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विज्ञान कथा / चन्द्रमा को बचा लिया / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

सोनम सिकरवार की कलाकृति

गृत्समद पोलिस जो कि चन्द्रमा की कोपरनिकस घाटी में स्थित है, से पूरे एक सौ किलोमीटर की दूरी पर एक गहरी घाटी है, जिसके विषय में अन्तरिक्ष अभियान के समय भारतीय दल को २०४० में: पता चला। चन्द्रमा के ध्रुव क्षेत्र में जमी बर्फ को प्रथम बार विश्व को दिखा देने वाले चित्रों को प्रस्तुत करने वाले भारतीय अन्तरिक्ष यान की भाँति ही, इस घाटी, उपत्यका की खोज का श्रेय भारतीय चंद्र अभियान दल को जाता है।

यह घाटी कुछ विशेष थी। वास्तव में यह चद्रमा की भूमि में आधी किलोमीटर गहरी और नब्बे किलोमीटर चौडी थी।

अमेरिका और रूंसी उपग्रह एवं अभियानदल के सदस्य इसे क्यों नहीं देख सके-स्पष्ट न था?

संभवत: उसके चारों तरफ की ऊँची पहाडियाँ ही, इसकी खोज में बाधक थीं। अभियान दल के सदस्य और लीडर कर्नल रजनीश का विचार था कि वह चन्द्-पाताल घाटी उन्हीं के लिए ही छूटी थी।

भारतीय नक्षत्रविदों की दृष्टि में यह घाटी आकाश गंगा के तथा उसके बाहर के क्षेत्रों के बहुकोणीय अध्ययन हेतु उपयुक्त थी। इसी कारण उन्होंने उस घाटी में विश्व का सबसे शक्तिशाली रेडियो-टेलिस्कोप स्थापित करने के उपरान्त ही भारतीय धरा पर वापस आने का निर्णय लिया। यह टेलिस्कोप अनेक वर्षों तक सफलता पूर्वक कार्य करता, सूचना देता रहा। परन्तु कुछ विचित्र परिस्थितियों के कारण दस से अधिक वर्षों तक सूचना-संकेतों को, आकाश गंगा के विशिष्ट ग्रह से, प्राप्त संकेतों के कारण. ही, उनसे उत्पन्न समस्या के निदान हेतु ईसको नष्ट कर देना पड़ा। यदि आप कभी चन्द्र अन्तरिक्ष अभियान पर जायें, तो आप को इस घाटी के मध्य में एक . बिन्दु चमकता हुआ दिखेगा।

' भारतीय अभियान दल चन्द्र अभियान से वापस आने के बाद दो वर्षों तक एकत्र डेटा को सुनियोजित एवं विश्लेषित करने में. लगां रहा। ¦

रेडियीटेलिस्कोप बोधायन (अपनी बोधायन प्रमेय के लिए विख्यात भारतीय गणितज्ञ महर्षि बोधायन, ८०० ई पू.. जिनकी प्रमेय को कालान्तर में पाइथागोरस प्रमेय कहकर प्रचारित किया गया था) के नाम पर इस टेलीस्कोप का नामकरण किया गया था। यद्यपि सिग्नल मिल रहे थे, रेडियो संदेश मिल रहे थे, पर. उनमें बैकग्राउन्ड न्वायज अधिक थी। इस कारण उनको यद्यपि रेडियो संकेतविद कुणाल रेकार्ड करते जा रहे थे तथा यह सुदूर अन्तरिक्ष में स्थित बुद्धिमान अन्तरिक्ष वासियों से संपर्क का सबसे उन्नत साथन था, पर उसे वे अन्यमनस्कतावश अथवा अपने सुदीर्घ अनुभव के कारण गम्भीरता से नहीं ले रहे थे। भारत का यह टेलिसकोप-सेटी अभियान की दृष्टि से महत्वपूर्ण था।

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दो वर्षों से आ रहे इन संकेतों की तीव्रता एकाएक बढ गयी। डॉ. कुणाल चैतन्य हो गये। यह सिग्नल-संकेत अतीव स्पष्ट थे। यह सिग्नल पृथ्वी से छ हजार पाँच सौ प्रकाश वर्षों की दूरी से गरुड नामक ग्रह जो काश्यप मंडल की दूरस्थ भुजा पर-देवयानी निहारिका मंडल में स्थित है, से आ रहे थे।

