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बाल कविताएँ - गुडविन मसीह

गुडविन मसीह

1

पतंग


सर सर सर सर हवा चली
फर फर फर फर उड़ी पतंग
हँस-हँस कर ऊपर जाती
बातें करती हवा के संग।

ठुमक-ठुमक नाच दिखाती,
फूलों जैसे इसके रंग,
हरकत करती चिड़ियों जैसी
रह जाते सब देख के दंग।

इतराती इठलाती है,
करती करतब खूब पतंग
आती वश में डोर से वह
जब भी ऊपर जाती पतंग।

सब बच्चों से कहती है
बादल में जाकर पतंग
ऊँचाई को छूने का
देती सबको संदेश पतंग।

2

बचपन

बचपन भी होता है कैसा
दूध-मलाई मक्खन जैसा।

सीधा सच्चा और सलोना
जैसे कोई खेल खिलौना।

जितना नटखट उतना चंचल
हँसमुख भोला और हठीला।

वर्तमान में पलने वाला
आइस क्रीम-सा घुलने वाला।

पल में हँसना पल में रोना
मौसम जैसा बदलने वाला।

गाड़ी बनकर, घोड़ा बनकर,
सरपट दौड़ लगाने वाला।

मीठी-मीठी बाते करके,
सपनों में खो जाने वाला।

3

नदिया ओ प्यारी नदिया

नदिया ओ प्यारी नदिया
कल कल तुम बहती जाती हो
चाँदी जैसा रूप तुम्हारा
पल पल कुछ कहती जाती हो।

ऊँचे पर्वत से नीचे आकर
मैदानों को तुम हर्षाती हो
बिन गाड़ी बिन बस के तुम
हर गांव शहर में जाती हो।

प्यास बुझा कर इस धरती की
फसलें भी तुम उपजाती हो
पेड़ों को हरियाली देकर
पुष्पों को तुम महकाती हो।

हँसती गाती लहरों के संग                   
हर मौसम में इतराती हो
वारिश करवाने की खातिर
तुम सागर में मिल जाती हो।


 

4

बादल

आसमान में छाये बादल,
कैसे अपना रंग बदल जाते
उमड़ घुमड़ कर आते बादल,
मौसम की हर बात बताते ।

जब-जब होते गुस्सा बादल,
कड़क-कड़क बिजली चमकाते,
जब-जब भावुक होते बादल,
रिमझिम-रिमझिम मेह बरसाते।

चित्रकार भी होते हैं बादल,
कितने अद्भुत चित्र बनाते,
भालू बनकर आते बादल
और कभी घोड़ा बन जाते।

लुका छुपी का खेल खेलते,
हैं ये सरपट दौड़ लगाते,
जाड़ा-गरमी या हो वारिश
हैं हर मौसम में इतराते।

किसने की बादल की रचना,
हैं कैसे ऊपर छा जाते,
कुदरत का भी खेल निराला,
बांस बिना तम्बू तन जाते।
 
...............
गुडविन मसीह,
चर्च के सामने, वीर भट्टी सुभाषनगर,
बरेली (उ.प्र.) 243 001

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