी-कभी उपदेश देने पर उतर आते हैं और कविता के स्थान पर सूक्ति और सुभाषित लिखने लगते हैं. कहीं इन सूक्तियों में अनुभव का मर्म होता है, कहीं नहीं होता. जहां नहीं होता वहां ठूठ उपदेश रह जाता है और कविता सूखा गद्य मालूम होने लगती है.

इस गद्यात्मकता की शिकायत त्रिलोचन के बारे में अकसर की गई है. लेकिन सर्वत्र यह गद्यात्मकता नहीं है. कविता के अंदर लोगों की बोली-ठोली में, वस्तुओं के यथातथ्य ब्योरे में और कहानी कहने में यह जीवन का गद्य अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ प्रकट होता है. लेकिन कभी-कभी इस गद्य से जीवन खिसक भी जाता है. इसके बाद रह जाता है द्विवेदी-युगीन सीधा-सरल पूरा सही वाक्य. व्याकरण और इतिवृत. सॉनेट के अंदर अरुद्धांत वाक्य-रचना-निर्वाह के कारण ऐसी दुर्घटना अकसर घटित होती. तुक मिलाने की दयनीय कोशिश में फालतू वाक्य भी काफी आते हैं. कारण वही पूरा वाक्य लिखने का हठ. गनीमत है, त्रिलोचन कभी-कभी यह प्रतिज्ञा भूल भी जाते हैं- खासतौर से सॉनेट से इतर छोटे प्रगीतों में. वहां उनका गद्य कविता में नई सर्जनात्मकता के साथ प्रकट होता है. कुछ कविताएं तो आद्यांत गिरे गद्य में ही हैं लेकिन काव्य की अनुभूति कराने में तनिक भी कमी नहीं आती.जैसे ‘अरधान’ की ‘क्या-क्या नहीं चाहिए’ शीर्षक कविता. कविता की अंतिम पंक्ति हैः ‘‘प्यार, घृणा, उदासीनता, सहानुभूति मुझे क्या-क्या नहीं चाहिए.’’ यह पंक्ति समूची कविता के गद्य को एक झंकार के साथ काव्य-संगीत में बदल देती है. इस प्रकार काव्य में यह गद्यात्मकता भी त्रिलोचन के काव्यशास्त्र का एक महत्वपूर्ण तत्व है.

किंतु जैसा कि मुक्तिबोध ने ‘धरती’ के प्रसंग में कहा है, यह ‘‘पाश्चात्य प्रोज टेक्नीक’’ नहीं है. कविता में पश्चिम की जो आधुनिक गद्य टेकनीक है, उससे त्रिलोचन के ठेठ देसी गद्य का कोई मेल नहीं है. ‘धरती’ की ‘जीवन का एक लघु प्रसंग’ शीर्षक कविता में जो गद्य है उसका द्वन्द्व बेपढ़ी-लिखी बुआ की ठेठ बोलचाल की भाषा से बंधा है और त्रिलोचन ने उसे अपनी देसी परंपरा से अर्जित किया है. इस गद्य का निखरा रूप अकसर उनके सॉनेटों में मिलता है, जो वस्तुतः तुकांत और छंदोबद्ध है. सॉनेट जैसे यूरोपीय काव्य रूप में देसी गद्य का विधान- यह भी एक विरोधाभास ही है, पर कोई जरूरी है कि चौदह पंक्तियों की उस कविता को ‘सॉनेट’ माना ही जाए. विश्वसनीय कवि है या उसकी कविता? कायदे से अंतिम निर्णय तो कथन-व्यापार से ही होना चाहिए. दरअसल देसी त्रिलोचन के लिए सॉनेट वैसा ही जैसे स्वर्गीय पंडित रामअवतार शर्मा के सिर पर सोला हैट! आशा है त्रिलोचन इस उपमा पर रीझेंगे, खीझेंगे नहीं. वैसे उनके तथाकथित सॉनेट, बगैर सॉनेट कहलाए भी, अधिकांशतः सुंदर काव्य हैं.

यह तो त्रिलोचन भी जानते हैं कि आधुनिक कवि होने के लिए सॉनेट लिखना जरूरी नहीं है और न सॉनेट लिखकर कोई आधुनिक होता ही है! जिस कवि ने पश्चिमी आधुनिकता के समस्त आकर्षणों को त्यागकर अपनी धरती और अपनी परंपरा का दामन दृढ़ता से पकड़े रखा वह सॉनेट के मोह में केवल इसीलिए पड़ा, विश्वास योग्य नहीं है. त्रिलोचन का काव्य यदि कोई विश्वास जगाता है तो यह कि स्वयं अपनी देसी परंपरा के अंदर से आत्मसमीक्षा की प्रक्रिया से गुजरकर जो नई काव्यसर्जना हुई, वही सार्थक है और सच्ची भी. उसका नाम ‘आधुनिकता’ हो या न हो! कहना न होगा कि समकालीन कवियों में त्रिलोचन परंपरा के इस सहज स्वाभाविक विकास के अग्रदूत हैं और काव्योपलब्धि की दृष्टि से अन्यतम भी.

‘‘नहीं हूं किसी का भी प्रिय कवि मैं’’ त्रिलोचन ने जब कहा था तब कहा था. यह बात सन् 1964 की है. आज वे अच्छी तरह जानते हैं कि वे कितनों के ही प्रिय कवि हैं- बल्कि कुछ के तो सबसे प्रिय कवि.

(आलोचना अंक-82, जुलाई-सितंबर 1987)

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