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शब्द-संधान - रेत / बालू - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

उर्दू का एक शेर है –

कभी रेगे-रवां से प्यास बुझ जाती है रहरौ की कभी दरिया के हाथों तश्नगी तकसीम होती है

( रेगिस्तान में बालू की लहरें उठती हैं और उन्हें देखकर पानी का गुमान होता है | यह पानी का गुमान ही कभी कभी राहगीरों की प्यास बुझा जाता है | लेकिन कभी ऐसा भी होता है कि दरिया को देखकर, जहां सचमुच पानी होता है, प्यास और बढ़ जाती है | यानी, नदियां भी बजाय प्यास बुझाने के प्यास बांटती देखी जा सकती हैं | )

इस शेर में एक पद-बंध आया है “रेगे रवां” | रेगे रवां का जो ‘रेग’ है, वही हिन्दी में ‘रेत’ है | रेग से ही रेगिस्तान बना है | इसी से बालू वाला कागज़,रेगमाल, भी आया है जिसे रगड़ कर लकड़ी आदि, पर खुरदरापन दूर किया जाता है | फारसी का रेग हिन्दी में आते आते रेत हो गया | बेशक, संस्कृत में एक शब्द रेत(स) है | लेकिन रेत(स) का अर्थ रेत न होकर, वीर्य, जल और पारे से है | बालू को रेतस नहीं कहते | बालू के लिए संस्कृत में ‘रेणु’ शब्द है | पर लगता है रेत की व्युत्पत्ति रेणु से न होकर फारसी के रेग से ही हुई है | रेणु को बालू के अर्थ में अलग से हिन्दी में अपना लिया गया है | हिन्दी में रेत, रेग का ही बिगड़ा हुआ रूप लगता है |

रेत कहें या रेती बात एक ही है | लेकिन रेती, एक अलग अर्थ में भी प्रयुक्त होने वाला शब्द है | रेती लोहे का एक औज़ार भी होता है जिसे रगड़ कर कोई वस्तु काटी या चिकनी की जाती है | रेती में छोटे छोटे रेत-समान दांते होते हैं ,इसीलिए इसे रेती कहा गया है | गला रेतना गला काटना है | धीरे धीरे रगड़ कर जब कोई चीज़ काटी जाती है तो उसे रेतना कहते हैं |

रेत बहता नहीं | रेत की बहने वाली नदी एक असंभव चीज़ है | लेकिन नदी या समुद्र तट पर रेतीली या बलुई भूमि ज़रूर होती है | इराक़ से पिछले दिनों एक खबर आई थी कि वहां “रेत की नदी” बहते देखी गई | जिस तरह रेत से उठती “लहरें’ दूर से पानी का भ्रम पैदा करती हैं (मृग तृष्णा )उसी तरह तथाकथित रेत की नदी भी एक भ्रमात्मक संघटना है | वैज्ञानिकों के अनुसार रेगिस्तानी इलाकों में कभी कभी तेज़ बारिश और ओले गिरते हैं | इस दौरान तापमान बहुत कम हो जाता है | किसी ऊपरी इलाके में अगर बहुत ज्यादह ओले गिरे हों तो वे एक साथ मिलकर रेत पर पानी की तरह बहने लगते हैं | इन ओलों में रेत के कण चिपके होते हैं जिनसे लगता है मानो रेत बह रही हो | इसी को रेत की नदी कहा गया है |

लिपट जाते हैं जब ओले बालू से, रेत की नदी का गुमाँ होता है बहुत अजीब तो होता है लेकिन ये नज़ारा बड़ा खुशनुमा होता है !

रेत की नदी एक भ्रम है | लेकिन “रेत के टीले” बेशक होते हैं | एक ही जगह तमाम रेत इकट्ठा हो जाने से रेत के टीले बन जाते हैं | किन्तु ये भी स्थाई नहीं होते जल्द ही ढह जाते हैं | अल्प-कालिकाता के लिए हिन्दी में कई मुहावरे और उक्तियाँ प्रयोग में आती हैं | पानी के बुलबुले की तरह ‘बालू की भीत” और “रेत की दीवार” भी ऐसी ही उक्तियाँ हैं | रेत पर नाम लिखना भी अल्पकालिक ही होता है – रेत पर नाम कभी लिखते नहीं / क्योंकि रेत पर नाम कभी टिकते नहीं || लेकिन फिर भी लोग काल्पनिक महल बनाने से बाज़ नहीं आते | भले ही ये ‘रेत के महल’ ही क्यों न साबित हों |

कहते हैं बारहवीं शताब्दी में सन्यासियों द्वारा “ रेत-घड़ी” का प्रयोग आरम्भ हुआ था | कभी समुद्र के यात्री समय की जानकारी के लिए रेत-घड़ी का ही इस्तेमाल करते थे | ये रेत-घड़ियाँ आज भी यदा-कदा देखने को मिल सकती हैं |

और अंत में , हमारे मिथकों में नरक लोक में एक “रेत-कुंड” है जिसमें नरक भोग के लिए व्यक्ति को डाल दिया जाता है |

डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो.) ९६२१२२२७७८ १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद - २११००१

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