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हास्य-व्यंग्य कहानी / स्टेटस सिंबल / गुडविन मसीह

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  स्‍टेटस सिम्‍बल चमचमाती हुयी लाल कार आकर पार्क के गेट पर रुकती है। कार का दरवाजा खुलता है, एक तगड़ा तंदरुस्‍त, हट्‌टा-कट्‌टा दुम कटा कु...

 

स्‍टेटस सिम्‍बल

चमचमाती हुयी लाल कार आकर पार्क के गेट पर रुकती है। कार का दरवाजा खुलता है, एक तगड़ा तंदरुस्‍त, हट्‌टा-कट्‌टा दुम कटा कुत्‍ता कार से उतरता है। इधर-उधर देखता है फिर अपने बदन को जोर से झटका देकर अपनी सुस्‍ती दूर करता है और अपने नौकर के साथ शाही अंदाज में पार्क में टहलने लगता है। वह जिधर जाता है, नौकर भी उसके पीछे-पीछे जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे आर्मी का कोई बड़ा आफीसर अपनी ड्‌यूटी पर आता है, तो उसके जवान सिपाही उसके आगे-पीछे घूमकर उसकी जी-हुजूरी में लग जाते हैं।

उस दुम कटे कुत्‍ते के ठाट-वाट और उसकी शान-ओ-शौकत को देखकर वहां मौजूद कुछ आवारा कुत्‍तों की सिट्‌टी-पिट्‌टी गुम हो जाती है। वो आपस में एक-दूसरे से काना-फूसी करते हैं और अपनी दुम दबाकर वहां से रफू चक्‍कर हो जाते हैं। लेकिन एक मरियल और गन्‍दा, मटमैला-सा कुत्‍ता वहीं रह जाता है। वह ध्‍यान से उस कुत्‍ते के ठाट-वाट को देखता है और अपने मन में कहता है, ‘‘यार, इसने क्‍या किस्‍मत पायी है। है तो यह मेरी तरह कुत्‍ता, पर ठाठ राजा-महाराजाओं जैसे हैं। मैंने कभी कार को छू कर भी नहीं देखा, और यह रोज कार में घूमने आता है, वो भी अपने नौकर के साथ।’’

‘‘यह सचमुच कुत्‍ता ही है...या...? कहीं कुत्‍ते के भेस में कोई बहरूपिया तो नहीं है...?’’

क्‍योंकि आजकल इंसान और कुत्‍ते में कोई ज्‍यादा फर्क नहीं रह गया है, कुत्‍ता अपने मालिक के प्रति वफादार होता है, लेकिन इंसान अपने मालिक के प्रति वफादार नहीं होता है। वह अपनी अमानवीय हरकतों से उसको कब काट खाये कुछ पता नहीं।’’

‘‘कुछ भी कह लो पर, कुत्‍ते में दम है, तभी तो कार में घूम रहा है, मक्‍खन लगी ब्रेड और बिस्‍कुट उड़ा रहा है। और एक मैं हूँ जिसे एक वक्‍त की रोटी के लिए भी जुगाड़बाजी करनी पड़ती है। लोगों की लात और दुत्‍कार खानी पड़ती है।’’

काफी देर पार्क में घूमने के बाद दुम कटा कुत्‍ता कार में बैठकर अपने घर चला गया। मरियल कुत्‍ता वहीं बैठा उसके बारे में सोचता रहा।

अगले दिन निश्‍चित समय पर दुम कटा कुत्‍ता पार्क में घूमने के लिए आया, तो मरियल कुत्‍ता हिम्‍मत जुटा कर दुम कटे कुत्‍ते के पास पहुँच गया और उसे एक बड़ा-सा सलाम ठोंक कर बोला, ‘‘सर, मैं आपसे आपके बारे में कुछ जानना चाहता हूं।’’

दुम कटे कुत्‍ते ने मरियल कुत्‍ते को हिकारत भरी नजरों से देखा और अजीब मुंह बनाकर बोला, ‘‘हां बोल, क्‍या जानना चाहता है?’’

