बुधवार, 14 दिसंबर 2016

उड़िया कहानी / चाची / प्रदोष मिश्र

चाची

मूल - प्रदोष मिश्र

भाषान्तर - सुरभि बेहेरा

गुंजा मालवे

भैया की चिट्ठी पढ़ते ही मन अशान्त हो गया था ।

प्रिय टुनू,

कल रात अचानक चाची हम सभी को छोड़कर चली गयी । लगातार पिछले कई दिनों से वे अपनी बीमारी से जूझ रही थीं । उन्हें बिस्तर से उठना भी मुश्किल हो गया था । पेशाव-पाखाना के लिए भी उठ नहीं पाती थी । एक तरह से अच्छा ही हुआ जो ईश्वर ने उन्हें मुक्ति दे दी । कल रात उनका निधन कब हुआ किसी को पता ही नहीं चल पाया । सुबह भी काफी देर बाद उनकी मौत की जानकारी मिली ।

यदि तुझे कोई परेशानी नहीं है तो आने की कोशिश करना । अपनी मौत से एक-दो दिन पहले तुझे बहुत याद कर रही थी । चिट्ठी पाते ही सिर धोकर स्नान कर लेना और बच्चों को भी स्नान करने के लिए कहना ।

अगर किसी कारणवश नहीं आ पाये तो ग्यारहवें दिन मंदिर जाकर चरणामृत गृहण कर लेना ।

ब्राह्मण धागा भी बदल देना । शेष मिलने पर ।

इति - भैया

हठात् ऐसी खबर पढ़कर मेरा मन भीतर से टूट गया । सिर्फ इस बात के लिए नहीं कि चाची की मौत हो गयी । बल्कि उनका चले जाना तो उनके हित में ही था । इतने कष्ट झेलने से अच्छा मृत्यु हो जाना ही उनके लिए बेहतर था । परन्तु मेरे स्मृतिपटल में कई सारे मृतकों की घटनाएं ताजी होकर मुझे परेशान किए जा रही थीं । वे सभी विभिन्न रूप लेकर मेरे आस-पास मंडराते जा रहे थे ।

चिट्ठी पढ़कर मैं किंककर्त्तव्यविमूढ़ होकर बैठ गया । मुझे लगा जैसे मैं सचमुच रो पड़ूँगा, जिस तरह मेरी बेटी इनू को उसके दोस्त चिमटी काट देने पर वह रो पड़ती है । लेकिन मेरी उम्र और स्थिति को नजर में रखकर मैं अपने अन्दर की पीड़ा को दमन करने की कोशिश कर रहा था ।

अचानक मेरे बेटे ने घर के अन्दर प्रवेश किया । मुझे इस तरह बैठे देख उसने न जाने क्या समझकर अपनी मम्मी को जोर से आवाज लगायी, मम्मी देखिए तो, डैडी को क्या हो गया है ? शायद रो रहे हैं ।'

मेरी पत्नी तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल रही थी । उसकी चीत्कार सुनते ही दौड़ते हुए आकर पूछने लगी, क्या हुआ है आपको ? किसकी चिट्ठी आयी है ? '

- मैंने चिट्ठी उसके हाथों में थमाते हुए कहा, चाची चली गयी ।'

उसने चिट्ठी पर तिरछी नजर डालते हुए झट से फाड़ दिया । अशुभ खबर को पढ़ते ही फाड़ कर फेंक दिया जाता है । रूना और इनि एक लय से मम्मी के चेहरे को देखते रहे ।

- क्या हुआ ? रूना ने जिज्ञाशावश पूछा ।

- छोटी माँ चली गयी । उनकी बहुत उम्र हो गयी थी न ? हाँ, शायद नब्बे वर्ष पार कर चुकी थी ।

मैंने समझाते हुए कहा ।

किशोर उम्र में जाने वाले बेटे के मुँह से हठात् निकल पड़ा, ओह ठू मच'। भारतवर्ष में मृत्यु की उम्र लगभग पचास वर्ष है । उन्होंने तो बहुत लम्बी आयु तक जी लिया ।

