नाटक / नौटंकी राजा / अनुज खरे

नाटक अंश - नौटंकी राजा

अनुज खरे

(प्रसिद्ध व्यंग्यकार अनुज खरे का नाटक नौटंकी राजा  लोकप्रियता के नए पायदानों को छू रहा है. प्रस्तुत  है इस नाटक का एक प्रारंभिक अंश -)

 

राजा लाओ...राजा लाओ...

एक सॉलिड सा राजा लाओ..

पेट में रोटी डाले जो...काम हमको बांटे जो....

देखने में हीरो हो....अरे काम में न जीरो हो...

राजा लाओ...राजा लाओ...

एक सॉलिड सा राजा लाओ..

अआ..आ.आ आ.....!


हां बोलो सरररररररररर......

हां बोलो सरररररररररर......

देश में चलती नौटंकी, राजा भी नौटंकी...

हां..हां...राजा भी नौटंकी....

हां..हां...राजा भी नौटंकी....


जनता फिरती नंगी....हां...हां...जनता फिरती नंगी...

देश में नौटंकी....देश में नौटंकी...

जनता फिरती नंगी, लागे न उसको ठंडी....

लागे न उसको ठंडी...


हां..हां...देश में नौटंकी....राजा भी नौटंकी....

नौटंकी है...नौटंकी है....सरेआम नौटंकी है....

बीड़ी जलाकर मिलती जनता को गर्मी....

देश में नौटंकी, हां...हां...देश में नौटंकी...

(इतने में विदूषक आता है। कान पर एक हाथ रखता है। दूसरा सामने है। तान छेड़ता है।)

जब सदन में चलती है गरमा-गरम बहस 

तो बहस से आती आंच, भैइया बहस से आती है आंच...

इसी से चलता है काम देखो, इसी से चलता काम...

(सब वापस शुरू हो जाते हैं।)

नौटंकी है...नौटंकी है....सरेआम नौटंकी है....

जनता फिरती नंगी....हां...हां...जनता फिरती नंगी...

देश में चलती नौटंकी, राजा भी नौटंकी...

हां..हां...राजा भी नौटंकी....

हां..हां...राजा भी नौटंकी....

हां बोलो सरररररररररर......

हां बोलो सरररररररररर......

विदूषक बोलता है- हो गया सररररररररर, अब अपने-अपने काम पर जाओ कमीनो....

सब नाचते हुए चले जाते हैं। विदूषक कुर्सी पर आकर बैठ जाता है। उसके कानों में मोबाइल लगा है। 

`हेलु...हेलु...क्या? राजा सटक गया, हमारे राजाजी सटक गए...!`

(हर वाक्य के बाद बैकग्राउंड में सीटी बजेगी।)

`अबे कब हो गिया? एड्स हो गिया था महाराजाधिराज को या गुप्त रोग था....कैसे मर गिया...हाय...हाय कैसे मर गिया...`

`अबे तो किया खाने के ओवरडोज से मारे गए हमारे पियारे राजा....?

`अबे नहीं ? तो फिर कैसे ! हें...हें...हेंहेंहें...`

`अबे जो राजा अय्याशी के चक्कर में नहीं मारा गया वो काहे का राजा, अबे में तो नीं मानता विसे राजा....`

`क्या हां कै रिया है, कमीने, हमारे राजाजी मार गिये तू मजे ले रिया है...`

`अबे हमारा तो राज्य अनाथ हो गिया....`

(फूं....फूं...करके रोता है। फिर दर्शकों की तरफ देखकर...)

रोने का मुकाम है जनाब, हमारे पिजापालक राजा जी कल्टी कर गिए। आप भी दो आंसू गिरा लीजिए। वैसे भी आजकल रोने का फैशन नहीं बचा है। हॉल में अंधेरा है। रो लीजिए जनाब कल को हम कहीं रोना ही न भूल जाएं....। 

(जेब से रूमाल निकाल कर फैं...फैं...करके नाक पोंछता है। फिर रूमाल जेब में रख लेता है। अब दर्शकों की तरफ देखकर....)

जनाब, आपको कहानी समझ नीं आ रई होगीजी। ये साला राइटर भी, अब में क्या बोलूं साब, लिखते तो ऐसा हैं जैसे सबसे महान नाटक लिख रहे हों.....