‘‘सर, मैं आपकी खुशहाल जिन्‍दगी का राज जानना चाहता हूं...?’’

दुम कटे कुत्‍ते ने उस मरियल कुत्‍ते को ऊपर-से-नीचे तक देखा, फिर जोर से हंसा और फिल्‍मी स्‍टाइल में बोला, ‘‘मेरी खुशहाली का राज जानकर क्‍या करोगे बच्‍चू ?’’

‘‘सर, मेरी तमन्‍ना है कि मैं भी आपकी तरह खूब मोटा-तगड़ा हो जाऊं। आपकी तरह मेरे भी आगे-पीछे नौकर घूमें और इस शहर में जितने भी आवारा कुत्‍ते हैं वो सब मुझे निकलते-बैठते सलाम ठोंके।’’

‘‘तो तुम मेरी तरह बनना चाहते हो?’’

‘‘जी सर।’’

‘‘तो दोस्‍त, मेरी तरह बनने के लिए पहले तो तुम्‍हें अपनी दुम कटवानी होगी।’’

‘‘दुम कटवानी होगी मतलब ?’’

‘‘मतलब, ‘‘मेरी दुम देख रहे हो...बड़खुरदार! ....तुम्‍हें भी मेरी तरह अपनी दुम की कुर्बानी देनी होगी।’’

‘‘कुर्बानी ? माफ करना सर, कुत्‍ते की दुम ही तो उसका स्‍टेटस सिम्‍बल होती है ?

‘‘होती है, लेकिन कटी हुई दुम से उसका स्‍टेटस और अधिक बढ़ जाता है।’’

तो क्‍या आपने अपनी दुम खुद कटवायी है...?’’मरियल कुत्‍ते ने आश्‍चर्य व्‍यक्‍त करते हुए कहा।

‘‘और नहीं तो क्‍या, ऊपर वाले ने काटी है..? डियर, अपनी दुम मैंने खुद कटवायी है।’’

‘‘क्‍यों, आपने, आपनी दुम क्‍यों कटवायी...? क्‍या फायदा हुआ आपको दुम कटवाने से...?’’

‘‘बेटा, इस देश में अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ अलग करना पड़ता है। जब तुम कुछ अलग करते हो तो, लोगों की नजर तुम पर पड़ती है, लोग भी तुम्‍हारे आगे-पीछे घूमते हैं, तुम्‍हारी जी-हुजूरी करते हैं, झुक कर सलाम ठोकते हैं, जैसे तुमने मुझे ठोंका था। क्‍योंकि आज का इंसान दूसरों को नीचा दिखाने और उनसे अलग बनने के लिए अपने घर में कुछ अलग रखने में अपनी शान समझता है। वो चाहे घर की सजावट का सामान हो, या फिर कोई पशु-पक्षी हो। जंगली फूलों को भी अपने बगीचे में लगाकर लोगों को बताता है कि ये विदेशी फूल हैं, इन्‍हें कैलीफोर्निया से मंगवाया है।

....बेटा, आज के हाईटेक जमाने में पहली चीज, डिपेंड करता है तुम्‍हारे गुर्राने और भौंकने पर....तुमने कभी किसी पुलिस वाले को गौर से देखा है, जिसके देखने और बोलने का स्‍टाइल आम इन्‍सान से बिल्‍कुल अलग होता है, वह जिसे भी देख ले, वही कांप जाये। बेटा यहां उसी का सिक्‍का चलता है, जिसके भौंकने और गुर्राने का अन्‍दाज सबसे जुदा होता है।’

‘‘मतलब...? मरियल कुत्‍ते ने कहां।

‘‘मतलब, तुम दूसरों पर कितना और कैसे रौब झाड़ सकते हो। सबके सामने खुद को सबसे अलग साबित कैसे कर सकते हो ? फिर तुम्‍हारे अन्‍दर ऐसा कुछ करने का जज्‍बा होना चाहिए, जिसे देखकर लोग तुम्‍हारी ही चर्चा करें।’’

‘‘आपकी बात सही है, लेकिन सर, मेरे अन्‍दर तो एक लात खाने की भी हिम्‍मत नहीं है, फिर मैं अपनी दुम कैसे कटवा सकता हूँ ? सर मैं आपको आज से अपना गुरू बना रहा हूँ, प्‍लीज आप मेरी दुम कटवाकर मुझे अपने जैसा बना दीजिए ?’’