हाँ बेटा, लम्बी आयु तक जीने से अच्छा तो मर जाना ही बेहतर है । किसी पर बोझ बनने से तो अच्छा ही है । इसके अलावे बहुत दिनों से वे घिसट-घिसटकर ही जिन्दगी जी रही थीं । खाने-पीने से लेकर पेशाव-पाखाने के लिए भी उन्हें उठाकर ले जाना पड़ता था । वे चली गईं तो एक तरह से सभी के लिए अच्छा ही हुआ । इतना कहते-कहते मेरी आँखों से आँसू बहते जा रहे थे । वे लोग क्या कह रहे थे मुझे सुनने की इच्छा भी नहीं थी । रूना मेरी और देखकर हँसते हुए कहने लगा, देखो तो मम्मी, डैडी इतने बड़े होकर भी रोये चले जा रहे हैं ।'

मुझे रोता-बिलखता देख मेरी बेटी इनि मेरे करीब आ गयी । डैडी भी कभी रो सकते हैं, ये उसे विश्वास नहीं हो रहा था । वह अपने स्कूल बैग से रूमाल निकालकर मेरी आँखों को पोंछते हुए खुद रोने लगी । उसका बहुत ही नरम दिल की है । मेरे शान्त होने से पहले बेबी कहने लगी, इस्स ! क्या छोटे बच्चे की तरह रो रहे हैं ? बच्चों के सामने भी आपकी आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं । आखिर ऐसा भी क्या हो गया ?

बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार हो चुके थे । आज रूना और इनि की परीक्षा थी । उनके स्कूल जाने से पहले ही पोस्टमैन को चिट्ठी देनी थी, पंद्रह मिनट बाद आने से नहीं होता? ऐसी खबर सुनने के बाद किसी अच्छे काम के लिए निकलना सही है क्या ? इतनी उम्र होने के बाद भी इनमें समझने की शक्ति ही नहीं है । कुछ देर के लिए इस बात को अपने तक सीमित भी तो रख सकते थे ?

बेबी ने पानी कलश को दरवाजे पर रखते हुए कहा, बच्चों तुमलोग जाओ, तुम्हें देरी हो जाएगी ।

- जब चिट्ठी मिल ही गयी है तो बच्चों के सिर पर थोड़ा पानी का छिड़काव कर दो ।

- अभी नहीं, परीक्षा से लौटने के बाद । ठण्ड के दिनों में कपड़े भीग गये तो जल्दी सूख नहीं पायेंगे । उनकी तबीयत खराब हो सकती है । परीक्षा में बैठने के लिए मन का अच्छा होना भी जरूरी है ।

मेरे मन को शान्ति नहीं मिली इसलिए मैंने जाते-जाते उनके सिर पर पानी का छिड़काव कर दिया । मुझे ऐसा करते देख बेबी गुस्से से लाल हो गयी । अभी पंद्रह दिन तक भाइरल फीवर से परेशान होकर ठीक हुई है । नहा-धोकर स्कूल जाने से पहले ऐसी खबर --- ।

- मैं अभी स्नान करने की हालत में नहीं हूँ । आपको तो मेरी तबीयत के बारे में पता ही है । इसके अलावे आज इतने दिनों बाद स्कूल ज्वाइन की हूँ । स्कूल जाने का समय भी हो गया है । आप मुझे स्कूल छोड़ दीजिए । इतनी मुश्किल से तैयार हुई थी, अब दोबारा कपड़े नहीं बदलने हैं ।

