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प्राची - नवम्बर - 2016 : पाठकीय - आपने कहा है

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आपने कहा है

भविष्य यश्स्वी न दीर्घ

‘प्राची’ अक्टूबर, अंक में श्री कृष्ण कुमार यादव ने ‘आपने कहा है’ के अंतर्गत् किन्हीं डॉ. प्रभु चौधरी द्वारा, अपने लेख की चोरी की ओर ध्यान दिलाया है. आल्हादकारी यह है कि पत्रिका ने इसे अत्यंत गम्भीरता से लिया. साहित्यिक चोरी पर पूरा सम्पादकीय वक्तव्य केन्द्रित किया है. यह आश्वस्त करता है कि ‘प्राची’ की प्रतिबद्धता पाठकों तक मौलिक तथा स्तरीय सामग्री पहुंचाना है. प्रश्न साहित्यिक चोरी करनेवालों का है तो उनका भविष्य न तो यशस्वी होता है न दीर्घ. कुछ चोरियों के बाद ही वे चोर लेखक के रूप में कुख्याति अर्जित कर लेते हैं. स्वयं दफ्न हो जाते हैं. अलबत्ता हर रचनाकर्मी को यह तो समझना ही होगा कि किसी साहित्यकार से या उसकी किसी रचना से प्रेरित होना, उसका प्रक्षेपण अपनी रचनाओं में आ जाना बहुत स्वाभाविक है. यह मूल रचनाकर के लिये भी गर्व करने की बात होती है लेकिन उसकी रचना को अपने नाम से प्रकाशित करवाना सम्पादक-पाठक के साथ छल तो है ही, मूल रचनाकार का भी अपमान है.

श्री भारत यायावर का पत्रिका के सम्पादन कर्म से जुड़ना स्वागत् योग्य है. आशा नहीं, विश्वास किया जा सकता है, पत्रिका उत्तरोत्तर और निखरेगी. पहले ही अंक को नागार्जुन पर केन्द्रित करना, उन पर अन्य विद्वान लेखकों के अतिरिक्त नामवर जी जैसे साहित्य-स्तम्भ द्वारा दी गई सामग्री यह सकारात्मक संकेत देती है. इसी प्रकार काव्य जगत के अंतर्गत नरेन्द्र पुण्डरीक जैसे माटी से जुड़े कवि को पढ़ना सुखद है. संयोगवश पुण्डरीक ‘माटी’ पत्रिका का सम्पादन दायित्व भी निभा रहे हैं. वैसे, धरोहर कहानियों के अतिरिक्त कहानी तथा कविताओं के चयन में और अधिक सजगता पत्रिका को और अधिक पठनीय बना सकती है. सहायक सम्पादिका, डॉ. भावना शुक्ला द्वारा साहित्यकारों से किये साक्षात्कार उनके पूरे रचना संसार को उद्घाटित कर रहे हैं. उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व से परिचित कराने का कार्य कर रहे हैं. यह सिलसिला जारी रहना चाहिये.

‘आपने कहा है’ में पाठकों को और अधिक स्पेस देना पत्रिका के विकास तथा मार्ग दर्शन की दिशा में विशेष कदम होगा. पत्र लेखक पाठकों के फोन नं. ई मेल सम्पर्क दिये जा सकें तो प्रयास कीजिये.

दिनेश बैस, झांसी (उ.प्र.)

मोः 08004271503

 

साहित्यिक रचनाओं की चोरियां होने की परम्परा है

‘प्राची’ का अक्तूबर अंक प्राप्त हुआ. आश्चर्य हुआ- इस अंक में सम्पादकीय एक नये रंग में ही दिखाई दिया, जिसमें सम्पादक एक अल्पज्ञात लेखक को नौसिखिया अधकचरा तथा खुद को आला दर्जे का गजलकार समझने वाला आदि विशेषणों से नवाजते हुये स्व. श्री गिरिजा शंकर त्रिवेदी जी के सान्निद्य में स्थापित ‘प्राची’ पत्रिका और सम्पादकीय की शालीन परम्परा को घ्वस्त करते ही प्रतीत हुये.

हर लेखक अपनी रचना को विश्व की सर्वश्रेष्ठ रचना मानता है. स्वयं इस सम्पादकीय के लेखक ने एक लेखक के रूप में उनकी कहानी ‘अपने पराये’ के बारे में ‘साहित्य अमृत’ पत्रिका के मार्च 2016 के अंक में पाठकों की प्रतिक्रिया स्तम्भ में उनके द्वारा ही उस पत्रिका के सम्पादक को लिखे गये पत्र में किसी पाठक द्वारा उन्हें दूसरा प्रेमचन्द कहने को उन्होंने गौरव और सम्मान की अनुभूति के साथ ही उद्धृत किया है तो अपनी रचना के प्रति सम्मान का भाव तो हर लेखक रखता ही है.