मुश्किल तो हमारी हो जाती हैं। जनता को अपनी एक्टिंग से समझाओ, क्या हुआ। अबे, तुम लिखो मिस्ट्री, हम बनाएं हिस्ट्री, दर्शकों से जोड़ें कैमिस्ट्री, मुझे ते नहीं जमती भैइया ये मिस्ट्री। अबे इस डायरेक्टर ने आधा पैमेंट एडवांस में देकर हमारे कपड़े रखवा लिए हैं। अब कहीं भाग भी नहीं सकता हूं। आप ही बताओ, ये क्या कमीनता हुई......हें...हें...(आंखें मटकाएगा।)

सड़ी सी तो कहानी है। और साली कहानी भी क्या है नौटंकी है, नौटंकी....नौटंकी राजा की 

नौटंकीभरी कहानी...

एक राज्य था। एक राजा था। राजा था तो रानी भी तो होगी, सो थी। रानी थी तो बाकी सब भी तो होगा ही, सो हैगा ही। 

अब साहब इस राइटर की हरकत तो देखिए....लिखा है बाकी सब भी हैगा ही....अब बाकी सब में क्या बताऊं....इसने तो बाकी सब ही लिखा है। फंसवाएगा ये किसी दिन...पूरी पार्टी को बेभाव के न पड़वाए इसने मेरा नाम बदल दीज्यो भाइजी आप तो....(दर्शकों की तरफ देखकर) आप टेंशन मती लोजी, भाइजी हमारे डायरेक्टर का नाम हैगाजी....ही ही ही....

तो बात कहा थी, यहां थी, बाकी सब पर थी। 

अरे हां बाकी सब माने, राजा होगा तो मंत्री भी होगा। मंत्री होगा तो सेना भी होगी। सेनापति भी होगा। जनता तो होगी ही अब ये भी कोई कहने वाली बात है क्या। तो साब राजा बड़ा अय्याश था मगर पिजापालक था। हरामी था मगर जनता का ध्यान रखता था। नंबर वन का गिरा हुआ था लेकिन लोग उसे सिर-आंखों पर उठाए (फिर कमीनता देखो आप इस राइटर की, बिठाए रखता कर देता तो क्या जाता, लेकिन नहीं भाईजी...पूरी नाटक ही नौटंकी से भरा है...कमीने टाइप का लिखा गया है कुछ-कुछ....) 

तो जनता सिर-आंखों पर बिठाए रखती थी। परम चोर औऱ धोखेबाज था लेकिन जनता उसे महान समझती थी। पक्का नौटंकीबाज था जनता को फुल चू...बनता था जैसा आज.....(मुंह पर चुप लगा लेता है और नारा लगाता है।)

`महाराजाधिराज की आत्मा अमर रहे....`

(स्टेज के बाहर पैर लटकाकर बैठा आदमी दर्शकों की तरफ देखकर क्या धांसू सीन है, का इशारा करेगा। फिर मूंगफली को नमक मिला-मिलाकर खाने लगेगा।)

विदूषक फिर बात शुरू करेगा।

भाइयो और बहनो, जैसा कि आपने सुना, इस भुखमरे से राज्य का राजा हो गया है टें...अब जनता को कोई सॉलिड सा राजा चाहिए....भूल गए अभी तो गा-गाकर मांग रही थी न जनता आपके सामने....

एक सॉलिड सा राजा लाओ...काम हमको बांटे जो....नौटंकी है, नौटंकी है (नाच कर भी दिखाता है।) 

साले पता नहीं राजा मांग रहे हैं या कौनऊ चपरासी चाहिए बिनकूं....रोटी दे....पाणी दे...काम बांटें...खुद भूखा मर जाए....हां...

अब इस अनाथ से राज्य को अपने टें वाले राजा के बदल चाहिए एक राजा...ज्यादा दिन राजगद्दी खाली नहीं ऱखी जा सकती है न। सो राजा चाहिए तत्काल...नहीं माने इतना तत्काल भी नहीं चाहिए कि तत्काल में ही रिजरवेशन करवाकर आ जाए। अरे उसके भी रेट बढ़ दिए हैं सरकार ने....आर्डिनरी रिजरवेशन करवाकर भी आ जैहे तो चलहै.....

