शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

प्राची - नवंबर 2016 / त्रिलोचन के पत्र

त्रिलोचन के पत्र

साहित्यकार जब अपने किसी साहित्यकार मित्र को पत्र लिखता है तो वह कोई साधारण पत्र नहीं होता. उस पत्र में साहित्यिकता होती है, कोई अनोखी और अनूठी बात होती है. उसको पढ़कर किसी भी असाधारण साहित्यिक रचना का सुस्वाद प्राप्त होता है. कई महान रचनाकारों के पत्रों के ग्रंथ तक छपे हैं और वह पाठकों ने पढ़े, सराहे और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है. चूंकि इस अंक का प्रथम परिशिष्ट त्रिलोचन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित है, यहां पर हम उनके तथा माखनलाल चतुर्वेदी के पत्रों को स्थान दे रहे हैं. संपादक

नागरी प्रचारिणी सभा

वाराणसी-1

24.9.62

मुक्तिबोध भाई, अरसा हुआ एक कार्ड लिखा था तुम्हें जिसका उत्तर आज तक नहीं मिला. उसमें कुछ ऐसे सवाल रखे थे मैंने जिनका उत्तर मिलने पर बात आगे चलती. उत्तर न मिलने से मैं समझता हूं कि तुम इन सवालों का सामना नहीं करना चाहते. तो कोई बात नहीं, बात के लिए और भी अतीत हैं, न सही गजानन. पर प्यारे, तुम्हारी बात तुम्हीं से करूं तो क्योंकर हो.

इच्छा हो तो मेरे उठाए प्रश्नों को कंधिया लेना, नहीं तो जैसी तुम्हारी इच्छा.

आज श्री दिनेश कुमार शर्मा के आग्रह से तुम्हें लिखने बैठा हूं. शर्मा जी, शर्मा जी हिंदी प्रचारक में काम करते हैं. संग्रही स्वभाव है. साहित्य और साहित्यकारों का परिचय रखना इनकी सहज प्रवृत्ति है. ये तुमसे 5 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक किसी दिन राजनांदगांव पहुंच कर मिलना चाहते हैं. आशा है, इन तारीखों को तुम्हें राजनांदगांव रहने में कोई कठिनाई न होगी. यदि तुम वहां न रह सको तो जहां कहीं रहना हो वहीं ऊपर के पते से, लौटती डाक से लिख भेजो. जहां रहोगे वहां जाकर ये तुमसे मिलेंगे.

आधुनिक हिंदी काव्य पर शोधकार्य करने वाली पोल कन्या सुश्री अग्नेस कोवालस्का भी इनके साथ तुमसे मिलेंगी. तुम उनके प्रिय कवि हो. तुम्हारे काव्य और काव्यदर्श पर ये विशेष बात करना चाहती हैं. अपनी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित गद्य-पद्य सामग्री का विवरण इन्हें जरूर देना. बहुभाषा विदुषी होने के साथ ये स्वयं कवयित्री हैं सूझ-समझ भी है, तुम स्वयं देखोगे.

आशा है, बच्चों सहित तुम अच्छी तरह हो. पिताजी को मेरा प्रणाम निवेदित कर देना. भाभी को नमस्कार.

सस्नेह

त्रिलोचन शास्त्री

 

श्री गजानंनद माधव मुक्तिबोध एम.ए.

आपका अध्यापक, डिग्री कॉलेज

राजनांदगांव, मध्य प्रदेश

माखन लाल चतुर्वेदी का पत्र

कर्मवीर, खंडवा

14.04.43

भाई मुक्तिबोध जी,

आपका कृपा पत्र मिला. सुख पाया. मेरा स्वास्थ्य किसी प्रकार पुनः रास्ते पर आ गया-सा दिखता है.

परिषद पर लिखे वक्तव्य के बाद तो क्षिप्रा, नर्मदा, और दिल्ली के निकट की जमना में पानी तो बहुत बह गया. उस वक्तव्य पर, कैफियत पर कैफियत देनी पड़ी.

जिन तरुणों की कविताएं आपने भिजवाई हैं, अच्छी हैं. नए दमूे बवदजतवस ने, इतना पराधीन कर दिया है कि कुछ न पूछिए. कविताएं खूब प्रारंभिक हैं, आशा है, ये तरुण आगे बढ़ने में ऊबेंगे नहीं. उनकी रचना, भगवान करे, ‘छोटी रजनी बड़ी कहानी’ के भेद को समझकर, गतिशील रहे, और खोल दृग अपने सलोनी कहनेवालों से रूठूं नहीं, तो वे मैदान मार लेंगे.

आशा है आप प्रसन्न हैं. कभी माचवे जी के हाल-चाल भी दीजिए.

आपका

मा.सी.च.