इसके अतिरिक्त कोई लेखक अगर किसी अन्य लेखक पर अपनी रचना की नकल या चोरी का आरोप लगाता है तो अधिक आक्रोशित तो आरोपित को होना चाहिये.

सम्पादक स्वयं एक प्रतिष्ठित लेखक, साहित्यकार और पत्रकार एवम् गजलकार हैं, इसलिये उनके द्वारा किसी अन्य समाचारपत्र को अनजाना सा अखबार कहना और हिन्दी गजलकारों के ऊपर पाकिस्तानी उर्दू गजलकारों की श्रेष्ठता सिद्व करने जैसा लेखन उनकी साहित्यकार और खासतौर पर हिन्दी गजलकार की प्रतिष्ठा के अनुकूल प्रतीत नहीं होता.

अपने लेख में सम्पादक ने स्वयं स्वीकार किया है कि साहित्यिक रचनाओं की चोरियां होने की परम्परा है और बड़े बड़े लेखक भी इस आरोप में आरोपित हुये हैं. उनके कथन का पूरी तरह समर्थन करते हुये मेरा निवेदन है कि जनाब मुजफ्फर नजमी की मशहूर गजल के शेर- लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई, के काफी मौकों पर मौजूं होने की वजह से इसे कई शायर अपनी बता कर बड़ी शान से अदीबी महफिलों में वाहवाही लूटते रहे, जब तक खुद नजमी साहब ने अपनी गजल कादम्बिनी के सम्पादक के समक्ष पेश करके इसे कादम्बिनी में प्रकाशित करवा पाने का अवसर प्राप्त नहीं किया. अब अगर कादम्बिनी के तत्कालीन सुधि सम्पादक ने अल्पज्ञात मुजफ्फर साहब को अधकचरा और नौसिखिया कह कर तिरस्कृत कर दिया होता तो आज तक श्री मुजफ्फर को न्याय नहीं मिलता. वैसे आज के ख्यातनाम लेखक और साहित्यकार भी कभी नौसिखिये और अधकचरेपन के दंश को झेल चुके हैं.

मैं श्री तन्वीर से किसी भी रूप में परिचित नही हूं, मगर मेरा अनुरोध है कि उन्होंने फेसबुक पर भी अपना पक्ष पूर्ण विनम्रता से ही प्रस्तुत किया है, तो उनके स्वयं के पक्ष रखने के अधिकार और विनम्रंता के प्रति उत्तर में भी समान व्यवहार ही अपेक्षित था.

मनोरंजन सहाय सक्सेना, जयपुर-302015

 

प्राची का नवीनतम अक्टूबर 2016 प्राप्त हुआ. आभार. प्राची के अक्टूबर 2016 के पृष्ठ 6 पर प्रकाशित संपादकीय को पढ़ा और आपको पत्र लिखने के लिये विवश हुआ. मैं आपकी संपादकीय से पूर्ण रूप से अक्षरशः सहमत हूं. साहित्य जैसी पवित्र विधा में भी तरह-तरह के तथाकथित झूठे रचनाकारों ने प्रवेश कर लिया है, जोकि वास्तव में रचनाकार तो हैं ही नहीं. यह तथाकथित रचनाकार दूसरों की मूल रचनाओं में हल्का सा शब्दों का हेरफेर, कुछ शब्दों को नीचे-ऊपर कर और मन में बिना किसी पछतावे या शर्मिन्दगी का भाव लाते हुए उसे अपना बता कर प्रकाशित करा लेते हैं. साहित्यिक मंचों पर भी दूसरों की रचनायें पढ़ जाते हैं. यह वही रचनाकार हैं जो अपने आपको प्रेमचंद, निराला और दुष्यंत कुमार जैसे श्रेष्ठतम राष्ट्रीय रचनाकारों से कम नहीं समझते. यह कृत्य कहीं न कहीं निंदनीय माना जायेगा. वे यह नहीं जानते या जानने का प्रयास नहीं करना चाहते कि उनके इस कृत्य से मूल रचनाकार को कितनी वेदना होती होगी? वह स्वयं को कितना ठगा हुआ महसूस करता होगा. ये वही तथाकथित रचनाकार हैं जो अपने ही तरह की झूठी संस्थाओं को पैसा देकर, चाटुकारिता कर के अपना झूठा सम्मान, अभिनंदन करवा लेते हैं और फिर अपने साहित्य परिचय में इन्हीं झूठे सम्मानों की एक लम्बी फेहरिस्त जोड़ कर स्वयं को महान प्रदर्शित करने का असफल प्रयास करते हैं. यह साहित्यिक मुखौटेबाजों का जिस तरह से आपने अपनी संपादकीय में पर्दाफाश किया है, वह सराहनीय ही नहीं अपितु प्रशंसनीय भी है. उसके लिये आपको सभी सच्चे, मेहनती, ईमानदार, विद्वान रचनाकारों की ओर से कोटिशः

धन्यवाद.