मरियम कुत्‍ते की बात पर दुम कटा कुत्‍ता मन-ही-मन कहने लगा, ‘‘अगर मैं इसको अपनी असलियत बता दूंगा कि पहले मैं भी इसी की तरह एक साधारण और मामूली कुत्‍ता था...... एक-एक रोटी के लिए मुझे भी लोगों की जूती-चप्‍पल, लात और डण्‍डे खाने पड़ते थे, जिधर जाता था, उधर ही लोग मुझे दुत्‍कारते थे। कभी किसी ने जूठन खिला भी दी, तो समझो उसका मेरे ऊपर बहुत बड़ा एहसान हो गया। रात भर उसके घर की चौकीदारी करनी होती थी, न भी भौंकने का मन हो, तो भी भौंकना पड़ता था और जिस दिन नहीं भौंकता था, उसी दिन सुबह को गालियां खाने को मिलती थी, लोग कहते थे एहसान फरामोश, जब पेट खाली होता है, तो दुम हिलाता हुआ यहां आ जाता है और जब भौंकने का वक्‍त होता है, तो न जाने कहां गायब हो जाता है। बस इसी तरह मायूसी में अपनी जिन्‍दगी कट रही थी। फिर एक दिन मैं एक घर में खाने की जुगाड़ से
घुस गया। घर के सभी लोग टीवी पर अनुपम खेर का शो ’’कुछ भी हो सकता है’’ देख रहे थे। मैं भी खड़े होकर उस शो को देखने लगा। अनुपम बार-बार, बात-बात पर एक ही शब्‍द दोहरा रहे थे कि कभी भी किसी की भी जिन्‍दगी में कुछ भी हो सकता है। मैंने मन में कहा, फेंक रहे हैं। ऐसा कैसे हो सकता है। मैं कुत्‍ता हूं तो कुत्‍ता ही रहूंगा, शेर थोड़े ही बन जाऊंगा।’’

यही सब सोचता हुआ मैं घर से निकल कर खाने की तलाश में रेलवे लाइन क्रॉस कर रहा था कि अचानक पीछे से धड़धड़ाती हुयी टे्रन आ गयी, मैंजब तक कुछ समझ पाता और पटरी से उतर पाता मेरी पूछ टे्रन के नीचे आकर कट गयी। मैं दर्द से बिलबिलाने लगा और मोहल्‍ले की तरफ भागा पर लोगों ने मुझे रुकने नहीं दिया और वहां से भगा दिया, जिससे मैं अपनी जान बचाकर जंगल में चला गया। वहां मेरे जख्‍म को मक्‍खियां कुरेदने लगीं। मक्‍खियों से बचने के लिए मैं घनी जंगली झाड़ियों में घुसकर बैठ गया । मुझे आराम मिल गया और मैं गहरी नींद में सो गया। वहां मुझे कैसी भी कोई तकलीफ नहीं हो रही थी इसलिए मैं वहीं रहने लगा।

एक-डेढ़ महीने में जब मेरा घाव भर गया तो मैं जंगल से निकल कर शहर की तरफ चला गया। वहां कुछ कोठी वाले लोग मुझे देखकर आपस में बातें बनाने लगे, ‘‘कोई कह रहा था कि कितना तगड़ा-तंदरुस्‍त है। कोई कह रहा था कि किसी बड़े घर का लगता है। ‘’...कोई कह रहा था ये यहां का लगता ही नहीं है। अच्‍छी नस्‍ल का है, पूछ कटी हुई है, कहीं बाहर का लगता है, तो कोई कह रहा था, यह अपने घर का रास्‍ता भटक गया है।’’

