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मथुरा प्रसाद नवीन का साक्षात्कार : जैसे चल रहा है वैसे चलेगा नहीं.

साक्षात्कार

जैसे चल रहा है वैसे चलेगा नहीं

मथुरा प्रसाद नवीन

मगही के कबीर कहे जाने वाले मथुरा प्रसाद नवीन का साक्षात्कार मनोज कुमार झा ने उनके गाँव बड़हिया, लखीसराय (बिहार) में 1989 में लिया था। कई वजहों से यह साक्षात्कार उस समय प्रकाशित नहीं हो पाया। मथुरा प्रसाद नवीन प्रगतिशील साहित्य आंदोलन से आजीवन जुड़े रहे। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने विपुल लेखन किया है। उनके गीत जन आंदोलनों में गाए जाते रहे। ‘राहे राह अन्हरिया कटतौ’ उनका मगही कविता संग्रह है, जिसका प्रकाशन 1990 में हुआ। साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश।

प्र. प्रगतिशील साहित्य आंदोलन से आप कब जुड़े?

उ. सन् 54-55 में एक बार पटना में कवि सम्मेलन हुआ था। उसमें कन्हैया जी और दिल्ली के कुछ वरिष्ठ लोग थे। कन्हैया जी के चलते ही हम प्रगतिशील लेखक संघ में आए और तब से जुड़े रह गए।

प्र. कन्हैया जी से आपका संपर्क कब हुआ?

उ. कन्हैया जी से कवि सम्मेलन में ही संपर्क हुआ। कवि सम्मेलन हिंदी साहित्य-सम्मेलन में हो रहा था। उस समय दिनकर जी सभापति थे। सम्मेलन शुरू हो जाने पर यकायक कन्हैया जी आए। मंच पर उनके आने के बाद लोग बड़ी सराहना करने लगे उनकी। मैंने सोचा कि कौन आदमी है जिसकी सराहना इतनी हो रही है। इसके बाद उनकी रचना सुनी मैंने। लगा, यह आदमी बहुत अच्छा लिखने वाला है और कर्मयोगी है। और इसके बाद अच्छा संपर्क रहा। घरेलू संपर्क हो गया।

प्र. जिस समय आप प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े, आपको याद है कि उस समय बिहार में क्या गतिविधियां होती थीं?

उ. उस समय पटना में प्रगतिशील लेखक संघ की एक पत्रिका निकलती थी। कुछ दिन चलने के बाद वह पत्रिका बंद हो गई। प्रलेस में दरार पड़ने लगा। धीरे-धीरे लोग बंट गए दो खेमे में। एक खेमा पटना प्रलेस के नाम से काम करने लगा। वह कारगर नहीं हुआ। लेकिन धीरे-धीरे हमलोग कमजोर पड़ने लगे। बिहार प्रलेस से कम लोग जुड़े। अब जो जुड़े वे कुछ तो हैं और कुछ नहीं। कमजोर पड़ने के बाद, दो खेमे मे बंटने के बाद पत्रिका बंद हो गई। बहुत दिनों तक चलता रहा कि अब निकलेगी, अब निकलेगी, नहीं निकल पाई और प्रलेस में दरार अभी पड़ा हुआ है। आपस में एक नहीं हो रहे हैं लोग।

प्र. इसके पीछे कारण?

उ. दरार पड़ने कारण था कुर्सी। सचिव, महासचिव बनने के लिए कुछ लोग जो सोफासेट थे, चाहते थे कि हमारे सिवा दूसरा कोई नहीं हो।

प्र. उस दौर में जब आप प्रलेस से जुड़े थे, उसके कार्यक्रमों का स्वरूप क्या होता था?

उ. उस समय कहीं भी सम्मेलन होता था और सम्मेलन में हमलोग जो तय करते थे, उसी के अनुसार काम होता था। जगह-जगह कवि सम्मेलन और साहित्यिक गोष्ठियां होती थीं। इससे नये लिखने वाले संगठन से जुड़ते थे।

प्र. कवि-सम्मेलनों से आप काफी दिनों से जुड़े रहे हैं। पहले जो स्थिति थी और अब जो है, उसमें क्या फर्क है?