तो जनाब, इस समय पूरे राज्य में एक ही चिंता है। राजा चाहिए। सॉलिड सा राजा चाहिए। पूरा देश किस कदर परेशान है आप इनकी राजा सिलेक्शन कमेटी की बैठक को देखकर समझ सकते हैं। देखिेए...

(हाथ से मंच के एक तरफ इशारा करता है। वहां का अंधेरा कोना उजाले से भर जाता है। वहां पांच-छह लोग एक टेबल के आसपास बैठे हैं। तीन-चार की ड्रेस राजसी है। जो महामंत्री, सेनापति, विदूषक आदि हैं। एक राजपुरोहित हैं। एक नेतानुमा आदमी बैठा है। जनता का प्रतिनिधि एक गंवई आदमी बैठा है। महामंत्री बोल रहा है।)

महामंत्री- महानुभावो, जैसा कि आपको पता ही होगा, हमारे पूज्य महाराज जो कि भयंकर रूप से प्रजा वत्सल थे। कृपा निधानों के कृपा निधान टाइप के थे। प्रजा के अनुकूल आचरण करने वाले देवपुरुष थे। जिनकी जबान से हमेशा लोगों की भलाई की बातें झरती थीं। जिनके नाममात्र से ही राज्य में झंझावात चलने लगते थे। जिनके दिल में हमेशा .....

सेनापति-माधुरी दीक्षित बसती थी। जिनकी आंखों के सामने से वेश्याएं भी पर्दा करके निकलना पसंद करती थीं। जिनके हरामजादे विचार सुनकर अगरबत्तियां तक सुलग उठती थीं। चिराग जल उठते थे। ज्लावामुखी फट पड़ते थे। राज्य के पूज्य मंत्रीजी राजाजी कल्टी कर चुके हैं। आप सीधे काम की बात पर आइए महानुभाव...।  

विदूषक (मटककर आदाब अर्ज करने वाली मुद्रा में)- हुजूर, ये वेश्या वाला संदर्भ कार्यवाही से विलोपित किया जाना चाहिए। अन्यथा मरहूम महराज की आत्मा का भीषण कष्ट होगा। 

राजपुरोहित-सौ फीसदी सच्ची बात कही है विदूषक महोदय, मरहूम को मरे हुए अभी ज्यादा वक्त भी नहीं बीता है। उनकी आत्मा भी यहीं-कहीं....

सेनापति-यहां कहीं नहीं उसी तेलन के घर के आसपास मंडरा रही होगी जिसके तेल के चक्कर में ही उनका पैर फिसला और वे नदी में गिरे थे। महाराज तो उस समय भी पूरे होशोहवास में थे। तेलन ने तो उन्हें निकालने के लिए हाथ भी बढ़ाया था लेकिन महाराज तो उसका हाथ न पकड़ कर उसकी साड़ी पकड़कर खींच रहे थे इसी चक्कर में बहते चले गए। बाद में वो बेचारी तेलन कैसे-कैसे करके तो अपने घर पहुंची थी। हमारे महाराज समय नष्ट करने के बिलकुल पक्षपाती नहीं थे बंधुओं...और हम अभी तक काम की बात पर ही नहीं आ पाए हैं। थू है हम पर...

महामंत्री-पर महोदय, साड़ी खींचने वाला प्रसंग के बावत अपनी स्थिति स्पष्ट कीजिए। क्या आप घटनास्थल पर मौजूद थे? 

सेनापति- हम सेनापति है भैंचो, कोई अस्तबल की लीद साफ करने वाले कर्मचारी नहीं हैं। राज्य के घाटों की सुरक्षा भी अपुन का ही दायित्व है। तेलन को अपन ने ही घसीटकर, घसीटे की बाइक पर बिठाकर घर भिजवाया था। अब ये भी बताऊं कि वो पहने क्या थी? घसीटे के पीछे क्रासलैग करके बैठी थी या चिपककर....

