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समीक्षा / आस्था और विश्वास का गीत-संग्रह : ‘कहां हो तुम’? / डॉ. राजेश कुमार

समीक्षा

आस्था और विश्वास का गीत-संग्रह : ‘कहां हो तुम’?

डॉ. राजेश कुमार

र्तमान काल में काव्य की विधाओं के उन्नयन में गीत का भी विशिष्ट स्थान है. गीत भावों की शब्दबद्ध योजना का निदर्शन करता है. जहां कविता पुरुष भावों की भी व्यंजना करती है, वहां गीत कोमल भावों की अभिव्यंजना का निरूपण करता है. भारतीय काव्य में गीतों का महत्त्व-बोध असंदिग्ध है. प्रायः कविता और गीत में मुख्य अंतर यह होता है कि कविता अपनी सम्पूर्णता में संप्रभाव का सर्जन करती है, वहीं गीत की पहली पंक्ति ही अपनी रमणीयता और कमनीयता के समावेश से पाठकों और श्रोताओं को रससक्ति करती है. यह निर्विवाद है कि गीतों में माधुर्य और प्रसाद गुणों की अर्थच्छाया पूर्ण रूप में विद्यमान होती है. तमसा नदी के किनारे मिथुनरत क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर क्रौंच की हत्या होने से कवि वाल्मीकि का आक्रोश निम्नलिखित शब्दों में अभिव्यक्त हुआ-

‘‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं गमः शाश्वती समाः.

यतं क्रौंच मिथुनादेकं वधीः काममोहितम्...’’

स्पष्ट है कि कविता हो अथवा गीत, दोनों में मानवता की विराट् भावभूमि को स्पंदन अनुस्यूत होता है. अशोक अंजुम एक प्रातिभ रचनाकार हैं. व्युत्पत्ति और अभ्यास से समन्वित उनकी प्रतिभा जब काव्य की मनोभूमि में विचरण करती है, तब भावप्रवणताजन्य माधुर्य की संसृष्टि होती है. गीत के संदर्भ में अपने प्रथम ‘गीत-संग्रह’ ‘एक नदी प्यासी’ में ‘अंजुम’ ने गीत को सुपरिभाषित किया है-

‘‘गीत क्या है-

रोशनी का घट,

या कि डोरी पर थिरकता नट.

सांस का संगीत है ये

धड़कनों की ताल है,

एक परिचित गंध वाला

रेशमी रूमाल है.’’

‘कहां हो तुम?’ अशोक अंजुम का दूसरा गीत-संग्रह है, जिसमें उनके विविधवर्णी भाव-चेतना के पुष्कल स्वरों को नवीनता का समावेश भी है. प्रायः गीत कोमल भावनाओं का संवाहक माना जाता है, जिसमें प्रेम की पीर का सौंदर्यबोध उद्भासित होता है. अशोक ‘अंजुम’ ने गीत को सीमाओं से बाहर किया है. कोमल भावनाओं के साथ-साथ जीवन-यथार्थ का हर पहलू उनके गीतों में है. गीतकार के मन में एक ऐसी पीड़ा है, जो निराशा और हताशा को द्योतित न करते हुए आस्था और विश्वास के स्वरों को उद्गीरित करती है. ‘अंजुम’ के इस संग्रह में उनके व्यक्तिगत संदर्भ पूरी ईमानदारी के साथ अभिव्यक्ति हुए हैं. संग्रह का पहला गीत ‘कहां हो तुम?’ औत्सुक्य संचारी का जागरण करता हुआ चौंकाता है. इस गीत के आधार पर संग्रह का नामकरण हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि अंजुम के इस गीत के अपने प्रिय आलंबन के बिछुड़ने का गम है, जो विविध बिम्बों एवं प्रतीकों में भासमान है-

‘‘हो रहा है मन बहुत व्याकुल,

कहां हो तुम?

जी नहीं लगता कहीं बिल्कुल,

कहां हो तुम?

है बहुत कुछ पास

फिर भी कुछ नहीं है,

जिंदगी की झील में

काई जमी है,

थरथराता प्राण का ये पुल,

कहां हो तुम?’’