उ. पहले सम्मेलन किसी पार्टी पर आधारित नहीं होता था। हर तरह के कवि उसमें भाग लेते थे। इसलिए भीड़ भी बहुत होती थी। आज खेमा बंट गया तो खेमे वाले ही कवि-सम्मेलन कराते हैं। लोग भी बंट गए हैं और अब जो भीड़ होती है कवि-सम्मेलनों में तो कहीं दू हजार, चार हजार, पांच हजार भी होती है, वो भी थोड़ी देर के लिए। पर हमलोग रात-रात भर कविता सुनाते थे। लोग उठते नहीं थे। जाड़े के दिन में रजाई ओढ़ कर लोग कविता सुनते थे रात-रात भर। अब यह माहौल है...दस बरस के अंदर हम देख रहे हैं कि आदमी भी जुटाना मुश्किल हो जाता है। उससे अच्छा हम गोष्ठी को समझते हैं। दस-बीस आदमी ही आते हैं, लेकिन बुद्धिजीवी होते हैं। कवि-सम्मेलन में अब वो माहौल नहीं रह गया है। सिनेमा के गीत लिखने वालों पर मेला जुटता है, ऐसे नहीं जुटता है।

प्र. कन्हैया जी भी कवि-सम्मेलनों में भाग लेते थे। उनका और आपका साथ तो काफी रहता होगा?

उ. कन्हैया जी भी कवि-सम्मेलनों में भाग तो लेते थे, लेकिन बहुत कम। कन्हैया जी लिखते बहुत थे। सबसे बड़ा उनका गुण था कि वे अनुवादक थे। रूसी साहित्य का उनका अध्ययन बहुत ज्यादा था। रूसी कवियों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद कर के उन्होंने बहुत प्रचारित किया। कवि-सम्मेलन में बुलाने पर चले भी जाते थे। अस्वस्थ रहते थे ज्यादा। कहीं जाने में उन्हें तकलीफ होती थी। हमलोग जब पहुंच जाते थे तो जबरदस्ती उनको लेकर जाते थे।

प्र. आजकल के नये कवियों को आप पढ़ते हैं जैसे अरुण कमल आदि।

उ. हां, नये कवियों को पढ़ते हैं। लेकिन हमको कोई ज्यादा रुचिकर प्रतीत नहीं होता है। इसलिए कि आडंबर साहित्य में बहुत ज्यादा घर कर गया है। नये-नये लेखक लोग, कवि लोग नये तरह से राह निकालना चाहते हैं। इसमें उनकी रचानाएं आम जनता तक नहीं पहुंच पाती हैं, भले ही वह पठन-पाठन के लिए, बुद्धिजीवियों के मस्तिष्क की खुराक हो, आम लोगों के पेट की रोटी नहीं मिलेगी। लोग समझ नहीं पाते हैं कि अरुण कमल की कविता क्या है। आम लोगों के समझ से बाहर उनकी कविता है। फिर भी अरुण कमल वगैरह लिख रहे हैं।

प्र. तो इस तरह के साहित्य की क्या भूमिका समझी जा सकती है?

उ. इस साहित्य की भूमिका कुछ नहीं है। यही इन लोगों की हॉबी है कि इसके माध्यम से हम आगे बढ़ जाएं। लेकिन ये कहीं आगे बढ़ेंगे तो कुर्सी मिलेगी अवश्य, कोई संस्था के मालिक बन जाएंगे। पर जनता के बीच में जरूरत नहीं है और न जनता समझती है कि उनकी जरूरत है। यह जो समाज है, उसमें लोग पेट की भूख और बेकारी से तबाह हैं और इतनी ऊंचाई तक सोचने के लिए तैयार नहीं हैं। किसी रचना को जो बहुत अच्छी रचना है, बहुत ऊंचाई से लिखी गई है, लोग ये समझते हैं कि ये मेरी बात नहीं है। ये कुछ लोगों की बात है। आम लोगों की बात इन लोगों की कविता नहीं है।

प्र. आम लोगों के लिए कविता और खास लोगों के लिए कविता के अलग-अलग मानदंड बनाए जा सकते हैं?

उ. हां, आम लोगों के लिए कविता...कविता तो समाज का दर्पण है। कविता में समाज की जो रूप-रेखा है, वही दिखाई देती है। लेकिन ये लोग करें तो क्या करें। इन लोगों के सामने कठिनाई है कि आम लोगों की बात करेंगे तो वे तो आम लोग हैं नहीं। अच्छा पेन्हना चाहिए, अच्छा ओढ़ना चाहिए, अच्छा से रहना चाहिए। इस तरह की जिंदगी और जनता की जिंदगी, दोनों में दरार है। जनता यह नहीं चाहती है कि वे लोग तो अच्छे से अच्छे ढंग से सुविधा में रहें और हम लोग भूख से तबाह रहें। तो ऐसी लेखनी क्या काम करती है...! लेकिन फिर भी लेखन लेखन है। अभी जो समाज है, उसमें लिखने वाला जो व्यक्ति है उसकी लड़ाई है पैसे वालों से। उसकी लड़ाई है धनवानों से। उसकी लड़ाई है धर्म के आडंबर से। और इस तरह की लड़ाई लड़ने वालों को समाज में बहुत तकलीफ उठानी पड़ती है।

प्र. आम लोगों के लिए जो साहित्य है, उसके प्रकाशन की कोई व्यवस्था नहीं हो पाती है। उसका प्रसार नहीं हो पाता है। इस समस्या के बारे में आप क्या सोचते हैं?

