शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

शब्द संधान - लकीर/ लीक/ अलीक - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

लकीर को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि इसकी लम्बाई तो होती है किन्तु चौडाई या मोटाई नहीं होती। कागज़, स्लेट आदि, पर खींचा हुआ ‘लंबा निशान’ लकीर कहलाता है। ज़मीन पर उंगली आदि, से बनाई गई लम्बी रेखा भी लकीर है। सांप के रेंगने से जो निशान पड़ता है वह लकीर है, गाड़ी के पहिए के चलने से जो निशान बनता ही, वह भी लकीर ही है। बराबर एक ही रास्ते पर चलने से जो लकीर बन जाती है वह ‘पगडंडी’ के रूप में जानी जाती है। आयु बढ़ने से व्यक्ति के चहरे पर जो लकीरें पड़ जाती है, उन्हें ‘झुर्रियां’ कहा गया है। ‘लकीर पड़ना’, निशान पड़ना है। वह निशान सांप के चलने से पड़े या आदमी के चलने से, गाडी के पहिए से पड़े या वक्त के साथ चहरे पर पड़े, लकीर छोड़ जाता है। किसी-किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व इतना प्रभाव- शाली होता है कि उसकी ‘छाप’, एक अमिट लकीर, हमारे मन में स्थाई रूप से पड़ जाती है। लकीर कभी न चाहते हुए भी खिंच जाती है तो कभी जानबूझ कर खींच दी जाती है। बड़ी लकीर को छोटा करने के लिए अपेक्षाकृत उससे भी बड़ी लकीर खींचना पड़ जाती है। हिन्दी में लकीर से कई अर्थ ग्रहण किए गए हैं।

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‘लकीर खींचना’ एक लंबा निशान लगाना तो है ही, सीमारेखा तय करना भी हैं। लक्ष्मण ने लकीर खींच कर सीता जी के लिए एक सीमा रेखा तय कर दी थी। लकीर खींचना मर्यादा रेखांकित करना है। हद निर्धारित करना है। हद को पार करना “लकीर पार करना” है। सामान्यत: लोग ‘लकीर से परे’ नहीं देख पाते। वे “लकीर के फकीर” बने रहते हैं। एक ही ढर्रे पर चलते रहते हैं| लोक-रीति, रस्म रिवाज, पुरानी रूढ़ियों की तय लकीर पर चलते रहते हैं। रूढ़ियों के अंध अनुगामी होते हैं। ‘लकीर पीटते रहते’ हैं। लकीर प्रारब्ध-लेख है। ‘हाथ की लकीर’ मिटाई नहीं जा सकती। अनुवांशिकता, पैतृकता, वंशक्रम की भी एक लकीर होती है। लकीर क्रम है, तरतीब है, क़तार है। ‘पत्थर की लकीर’ वह लकीर है जो मिटती नहीं।

लकीर का ही संक्षिप्त रूप शायद “लीक” हो। लीक कहें या लकीर,कोई अंतर नहीं पड़ता। ‘लकीर पर चलना’ और ‘लीक पर चलना’ बात एक ही है। ‘लकीर पीटने’ को ‘लीक पीटना’ भी कह सकते हैं। लीक खींचना और लकीर खींचने में भी कोई अंतर नहीं है। ‘लकीर का फकीर’ कहें या ‘लीक का फकीर’ अर्थ एक ही है। लेकिन मुहावरों में लीक और लकीर के बीच कभी कभी फर्क भी देखा जा सकता है। लीक जहां परम्परा के अर्थ में लगभग रूढ़ हो चुका है, लकीर इस अर्थ में बहुत ही कम प्रयुक्त होता है। “काजल की कोठारी में कैसो ही सयानो जाय, एक लीक काजल की लागि है सो लागि है” –इस मुहावरे में ‘लीक’ की जगह ‘लकीर’ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

लीक से हट कर काम करना बड़ा कठिन काम है। हम न सिर्फ लीक पर चलने के आदी हो जाते हैं, बल्कि दूसरों को भी उसी रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करते हैं। लेकिन एमर्सन का कहना है, वहां मत जाओ जहां रास्ता ले जाता है, बल्कि अपने निशानों को छोड़ते हुए वहां जाओ जहां कोई रास्ता नहीं है। बाद में दुनिया उन्हीं निशानों पर चलती है। पर बिरले ही लीक के पार देख पाते हैं और नई लीक डाल पाते हैं।

एक लीक अंग्रेज़ी में भी है – leak . लेकिन इसका हिन्दी के लीक से कोई लेना देना नहीं है। इसका अर्थ रिसना है। लेकिन पानी ही लीक नहीं करता। गुप्त बातें भी लीक कर जाती हैं। पेपर्स लीक कर जाते हैं।

हिन्दी में लीक यदि परम्परा पर चलना है तो “अलीक”, वह है जो परम्परा से हटकर हो। लीक से अलग चलना हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा गया है। अपरम्परागत हर व्यवहार को सामान्यत: सही नहीं माना जाता। इसीलिए ‘अलीक’ का अर्थ झूठ, मिथ्या और अप्रतिष्ठित आचरण से लगाया गया है। अलीक अवांछनीय है, अप्रिय है। मनगढ़ंत है। अवास्तविक, अयथार्थ है। शंकराचार्य ने अपने अद्वैत वेदान्त में सत्ता के चार स्तर बताए हैं। पूर्ण-वास्तविकता तो ब्रह्म है। इसे परम सत्ता कहा गया है। इसके बाद व्यावहारिक सता है। व्यावहारिक सत्ता तब तक सत्य है जब तक हम परम सत्ता प्राप्त नहीं कर लेते। तदुपरांत प्रातिभासिक सत्ता है, यह भ्रम और स्वप्न की सत्ता है। जब तक भ्रम या स्वप्न टूटता नहीं प्रातिभासिक सत्ता सत्य बनी रहती है। और अंत में,“अलीक” है। यह सत्ता का वह स्तर है जिसमें सत्य नाम-मात्र के लिए भी नहीं होता। जैसे गधे के सर पर सींग। जैसे ब्रह्म परम सत्ता है उसी तरह “अलीक” परम असत्य है।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा, (मो. ९६२१२२२७७८ ) १०, एच आई जी, १ सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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