मैं भी इस साहित्यिक चोरी के दुराग्रह का शिकार हो चुका हूं मेरी एक प्रसिद्ध लघुकथा ‘भयभीत’ है, जिसे एक तथाकथित लघुकथाकार ने लघुकथा में हल्का सा शब्दों का हेरफेर कर पूरी की पूरी लघुकथा को राजस्थान के एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में प्रकाशित करवा ली. जिसकी सूचना मुझे आबू रोड निवासी मेरे मित्र श्री त्रिलोकसिंह ठकुरेला द्वारा दूरभाष से मुझे दी गई. इसी तरह वाटस्अप पर मेरी एक बहुचर्चित कविता-

यह अजीब मुल्क है, रिश्वत सुविधा शुल्क है,

काम होगा मरजी से, जल्दी है तो शुल्क है.

यह नदियों का मुल्क है, पानी भरपूर है,

बोतल में बिकता है, दस रुपया शुल्क है.

पूरी की पूरी रचना बिना किसी बदलाव के अपने नाम से मुझे ही किसी झूठे रचनाकार ने वाटस् अप पर अपने नाम से भेज दी. इन तथाकथित झूठे मक्कार रचनाकारों की जितनी भी भर्त्सना की जाये उतनी कम होगी.

खैर अब दूसरी बात...प्रधान संपादक भारत यायावर को प्राची से जोड़ने के लिये आपको धन्यवाद और यावावर जी को अनंत शुभकामनाएं. यायावर जी का लेख ‘मैं ऐसे बाबा का चेला हुआ’ पढ़कर मैं निःसंदेह कह सकता हूं कि यायावर जी का प्राची से जुड़ना प्राची के लिये अत्यन्त लाभकारी होगा और भविष्य में प्राची में और अधिक निखार आयेगा. यह प्राची का ‘नागार्जुन’ पर प्रकाशित विशेष अंक पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा. सुप्रसिध्द लेखक, नामवर जी, भारत यायावर, अजीत प्रियदर्शी,उमाशंकर सिंह परमार आदि वरिष्ठ लेखकों का नागार्जुन जी के जीवन पर प्रकाशित लेख पठनीय और सारगर्भित है. नागार्जुन की पद्य कथा चान्दना प्रभावित करती है.

कभी महाविद्यालयीन छात्र जीवन में पढ़ा कृःन चन्दर का सुप्रसिध्द उपन्यास एक गधे की आत्मकथा को पुनः किश्तों में पढ़ना सच में बड़ा सुखद लगता है. आपके द्वारा प्राची के पाठको को विदेशी लेखकों की प्रसिध्द कहानियों से परिचय कराना, आपकी संपादकीय सूझबूझ का प्रशंसनीय एवं अनुपम उदाहरण माना जायेगा.

इसी अंक में प्राची की सह संपादिका भावना शुक्ला का डॉ. राजकुमार सुमित्र से लिये गये साक्षात्कार में उनकी पत्रकारिता, कवि मन की बातों से, उनके अतीत से परिचित हुआ यह लेख डॉ. सुमित्र जी के जीवन की काफी जानकारी देता हुआ ज्ञानवर्धक लेख है. सहज, सरल, सरस, कलम-कौशल के धनी हमारे राजकुमार जी सुमित्र जैसे साहित्यकारों से ही संस्कारधानी साहित्यधानी कहलाने का गौरव प्राप्त करती है. इस लेख के प्रकाशन पर आपको और डॉ. भावना का आभार. यदि सुमित्र जी की कोई रचना भी प्रकाशित कर दी जाती तो मेरी दृष्टि से वह अति उत्तम होता. सभी स्थाई स्तम्भ हमेशा की तरह प्रभावित करते हैं. इस साहित्य की अनिवार्य एवं महत्पूर्ण पत्रिका प्राची के इस अनुपम अंक के लिये आपको और आपकी पूरी टीम को धन्यवाद.

प्रभात दुबे, जबलपुर (म.प्र.)

