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शब्द – संधान / योग / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

हिन्दी में शब्द,‘योग’ के अनेक अर्थ हैं | लेकिन आजकल जब से इसे अंग्रेज़ी के प्रभाव में “योगा’ कहा जाने लगा है यह केवल स्वास्थ्य संबंधी कतिपय आसनों आदि तक ही सीमित रह गया है | लेकिन इसकी लोकप्रियता में बेशक बेहद इजाफा हुआ है इसका श्रेय महेश योगी और बाबा रामदेव को जाता है | इन दोनों विभूतियों ने सारे विश्व में योग को प्रतिष्ठित किया है |

यदि हम किसी भी हिन्दी कोष में योग के अर्थ को देखें तो हम सहज ही इसके अनेक अर्थ और प्रयोग पा सकते हैं | योग का मूल अर्थ जोड़ने के कार्य से है | उदाहरण के लिए दो संख्याओं का जोड़ योग कहलाता है | हम गाढ़ी में उसे चलाने के लिए किसी पशु को ‘जोतते’ हैं , यह भी योग है | अंग्रेज़ी में इसे ‘योक’ (yoke),जिसका अर्थ जोतने से ही है,कहा गया है |

दर्शन शास्त्र में पतंजलि ने योग के आठ अंग बताए हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि | व्यक्ति का इनसे जुड़ जाना ही योग है | भक्ति-योग, ज्ञान-योग, और कर्म-योग भी योग के प्रकार हैं | भक्ति से जुड़ना, भक्ति-योग है, इसी तरह कर्म या ज्ञान से जुड़ना कर्म-योग और ज्ञान-योग है | गीता में तो विषाद-योग का भी उल्लेख है | विषाद से जुड़ जाना ‘विषाद’ योग है |

योग वह ‘मार्ग’ है जो हमें अपने अभीष्ट की और ले जाता है | यही कारण है कि भक्ति, कर्म और ज्ञान योग को भक्ति मार्ग, कर्म-मार्ग और ज्ञान मार्ग भी कहा गया है | योग का एक अर्थ इस प्रकार ‘मार्ग’ से भी है |

योग से न जाने कितने शब्द जुड़ गए हैं –सुयोग, संयोग, वियोग, नियोग, आदि| ‘संयोग’ मेल-मिलाप है | घनिष्ट सम्बन्ध है | प्रेमी-प्रेमिका का मिलन है | मैथुन है | अंग्रेज़ी में पति-पत्नी को ‘योक-मेट’ कहा गया है | योग मतैक्य है | संयोग-संधि आक्रमण के बाद सामान्य उद्देश्य से की जाने वाली संधि है | ‘सुयोग’ सुन्दर अवसर है, एक अच्छा मौक़ा है | ‘वियोग’ - योग जुड़ना है तो वियोग बिछुड़ना है | विच्छेद है | श्रृगार रस का यह एक भेद है जिसमें प्रेमियों के विरह का वर्णन होता है | “नियोग’ नियुक्त करना है | मनुस्मृति के अनुसार नि:संतान स्त्री पति के अशक्त होने की दशा में देवर या किसी अन्य गोत्र के द्वारा संतान उत्पन्न करा सकती थी, इसे भी नियोग कहा गया है | यह किसी पर पुरुष की नियुक्ति ही तो है |

दर्शन शास्त्र में योग के अनेक लाभ बताए गए हैं | इस सन्दर्भ में योग को अनेक तरह से परिभाषित किया गया है | कर्म को कौशल से करने का नाम योग है – योग: कर्मसु कौशलम | योग हमारी चित्त वृत्तियों का निरोध करता है | योगश्चित्त वृत्ति निरोध: | योग हमारे दु:खों को दूर करता है | इसीलिए उसे ‘दु:खहा’ कहा गया है –वह दु:खों का हरण करने वाला है, इत्यादि|

भारतीय वांग्मय में योग पर अनेक शास्त्र-ग्रन्थ मिलते हैं | सबसे महत्त्व पूर्ण पतंजलि ऋषिकृत योग विषयक ग्रन्थ, योग शास्त्र या योग-सूत्र है जिसमें चित्त-वृत्ति के निरोध का सांगोपांग विवेचन है | ‘योग वाशिष्ठ’ एक वेदान्त ग्रन्थ है जो वशिष्ठ निर्मित कहा जाता है | इसी तरह योग-शिक्षा भी एक उपनिषद् है |

जो योग का अभ्यास करता है वह योगी कहलाता है | जो योग में पारंगत है उसे योग-पारंगत कहते हैं | लेकिन योग को जो स्वार्थ-सिद्धि के लिए साधता है, उसे योग-पुरुष कहा गया है ! योग-शास्त्र का ज्ञाता योग-शास्त्री कहलाता है | योग के ज्ञानी को योग-विद कहते हैं | जिसका योग पूरा हो चुका है उसे योग-सिद्ध कहा गया है | योग में लगा हुआ व्यक्ति योगस्थ है | योग संसिद्धि योग की सफलता है |

आजकल योग को ‘योगा’ कहा जाने लगा है , लेकिन वास्तव में ‘योगा’ नाम की सीता की एक सखी थी | यशोदा की कन्या का नाम योग-माया था | इसे वसुदेव-पुत्री समझकर कंस ने मार डालने की चेष्ठा की थी | वैसे योग-माया सूक्ष्म समाधि की अलौकिक शक्ति भी मानी गई है | इसे भगवती या विष्णु की शक्ति भी कहा गया है | महादेव योग-निलय कहलाते हैं | योग-पति विष्णु हैं | विष्णु को योग-मय भी कहा गया है | यज्ञ-वल्क का नाम योगीश है | योगेश्वरी दुर्गा हैं |

-डा. सुरेन्द्र वर्मा -- १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१ मो. ९६२१२२२७७८

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