इस संग्रह में ‘कहां हो तुम?’, ‘संवाद नहीं रहता’, ‘उत्तर नहीं मिले’, ‘क्या-क्या तुमको याद दिलाऊं’, ‘याद रखना’ उत्कृष्ट वैयक्तिक गीत हैं, जिनमें गीतकार के पीड़ाजनक स्वर हैं. इन गीतों में पद-सौकुमार्य एवं भाव-प्रखरता का सामंजस्य है. गीत भावों की रसधारा के अजस्र स्रोत हैं. ‘क्या-क्या तुमको याद दिलाऊं’ गीत में गीतकार का प्रेम के आलंबन के प्रति निष्ठावान विवेक, चाक्षुष बिम्बों, स्पर्श्य बिम्बों के माध्यम से घनीभूत हुआ है. इस गीत में ‘अंजुम’ की प्रतिभा श्लाघ्य है-

‘‘क्या-क्या तुमको याद दिलाऊं.

भूल गए चुपके-चुपके पिछवाड़े आना,

और मौन की भाषा से सब कुछ कह जाना,

भूल गए अंगुली से लिखना नाम रेत पर,

पकड़ के कहना हाथ, साथ छूटे न उम्र-भर,

दृष्टि फेरकर जाना अब कैसे सह पाऊं!?

क्या-क्या...’’

इस गीत-संग्रह में विविधवर्णी भाव-चेतना को वैचारिक आयाम देने का सारस्वत प्रयास किया गया है. गीतकार ने पर्यावरण-संरक्षण के प्रति अपनी नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा का परिचय दिया है. इस संदर्भ में ‘बीमार है गंगा’, ‘निर्मल तुम बहती ही रहना’, ‘गुनगुनाती नदी’, ‘जल जीवन है’, ‘एक बूंद पानी की’ गीत उत्कृष्ट हैं. इसके साथ ही देश की अस्मिता के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाले शहीदों के प्रति श्रद्धा का प्राकट्य भी ‘अंजुम’ के गीतों में पाया जाता है. उनके गीतों में राष्ट्रीय भावधारा की स्रोतस्विनी का प्रवेग स्पंदित होता है, जिसमें व्यक्तिवाद, अहंवाद से ऊपर उठकर देशानुराग की अनन्त रागमयी स्थितियों का चित्रांकन है. ‘उन शहीदों को नमन’, ‘मेरे प्यारे वतन’, ‘देश मेरे’ इस संदर्भ में स्मरणीय गीत हैं. उन के कुछ गीतों में व्यंग्य की वक्रोक्तिपरक व्यंजना क्रांतदर्शिता के समन्वय से रमणीय हुई है. यह रमणीयता, गीतों को न्यूनता प्रदान करती है.

कहा जा सकता है कि अशोक ‘अंजुम’ के गीतों में जीवन को ऊर्जा प्रदान करने वाली प्रगतिशील चेतना का डिण्डिम निनाद है. लोकधर्मी चेतना से ‘अंजुम’ का तादात्म्य घनीभूत संवेदना के साथ सम्पृक्त है. हिंदी के उत्थान और काव्य-साधकों के प्रति ‘अंजुम’ का प्रेम एक नए तेवर के साथ मुखरित हुआ है. हिंदी के संवर्द्धन और सम्मान के प्रति ‘अंजुम’ का ‘हिंदी-गीत’ मिश्रित छंद की बानगी है. हिंदी के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को ‘अंजुम’ कटूक्तियों और व्यंग्योक्तियों से तिरस्कृत करते हैं, जिस के कारण उनके कथ्य का उदात्तबोध न केवल अभिनंदनीय बन जाता है, बल्कि अपनी भाषा के प्रति सम्माननीय भी बनता है. लयात्मक अनुसंधान, प्रतीक-बोध तथा प्रतीयमान अर्थ की सशक्त व्यंजना करने वाले इनके अधिसंख्य गीत पाठकों को रसार्द्र करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है. ‘अंजुम’ के गीतों पर गर्व किया जा सकता है.

सम्पर्कः पी.सी. बागला (पी.जी.) कॉलेज,

हाथरस (उ.प्र.)

मो. 09897172160

समीक्षित गीत-संग्रह : ‘कहां हो तुम?’

गीतकार : अशोक ‘अंजुम’

प्रकाशक : सरस्वती प्रकाशन, ‘सारस्वत’, 1, बी.एन. छिब्बर मार्ग, देहरादून-248001

प्रथम संस्करण : 2016

मूल्य 150

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