उ. यह एक बहुत बड़ी समस्या है। इसके बारे में क्या कहा जाए। लक्ष्मी को ही लोग चाहते हैं। सरस्वती और लक्ष्मी में संबंध पहले नहीं था। पहले सरस्वती गरीब के घर में रहती थी। टूटी हुई चारपाई पर सोती थी। लेकिन अब सरस्वती प्रवेश कर गई है लक्ष्मी के घर में और सरस्वती का जो उपासक है, वो बेचारा भटकता चला जा रहा है। भूखे रहने की नौबत। देखता हूं कि आज से बीस-पच्चीस साल पहले मैं कलम के माध्यम से जी लेता था। कहीं न कहीं कवि-सम्मेलन, कहीं न कहीं कोई प्रोग्राम हो जाता था और कम से कम नोन-रोटी जरूर कलम देती थी। लेकिन इन दिनों हम देख रहे हैं कि नौबत ये आ गई है कि भूखे रहना पड़ता है। चूल्हा घर में नहीं जलता है। कहें तो किससे कहें, क्या कहें! समाज का स्तर ही ऐसा हो गया है कि जिसके पास पैसा है, उससे लड़ाई है। जिसके पास पैसा नहीं है, उसको हमसे भी ज्यादा तकलीफ है। अभी जो माहौल है, उसमें समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे हम लोग चलें। एक रास्ता ढूंढने के क्रम में हम लोग हैं।

प्र. लेकिन प्रकाशन, वितरण और साहित्य के प्रचार का काम संगठन क्यों नहीं करता?

उ. करना चाहिए संगठन को। लेकिन संगठन में लोग कहां हैं? नाम का संगठन सब जगह बना हुआ है, काम का नहीं।

प्र. खेमेबाजी की समस्या के समाधान का भी कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता है।

उ. अभी तो कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा है।

प्र. जो स्थिति समझ में आती है, लगता है कि एक मध्यवर्गीय ढांचा बना हुआ है। ऊपर के लोग आते हैं। उनकी अपनी आकांक्षाएं होती हैं। अपनी जीवन-शैली होती है। उसमें किसी तरह का बदलाव, किसी तरह का हेर-फेर वो स्वीकार नहीं करते हैं। संगठन में मज़दूर-किसानों के बीच से लोग नहीं आते हैं। एक खेमे का आदमी दूसरे का मूल्यांकन कभी पूर्वग्रह-मुक्त होकर नहीं करता। तो ये जो सारी प्रवृत्तियां हैं, उनकी जड़ कहां है?

उ. खेमा को तोड़ने के लिए ऐसे लोग इसमें घुस गए हैं जो अपनी बात छोड़ना नहीं चाहते और अधिक संख्या है इन्हीं लोगों की। कम संख्या है वैसे लोगों की जो कुछ करना चाहते हैं। वे लोग पहचान में भी नहीं आते। यही दशा है। और यही कारण है कि प्रकाशन की व्यवस्था भी नहीं है। लोग टूट जाते हैं। अपने तरफ से, अपने इनकम से या पैसा कहीं से इकट्ठा कर के कोई अपनी पुस्तक प्रकाशित भी कर ले तो संगठन के लोग चाहें तो उसको वितरित कर सकते हैं, बेच सकते हैं, आगे काम बढ़ सकता है। लेकिन वैसे लोग भी, अपने लोग भी चाहते हैं कि किसका पैर खींचें। जैसे राजनीति में है, वैसे ही घुसपैठिया लोग साहित्य में भी घुसे हुए हैं। मार्क्स ने कहा है, बड़े-बड़े विद्वान लोगों ने कहा है कि ऐसा समय आता है जब लोग तोड़ने के क्रम में घुसते हैं। लेकिन वह नकाब इतना साफ रहता है कि तुरंत पहचान में आता नहीं है। हम लोग चाह रहे हैं कि वैसे लोगों को जमा किया जाए जो काम करने वाले हों। अभी ओहदा वाले लोग हैं जो चाहते हैं कि हमारी राजनीति सबसे आगे चली जाए। वैसे लोगों की जरूरत नहीं है। यह बात अब भी समझ में नहीं आ रही है कि कैसे इसका (प्रगतिशील लेखक संघ) का गठन किया जाए। कैसे कामयाब हम लोग हों, यह बात समझ में नहीं आ रही। फिर भी चिंतन में हैं हम लोग। आखिर तो एक न एक दिन कभी न कभी यही होना है। जैसे चल रहा है वैसे चलेगा नहीं।

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