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प्राची - नवंबर 2016 / लघु लेख / कविताओं से बतियाने का सुख / श्याम सुशील

लघु लेख

कविताओं से बतियाने का सुख

श्याम सुशील

मारे प्रिय कवि त्रिलोचन का यह जन्मशती वर्ष है. त्रिलोचन एक ऐसे कवि जो जनपद का होते हुए भी पृथ्वी को अपना घर समझते थे और सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना करते थे. त्रिलोचन जी का महयुक्ति-राग है- ‘केवल भारत नहीं विश्व का मानव जागे, फूले, फले, बढ़े, अपने दामन का सुख पाए...

‘नहीं हूं किसी का भी प्रिय कवि मैं’ लिखने वाले त्रिलोचन जी का मानना था कि कविता करना अपने आप में कोई बड़़ा तीर मारना नहीं है. कवि को पहले मनुष्य होना चाहिए. एक मनुष्य किसी भी कवि से बड़ा है. अपने एक सॉनेट में वे कहते हैं, ‘मैंने उनके लिए लिखा है जिन्हें जानता हूं जीवन के लिए लगा कर अपनी बाजी जूझ रहे हैं, जो फेंके टुकड़ों पर राजी कभी नहीं हो सकते हैं, मैं उन्हें मानता हूं.’

‘आगामी मनुष्यताओं का निर्माता’ इस ऊबड़-खाबड़ दुनिया में त्रिलोचन जी समझौता नहीं कर सके, इसलिए अपनी राह चले, आंखों में रहे निराला, मानदंड मानव के तन के मन के, तो भी पीस परिस्थितियों ने डाला...इस पर भी हंसकर, गाकर और खेलकर पथ जीवन का पार किया, यह कहते हुए- ‘आभारी हूं मैं, पथ के सब आघातों का मिट्टी जिनसे वज्र हुई उन उत्पातों का...त्रिलोचन जी भाषा के लोक आचरण पर जोर देते थे. उर्दू-फारसी जानते हुए भी उन्होंने हिंदी में गजल कही है- बिस्तरा है न चारपाई है, जिन्दगी खूब हमने पाई है...वे मानते थे कि उर्दू और हिंदी दोनों जुबानों में कोई दूरी नहीं है. दुनिया में कोई दो भा-ााएं ऐसी नहीं हैं जो इतनी करीब हैं. ‘तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी, मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो’ कहने वाले कवि ने यह भी लिखा है- ‘गालिब गैर नहीं हैं, अपनों से अपने हैं, गालिब की बोली ही आज हमारी बोली है.’ वे उच्चरित भाषा को आदर्श मानते थे. कहते थे, जनता जैसा बोल रही है वैसा कवि लिखें. जनता पूरा वाक्य बोलती है. त्रिलोचन जी अपनी कविताओं में पूरा वाक्य देते हैं. मुझे याद आ रहा है उनकी 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित समारोह में गुरुवर डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा था कि त्रिलोचन वाक्यों में कविता लिखते हैं. खड़ी बोली हिंदी में कितने कवि हैं जो वाक्यों में कविता लिखते हैं? अर्थबोध वाक्य से होता है, शब्दों से नहीं होता. वाक्यों में कविता लिखने वाला आज दूसरा कोई नहीं है- ‘आज मैं अकेला हूं अकेले रहा नहीं जाता, सुख-दुख एक भी अकेले सहा नहीं जाता.’ त्रिलोचन वाक्य पर अटल रहते हैं. वे बीच में तोड़ते नहीं हैं...उनकी कविता मित्र की तरह है जो एक बार मित्र बन जाती है तो ताउम्र बनी रहती है.

कविवर त्रिलोचन की कविताओं से मेरी मित्रता सन् 1980-81 के दौरान हुई थी और तब से आज तक बनी हुई है. उनका सादगीपूर्ण पहनावा, सरल आत्मीय व्यक्तित्व हर किसी को सहज ही अपनी ओर खींचता था. उनकी लगभग सभी रचनाएं मुझे प्रिय हैं, क्योंकि प्रकृति, समय, समाज और उससे जुड़ा हुआ उनका जीवन-अनुभव हर रचना में धड़़कता हुआ लगता है. वे स्वयं कहते थे- ‘मुझे शब्द शब्द में देखो, मैं कहां हूं, मैं तुम से, तुम्हीं से, बात किया करता हूं, और यह बात मेरी कविता है.’ ऐसे निर्मल, सरल हृदय कवि की कविताओं से बतियाने का अपना ही सुख है!

सम्पर्कः ए-13, दैनिक जनयुग अपार्टदतमहयेंट्स, वसुंधरा एनक्लेव, दिल्ली-110096

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