यह शार्ट-सिग्नल कुछ सेकेन्डों तक आते, क्रमश: क्षीण होकर हिस्स की ध्वनि करते दस बारह महीनों के उपरान्त पुन दिखाई-सुनाई पडते थे।

वैज्ञानिकों में इन सिग्नलों को लेकर पर्याप्त उत्तेजना थी। समाचार पत्रों में अन्तरिक्ष वासियों के सम्पर्क संबंधित विभिन्न रंजित समाचार प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गए। यह सिलसिला कुछ. सप्ताह तक चला। समाचार बदल गए परन्तु डॉ. कुणाल और उनके सहयोगी तपस्वियों की भाँति कंप्यूटर की स्क्रीन पर दृष्टि जमाए रहते .थे। उनके मानस विभिन्न धारणाओं से

उद्वेलित थे, पर वे धैर्य: के साथ प्रतीक्षारत थे बोधायन से डॉ कुणाल के रिसीविंग. सेन्टर पर संकेतों के पुन: अंकित होने के लिए एक दिन बातों बातों में डॉ. कुणाल की सहयोगिनी सुनन्दा ने पूछा ''डॉ. कुणाल क्या: आप आश्वस्त हैं कि इगेल नक्षत्र-गरुड नक्षत्र के किसी क्षेत्र में स्थित बुद्धिमान जीव-ई.टी. अथवा विवेक युक्त प्रजाति रहती है?"

"तुम्हें यह संशय क्यों हो रहा है" डॉ. कुणाल के दूसरे सहयोगी रजत ने प्रश्न किया। सुनन्दा कुछ सोचने लगी। उसके मौन को डॉ. कुणाल समझ गए। उन्होंने सुनन्दा को देखा और बताने लगे, ''इस ब्रह्माण्ड के जन्म के समय हमारी आकाश गंगा में कालान्तर में नक्षत्रों का उद्भव प्रारम्भ हुआ और केन्द्र में स्थित सुपर-हैवी एलीमेन्टों अथवा तत्वों के कारण ही इन नक्षत्रों पर जो सुपरनोवा के विस्फोट के फलस्वरूप केन्द्र से दूरस्थ बिन्दु पर फेंक दिये गए थे, जीवन की गतिविधियाँ वास्तव में यह नक्षत्र इनसे .आ रहे, प्राप्त हो रहे रेडियो संकेतों को, मैं बुद्धिमान प्राणियों द्वारा, जिनकी सभ्यता हमसे संभवत: उन्नत एवं प्राचीन है, भेजा हुआ संदेश अथवा उनकी उपस्थिति का संकेत मानता हूँ।'

'आपके इस कथन के अनुसार हमारी आकाश गंगा में विवेकवान जीव हैं? रजत ने प्रश्न किया।

'निश्चित रूप से होना चाहिए" संक्षिप्त उत्तर था, डॉ. कुणाल का।

'क्या हम उनकी संख्या का अनुमान लगा सकते हैं?" सुनन्दा ने जिज्ञासा प्रकट की।

'हाँ, हम इसको यदि इस प्रकार से देखें तो कुछ पूर्वानुमान लग सकता है, कहते हुए डॉ. कुणाल अपने पैड पर कुछ गणनाएँ करने लगे। कुछ क्षणों के बाद उन्होंने कहा ""हमारी आकाश गंगा, एक अनुमान से एक लाख प्रकाश-वर्ष के क्षेत्र में फैली है, तथा इसमें ३५० विलियन सौर्य मंडल है। इन सौर्य मंडलों में विद्यमान अनेक ग्रहों पर जो पृथ्वी की ही भाँति हैं तथा इन पर जल, वातावरण, एवं आक्सीजन विद्यमान है। इस कारण वहाँ पर विवेकवान उन्नत सभ्यताओं की संभावना है।

'इस प्रकार वे नक्षत्र मंडल हमारी पृथ्वी से बहुत प्राचीन होंगे तथा इस गरुड नक्षत्र से आ रहे माईक्रोवेब संकेत यह भी इंगित कर रहे हैं, कि उनकी प्रौद्योगिकी विकसित हैं" एक दार्शनिक की सी मुद्रा में सुनन्दा ने सुझाया।