उन सबकी बातें सुनकर मुझे खुशी हुई और मैं मन में सोचने लगा कि मेरी दुम कट जाने से मेरी काया बदल गयी है। मैं तगड़ा-तंदरुस्‍त भी हो गया हूं। इसीलिए यह लोग मुझे यहां का नहीं किसी दूसरे देश का समझ रहे हैं। मुझे देखकर, वहां के सड़क छाप कुत्‍ते भी के डर के मारे मुझसे दूर भाग रहे थे। सचमुच किसी का वक्‍त बदलते देर नहीं लगती है ।

मैं रुक कर उनकी बातें सुनने लगा। मिस्‍टर सक्‍सेना अपने पड़ोसी से बोले,‘‘मिस्‍टर कपूर, क्‍या ऐसा नहीं हो सकता कि जब तक इसका मालिक इसे ढूंढने यहां आए, तब तक इसे मैं अपने घर में रख लूं ?’’

‘‘अगर आपके यहां रह जाए तो रख लीजिए, वैसे भी आपको तो कुत्‍तों से बहुत लगाव है।’’

मैं तो चाहता भी यही था कि मुझे किसी के घर में शरण मिल जाए। सक्‍सेना जी ने मुझे पुचकारा तो मैं अपनी कटी दुम हिलाता हुआ उनके पास पहुंच गया। उन्‍होंने प्‍यार से मुझे सहलाया तो मेरे बदन में गुदगुदी होने लगी, जिससे मैं कुनमुनाने लगा। मुझे ऐसा करते देख सक्‍सेना जी बहुत खुश हुए और अपने घर में लेजाकर मुझे दूध में ब्रेड मिलाकर खाने को दिया, जिसे खाकर मेरी तबियत खुश हो गयी, क्‍योंकि जिन्‍दगी में पहली बार मुझे ऐसा खाना खाने को नसीब हुआ था।

बस फिर क्‍या था उस दिन से अपनी खूब आव-भगत होने लगी। सुबह-शाम कीमती पट्‌ठे में बांधकर मिसेस सक्‍सेना मुझे पार्क में घुमाने ले जातीं। मुझे देखकर लोग बातें बनाते तो मिसेस सक्‍सेना खुद में गर्व महसूस करतीं। पार्क से आने के बाद अपनी मालिश होती, शैम्‍पू से नहाना-धोना होता और आराम से दूध-ब्रेड खाने को मिलती। जैसे-जैसे मिस्‍टर सक्‍सेना के रिश्‍तेदारों, परिचितों और दोस्‍तों को मेरे बारे में पता चलता गया, वो लोग मुझे देखने के लिए वहां आने लगे और मिस्‍टर सक्‍सेना की किस्‍मत को सराहने लगे। जब सक्‍सेना फैमिली पूरी तरह से निश्‍चिंत हो गई कि अब मुझे कोई लेने आने वाला नहीं है तो उन्‍होंने पूरी तरह मुझ पर अपना हक जमाने के लिए मेरा नामकरण भी कर दिया। मेरे लिए एक अलग से कमरा बना दिया गया, जिसमें बिस्‍तर से लेकर सारे ऐश-ओ-आराम थे। अब मैं जहां भी जाता हूँ तो पट्‌ठे में बंधकर या पैदल न जाकर सक्‍सेना फैमिली की चमचमाती कार में जाता हूँ।

एक दिन मिसेस और मिस्‍टर सक्‍सेना मुझे शहर की जानी-मानी पैट क्‍लीनिक ले गए और डॉक्‍टर से मेरा चेक-अप करबाने के साथ-साथ इस आश्‍य से मेरे इंजक्‍शन ठुकवा दिया ताकि आस-पास में मेरी जनरेशन न होने पाए, क्‍योंकि अब मैं उनका स्‍टेटस सिम्‍बल जो बन गया था। हाईटेक सुविधाओं में रहते हुए मेरी काया बदल गई। मेरे भौंकने और चलने-फिरने का स्‍टाइल भी चेंज हो गया। पहले मैं अनाथ मरियल कुत्‍तों की तरह भौंकता था अब अमीरों जैसा दमदार भौंकता हूँ और सोफे पर बैठकर अनुपम खेर का शो ’’कुछ भी हो सकता है, देखता हूं। क्‍योंकि अब मुझे पक्‍का यकीन हो गया था कि किसी की भी जिन्‍दगी में, कभी भी कुछ भी हो सकता है।‘‘

‘‘क्‍या हुआ सर! आप क्‍या सोचने लगे?’’