राजपुरोहित- बस कीजिए वीर शिरोमणि, आपको मुखारबिंद से इस तरह की उथली बातें शोभा नहीं देती हैं। 

सेनापति- ऐलो, एक तो नारी की आबरू बचाई, राज्य में लॉ एंड आर्डर मैंटेन किया, ऊपर से....वैसे एक्सक्यूज मी, ऐ बुढ़ऊ अंकल, ये जो टोकनाभर दाढ़ी के पीछे जो डालडे के डिब्बे जैसा मुंह है। उस मुंह में जो गजभर की जबान है। उस वस्तु की सहायता से एवैई ही अंट-संट नीं बकने का...उथले पानी से तो वो तेलन राजा को खींच रही थी। राजा उसकी साड़ी सहित उसे पानी में खींच रहे थे। गहरे चले गए। गड़प हो गए। अब बोलो तेलन को बचाया किसने, घर पहुंचाया किसने, इसी वीर शिरोमणि ने। तो फिर...

महामंत्री- महोदय, हमें यूं आपस में अशिष्टों की तरह आचरण शोभा नहीं देता। हमें इनके( दर्शकों की तरफ इशारा करता है।) सामने अपनी औकात पर नहीं आना चाहिए। फिर हम मुद्दे से भी भटक रहे हैं मान्यवर, हमें राज्य के लिए राजा चाहिए। सो जैसी कि हमारे इस राज्य की परंपरा है। हमे एक सॉलि़ड सा राजा चाहिए।      

नेता- हुजूर, हमारे महाराज बनने के लिए बेसिक क्वालिफिकेशन क्या होगी?

सेनापति- अरे कमेटी के कामचोरो, बैठक में आने से पहले कुछ एजेंडा वगैरहा भी तो पढ़कर आया करो। संसद में आकर बैठ जाते हो, टाइप हरकतें कर रहे हो। क्या खाक जनता का भला करोगे। बस, टीएडीए की जुगाड़...कितने दुष्ट हो रे तुम लोग...।

महामंत्री- मान्यवर, जनता के नुमाइंदों के साथ शिष्ट व्यवहार करना सीखिए। उन्हें नियम कायदों की जानकारी देने के लिए हम बैठे हैं। जनता खुद इतनी जानकार होती तो फिर हमारी जरूरत ही क्या पड़ती। हम नहीं होते तो राजा कहां से होते, राजा नहीं होते तो राज्य कहां से होते, राज्य नहीं होते तो...होते तो..(सिर खुजाता है) तो तनखा कहा से मिलती...।  

राजपुरोहित (जब भी बोलता है एक स्वर में पूरी बात कहता है)- महामात्य बजा फरमा रहे हैं वीर शिरोमणि...जो झांसे में आ जाए वो जनता, जो देने में सफल हो जाए वो सरकार, जो बंदा दोनों के बीच सेट कर ले अपना धंधा वो हमारे महाराजाधिराज...वही प्रजापालक। 

सेनापति- बस, महाराज दमभर के लिए दम लेलो। कहीं दमा न उभर आए तु्म्हारा। धोती न खुल जाए। दम ले लो दम। मुंह को भी ठीक कर लो कैसे चुसे हुए आम सा निकल आया है। महाराज की तेरवीं से पहले ही तो तर माल का टोटा नहीं पड़ गया महाराज। 

जनता का नुमाइंदा- (विदूषक की तरफ देखकर) ए हंसोड़े...ए हंसोड़े जरा हंसा के दिखा....

विदूषक- अबे, जनता को हंसने की तमीज होती है कहीं....। जनता तो रोने के लिए होती है। एक जोक सुनाऊं आंसू निकल आएंगे तेरे। अबे सुनाऊं क्या बोल...

आज स्वर्ग में गांधी जी से चित्रगुप्त जी मिले। तब गांधी जी ने अपने तीनों बंदरों का हाल पूछा।

चित्रगुप्त बोले- वो तीनों बहुत मजे में हैं।

जो अंधा था वो तो कानून बन गया है,

जो बहरा था वो सरकार बन गया है और

जो गूंगा था वो सबसे मस्त है,

वो बड़ा नेता बन गया है..