""परन्तु सामान्य जन इस विषय में क्या सोचते हैं? रजत ने जानना चाहा। ''ओह्र! सामान्य जन, अपनी रोजी रोटी, आमोद प्रमोद में व्यस्त रहते हैं, वे इन रहस्यों में इस कारण भी रुचि नहीं लेते, क्यों कि मीडिया-दृष्य-श्रव्य दोनों ही 'माध्यमों ने, उनके मानस में बैठा दिया है, कि अन्तरिक्ष में विवेकवान जीव रहते हैं"

सुनन्दा का स्पष्टीकरण था। 'वे जीव किस प्रकार के होंगे? रजत का अगला प्रश्न था। 'मानव ने निराकार ईश्वर को, ब्रह्माण्ड-व्याप्त ऊर्जा को अपना स्वरूप देकर, उसकी उपासना, अनावश्यक रूप में प्रारम्भ कर, अपने लिए अनेक समस्यायें उत्पन्न कर ली हैं, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मेरा विचार है कि जन सामान्य इन जीवों को मानव अथवा उससे इतर जीवधारी ही मानेंगे"

सुनन्दा के उत्तर पर डॉ. कुणाल के होंठों पर हँसी थिरक उठी। वे कहने लगे'' चाहे यह जीव बजाय कारबन के सिलिकान द्वारा निर्मित क्यों न हों, मानव उन्हें अपने स्वरूप में ही देखना पसन्द करेगा।'

'पर, उस गरुड नक्षत्र के पास का वातावरण पृथ्वी के समान नहीं होगा। क्योंकि धनु-राशि मंडल अनेक

विस्फोटों-अन्तरिक्षीय चक्रवातों तथा नव-निर्मित तारों से भरा पडा है। इस कारण मेरे अनुमान से वे हम मानवों से अवश्य ही भिन्न होंगे तथा उनके चिन्तन की विधि भी भिन्न होगी।' मेरा भी यही अनुमान है, सुनन्दा," कहते हुए डॉ. कुणाल की दृष्टि आ रहे संकेतों पर ठहर गयी। दूसरे दिन रजत और सुनन्दा को देखकर हर्षित डॉ. कुणाल ने बताया, 'तुम्हें जान कर आश्चर्य होगा कि जो संदेश हमें मिल: रहे हैं, वे हमारी ''वेव लेंथ मल्टीप्लेक्सिंग पद्धति के समान हैं।' चकित भाव से रजत ने जानना चाहा" क्या यह सिग्नल किलो हर्टज अथवा गिगा बाइटस में हैं? ''गिगा बाइटस् में" ^ इस प्रकार लगता है कि यह सिग्नल ही हैं और माइक्रोवेव द्वारा उत्पन्न किये गये व्यवधान नहीं हैं? सुनन्दा की टिप्पणी थी। . "मैं तुम्हारे संशय को दूर करना चाहूँगा। देखो यदि माइक्रोवैव व्यवधान होता तो इस को यह मशीन एक सीधी रेखा में अंकित करती। यदि इसमें कोई सूचना न होती तो यह शंकु . के आकार: को ग्रहण कर लेता परन्तु तथ्य युक्त संकेत अथवा सिग्नल एक समान न होकर उतार चढाव, पंक्ति, छोटी पंक्ति, लम्बी पंक्ति अथवा शंकु के विविध आकर को ग्रहण करते हैं।'

'ठीक! हमारे स्वर एवं व्यंजन की ध्वनियों के अनुसार" डॉ. कुणाल की बात को काट कर उत्साहित सुनन्दा ने कहा।

'मैं सहमत हूँ, तुम्हारे इस विचार से "'डॉ. कुणाल ने कहा |' 'लेकिन हमें अब इस प्राप्त डेटा को बोधायन से जुडे सुपर कम्पयूटर में फीड करना होगा।' ,

'लेकिन क्यों डॉ. कुणाल" सआश्चर्य रजत ने जानना चाहा। ''इस कारण कि वही इन सिग्नलों को डिकोड कर सकने में सक्षम है'' संक्षिप्त सा उत्तर था डॉ कुणाल का।

डॉ. कुणाल ने इन सिग्नलों को बोधायन के सुपर कम्पूटर में फीड कर दिया। उनका तनाव कुछ घट चुका था। पर इस घटना के कुछ घण्टों बाद- दूसरे दिन जब डॉ. कुणाल ने कम्पयूटर ले लगे डिकोड प्रोसेसर को प्रेस किया तो परिणाम देखकर वे चकित रह गये। " ¦

रजत और सुनन्दा भी उसी समय आ गए। डॉ. कुणाल के चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित चिन्ता को देखकर उन्हें डॉ. कुणाल से कहा क्या कुछ समस्या आ गयी है?