मो. 9424310984

 

सर्वश्रेष्ठ पत्र

‘परोपकाराये पुण्याये, पापाये पर पीड़नम्’

इधर ‘प्राची’ के अंकों को लगातार पढ़ रहा हूं. किसी भी पत्रिका की दृष्टि को समझने के लिए उसके संपादकीय का पढ़ना आवश्यक होता है. इस नजरिये से आपके सारे अंक अनुकूल सिद्ध हो रहे हैं. लेकिन अक्टूबर ’16 अंक के संपादकीय से निराशा हाथ लगी. आपने तो जैसे एक ऐसे भिखारी की रपट दर्ज कर ली, जिसने एक करोड़पति पर आरोप लगाया हो कि उस करोड़पति ने भिखारी के घर डकैती कर ली हो. तनवीर को इतना तवज्जो दे दिया कि संपादकीय का मजा ही किरकिरा हो गया.

बहरहाल पत्रिका उत्तरोत्तर रचनात्मक स्तर पर निखरती जा रही है और अब तो प्रधान संपादक के तौर पर इससे भारत यायावर भी जुड़ गए हैं, तो आगे अंक भी निश्चित ही पूर्ण संतुष्टि देने में समर्थ होंगे. इस अंक को नागार्जुन पर आधारित संस्मरण और आलेख, संग्रहणीय बनाते हैं. नागार्जुन की लम्बी कविता भी पाठकीय संतुष्टि देती है. राजा भोज का सपना (राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द) तथा एक गधे की वापसी (कृश्न चन्दर- धारावाहिक उपन्यास) दोनों मेरी पूर्व में पढ़ी हुई रचनाएं हैं. बावजूद इसके पुनर्पाठ ने जैसे पूर्व आस्वाद को फिर से ताजा कर दिया. ये रचनाएं बारम्बार पठनीय हैं. ‘एक गधे की वापसी’ का तो हमारे शहर की संस्था ने क्रमवार मंचन भी किया है.

विजय केसरी की कहानी ‘भिखारी की शव यात्रा’ को पढ़ते हुए ऐसा लगा, जैसे आज के बाजारवाद और स्खलित होते मानवीय-पारिवारिक एवं सामाजिक सम्बन्धों के बीच कहीं से कोई आशा की किरण झिलमिला उठी हो. हमारे पूर्व के संस्कार रहे हैं कि-

‘परोपकाराये पुण्याये, पापाये पर पीड़नम्’

उपरोक्त पंक्ति हमारे पूर्वजों के संस्कारों में, बल्कि आज से तीस चालीस वर्ष पूर्व के हमारे संस्कारों में भी रचे-बसे रहे हैं. लेकिन धीरे-धीरे जाने कैसी हवा चली कि हमारे शब्दकोश से परोपकार जैसे शब्द लुप्त होते चले गए. आज सारे सम्बन्ध स्वार्थ के गिर्द सिमट कर रह गए हैं. माता-पिता, भाई-बहन, यहां तक कि पति-पत्नी के रिश्तों में भी स्वार्थ की लोलुपता ने ही सम्बन्धों की परिभाषा निर्धारित कर ली है. ऐसे में किसी व्यक्ति या व्यक्ति के माध्यम से प्रेरित होकर समाज का एक छोटा सा अंश भी एक भिखारी के प्रति मानवीय संवेदना परदर्शित करते हुए नजर आते हैं, तो इसमें न सिर्फ कहानी की सार्थकता है, बल्कि पाठकों के लिए एक दिशा निर्देश भी है कि वे भौतिकता और बाजारवाद की चकाचौंध से अपने नजरिये का छोटा सा अंश भी चुराकर अगर वंचितों और जरूरतमंदों के लिए निकाल पायें तो शायद हम अपनी संवेदना को संरक्षित रख पाने में समर्थ हो सकते हैं. संभवतः ‘भिखारी की शव यात्रा’ की रचना के पीछे लेखक का भी यही उद्देश्य है. इस रचना के लिए विजय केसरी को बहुत-बहुत बधाई और बधाई संपादक मंडल को भी, जिन्होंने यह रचना उपलब्ध करवाई. समस्त ‘प्राची’ परिवार को आगामी दीप वर्ष की अशेष शुभकामनाएं.

रतन वर्मा

के-10, सी.टी.एस., हजारीबाग-825 301 (झारखण्ड)

मोः 9430347051

 

(श्री रतन वर्मा को अंशलाल पन्द्रे की पुस्तक ‘सबरंग हरसंग’ निःशुल्क प्रेषित की जाएगी. संपादक)

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