- आज छुट्टी ले लेने से नहीं होता ? मैंने अपनी राय जतायी ।

- आज ज्वाइन नहीं करने पर कल शनिवार पड़ जाएगा । परसों तो स्कूल की छुट्टी है । मेरी छट्टी कट जाएगी । इसके अलावे इतना भावुक होने की जरूरत नहीं है । जिन्हें जाना था वो तो चली गईं । कुछ कम उम्र में तो नहीं गयीं ? बिस्तर में पड़ी हुई थी उनका चला जाना सभी के लिए अच्छा ही हुआ । इसके लिए सारे काम बन्द कर बैठ जाने में कहाँ की समझदारी है ? वह कौन सी हमारी अपनी माँ थी ? उनके लिए तो उनके दो-दो बेटे हैं ही ।

- रहने दो बेबी, और कुछ मत कहो । मैंने उसके उलाहना भरे शब्द सुनकर कहा । सुबह के दस बज चुके थे । मेरे खुद के लिए भी समय की कमी थी ।

मुझे स्कूल छोड़ दीजिए । आपके पास बहुत समय है । वापस घर आकर सिर धोकर नहा लेना ।

दोबारा नहाने से मेरी तबीयत खराब हो जाएगी । स्कूल से लौटने के बाद मैं सिर में पानी का छिड़काव कर लूँगी । बेबी ने तिरछी नजर से उनकी ओर देखते हुए कहा ।

उनके मन में न जाने क्या विचार आया, नाक-भौं सिकोड़कर टंकी के पानी से हाथ भिगोकर धीरे से सिर पर फेर दिया । मानो चाची की आत्मा उनके भीगे हाथों के प्रलेप का इन्तजार कर रही थी । बेबी गुस्से से लम्बी-लम्बी डग मारते हुए बाहर निकल गयी ।

एक मजबूर पति का अनुगमन कर मैंने गाड़ी बाहर किया । अतीत की यादों को गठरी में बाँधकर उसे स्कूल छोड़ने के लिए जाना ही पड़ा । घर लौटने तक करीब डेढ़ बज गये थे । नहा-धोकर कारखाने तक पहुँचने में बीस मिनट तो लग जाएंगे । मन ही मन गुस्से से आग-बबूले हुए जा रहे थे । यह जीवन भी एक मशीन की तरह बन गया है, जिसका हर क्षण माप-तौल कर चल रहा है । जिसे जीवन में जरा सी उतार-चढ़ाव का सुयोग भी नहीं मिल पाता है ।

बेबी को स्कूल छोड़कर लौटते वक्त बेहेरा बाबू के साथ मुलाकात हो गयी । चाहकर भी उनसे पीछा छुड़ाकर नहीं आ पाया । बेवजह उन्हें कई बातें सुनाने का मौका मिल जाएगा । मेरे कुछ सोचने से पहले उन्होंने आवाज लगायी, दास बाबू, जरा सुनिए तो ! इतने अधिक सामान लेने में मुझे दिक्कत हो रही है । आपकी तो बी शिफ्ट है, जरा मदद कर दीजिए ।'

मैं क्या कर सकता हूँ ? बैग भरकर सामान है, यह कैसे जा पाएगा ? कल डिपार्टमेंट की तरफ से पिकनिक है । मैं तो भूल ही गया था । दरअसल, मैं थोड़ा परेशान हूँ । मेरी चाची का देहान्त हो गया है ।

इसलिए मैं कहीं नहीं जा सकता । मैंने उदास होकर कहा ।

- ओह् सैड ! अच्छा छोड़िए, वह तो गाँव में रहती थीं । आप यहाँ रहकर क्या शोक पालन करेंगे ? वही बूढ़ी औरत न जो कुछ दिन पहले आपके यहाँ आयी हुई थीं ? बेहेरा बाबू ने अपने मन की बात कही ।

- हाँ, वही मेरी चाची थी । मैंने जवाब दिया ।

- इसमें परेशान होने वाली कौन-सी बात है ? जिसकी उम्र हो गई उसे एक न एक तो दिन जाना ही है । छोड़िए, इन सब बातों को और बस्ता पकड़ने में मेरी मदद कीजिए । अभी हमारे पास और भी कई काम हैं । इन सारे कामों में हमारा साथ नहीं देंगे तो कल वाली पिकनिक को बन्द करना पड़ेगा । वटबाबू ने अपना सुझाव दिया ।

