ए... चश्मे वाले...! / कहानी / क़ैस जौनपुरी/

ए... चश्मे वाले...!/

 

कहानी

 

क़ैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

 

ट्रेन रुकी. बहुत सारे लोग छोटे से डिब्बे में चढ़े. कुछ उतरे भी. एक साथ चढ़ने-उतरने में कुछ लोग आपस में टकराए भी. कुछ अपना गुस्सा पी गए. कुछ ने कुछ नहीं कहा. वहीं एक से रहा नहीं गया. वो उतरने ही वाला था कि एक चढ़ने वाले से टकरा गया. भीड़ में कोई ज़रा सा धक्‍का दे दे तो आदमी का सारा गुस्सा बाहर आ जाता है. आजकल तो इन्सान इतना गुस्से वाला हो गया है कि छोटी सी बात पे भी जान ले लेने पे उतारू हो जाता है, ख़ून कर देता है.

चढ़ने वाला चढ़ गया था. उतरने वाला उतर गया था. लेकिन कुछ था, जो उतरने वाला कहना चाहता था, जो वो गेट पे नहीं कह पाया था, भीड़ की वजह से. लेकिन उसने उस चढ़ने वाले का हुलिया देख लिया था. आगे खिड़की पे जाके उसने देखा, वो चढ़ने वाला अन्दर आ चुका था. उतरने वाला अचानक से बोल गया, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

ये गाली अचानक से पूरे डिब्बे में हवा की तरह फैल गई. उस आदमी ने मुड़के देखा, मगर वहाँ कोई नहीं था. ट्रेन चल चुकी थी. उस आदमी ने गेट पे भी जाके देखने की कोशिश की कि वो कौन था, जिसने कहा, “ए भोस**...चश्मे वाले...!!!”

अब ट्रेन चल रही थी. गाली देने वाला जा चुका था. उसकी भड़ास तो निकल चुकी थी. लेकिन इस आदमी के लिए मुसीबत हो गई. उसे अपने चश्मे से नफ़रत सी हो गई. अगर ये चश्मा नहीं होता, तो उसे कोई इस तरह नहीं कहता, “ए भोस**...चश्मे वाले...!!!”

उसे ऐसा लगा, जैसे उसका काला चश्मा चूर-चूर होके उसकी आँखों में घुस गया हो. उसने अपना चश्मा निकाल के फेंक देना चाहा, मगर फिर रुक गया. उसे लगा, “इस चश्मे की वजह से मेरी आँखें ढँकी हुई हैं. इसे उतार दिया तो लोगों से नज़र कैसे मिलाऊँगा...?”

उसके कानों में अब एक ही आवाज़ गूँज रही थी, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” वो आदमी जैसे नाच गया हो. उससे रहा नहीं गया. लेकिन वो कुछ कर भी नहीं पा रहा था. वो बेचैन हो गया था. और जिसने उसे बेचैन किया था, वो वहाँ नहीं था. उसने एक भारी सा पत्थर उस डिब्बे में छोड़ दिया था, जो आवाज़ बनके डिब्बे के कोने-कोने में फैल गया था. ट्रेन के लोहे के बने डिब्बे का हर हिस्सा जैसे कह रहा हो, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

उस आदमी को समझ में नहीं आया कि अब वो जाए किधर! ट्रेन चल रही थी. वो कूद भी नहीं सकता था. कूदता तो मर जाता. इस डर से वो कूदा नहीं. लेकिन अगले ही पल वो सोचने लगा, “कूद जाता, तो अच्छा था. इतने लोगों का मुँह नहीं देखना पड़ता.” उसे शर्म महसूस हो रही थी. उसके साथ डिब्बे में मौज़ूद हर आदमी, जैसे उसे देख के कह रहा हो, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

ट्रेन में खड़े होकर सफ़र करने वाले लोगों के लिए बने हुए ढेर सारे हैण्डल, ट्रेन चलने के साथ इधर-उधर हिल रहे थे. उस आदमी ने देखा, जैसे सारे हैण्डल ख़ुशी में झूम रहे हैं और उसे ही देखके कह रहे हैं, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” और ख़ूब हँस रहे हैं.

ट्रेन के डिब्बे में कुछ इश्तिहार लगे हुए थे. “लड़के चाहिएँ... तनख़्वाह बीस से तीस हज़ार रुपए महीना... घर बैठे काम करें.... दो दिन में पैन कार्ड बनवाएँ... डिलीवरी हाथों हाथ... बाबा बंगाली अजमेर वाले... शाह जी बंगाली मलाड वाले... हर समस्या का समाधान एक घण्टे में... 100% गारण्टी के साथ... प्यार में धोखा, बिजनेस में तरक़्क़ी, सौतन से छुटकारा, जादू-टोना, किया-कराया... फ़िल्मों में सफलता... हर समस्या का हल...”

वहाँ एक फ़ोन नम्बर भी लिखा था. उसे लगा कि फ़ोन मिला के बाबा बंगाली को ही अपनी समस्या बता दे. मगर वो भी उसकी समस्या दूर करने के लिए एक घण्टा लेंगे, इसलिए नहीं किया. उसे अपनी समस्या का हल तुरन्त चाहिए था. उसे कोई ऐसी दवा चाहिए थी, जो वो अपने माथे पे मल ले और भूल जाए कि किसी ने उसे गाली दी है. वो चाहता था, कोई ऐसी दवा, जो अपने कानों में डाल ले और उसे अब सुनाई न दे, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” और ऐसी कोई दवा उसे सूझ नहीं रही थी जो उसकी इस आवाज़ को भूलने में मदद कर सके.

“ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” ये आवाज़ अब गूँजने लगी थी. वो आदमी एक जगह से उठकर दूसरी जगह बैठ जाता था. मगर उसे लगता था जैसे सामने बैठा हुआ आदमी वही आदमी है जिसने कहा था, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” फिर वो खड़ा हो जाता था, दूसरी जगह तलाशता था, सोचता था, “गाली देने वाला तो उतर गया. ये सब तो नए लोग हैं.” ऐसा सोचके वो दूसरी जगह बैठ जाता था मगर अगले ही पल उसे “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” सुनाई देता था. सामने बैठा हुआ आदमी भले ही किसी भी हालत में बैठा हो, इस आदमी को यही लग रहा था जैसे सामने बैठे हुए आदमी ने भी “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” सुना था, और अब वो भी मुस्कुरा रहा है.

वो वहाँ से भी उठ गया. इधर-उधर देखने के बाद उसे ट्रेन की दीवार पे कुछ लिखा हुआ दिखा. लिखा था, “सेक्स...” और साथ में एक नम्बर लिखा हुआ था. मतलब ये था कि अगर आपको सेक्स चाहिए तो ये नम्बर मिलाइए. वो आदमी भन्‍ना सा गया. उसे गुस्सा सा आया. वो मन में ही कुछ बुदबुदा के रह गया. फिर उसने सोचा, “क्‍या पता दिमाग़ बदल जाए...??? मैं भूल जाऊँ, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” मगर वो नम्बर नहीं मिला सका. उसने सोचा, “अभी तो लोग, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” ही कह रहे हैं. नम्बर मिलाया तो लोग ठरकी भी कहेंगे.” इसलिए उसने रहने ही दिया.

तभी उसे ट्रेन में दूसरी तरफ़ एक औरत बैठी हुई दिखी. उसके सामने की सीट ख़ाली थी. वो वहाँ जाके बैठ गया. उसने सोचा, “ये औरत है. गाली नहीं देगी.” उसने एक नज़र उस औरत को देखा. सेहतमन्द औरत थी. मोट-मोटे बाज़ू थे. सोने के गहने पहने हुए थे. गुलाबी रंग की सलवार-कमीज़ पहने हुए थी. उस आदमी को थोड़ी राहत महसूस हुई. उसने उस औरत का चेहरा देखा. उसके मोटे-मोटे होंठ थे. जैसे ही उसने उस औरत के होंठों को देखा, उसे लगा वो मोटे-मोटे होंठ मुस्कुरा के कह रहे हैं, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

फिर उस आदमी ने तुरन्त अपनी नज़र उस औरत के होंठों से हटा ली. उसने उसके बाज़ू देखे. मोटे-मोटे बाज़ू. फिर वो सरकते हुए उसकी कुहनी, फिर उसकी हथेली को देखने लगा. उसके हाथों का रंग थोड़ा गहरा था. उसने अपने मन में कहा, “गोरी नहीं है.” उसको तुरन्त जवाब मिला, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

वो आदमी सकपका सा गया. ये किसने कहा...? उसने देखा, हाथों को तो मुँह नहीं है, फिर किसने कहा...? तभी उसे लगा कि उस औरत का अंग-अंग बोल रहा है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उसके कान की बाली बोल रही है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उसके हाथ की चूड़ी बोल रही है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उस औरत का गुलाबी सूट बोल रहा है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उस औरत की मोटी गरदन बोल रही है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उस औरत की मोटी-मोटी छातियाँ बोल रही हैं, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उस औरत का हर हिस्सा, जहाँ-जहाँ उस आदमी की नज़र जा रही थी, बोल रहा था, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

उस आदमी को यहाँ भी आराम न मिला. उसको अब लगा कि मेरे कान फट जाएँगे. उसने सोचा, “मैंने ऐसा कौन सा गुनाह किया था...? सिर्फ़ सबकी तरह ट्रेन में चढ़ा ही तो था. उस आदमी को भी मैं ही मिला था क्‍या...?”

तभी अगले स्टेशन पे ट्रेन रुकी. उसने सोचा, “अब क्‍या करूँ...? जाना तो और आगे है...?” तभी उसने सुना, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” इस बार ये ट्रेन के गेट ने कहा था. उसको लगा कि ट्रेन का गेट उससे कह रहा है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!! अब तो उतर जा...!!!” और फिर उसने आव देखा न ताव, झट से नीचे उतर गया.

अब ट्रेन फिर से चल दी थी. ट्रेन उसकी आँखों के सामने से दूर जा रही थी. वो डिब्बा जिसमें वो सवार था, आगे निकल चुका था. जैसे ही ट्रेन उसकी आँखों के सामने से ओझल हुई, उसने एक धीमी आवाज़ में सुना, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” इस बार उसे इतना बुरा नहीं लगा क्‍यूँकि इस बार आवाज़ कर्कश नहीं थी, और दूर से आई थी, ऐसा लग रहा था. और फिर धीरे-धीरे वो आवाज़, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” हवा में घुल गई और गुम हो गई.

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