मरियल कुत्‍ते ने दुम कटे कुत्‍ते को खामोश देखकर कहा, तो दुम कटे कुत्‍ते की विचार श्ाृंखला भंग हो गयी। वह एकदम ऐसे चौंक गया, जैसे किसी ने उसे गहरी नींद से जगा दिया हो। उसने सोचा, अगर मैंने अपने मोटे-तगड़े और ऐशो-आराम की जिन्‍दगी गुजारने का राज इस मरियल कुत्‍ते को बता दिया, तो मेरी पोल खुल जायेगी और इसकी नजरों में मेरी जो इज्‍जत है, वो खत्‍म हो जायेगी ? ...नहीं, मैं इसे अपनी असलियत नहीं बताऊंगा।’’

दुम कटा कुत्‍ता एकदम सामान्‍य होकर उस मरियल कुत्‍ते से बोला, ‘‘कुछ नहीं बस ऐसे ही। अच्‍छा दोस्‍त, मेरा योगा क्‍लास जाने का समय हो गया है। ऐसा करते हैं हम इस विषय पर फिर कभी बात करेंगे।’’

‘‘तो क्‍या आप योगा क्‍लास भी लेते हैं ?’’

‘‘हाँ, मेरी इच्‍छा तो नहीं होती है, पर क्‍या करूं, यह सब बड़े लोगों के चोचले हैं, करने तो पड़ते ही हैं। आजकल इन्‍हीं सब चोचलों से इंसान बड़ा आदमी कहलाता है।.....अच्‍छा दोस्‍त, अब मैं चलता हूँ।’’

‘‘ठीक है सर! मैं आपका इन्‍तजार करूंगा।’’

‘‘आज तो बच गया, लेकिन आगे कैसे बचूंगा ? मुझे इसे गोली पिलानी ही पड़ेगी। जाते-जाते अचानक रुक गया और मरियल कुत्‍ते से बोला, ‘‘यार, माफ करना मैं कल नहीं आ पाऊंगा, कल क्‍या अब बहुत दिनों तक नहीं आ पाऊंगा, क्‍योंकि आज शाम को मेरी मुम्‍बई की फ्‍लाइट है।’’

‘‘मुम्‍बई की फ्‍लाइट ? आप मुम्‍बई क्‍यों जा रहे हैं ?

‘‘वहां मुझे एक फिल्‍म में कुछ स्‍टन्‍ट करने हैं इसलिए।’’

‘‘तो क्‍या आप फिल्‍मों में भी काम करते हैं ?’’ मरियल कुत्‍ते ने उत्‍सुकता से पूछा।

‘‘हां, अपने मालिक को खुशी देने के लिए सब कुछ करना पड़ता है।.....अच्‍छा दोस्‍त चलता हूं, वापस आने के बाद तुमसे मिलता हूं।’’

‘‘ठीक है, मैं आपका इन्‍तजार करूंगा।’’

मरियल कुत्‍ता उस दिन से सपने देखने लगा, चमचमाती कार, योगा, फिल्‍मों में स्‍टन्‍ट....वाह, इसका मतलब मेरी भी किस्‍मत चमकने वाली है? मैं भी आम कुत्‍ते से खास कुत्‍ता हो जाऊंगा। इसी तरह के सपने देखते-देखते मरियल कुत्‍ता बद-से-बदतर हो गया मगर दुम कटा कुत्‍ता उस पार्क में फिर कभी नहीं आया।

गुडविन मसीह

चर्च के सामने, वीर भट्‌टी,

सुभाषनगर,

बरेली (यूपी) 243001

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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,86,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,305,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1879,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,675,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,51,साहित्यिक गतिविधियाँ,180,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: हास्य-व्यंग्य कहानी / स्टेटस सिंबल / गुडविन मसीह
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