'ग्लग तो ऐसा ही रहा है' संक्षिप्त सा उत्तर था डॉ. कुणाल का |

'कुछ स्पष्ट करें" सआग्रह सुनन्दा ने कहा।

''वास्तव में उन सिग्नलों को डिकोड होने के उपरान्त उन्होंने अपने को एक विशेष क्रम में नियोजित कर लिया। ठीक वाइरस की, कम्यूटर वांईरस की भाँति और इतना ही नहीं उन्होंने, अपनी वृद्धि प्रारम्भ कर दी तथा वे बोधायन के सुपर कम्यूटर में एकत्रित सूचनाओं को डिकोड-करने के उपरान्त उस' कम्यूटर के आपरेटर अथवा मुझसे 'एस" और 'नो' में ट्रू, अथवा 'फाल्स' में प्रश्नोत्तर करना प्रारम्भ'कर दिया।

« यह तौ: अतीव आश्चर्यजनक है?' रजत और सुनन्दा एक साथ कर उठे। - "पर इसका अर्थ क्या है? उनका अगला प्रश्न डॉ. कुणाल के सम्मुख था।

'जहाँ तक मैं समझता हूँ. कि नक्षत्र वासी यह संदेश इस ब्रह्माण्ड में प्रसारित कर :रहे हैं तथा इसमें छिपे वाइरस-कोड को उन्होंने कृत्रिम बुद्धि युक्त कर. दिया है, जिसके परिणाम स्वरूप वह अपनी कृत्रिम बुद्धि के अनुसार सूचनाएँ एकत्र ५. * 'उनके केन्द्र को संम्प्रेषित कंर सके" चिन्ताग्रस्त से डॉ. कुणाल ने बताया। एक पक्ष यह भी है कि गरुड वासियों को हमारी सभ्यता और प्रौद्योगिकी आदि के विषय में कुछ पता नहीं है तथा हमें भी यह. ज्ञात नहीं है कि वे किस प्रकार के हैं, उनकी प्रौद्योगिकी कितनी विकसित है'' सोचते हुए रजत का कथन था। ''परन्तु रजत! वे निश्चय ही हमसे स्मार्ट हैं, और विकसित प्रौद्योगिकी संपन्न हैं' सुनन्दा की टिप्पणी थी। सुनन्दा एवं रजत को डॉ. कुणाल के चिन्ताग्रस्त स्वर का स्मरण हो आया। उन्हें लगा कि दूसरे पक्ष को डॉ. कुणाल उनसे बता नहीं रहे हैं।

काफी ब्रेक के समय सुनन्दा ने डॉ. कुणाल से पूछा 'क्या यह वाइरस. मात्र हमारे ग्रह से सूचना प्राप्त करना चाहता है, अथवा इसका कोई मन्तव्य और है? ,. _ डॉ. कुणाल के चेहरे पर छायी चिन्ता में कुछ परिवर्तन .हो चुका था। वे काफी का सिप लेते हुए मौन थे। कुछ क्षणों तक 'इसी प्रकार के वातावरण की .निस्तब्धता भंग करते हुए उन्होंने कहा मुझे इस वाइरस अथवा सिग्नल को बोधायन के सुपर कम्यूटर में फीड नहीं करना चाहिए था।'

'क्या कुछ समस्या उत्पन्न हो सकती है, इससे" रजत अपनी जिज्ञासा रोक न सका।

'मैं अब इसरो-भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संस्थान से संपर्क करना चाहता हूँ, जिससे वे चन्द्रमा के समीप से जाते हुए उपग्रह को, बोधायन के आस पास के क्षेत्र पर केन्दित कर, उसे सूचनाएँ एकत्र करने का निर्देश प्रेषित करें" कहते हुए डॉ. कुणाल उठ गए।

