रचनाकार

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प्राची - नवंबर 2016 / विशिष्ट कवि / विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

विशिष्ट कवि

इस अंक के विशिष्ट कवि श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

जीवन-वृत्त

जन्मः 1940 ई., कुशीनगर जनपद (उ.प्र) का एक गांव (रायपुर भैंसही-भेड़िहारी).

शिक्षाः एम.ए., पी.-एच.डी.

पदः गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष पद से 2001 ई. में अवकाश ग्रहण. अनेक विश्वविद्यालयों की कार्य परिषदों, शोध परिषदों एवम् पाठ्यक्रम समितियों के सदस्य. अध्यक्ष, गोरखपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ 1988-90.

सम्प्रतिः अध्यक्ष, साहित्य अकादेमी (नेशनल एकेडमी ऑफ लेटर्स) संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार.

विदेश यात्राएंः इंग्लैंड, मारीशस, रूस, नेपाल, अमेरिका, नीदरलैंड, जर्मनी, फ्रांस, लक्जमवर्ग, बेल्जियम, चीन, थाईलैंड, कनाडा, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रिया जापान.

पुरस्कार

1. ‘महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’ केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, 2013

2. ‘व्यास सम्मान’ बिङला फाउंडेशन, दिल्ली, 2010

3. ‘हिन्दी गौरव सम्मान’ उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 2007

4. साहित्य भूषण सम्मानउत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 2000

5. ‘पुश्किन सम्मान’ भारत मित्र संगठन, मास्को, रूस 2003

6. ‘दस्तावेज’ पत्रिका को ‘सरस्वती सम्मान’ उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 1988 और 1995

7. ‘शिक्षक श्री’ सम्मान, उ.प्र. सरकार, 2008

अनेक पुस्तकें हिन्दी संस्थान, उत्तर प्रदेश द्वारा पुरस्कृत.

‘दस्तावेज’ पत्रिका का सम्पादन : गोरखपुर से रचना और आलोचना की विशिष्ट साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका का सम्म्पादन. यह 1978 से नियमित निकल रही है. जिसके कई दर्जन विशेशांक ऐतिहासिक महत्त्व के हैं.

रचनाओं के अनुवाद

1. ओड़िया में कविताओं के चार संकलन, 2. गुजराती में कविताओं का एक संकलन 3. मराठी में कविताओं के दो संकलन 4. तमिळ में कविताओं का एक संकलन 5. नेपाली में कविताओं का एक संकलन 5. तेलुगू में कविताओं का एक संकलन 6. अंग्रेजी में कविताओं का एक संकलन 7. रुसी में कविताओं का एक संकलन 8. कन्नड में कविताओं का एक संकलन 9. मलयाळम् में कविताओं का एक संकलन 10.पंजाबी में कविताओं का एक संकलन

11. राजस्थानी में कविताओं का एक संकलन 12. बांग्ला में कविताओं का एक संकलन 13. हजारी प्रसाद द्विवेदी (आलोचना ग्रंथ) गुजराती और मराठी में और 14. महादेवी रचना-संचयन बांग्ला में प्रकाशित

प्रकाशित पुस्तकें

शोध एवं आलोचना ग्रन्थ

1. छायावादोत्तर हिन्दी गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1968, 2. नये साहित्य का तर्कशास्त्र, मैकमिलन प्रकाशन, दिल्ली, 1975, 3. आधुनिक हिन्दी कविता, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1977, 4. समकालीन हिन्दी कविता, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1982, 5. रचना के सरोकार, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1987, 6. हजारी प्रसाद द्विवेदी, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1989, 7. कविता क्या है?, पार्श्व प्रकाशन, अहमदाबाद, 1989, 8. गद्य के प्रतिमान, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996, 9. कबीर, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, 1997, 10.कुबेरनाथ राय, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2007, 11.आलोचना के हाशिए पर, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 2008, 12.गद्य का परिवेश, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2013

कविता-संग्रह

1. चीजों को देखकर, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1970, 2. साथ चलते हुए, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1978, 3. बेहतर दुनिया के लिए, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली,1985, 4. आखर अनन्त,

राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991, 5. फिर भी कुछ रह जायेगा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 2008, 6. जिजीविशा (हिंदी-रूसी द्विभाषी संकलन), शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, 2016

यात्रा संस्मरण

1. आत्म की धरती, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 1999, 2. अन्तहीन आकाश, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2005, 3. अमेरिका और यूरप में एक भारतीय मन, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2012

लेखकों के संस्मरण

1. एक नाव के यात्री, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2000

डायरी

1. दिन रैन, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2014

आत्मकथा

1. अस्ति और भवति, नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, 2014

साक्षात्कार

1. मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2001

2. बातचीत, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2014

3. साक्षात्कार और स्वीकृतियां, विजया बुक्स, दिल्ली, 2016

संकलित पुस्तकें

1. बेड़ियों के विरुद्ध, अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, 2003