अबे देख तेरे आंसू बह रहे होंगे। अबे घर पे नजर डाल। अपने टिफिन बॉक्स पर नजर डाल। अबे जिस आटो से यहां आय़ा है उस के बिल पर नजर डाल तेरे आंसू निकल आएंगे। अबे ढीट तेरे आंसू क्या निकलेंगे। पिछले 70 सालों में नहीं निकले तो अब क्या निकलेंगे। अबे समझ में नहीं आय़ा। अबे चारों तरफ देखोगे नहीं तो सोचोगे क्या। सोचोगे नहीं तो समझोगे क्या खाक....समझोगे नहीं तो महसूस क्या करोगे घंटा...चल अबकी बार अच्छा वाला जोक सुनाता हूं, नॉनवेज टाइप....चल कान इधर दे....

नहीं सुनेगा। बस, साले फट गई न...अबे दिल में रखेंगे गंदी बातें, जोक सुनने से डरेगा.....तुम साले मैंगो पीपुल....।

नेता हकबकाया सा इधर-उधर ताक रहा है।

विदूषक- क्या ढूंढ रहे हैं प्रतिनिधि महोदय. टीए-डीए के वाउचर अभी तक क्यों नहीं आए। मीटिंग से पहले सिग्नेचर हो जाते तो खत्म होने से पहले ही पैमेंट आ जाता है, यही न। 

नेता- हें...हें....मतलब...जो है सो..माने....मैं कह रहा था।

विदूषक- गुरू, पैमेंट मिल जाएगा। तनिक धैर्य ऱखो। अभी तो मीटिंग शुरू ही नहीं हुई है. मिल जाएगा पैमेंट...।

राजपुरोहित- तो मैं कह रहा था। हमें एक राजा चाहिए। जो नौटंकी करने में एक्सपर्ट हो। जनता को भरमाए रखे। कैसे मिलेगा गुणीजनों को इसलिए कष्ट दिया गया है कि राजा के चयन के लिए प्रक्रिया और आदमी तय किया जा सके।

महामंत्री-तो कार्रवाई शुरू करें श्रीमान्

विदूषक- हुजूर, कर दो, तत्काल....बिना विलंब, फौरन से पेश्तर....

सेनापति- नहीं बेटा, तू बोल ले फिर कर देंगे कार्रवाई शुरू...फारसी में भी बोल ले, अंग्रेजी में भी बक ले, जल्दी क्या है...दुष्ट! मुंह पर लगा फुल स्टाप औऱ चाबी फेंक दे दरिया में, समझा। 

विदूषक- हुजूर, खता हो गई। आप बजा फरमाते हैं।( महामंत्री की तरफ देखकर) चल बे, कार्यवाही  की शुरू कर...( फिर दोनों हाथ कानों पर रखकर) जनाब, जबान को काटकर इसके कबाब बनाकर आपको खिला दूंगा, कैसी कच-कच चलती है।

( अपनी जीभ को निकालकर दो अंगुलियों से कैंची जैसा काटने की हरकत करता है।)

महामंत्री-बस, चुपकर भांड, तेरी जुबान नहीं तेरी बटेर जैसी आंखें निकलकर गोटियां खेलूंगा एक दिन...

(राजपुरोहित महामंत्री की तरफ देखता है। सेनापति विदूषक की तरफ देखता है। फिर विदूषक नेता की तरफ देखता है। जनता का नुमाइंदा सेनापति की तरफ देखता है।)

राजपुरोहित-कमबख्त! कुसंगति, फुर्सत, अय्याशी, गंदगी में खींच ही लेती है। जैसे हमारे मरहूम महाराज...( बोलते-बोलते चुप हो जाता है।)

जनता का नुमाइंदा- कार्यवाही शुरू की जाए...(कार्यवाही जोर से बोलता है। शुरू की जाए तक आते आते मिमियाने लगता है) 

विदूषक- शुरू करो रे....जनता के जागने से पहले शुरू करो रे....

राजपुरोहित- (एक सांस में) हमें हमारे इस अनाथ राज्य के लिए एक राजा चाहिए। राजा नौटंकी में एक्सपर्ट हो। खानदानी हो। कैरेक्टर लूज हो। शराबी हो। कबाबी हो। नवाबी हो। हरामी हो। 

विदूषक- शेरवानी हो...

राजपुरोहित- शेरवानी हो या न नंगा ही हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। बदनामी हो। अर्थात् बदचलन टाइप का बैकग्राउंड हो। भांड हो। सांड हो। रांड हो। सॉरी इसे रंडुवा समझा जाए। वक्त जरूरत दरी-माइक हो। किवाम-चटनी-चमन बहार भी हो। 120 नंबर की तम्बाखू वगैरहा-वगैरहा भी हो...

