शब्द संधान / कैसी कैसी बाज़ियाँ / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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बाज़ी और बाजी –दोनों में केवल एक नुख्ते का फर्क है, लेकिन अर्थ बिलकुल बदल जाता है। बाजी सामान्यत: बड़ी बहिन को पुकारते हैं, लेकिन बाज़ी एक फारसी का लव्ज़ है जिसका मतलब है खेल, करतब, तमाशा। हिन्दी ने इस शब्द को पूरी तरह अपना लिया है और अब बाज़ी, लगता है, हिन्दी की ही होकर रह गई है।

कैसी कैसी तो बाज़ियाँ हैं ! शतरंज की बाज़ी, ताश की बाज़ी, मुक्के-बाज़ी, इत्यादि। जीत/ हार होने तक जब तक पूरा खेल खेल नहीं लिया जाता बाज़ी चलती रहती है। पूरा खेल बाज़ी है। जब खेल की बाज़ी लगती है तो हर खिलाड़ी चाल चलने के लिए अपनी बाज़ी का इंतजार करता है। हरेक की बारी बारी से बाज़ी आती है। बाज़ी खेल तो है ही, खिलाड़ी की बारी भी बाज़ी ही है।

बाज़ी धोखा और चालाकी है। हिन्दी समाचार पत्रों में अक्सर “टप्पे-बाजी” की खबरें छपती हैं। टप्पे बाजी कोई खेल नहीं है। यह धोखा देना है। आपका ध्यान बटा कर आपका माल ग़ायब कर देना है। इस तरह धोखा देने का नाम टप्पेबाज़ी कैसे पड गया, कुछ कहा नहीं जा सकता। ज्यादहतर बाजीगर इसी तरह से धोखा देकर अपनी कलाकारी दिखाते हैं। हम उसे जादू समझते हैं। कुछ बाजीगर जिन्हें हम नट कहते हैं कसी रस्सियों पर चलकर,और शरीर को तोड़-मरोड़ कर अपनी कलाकारी दिखाते है। ज़ाहिर है, बाज़ी है तो बाजीगर भी हैं और बाज़ीगरी भी है।

बाजी शर्त लगाना है। दांव खेलना है। किसी भी प्रकार की घटना के अनिश्चित परिणाम के प्रसंग में दो या अधिक पक्षों में होने वाला पारस्परिक निश्चय, कि जो पक्ष हार जाएगा उसे जीतने वाले को कुछ धन देना होगा या अपनी हार का सूचक अमुख काम करना होगा – इसे बाजी लगाना कहते हैं। बाज़ी सिर्फ लगाई नहीं जाती, वह ‘बदी’ जाती है, जीती और / या हारी जाती है, जो जीतता है वह बाजी ‘मार’ लेता है । अगर जुए की बाज़ी न लगती तो शायद महाभारत न होता।

नखरेबाजी और बहानेबाजी से भला कौन परिचित नहीं है } दफ्तर से छुट्टी लेने के लिए कर्मचारी क्या क्या बहानेबाज़ी नहीं करते ! नखरेबाज़ी पर तो कमोबेश स्त्रीयों ने ही अपना एकाधिकार जमा लिया है।

बाजी सिर्फ खेल और सिर्फ धोखा ही नहीं है अच्छे कामो के लिए भी लोग बाजी लगाते देखे गए हैं। दूसरों को बचाने में लोग ‘जान की बाजी’ लगा देते है। अपने आदर्शों की रक्षा के लिए, अपने देश के लिए, अपने बच्चों की खैरियत के लिए लोग, जान की बाजी लगाते देखे गए हैं। आदमी में और अन्य प्राणियों में यही एक बड़ा फर्क है।

इश्क किया तो डरना क्या ! एक मशहूर फिल्मी गाना है। न जाने कितने कवियों और शायरों ने इश्कबाजी का ज़िक्र किया है। फैज़ अहमद ‘’फैज़” की एक ग़ज़ल है, जिसे अंजुमन फिल्म में मुज़फ्फर अली ने खय्याम के संगीत निर्देशन में गाया था। इस ग़ज़ल का एक शेर है -

ये बाज़ी इश्क की बाजी है जो चाहो लगा दो डर कैसा गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाजी मात नहीं

एक और शेर देखिए -

इश्क बाजी बुल, हवस बाजी न जाने इश्क है ये खाना -ए -खाला नहीं

बहरहाल इश्कबाजी खेल भी है और बहुतों के लिए धोखा भी, करतब और तमाशा तो है ही। इश्क को लेकर न जाने कितनी फिल्मे ‘बाज़ी’ और ‘बाजीगर’ नाम से बनी हैं। नाम में क्या रखा है लेकिन इतिहास में एक बाजी राव भी हुए हैं।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.) ९६२१२२२७७८

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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