उनके पास कोई उपाय नहीं था । बस्ता पकड़कर स्कूटर के पीछे बैठते हुए कहने लगे, कल की पिकनिक के लिए मुझे माफ कीजिए । मैं नहीं जा पाऊँगा ।

- जब आपको अभी गाँव नहीं जाना है तो पिकनिक जाने में क्या मुश्किल है ? पैसे तो दे दिये गये हैं फिर बच्चों की खुशियों में बाधा क्यों डाल रहे हैं । आजकल जमाना बदल गया है, पुरानी परम्परा धीरे-धीरे बदलने लगी है । पिछले साल मेरे पिताजी की मौत को एक महीना भी नहीं गुजरा था पर आपलोगों ने मुझे होली खेलने के लिए तो मजबूर कर ही दिया ? पुरानी प्रथाओं में परिवर्त्तन लाना भी जरूरी है । आप मांसाहारी की जगह शाकाहारी भोजन ही कीजिएगा । बेहेरा बाबू ने अपनी राय देते हुए कहा ।

- इनलोगों के साथ बहस करके कोई फायदा नहीं होने वाला था । इनके लिए खाना ही बहुत जरूरी है । किसी के मन के अन्दर झाँकने की किसे फुरसत है ? उनके चंगुल से छुटते ही सुभाष बाबू के साथ मुलाकात हो गयी ।

- हे भगवान ! रास्ते में इतने सारे लोग क्यों मिल जाते हैं ? वह भी ऐसे समय में ।

- सर नमस्कार, स्कूटर को फिर रोकना पड़ा ।

- अरे ! मि० दास, मैं आपको ही खोज रहा था । आपके सन्दर्भ को लेकर कोई मुश्किल आ गयी है । मैं सुभाष सर के अधीन गवेषणा कर रहा था इसलिए वे लेखन के सन्दर्भ में कुछ कहना चाह रहे थे ।

- मैं अभी बहुत परेशान हूँ । मुझे जल्दी घर जाना है । दरअसल, मेरी चाची का देहान्त हो गया है । मैंने अपनी भावनाओं को व्यक्त करना चाहा ।

- ओहो ! मुझे माफ करना । क्या यह हादसा यहाँ हुआ है ?

- नहीं, मेरे गाँव में ।

- अच्छा ! इसमें परेशान होने वाली कौन-सी बात है । गाँव जाने के लिए तो रात दस बजे तक बस चलती ही है ।

- नहीं, सर मैं गाँव नहीं जा रहा हूँ ... परन्तु ... ।

- ठीक है फिर समय निकालकर घर आओ । लाईब्रेरी से दो किताबें भी लेते आना । इतना कहकर उन्होंने एक कागज में कुछ लिखकर मेरे हाथों में थमा दिया । मुझे कागज देखने की भी फुरसत नहीं थी ।

घर पहुँचने पर दरवाजे पर गैस वाला खड़ा मिला । रसीद काटकर तथा पैसे देकर उससे छुटकारा पाने तक दोपहर के डेढ़ बज चुके थे । आफिस से छुट्टी लेना मुश्किल था फिर भी नहाने जाने से पहले मन में विचार आया कि ऑफिस में कुछ कहकर छुट्टी ले ही लेता हूँ ।

गाँव में चाची का देहान्त हो गया है । उस पर गाँव जाना भी नहीं है । यह सुनकर तो छुट्टी मिलेगी नहीं । बल्कि कोई दूसरा बहाना करना होगा । कुछ सोचने से पहले ही टेलिफोन की घंटी बज गयी । हेलो सर ! मैं घर पर नहीं था, अभी ही पहुँचा हूँ, जल्दी ही ऑफिस पहुँच रहा हूँ ।

