शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

वो चड्ढ़ी पहना हुआ आदमी / कविता / क़ैस जौनपुरी

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वो चड्ढ़ी पहना हुआ आदमी

सुबह का सूरज
पीली धूप
चाय की दुकान
भूख लगी है, चाय पिला दो!

नज़र उठाके सबने देखा
चड्ढ़ी पहना हुआ एक आदमी
सामने खड़ा था
सिर्फ़ चड्ढ़ी
और धूल-मिट्टी से सना हुआ
पता नहीं कहाँ से आया था?
और पता नहीं कहाँ को जाएगा?

भूख लगी है, चाय पिला दो!

बड़ा आया, चाय पिला दो!
चलो, पहले पैसा दो!

पैसा?
‘पैसा’ सुनके सिर खुजलाया
शायद उसको समझ न आया
भूख लगी है, चाय पिला दो!
बस इतना वो फिर चिल्लाया

चाय वाला भी उसी की तरह ज़िद्दी
चाय से पहले पैसा दो!

फिर उसने टटोला अपने बदन को
जैसे पूछ रहा हो, पैसे दे दो
लेकिन कुछ भी तो नहीं था वहाँ
सिर्फ़, धूल और मिट्टी के सिवा
फिर उसने डाला हाथ
अपनी चड्ढ़ी में
और वही हाथ बढ़ा दिया
चाय वाले की ओर

अब चाय वाला बिदक गया
थोड़ा सा पीछे सरक गया
देखा, हाथ में कुछ भी नहीं था

ले लो, पैसा है
ले लो, पैसा है
कहके उसने फिर हाथ बढ़ाया
अबकि बार चाय वाला
ज़ोर से चिल्लाया
अरे! हटाओ इसको यहाँ से!
चला आया, पता नहीं कहाँ से!

खाकर चाय वाले की डाँट
फिर उसने अपना हाथ
दुकान में पहले से बैठे
चाय पी रहे
लोगों की तरफ़ बढ़ाया
फिर उसके मुँह से
बस इतना ही बाहर आया
भूख लगी है, चाय पिला दो!

देखके उसका हाथ
अपनी तरफ़ बढ़ा हुआ
एक सज्जन ने उठा लिया
एक डण्डा वहीं पड़ा हुआ
और बोले, चल भाग यहाँ से!
चला जा वहीं, आया है जहाँ से!

वो गिड़गिड़ाया
चला जाऊँ?
कहाँ चला जाऊँ?

हाँ, जा यहाँ से!
देखता नहीं, यहाँ शरीफ़ लोग बैठे हैं?
भला, ये भी कोई तरीक़ा है?

तरीक़ा?
कौन सा तरीक़ा?

अरे यही!
चड्ढ़ी पहन के निकल पड़े!
चड्ढ़ी बच्चों पे अच्छी लगती है
अब तुम बड़े हो गए हो
कुछ शर्म तो करो!

शर्म?
कैसी शर्म?

हाँ, हाँ शर्म!
ऐसे चड्ढ़ी पहन के
किसी के सामने जाया जाता है क्या?
कपड़े कहाँ हैं तुम्हारे?

कपड़े?

हाँ, हाँ कपड़े!

कपड़े तो रिश्तेदारों ने उतार लिए
पैसे भी उन्होंने ही छीन लिए
कहते हैं, मेरा दिमाग़ चल गया है

हाँ तो सही कहते हैं, और क्या!

सही कहते हैं?

हाँ, हाँ! सही कहते हैं
बदन पे कपड़े नहीं
जेब में पैसे नहीं
इन्सान हो कि क्या हो?

इन्सान?

हाँ, हाँ! इन्सान!
अब इन्सान क्या होता है
ये भी नहीं समझते?

अरे हटाओ, यार!
क्यूँ दिमाग़ ख़राब कर रहे हो, सुबह-सुबह?
एक दूसरे सज्जन बोले

चाय वाले को अब बुद्धि सूझी
उसके ग्राहक चले न जाएँ
इसलिए उसको युक्‍ति सूझी
उसने कहा, जा भई! पैसे-वैसे ले के आ
यहाँ चाय मुफ़्त में नहीं मिलती!

मुफ़्त में नहीं मिलती?

हाँ, हाँ! मुफ़्त समझता है ना?
यही कि तूने माँगा और मैंने दे दिया
और बदले में कुछ नहीं लिया

यही तो!
अब चड्ढ़ी पहने हुए आदमी को होश आया
और वो भी ज़ोर से चिल्लाया
यही तो मैंने किया है!
अपना सबकुछ दूसरों को दिया है!
और उनसे बदले में कुछ भी नहीं लिया है!

अरे जा! बड़ा आया देने वाला!
जिसके पास ख़ुद एक चड्ढ़ी बची हो!
भला वो किसी को क्या देगा?

जिसके पास ख़ुद एक चड्ढ़ी बची हो?
ये भी तो सोचो
हो सकता है सबकुछ देने के बाद
यही एक चड्ढ़ी बची हो!

तो जा! जिनको दिया है
उनसे माँग ला!

वो अब मुझे नहीं पहचानते
कहते हैं, मुझे नहीं जानते
कहते हैं, अब मैं कमाता नहीं
कहते हैं, अब मैं घर में कुछ लाता नहीं

हाँ तो सही कहते हैं, और क्या!
मुफ़्त में कोई कब तक खिलाएगा तुम्हें?
यहाँ भी चाय कोई नहीं पिलाएगा तुम्हें!

इतना सुनकर
वो चड्ढ़ी पहना हुआ आदमी थक गया
और चाय की दुकान से बाहर निकल गया
चाय वाला पीछे से मुस्कुरा दिया
डण्डे वाला हँस दिया
और दूसरे सज्जन ने अपना मुँह
दूसरी ओर फेर लिया

वो चड्ढ़ी पहना हुआ आदमी
पता नहीं कहाँ से आया था...
और पता नहीं कहाँ चला गया...

***
 

संपर्क - qaisjaunpuri@gmail.com

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