शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

प्राची - नवंबर 2016 / कवि के चिंतन से निकली भीषण चिन्गारियां डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ला

कवि के चिंतन से निकली भीषण चिन्गारियां

डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ला

मानवीय अनुभूति के भावपूर्ण मानस उत्कर्ष से उपजी शब्दार्थमय अभिव्यक्ति ही चेतना का चारुत्व बनकर कवि के काव्य जीवन का सत्य उद्घाटित करती है. जिससे उसके स्मृति कोष में संचित अनुभव के स्फुलिंग ही व्यष्टि से निकल कर समष्टि तक चेतना के चारुत्व को सम्प्रेषण का आधार देते हैं.

श्री कन्हैयालाल गुप्त ‘सलिल’ के काव्य जीवन का यही सत्य, चित्त, चैतन्य और चेतना का पर्याय बनकर जीवन दर्शन का काव्य-विवेक बना है. उनकी विचार प्रधान रचनाओं का भावपूर्ण संकलन ‘चिंतन की चिंगारियां’ इस कथन का प्रमाण हैं जिसमें जगत भी है, जीवन भी है, और जीवन का आधार कोई रहस्यमय परा प्रकृति का पारमार्थिक तत्व भी उद्भाषित हुआ है. इस संकलन में कवि के पांच चिंतनपरक काव्याख्यान लंबी कविताओं के रूप में विविध वैचारिक सत्यों से समन्वित होकर वाक्य वक्रता का दर्शन बने हैं जिनमें शब्दालंकारों के साथ ही अर्थालंकारों की चमत्कारिकता बहुत ही सहज रूप में वस्तु तत्व को प्रतिपादित करने का अभीष्ट बनी है. इन रचनाओं में कल्पना शक्ति कवि प्रतिभा के रूप में अनुभव (भाव, ज्ञान और अभिव्यंजना) बनकर शब्द सामर्थ्य का प्रमाण बनी हैं.

इस संकलन की पहली कविता है ‘मैं सलिल’ हूं. सलिल का सामान्य अर्थ जल तो होता ही है, स्वयं इस संकलन के कवि का उपनाम भी ‘सलिल’ ही है जो जल के विशेष गुणों की धारक है. करुणा कवि का प्रमुख गुण है तभी तो कविता के प्रारंभ में ही अपनी आत्म चेतना का परिचय देते हुए कहा है कि मैं पानी तो हूं ही पर ‘आंसू बनकर बहने वाली दुखिया की राम कहानी’ भी हूं. सलिलाक्षरों में उच्चादर्शों की अभिव्यंजना बनकर जल को ‘अनेक अर्थों’ और अनेक पदार्थों तथा दृश्यों में कविता के स्वर प्राप्त हुए हैं. आदिम मानव की उद्भव और आज के विज्ञानी मानव की विनाश कथा भी इन पंक्तियों में जीवन विकास से लेकर प्रतिफल विनाश तक चले जा रहे घटना क्रमों से शब्द में रूपायित हुई. यह संपूर्ण कविता काव्य धारणा और प्रयोजन तक ही सीमित नहीं है, इसमें तो काव्य की मार्मिकता, गंभीरता और उदात्तता के साथ समय को गति प्रदान करने वाली निष्ठापूर्ण प्रेरणा का प्रेरक तत्व भी उत्कर्षित हुआ है.

कृति में ‘सलिल जी’ की दूसरी रचना है ‘अंधकार का लघु-दीपक’. निःसंदेह अज्ञान के अंधकार के तमसाछन्न जीवन की भटकन को ज्ञान का एक नन्हा सा दीपक ही अपनी आलोक रश्मियों से प्रकाशमय कर सकता है. कवि का यह कथन कि मैं अंधकार का लघु दीपक उन अंधियारी गलियों की ज्योति कथा बनता हूं जिन में मेरी आवश्यकता होती है. इस कविता में सृजन के स्वर भी हैं, विजन के स्वर भी हैं, नश्वरता और अवसान के अर्थ भी समाहित हैं. विज्ञान बोध की विद्युत धारा का वर्णन भी है और पूजन की थाली में सजे हुए पावन चंदन चर्चित अगरू अक्षत और कर्पूर की सुरभि से संबंधित पावनता का प्रतीकात्मक पाठ भी समाहित है. अपने व्यक्तित्व को विलीन करके अग-जग को अपनी रश्मियों से उर्जस्वित करने वाले लघु दीपक की आत्म कथा महानतम व्यक्तित्व की आदर्श गाथा है.

चेतना के चिंतन सूत्रों में पिरोई मानस चिंगारियों की अगली कड़ी है ‘मुझको तो प्यारा लगता है’ शीर्षक कविता. जिसमें कवि ने कृत्रिम तथाकथित सभ्य और जन्नत कहे जाने वाले नगरीय जीवन की वितृष्णा प्रकट करते हुए कहा है कि ‘मुझको तो प्यारा लगता है, वही पुराना गांव. जहां खुरदरी सी जमीन पर सोती शीतल छांह.’ ‘सलिल जी’ का बचपन याद रखने का अपने स्मृति को सीधी और सहज जीवन गति से आप्लावित किये रखने का सुख सपना तो है ही. बहुत अच्छी कविता है- प्रेम की, नेह की, अपनेपन की अपनी विसंगतियों को पुरानी यादों के सहारे भुलावा देने की नई पीढ़ी को अपनी विरासत का संदेश भी है इस कविता में.

इस संकलन की चौथी कविता है कवि का स्वयं को आह्वाहन देकर कुछ इस प्रकार का गीत लिखने को कहना कि जिसमें मानवीय मूल्यों का प्रेम, करुणा का, सत्य का, दया का, क्षमा का, और वीर भावों का समावेश हो. जिसमें अपने कर्तव्य पथ पर सत्य के लिए, देश के लिए, समाज के लिए और दलित, दमित और पीड़ित के कष्ट में साझीदार होने के स्वर समाहित हैं. इन्हीं भावों को व्यक्त करने के लिए कहा गया है कि एक ओजस्वी रचना जो सोई हुई जवानी को जगा दे, कवि कुछ इस प्रकार का गीत लिखो.

अंतिम रचना है ‘फूल और शूल’ जीवन में कुरूपता भी है और सुंदरता भी है. एक फूल की डाली पर उगे शूल भी जीवन के अंकुरण का संदेश देने वाले हैं और फूल तो अपनी वाह्य और आंतरिक सुषमा से सभी को अलौकिक आनंद प्रदान करते ही हैं. इस कविता में फूल और शूल दोनों को ही जगत और जीवन का अभिन्न और आवश्यक अंग मानकर चिंतन प्रधान भाव प्रदान किये गये हैं.

इन कविताओं में वस्तु तत्व की प्रधानता है, जिसे ‘सलिल जी’ ने आदर्श और यथार्थ के समन्वय से चिंतन की चिंगारियों के रूप में अभिव्यक्त किया है.

संपर्कः 119/501-सी3, दर्शनपुरवा, कानपुर

मो. 9839202423

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------