इस बीच कई बार फोन आ चुके थे । मशीन खराब होने की वजह से उत्पादन बन्द हो चुके थे ।

बेवजह ऑफिसर से गाली सुननी पड़ी । अब तक घर पर नहीं थे तो कहाँ थे ? यदि कहीं जाना ही था तो हमें सूचित क्यों नहीं किया । इस तरह की दायित्वहीनता मुझ जैसे ऑफिसर से उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी ।

इतनी सारी हिदायद सुनने के बाद मेरे दिमाग से छुट्टी लेने वाली बात नदारत हो गयी । चाची को याद कर उनसे माफी माँग ली । सुबह से पता ही नहीं चल पाया कि दोपहर के दो कैसे बज गये, झटपट शर्ट-पैंट पहनकर मैं ड्यूटी के लिए निकल पड़ा । एक बार काम में व्यस्त हो जाने के बाद अतीत की यादें अपने-आप धूमिल हो जाती हैं । चाची की यादें भी कुछ पल के लिए मेरे स्मृतिपटल से खो सी गयी थी । मशीन की खट-खट शब्द के बीच उनकी यादें भी अजनबी की तरह दूर हो जाती,पर वापस घर लौटने पर दोबारा जेहन में हाजिर हो जाती ।

घड़ी में नजर पड़ी तो रात के बारह बज रहे थे । दूसरे कमरे से टेपरिकार्ड बजने की आवाज सुनाई दे रही थी । आज ही बच्चों की परीक्षा खत्म हुई थी और कल पिकनिक जाने का प्रोग्राम था । अब तक डैडी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे । कल की पिकनिक में क्या-क्या करना है शायद उसी की चर्चा करनी होगी ।

छोटी बेटी इनि की आँखें अनजाने में झपकती जा रही थी फिर भी वह दृढ़ मन से डैडी के आने का इन्तजार कर रही थी । उसे डैडी को परीक्षा तथा और भी कई छोटी-बड़ी समस्याओं को बताना था ।

बिना चिन्ता किए गहरी नींद में बेबी के नाक बजते जा रहे थे । हल्की पवन से गौरेया पक्षी के घोंसले को टूटने का डर भी तो नहीं रहता है । भाइरल फीवर के बाद वह कमजोर भी हो गयी है । इसके अलावा मेरी तरह एक कम्पनी में काम करने वाला व्यक्ति, जिसके आने-जाने का कोई निश्चित समय नहीं हो,

उसके लिए एक आदर्श गृहणी बनना कैसे सम्भव हो सकता है ? यहाँ तो पूरे परिवार की दिनचर्या ही ऐसी बन गयी है । मेरे सिर और कान ठण्ड के कारण जड़वत हो गये थे । सिर दर्द से फटा जा रहा था । घर से जाते वक्त गर्म कपड़े ले जाना भूल गया था । भूख से पेट में जलन होने शुरू हो गये थे, सुबह से अब तक उपवास ही रह गया था ।

मेरी आवाज सुनते ही दूसरे कमरे से रूना दौड़ते हुए आकर कहने लगा, डैडी, हमारी परीक्षा के बाद का प्रोमिस तो आपको याद ही होगा ? मम्मी ने मुझे एक वाकिंग गिफ्ट, और इनि के लिए फ्लाइंग डिस्क दिया है । आपने भी जो वायदा किया था उसे देना पड़ेगा, वर्ना कल वाली पिकनिक में मजा नहीं आयेगा ।'

मैंने उनसे क्या वायदा किया था, उसे याद कर पाने की हालत मेरी नहीं थी । कपड़े बदलते हुए मैंने कहा, इनि ! जरा मम्मी को बुलाओ तो ।' गरम पानी कर देगी तो मैं नहा लूँगा । सुबह से खबर सुनकर भी नहाने का समय ही नहीं मिल पाया ।

