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शशांक मिश्र भारती के हाइकु

01:-

आयोजन हैं

सुविधाओं के लिए,

गरीब मिटे।

02:-

आफिस तेज

अफसर निस्‍तेज

कितना फल।

03:-

कहते सब

कितने करते हैं,

आदत जन्‍य।

04:-

छुप जाती है

अन्‍दर सफेदी के,

मक्‍कारी भी।

05:-

पहचान जो

अस्‍तित्‍व मिटाकर

अपना स्‍वार्थ।

06-

उन्‍नति हुई

आगे भी बढ़ें हम

भ्रष्‍ट होकर।

07-

क्रूर है कौन

विध्‍वंस ही विध्‍वंस

प्रकृति मौन।

08-

सोचिए तब

सर्वस्‍व अपना हो

रुला के जन।

09-

क्‍या हैं हुआ

प्रगति कर गए

स्‍वयं बिके।

10-

आज के सर्प

नेताओं को न डसें

भय मृत्‍यु का।

11-

तिगड़म बाज

प्रतिष्‍ठित होते

आज पदों पे।

12-

सरकती न

चाय नाश्ते बिन

आज फाइलें।

13-

परिक्रमा हो

कामद गिरी जैसी

कार्य के हेतु।

14-

मिलें न साब

अपनी कुर्सी पर

सुविधा शुल्क।

15-

आज के केस

बढ़ते ही जाते हैं,

अगली पीढ़ी।

16-

दीवारें चुप

जनता आतंकित

दूर जो ज्ञान।

17-

क्रुद्ध प्रकृति

दिखे भयावहता,

विजय कैसी।

18:-

आज के पद

वणिक सम राग,

निन्‍दा ही कार्य।

19:-

उन्‍होंने सीखा

उनसे ही हुनर,

दीमक जैसा।

20:-

स्‍वार्थ की नदी

बहती वहीं,

दिखता पैसा।

21:-

ताण्‍डव मृत्‍यु

जो खेलते रहते,

मात्र आखेट।

22:-

बातचीत है

याकि दावतनामा,

हवेली सजा।

23:-

मुकदमें जो

यहां पर चलते,

पीढ़ियों तक।

24:-

फाइल नहीं

चक्‍कर काटे रहो,

शुल्क दिखाये।

25:-

बात न होती

जी हुजूर कहिए,

सुविधा बिन।

26:-

पैसा आपका

मिल नहीं सकता,

रिश्वत बिन।

27:-

आज स्‍थिति

स्‍व-स्‍वजनों की,

जेब भरिये।

28:-

धरा कांपती

बम पटाखे सुन,

दिखावे भर।

29:-

बारात घर

संजती हैं झालरें,

गिरवीं सब।

30:-

बुधुआ रोता

फुटपाथ पर बैठा,

भेड़िया आया।

शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र.

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