दस घण्टे के बाद उपग्रह-भारतीय उपग्रह से प्राप्त संरचनाएँ चौंकाने वाली: थीं।

चन्द्रमा पर बोधायन के समीप स्थापित किये गये यंत्रों को उस वाइरस ने प्रभावित करें उनकी कार्यक्षमता को नष्ट कर दिया था। वे कार्य करना बन्द कर चुके थे।

इतना ही नहीं, उस वाइरस ने उन यंत्रों को, सूक्ष्म यंत्रों में परिवर्तित ही नहीं कर दिया था. वरन बोधायन के शेड के भीतर रखे हुए यंत्र भी अपना स्वरूप बदल चुके थे तथा वे वायरस की कृत्रिम बुद्धि के अनुसार संदेश प्रेषित करने लगे थे।

अगले दो घण्टों में उन सभी यंत्रों ने कार्य बन्द कर दिया। वे बिना सूचना के सूक्ष्मकणों में टूटने लगे। अब-न तो बोधायन का टेलिस्कोप दिखाई पड रहा था और न ही उसके समीप स्थापित यंत्र ही। '

इसरो-कन्ट्रोल के निर्देश पर जो संदेश उपग्रह से' प्राप्त हुआ था, उसे देख पर, वैज्ञानिक गण स्तब्ध रह गये। सभी यंत्र एक सूक्ष्म पर्टिकिल एक्सीलरटेर की भाँति कार्य करने लगे थे। अगले कुछ घण्टों में इन सूक्ष्म मशीनों ने उस पाताल घाटी की सतह .पर एकत्र चट्टानों और खनिजों को ऊर्जा में परिवर्तित करना प्रारम्भ कर दिया तथा प्रारम्भ हो गया चान्द्र सतह से ऊर्जा दोहन का सिलसिला। '

घबराये वैज्ञानिकों ने डॉ. कुणाल को तत्काल केन्द्र में आने को कहा।

डॉ. कुणाल 'के वहाँ इसरो केन्द्र में पहुंचते ही, चर्चा प्रारम्भ हो गयी।

वैज्ञानिकों का कथन. था ''इस प्रकार गरुड्ड नक्षत्रवासियों द्वारा चन्द्रमा का' अनियंत्रित ऊर्जा दोहन, एक चेन-रिऎक्शन को प्रारम्भ' कर, चन्दम् को सदा के लिए नष्ट कर देगा! ''अब क्या करना. उचित रहेगा?" "'हमारे पास सिर्फ एक ही विकल्प है?"

'मैं उसके विषय में सोच रहा था' डॉ. कुणाल का उत्तर इसरो के निदेशक ने ध्यान से डॉ. कुणाल को देखा और कहने लगे ''इन नौनो मशीनों को अनियंत्रित कर, ऊर्जा दोहन से रोकने का मात्र एक ही विकल्प है, क्या आप उस विकल्प के प्रयोग से सहमत हैं?

पूर्णरूपेण" डॉ. कुणाल ने कहा।

एक दूसरा परमाणु बम युक्त उपग्रह बोधायन टेलिस्कोप की. ओर' पाताल घाटी भेजा गया। पाँच-दिनों बाद लोगों ने से अन्तरिक्ष में फैलती एक पीली ज्वाला देखी।

डॉ. कुणाल अब तनाव रहित थे। नौनों मशीनें नष्ट हो चुकीं थीं, चन्द्रमा से ऊर्जा दोहन रुक चुका था। उसकी ऊर्जा का अपने कार्यों में उपयोग न कर पाने पर अपने .प्रयोजन को विफल होते. जान कर, गरुड ग्रह के वासी क्या सोच रहे होंगे, इस की चिन्ता डॉ. कुणाल को नहीं थी। .. -पृथ्वी का निकटतम उपग्रह चन्द्रमा बंचंचुका था। परन्तु आकाश में उस विस्फोट के परिणाम स्वरूप पाताल घाटी का वह क्षेत्र पीत-आभा युक्त बिन्दु की भाँति सुदीर्घ काल तक दिखता रहेगा, और आने वाली पीढियों को बताता रहेगा कि किस प्रकार कृत्रिम बुद्धि द्वारा, आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नौनों कणों को उत्पन्न कर चन्द्रमा को नष्ट करने का षडयंत्र, गरुड ग्रह के जीवों ने रचा था।

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