दूसरे कमरे से बेबी की आवाज आयी, क्या निमोनिया होने का विचार है क्या ?' पूरे शहर का उत्ताप तीन डिग्री हो गयी है इतना तो जानते ही हैं न ? इतने पुराने ख्याल रखने से कैसे चलेगा । हाथ-पैर धो लीजिए, सिर में बिल्कुल भी पानी नहीं दीजिएगा ।

मैंने पानी की टंकी में अपना हाथ डालकर देखना चाहा । बहुत ज्यादा ठण्ड छूना भी मुश्किल था ।

मैंने पानी छूकर केवल सिर को सहला दिया ।

इनि ने पूछा, डैडी ! आप खाना नहीं खायेंगे ?'

- नहीं ! आज मैं तुम सभी से गुस्सा हूँ ।

- ऊँ हूँ ! आप इतने बड़े होकर क्यों गुस्सा होंगे ? उसे डैडी की बातों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ । आपको कोई क्यों गाली देगा या फिर क्यों मारेगा ? इनि ने पूछा ।

- सुन ! आज से बहुत पहले मुझे भी किसी ने मारा था । इतनी मार पड़ी थी कि मेरी पीठ से खून निकल पड़े थे ।

- ओहो ! किसने मारा था ? आपके सर ने ? मासूम दिल की जिज्ञासा बढ़ने लगी ।

- नहीं, मेरे पिताजी ने मारा था ।

आपने जरूर कोई बदमाशी की होगी न ?

- नहीं, मैंने उस दिन नहाया नहीं था । बहुत ठण्ड थी इसलिए मैंने झूठ कह दिया कि मैं नहा लिया हूँ ।

- उसके बाद क्या हुआ ? इनि उत्साहित हुए जा रही थी ।

- पिताजी ने मुझे घर से बाहर कर दिया और कहा कि कुँए की पानी से नहाकर गीले कपड़ों में आओगे तभी खाना मिलेगा ।

- आप गये थे डैडी ?

- नहीं, मैंने उनकी बात नहीं मानी ।

- तब आपने क्या किया ? वह मेरे चेहरे के हाव-भाव को एकटक देखे जा रही थी ।

- मैं चाची के पास चला गया । चाची हमारे सामने वाले घर में रहती थी । उनके अपने बेटे बाहर रहते थे । उस वक्त उन्होंने मुझे भात के साथ बैगन की चटनी और पापड़ खाने दिया । उन्होंने मेरे हाथ-पैर सहला दिये और मुझे अपने पास ही सुलाया । कटे हुए घाव में गेंदे का रस लगा दिया । पर उस दिन वह खुद उपवास रह गयीं ।

- क्यों डैडी ? उन्होंने ऐसा क्यों किया ? इनि सजल हो गयी ।

- उनके पास खाने के लिए कुछ बचा ही नहीं ? मैं पेटू तो सब कुछ खा लिया था ।

- डैडी आपने आधा क्यों नहीं खाया । आप सेलफिस हैं ? उसके बाद क्या हुआ ?

- दो दिन तक सभी मुझे ढूँढते रहे । पिताजी खोज-खोजकर थक गये । माँ का रो-रोकर बूरा हाल होने लगा, तब जाकर चाची ने मुझे सब के सामने हाजिर किया ।

- वाव ! कितना मजा आया होगा न ? इनि ने खुश होते हुए कहा ।

- मुझे पिताजी से बहुत डाँट पड़ी । पर, उस दिन के बाद से मार खाना बन्द हो गया ।

- इनि अपने डैडी के बचपन की बातें सुनकर हँसी से लोट-पोट हुए जा रही थी । उसने दोबारा पूछा, आपकी चाची आपसे बहुत प्यार करती थी न ?

- हाँ ! मुझे बहुत प्यार करती थी, लेकिन जब मेरी बारी आयी तो मैंने उन्हें धोखा दे दिया।

- यू चिट !