वद्युत ग.मा. मुक्तिबोध

बशीर मंजिल, फ्रीगंज,

उज्जैन

प्रदीप कार्यालय

मुरादाबाद, (यू.पी.)

10.3.42

 

प्रिय श्री गजानन जी,

इधर बहुत दिनों से ‘प्रदीप’ की ओर से कुछ उदासीन से जान पड़ते हैं. ‘प्रदीप’ सदा आपके पास जाता रहा है. बता सकेंगे कि आपके मौन का कारण क्या है?

आपने लिखा था कि ‘प्रदीप’ के लिए एक लेख तैयार कर रहे हैं. काफी दिन बीत गए न, और आपने फिर कुछ लिखा नहीं. सूचना भी नहीं भेजी.

इन दिनों श्री जगदीश जी प्रायः प्रवास में रहे. अनेक समस्याओं से उनका चित्र प्रायः समाकूल रहा. इसी कारण, पहले और आज भी वे आपसे स्वमेव पत्र द्वारा कुछ मालूम न कर सके. उनकी परिस्थिति आप जानते हैं और अच्छी तरह जानते हैं, अतः आपको अधिक प्रमाण संग्रह की इच्छा न होगी.

हां, इधर ‘प्रदीप’ का एक विशेषांक निकलने वाला है. अप्रैल में निकलेगा. नाम है ‘‘सुदूर पूर्वांक’’ इसकी रूपरेखा आपके लिए भेजी जा रही है. इस अंक के लिए आपसे एक लेख पाने की, आशा ही नहीं, विश्वास भी है. लेख आप किसी भी विषय को लेकर लिखें. लिखें अवश्य. आपका लेख हमारे उत्साह की वृद्धि करेगा, आप पर कुछ अपना अधिकर है न!

यदि ‘सुदूर पूर्व’ की नवीनतम साहित्यिक प्रवृत्तियों पर आप कोई ऐसा लेख लिख सकें, जिसमें वहां के राष्ट्र जीवन का अपेक्षित अध्ययन हो, तो बड़ा ही उत्तम हो. लेख 30वीं मार्च तक आने की प्रतीक्षा करूंगा.

आशा है, आप स्वस्थ व सानंद हैं.

तुम्हारा

त्रिलोचन

 

6/19,

रानी भवानी गली,

1.9.60

प्रिय भाई,

मेरा पत्र क्या तुम्हारे हाथ लगा?

क्या कर रहे हो आजकल? तुम्हारी डायरी बेशक अच्छी आ रही है. उसे बराबर लिखते रहो. लेखक की मनोरचना और उसके परिपार्श्व की इतनी सुंदर और संगत विवेचना और कहां मिलती है?

जानते ही हो प्रभाकर बलवंत माचवे आजकल पाताल पहुंच गए हैं. तुम सपरिवार अच्छी तरह हो, आशा है. भाभी को नमस्ते और बच्चों को सस्नेह, आशीः.

नमस्कार.

त्रिलोचन

 

श्री गजानन माधव मुक्तिबोध

प्राध्यापक, डिग्री कॉलेज, राजनांदगांव, मध्यप्रदेश

नागरी प्रचारिणी सभा

वाराणसी-1

24.2.62

प्रिय भाई,

अर्से से तुम्हारा कोई हाल नहीं मिला. अनुमान है कि तुमने जगह नहीं बदली होगी. मेरा अनुमान सही उतरने पर मेरी बात भी तुम तक जा पहुंचेगी.

कामयानी वाली तुम्हारी किताब देख गया. पहले की कुछ बातें हैं, बाकी तुमने बदल दीं. मैं मानता हूं कि स्थिति के अनुकुल उत्तम रचना पाठक को दी जानी चाहिए. रचना प्रक्रिया जो तुम्हारा समय प्रतिदिन ले लेती है यहां भी मौजूद है. अच्छा हो, इस पर कोई पुस्तक दे डालो. इस पर यदि संतोष न हो तो इसी विषय पर दूसरी, तीसरी, कितनी ही पुस्तकों की योजना बना सकते हो. पर अपनी उद्धरणी से बचो. दार्शनिक रुचि वाले तुम्हारे जैसे लोग इसमें लिपट जाएं यह ठीक न होगा.

इधर नया क्या सोच रहे हो? विचारात्मक और रूपात्मक अर्थात् गद्य में तुम्हारी क्या योजनाएं हैं और पद्य में क्या हैं.

और किताबें भी कहीं छपने को दी हैं? दीगर दुनिया. आशा है सानंद हो.

स्नेह

त्रिलोचन

श्री गजानन माधव मुक्तिबोध

प्राध्यापक, डिग्री कॉलेज, राजनांदगांव, मध्य प्रदेश

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