2. शब्द और शताब्दी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2003

3. कवि ने कहा, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2012

4. पचास कविताएं, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2012

5. प्रतिनिधि कविताएं, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2014

6. संकलित निबंध, नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, 2014

7. जो दिखता है और जो दिखता नहीं (यात्रा) नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, 2014

सम्पादित पुस्तकें

1. अज्ञेय, 1978, 2. हजारी प्रसाद द्विवेदी, 1980, 3. प्रेमचन्द, 1980

4. आठवें दशक की हिन्दी कविता, 1982, 5. रामविलास शर्मा, 1985

6. रामचन्द्र शुक्ल, 1985, 7. मुक्तिबोध, 1986, 8. प्रतिनिधि कविताएंः श्रीकांत वर्मा, 1987, 9. आठवें दशक की हिन्दी आलोचना, 1991, 10. जयशंकर प्रसाद, 1992, 11. निराला, 1997, 12. महादेवी रचना संचयन, 1998, 13. तुलसीदास, 1999, 14. बीसवीं शताब्दी का हिन्दी साहित्य, 2005, 15. पुस्तक समीक्षा का परिदृश्य, 2005, 16. महात्मा गांधी : सहस्राब्द का महानायक, 2009, 17. अज्ञेय पत्रावली, 2012

18. आधुनिक भारतीय कविता संचयन (हिन्दी) 2012

रचनाओं पर शोध कार्य

1. बम्बई विश्वविद्यालय, बम्बई, 2. बिहार विश्वविद्यालय, मु्जफ्फरपुर,

3. हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला, 4. रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली, 5. पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, 6. उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, 7. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, 8. दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, चेन्नई. कई अन्य विश्वविद्यालयों में भी उनकी रचनाओं पर शोध उपाधियां प्राप्त.

उनकी रचनाओं पर प्रकाशित पुस्तकें

1. स्वप्न और यथार्थ के कवि : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, संपादक, अरविन्द त्रिपाठी, 1997 2. कविता सबसे सुंदर सपना है, ए. अरविन्दाक्षन, 2003 3. साहित्य का स्वाधीन विवेक : संपादक, ओम निश्चल, 2003 4. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का काव्य : डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय, 5. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का गद्य : डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय, 6. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के पत्र साहित्यकारों के नाम : संपा. अनंतकीर्ति तिवारी.

उनकी रचनाओं पर एकाग्र पत्रिकाएंः

1. समावर्तन (उज्जैन) : अंक-15, जून 2009

संपादक : प्रभात कुमार भट्टाचार्य/रमेश दवे

2. सृजन समीक्षा (उरई), 2010, संपादक : सत्यवान

3. अभिनव इमरोज (दिल्ली) 2015 संपादक : देवेंद्र कुमार बहल

4. चौराहा (मुजफ्फरपुर) संपादक : अंजना वर्मा

पता : संपादक, दस्तावेज, बेतियाहाता, गोरखपुर-273 001

रवीन्द्र भवन, 35, फ़ीरोज़-ााह रोड, नई दिल्ली-110001

फोन : मो. 09810139991

09415691378

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अचजपूंतप378/ीवजउंपसण्बवउ

विशिष्ट कवि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कविताएं

मनुष्यता का दुख

पहली बार नहीं देखा था इसे युद्ध में

इसकी कथा अनंत है

कोई नहीं कह सका इसे पूरी तरह

कोई नहीं लिख सका संपूर्ण

किसी भी धर्म में, किसी भी पोथी में

अंट नहीं सका यह पूरी तरह

हर रूप में कितने-कितने रूप

कितना-कितना बाहर

और कितना-कितना भीतर

क्या तुम देखने चले हो दुख?

नहीं जाना है किसी भविष्यवक्ता के पास

न अस्पताल, न शहर, न गांव, न जंगल

जहां तुम खड़े हो

देख सकते हो वहीं

पानी की तरह राह बनाता नीचे

और नीचे

आग की तरह लपलपाता

समुद्र सा फुफकारता दुख

कोई पंथ कोई संघ

कोई हथियार नहीं

कोई राजा कोई संसद

कोई इश्तिहार नहीं

तुम

हां-हां, तुम

सिर्फ हथेली से उदह दो

तो चुल्लू-भर कम हो सकता है

मनुष्यता का दुख

कोशिश

पृथ्वी उसकी नहीं थी

जिस पर गिरा वह एक दिन

अपनी एक जोड़ी वेदना के लिए

पृथ्वी बंधी थी सूरज और ग्रह-नक्षत्रों से

वह अपने डैनों और चोंच से

दोनों घूम रहे थे

अपनी-अपनी धुरी पर

पृथ्वी को कहीं जाना नहीं था

अपनी अविराम यात्रा में

उसके कुछ स्वप्न और स्वाद थे

उड़ नहीं सकती थी पृथ्वी भारी थी

वह अपने डैने फड़फड़ा सकता था

उसने पत्थरों पर चोंच मारी

हवा से जल से धूप से की दोस्ती

वृक्षों पर बनाए घोंसले

शिकारियों से डरते और चुनौती देते हुए

दाने चुगाए अपने बच्चों को

और छिटका दिए धरती पर

इधर-उधर कुछ बीज

पृथ्वी नहीं थी उसके पंजों में

जिसे वह घूमने से रोक देता

मगर उसने कोशिश बहुत की

अपनी लाल भूरी स्याह चोंच से.