(सेनापति कुछ बोलने के लिए मुंह खोलने की कोशिश करता ही है।) 

राजपुरोहित-ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है पहले डिस्क्लेमर भी सुन लो। इस वगैरहा-वगैरहा में जमानेभर के वो ऐब भी शामिल होंगे जिनके बारे में अभी तक तय नहीं किया गया है, समझे। हमें कोई लोकल नहीं, पूर्ण शुद्ध क्वालिटी का राजा चाहिए, साऱी खासियतों के साथ...समझे।

सेनापति- दम ले लो बुढ़ऊ अंकल....धोती न खुल जाए...

राजपुरोहित- धोती तो तेरी मैं खोलूंगा अबकी बार। तू नदी मैं जाकर उद्धार करता है न, साले अबलाओं का वहीं आकर तेरा तबला न बजाया तो कहना। कमीनों का काटना ही पड़ता है तभी उनकी चकर-चकर बंद होती है। (फिर हाथ ऊपर उठाकर) प्रभु तेरी लीला अपरंपार है...हा...

अब संक्षिप्त में सुन लो- हमें ऐसा राजा चाहिए जो एक्स्ट्रा हरामी, हरामीमीमीमी...(ईको करता है।), हाइली चूतिया, (इको करने ही वाला होता है कि सेनापति कहता है ईको रैन दो दादाजी।) एक्सीलेंट लेबल का कमीना, कमीनानानानाना...... कुल मिलाकर बंदे की क्षमता एटपार हो....समझे।

(विदूषक एकदम से गोता लगाकर राजपुरोहित के पैरों में गिरता है।)

विदूषक- गुरू! गुरू! गुरुदेव! इतना तेजस्वी हरामीपन कहा से लाए हो! बद्तमीजी के रूमाल से कमीनता का कैसा गजब सूट सिला है आपने्...महाराज आप ज्ञानी हो...मैं तो आपके चरणों का दास टाइप हूं...थोड़ा ज्ञान हम पर भी तो छिड़क दो महाराज। हमारा बस चले तो हम राजा की क्वालीफिकेशन राज्य के पहाड़ों...दीवारों...पर लिखवा मारें ताकि कैंडीडेट प्रेरणा ले सकें....महाराज चरण दो अपने तो...

राजपुरोहित- धोती छोड़ हमारी...चल पगले धोती छोड़ हमारी, रुलाएगा क्या.... तो समझे बंदे की क्षमता कैसी होनी चाहिए...

सभी समवेत स्वर में - कुत्ताई में एटपार होनी चाहिए...


(गाना शुरू हो जाएगा। विदूषक सबसे आगे डांस करेगा। गाना बीच में रूकेगा सेनापति कहेगा-जा विदूषक देशभर में घूम और ऐसा राजा ढूंढकर हमारी कमेटी के सामने पेशकर। हम लोग उसमें से किसी को अपना राजा बनाएंगे। विदूषक हाथ जोड़कर सिर झुकाता है। डांस-गाना फिर शुरू हो जाता है। इसी गाने के बीच नेता टीए-डीए देने वाले को रिश्वत देकर अपना वाउचर पास करवा लेता है। इस दौरान बाकी लोग फ्रीज रहते हैं। केवल जनता का नुमाइंदा हैरान सा इधर-उधर घूम रहा होता है।)

विदूषक-तो हुजूर जाऊं...एकदम से निकल ही जाऊं...राजा जी को ढूंढकर लाऊं...कर्तव्य निभाऊं...एकदम...तुरत-फुरत....

सेनापति उसको एक लात जमाता है। विदूषक दूर जाकर गिरता है।

स्टेज पर अंधेरा छा जाता है। जब दोबारा रोशनी होगी तो एक बाबा अपने चेलों के साथ बैठे दिखाई देंगे। बाबा ऊंचे आसन पर बैठे हैं चेले नीचे बैठे हैं। उनके आसपास कुछ महिला भक्तिन भी बैठी हैं। बाबा प्रवचन करते दिख रहे हैं। विदूषक यहां चेला बनाकर बैठा दिखाई देगा।

(--- जारी है)

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