- एक दिन अचानक सुबह-सुबह चाची हमारे यहाँ पहुँच गयी थी । पोटली में कई प्रकार के अचार, बासमती चावल और भी कई चीजें छिपाकर यहाँ आ गयी थी ।

- क्यों ? उनको भी किसी ने मारा था ? इनि से जानने की इच्छा जाहिर की ।

- नहीं, उनके बेटों ने उन्हें अपने पास रखने से मना कर दिया । उन्होंने कहा कि उनके पास उन्हें रखने की सुविधा नहीं है अतः वे गाँव में ही अपना अन्तिम जीवन व्यतीत करें ।

- क्या, अपनी मम्मी को रखने के लिए वे मना कर रहे थे ?

- हाँ बेटा, मुसीबत आने पर डैडी-मम्मी कुछ दिखाई नहीं पड़ते । सभी उसके गुलाम बन जाते हैं ।

उनकी भी उम्र हो गयी थी, वे भी गाँव में अकेले रहना नहीं चाहती थीं ।

- डैडी, आपने उन्हें क्यों नहीं रखा ? वह तो आपसे इतना प्यार करती थी, हमारा तो घर भी बहुत बड़ा है । फिर क्या परेशानी हुई ?

- सबसे बड़ी समस्या थी कि यहाँ कौन उनकी देखभाल करता ? किसके पास उनके लिए समय

है ? अगर उन्हें कोई दिक्कत हो जाती तो उनके बेटे हमें दोषी ठहराते । इसके अलावा तुम्हारी मम्मी भी तो दमा की मरीज है ।

- तो क्या, आपने उन्हें वापस गाँव भेज दिया ?

- नहीं, कुछ दिन बाद उन्हें बहला-फुसलाकर उनके सनकी बेटे के पास छोड़ आया ।

- छीः डैडी ! यह तो बहुत गलत बात है । उन्होंने तो आपके पिताजी की मार से बचाकर आपको अपने घर में छिपाकर रखा था, और आपने उनसे झूठ कहकर उनके सनकी बेटे के पास उन्हें छोड़ दिया ?

- मैंने लम्बी साँस ली । अब पछताने के अलावा मेरे पास कोई उपाय नहीं था ।

- डैडी ! आपका मन उदास है न ? चलिए, थोड़ा आराम कर लीजिए । डैडी, आपको पता है आज मम्मी के स्कूल में एक शोकसभा थी । किसी बड़े व्यक्ति का देहान्त हो गया था । भाषण देते वक्त मम्मी रो पड़ी थीं । मम्मी ने बताया, सभी उनके वक्तव्य की बहुत प्रशंसा कर रहे थे।

- बेटा, आजकल शोक वक्तव्य में भी प्रशंसा मिलती है । तू अभी समझ नहीं पायेगी ।

- डैडी, आप खाना नहीं खायेंगे ?

- क्या करूँ, ठण्ड के कारण नहाना तो नहीं हो पाया । एक दिन भूखा ही रह जाऊँगा । एक दिन उन्होंने भी तो खुद भूखा रहकर मुझे खाना दिया था । उस दिन भी मैंने स्नान नहीं किया था । कुछ और सुनेगी ? मैंने देखा, इनि गहरी नींद में सो गयी थी ।

- उसकी पीठ सहलाते हुए मैं हँस पड़ा । मेरा मन बहुत हल्का हो गया था । अब मुझे भूख भी नहीं लग रही थी । उसे चादर ओढ़ा कर मैं भी उसके पास लेट गया ।

समय के साथ-साथ यह जीवन भी आगे बढ़ते रहने का एक मार्ग ही है । हमारे पास वापस अतीत में लौटने का कोई उपाय भी तो नहीं है । कभी-कभी बीती बातें पवन के झोंकोकी तरह हमारी यादों में समाकर हमें बहा ले जाते हैं । जिस तरह आज बड़े भैया की आत्मिक चिट्ठी के जरिये चाची हमारे बीच से चली गयीं ।

-----------------------------

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------