राजधानी

इतना आतंक था मन पर

कि चौथाई तो मर चुका था

उतरने के पहले ही

राजधानी के प्लेटफार्म पर

मेरा महानगर प्रवेश

नववधू के गृह-प्रवेश की तरह था

मगर साथियों के साथ

दौड़ते, लड़खड़ाते और धक्के खाते

सीख ही लिये मैंने भी सारे काट

लंगड़ी और धोबिया-पाट

एक से एक किस्से थे वहां

परियों और विजेताओं

आलिमों और शाइरों के

प्याले टकराते हुए

मैं भी बोलता था

सिकंदर और गालिब के अंदाज में

हालांकि प्यारा ही भरता

और दस्तरख्वान ही बिछाता रहा

शाही महफिलों में

दिन बीतते रहे

मेरी याददाश्त धुंधली होती रही

भूलता रहा

साकिन मौजा तप्पा परगना

फिर सूखने लगा पानी

जो था आंखों में और मन में

और झरने लगे भाव

एक-एक कर पीले पत्तों की तरह

शोर था इतना

कि करुणा भी पहिए-सी घरघराती

और शांति गुरगुराती इंजन-सी

इतनी भागमभाग

कि हास दिखता था

दूर से ही उदास निराश हताश

वीरता के लिए क्या जगह हो सकती थी

उस चक्रव्यूह में?

यदि प्रेम करता लड़कियों से

तो धोखा देता किन्हें?

इतनी रगड़ी गई चमड़ी

भीड़ में और बेरहम मौसम में

कि कोई अंतर नहीं रह गया

मेरे लिए आग और पानी में

इस तरह एक दिन

लौटा जब राजधानी से

तो मृतकाया में उतारा गया मैं

अपने गांव के छोटे-से टीसन पर.

अअअ

अनंत जन्मों की कथा

मुझे याद है

अपने अनंत जन्मों की कथा

पिता ने उपेक्षा की

सती हुई मैं

चक्र से कटे मेरे अंग-प्रत्यंग

जन्मदात्री मां ने अरण्य में छोड़ दिया असहाय

पक्षियों ने पाला

शकुंतला कहलाई

जिसने प्रेम किया

उसी ने इनकार किया पहचानने से

सीता नाम पड़ा

धरती से निकली

समा गई अग्नि-परीक्षा की धरती में

जन्मते ही फेंक दी गई आम्र-कुंज में

आम्रपाली कहलाई

सुंदरी थी

इसलिए पूरे नगर का हुआ मुझ पर अधिकार

जली में वीरांगना

बिकी मैं वीरांगना

देवदासी द्रौपदी

कुलवधू नगरवधू

कितने-कितने मिले मुझे नाम-रूप

पृथ्वी, पवन

जल, अग्नि, गगन

मरु, पर्वत, वर

सबमें व्याप्त हे मेरी व्यथा.

मुझे याद है

अपने अनंत जन्मों की कथा.

उसके दुख

दिख नहीं रहे थे उसके दुख

पर्दे पर जब वह तेल का प्रचार करती

उसके बाल बिना तूफान के लहराते थे

मसालों के प्रचार में

महक उठती वह स्वयं

कैमरा उसकी आंखों को

कभी झील में बदल देता

कभी अधरों को कोंपलों में

और हद तब हो जाती है

जब पैंटी का प्रचार करते

वह पैंटी से बाहर निकल

दर्शकों से चिपक जाती

कुछ भी तो नहीं था उसकी काया पर

जिसमें छिपा सके वह अपना दुख

मैंने बुद्ध का महावाकय पढ़ा था

कि संसार दुखमय है

मैं देखना चाहता था उसके दुख

महीनों-महीनों

उस परी को

निहारते-निहारते

एकाएक मुझे लगा

क्या अपने दुख को

मेरे सुख में तब्दील कर देना ही

नहीं है उसका दुख?

ऊंघता संतरी

उसे मत जगाओ

वह सपने देख रहा है

बच्चे लौट रहे हैं उसके सपने में

पक्षी चहचहा रहे हैं उसके सपने में

बदल रहे हैं इंद्रधनुष के रंग उसके सपने में

झर रहे हैं गुलमुहर के फूल उसके सपने में

उसे मत जगाओ

उसकी नींद पर पाबंधी है

अभी एक झपकी में वह लूट लेगा ब्रह्मांड

अभी एक हल्का-सा पदचाप

चकनाचूर कर देगा उसका शीशमहल

देवदूत की तरह सो रहा हे वह

उसे मत जगाओ

अभी वह उछलकर खड़ा हो जाएगा

सीधे तने वृक्ष की तरह

सजग और तैयार

किसी पर भी गोली चला देने के लिए.

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