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छविगृहों में पहले भी अपमानित हो चुका है राष्ट्रगान - डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

मुद्दा...

छविगृहों में पहले भी अपमानित हो चुका है राष्ट्रगान

0 सरकारी एजेंसियों में नहीं है अनिवार्य

राष्ट्रगान को स?मान देने के लिए फ् नवंबर को देश के सुप्रीम कोर्ट ने सभी छविगृहों में फिल्म शुरू होने से पूर्व राष्ट्रगान का बजाया जाना और इसके स?मान में सावधान की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य घोषित कर दिया है। राष्ट्रगान को स?मान दिलाने परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस द्वय दीपक मिश्रा एवं अमिताब राय की बैच ने कहा कि यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति स?मान प्रकट करें। अदालत ने कहा कि लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि यह मेरा देश और मेरी मातृभूमि है। जस्टिस द्वय ने राष्ट्रगान बजाये जाने वाले आदेश को एक सप्ताह में लागू करने प्रमुख सचिवों के माध्यम से कार्य करने की बात कही है। सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाये जाने तथा स?मान में दर्शकों की स?मान की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य किये जाने का सर्वोच्च न्यायालय का आदेश जहां स्वागतेय है, वहीं प्रत्येक देशवासी को गौरवान्वित करने वाला भी है। राष्ट्रगान के संबंध में ऐसा किया जाना पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले छविगृहों में फिल्म समाप्त होने पर इसे बजाया जाता रहा है, किंतु स?मान को ठेस पहुंचने के बाद इसे बंद कर दिया गया था। कारण यह कि राष्ट्रगान शुरू होते ही दर्शक अपने स्थान पर खड़े न रहकर जल्दी निकलने के फेर में राष्ट्रगान का अपमान करने से नहीं चुक रहे थे। अब फिल्म के शुरूआत में इसे बजाया जाना अनिवार्य किया जाना- ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ की तरह ही होगा। इस बात की क्या गारंटी है कि लोग राष्ट्रगान के शुरू होने पर सीटें ढूंढते दिखाई नहीं पड़ेंगे या गेट कीपर टॉर्च की रोशनी से उन्हें सही सीट पर ले जाने से बाज आएगा।

बदलते रहे हैं राष्ट्रगान के नियम

राष्ट्रगान की महिमा बरकरार रखने के लिए समय पर समय पर इसके गाये जाने के नियमों को बदला जाता रहा है, जब जहां राष्ट्रगान के स?मान में कमी नजर आयी या उसका स?मान न होना पाया गया, वहां इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जब इस गान को राष्ट्र कवि रबिन्द्रनाथ टैगोर जी ने लिखा तो यह इस रूप में नहीं गाया जाता था, बल्कि इसके पूरे पांच पदों का गायन हुआ करता था। बाद में इसका संक्षिप्त रूप में भ्ख् सेंकेड के रूप में देशवासियों के समक्ष लाया गया। इसके बाद एक और संक्षिप्त रूप भी लाया गया, जो महज ख् सेकेंड में गाया जाता था, जिसमें राष्ट्रगान की पहली और अंतिम पंक्ति ही गायी जाती थी, जो इस प्रकार से थी-

जन-गण-मन अधिनायक जय हे।

भारत भाग्य विधाता।

जय हे...जय हे...जय हे...जय...जय...जय...जय...हे।

बाद में विशेष अवसरों पर गाये जाने वाले इस संक्षप्ति संस्करण को भी प्रतिबंद्धित कर दिया गया। पहले छविगृहों में फिल्म समाप्ति पर और अब शुरूआत में बजाये जाने का आदेश एक और प्रयोग ही माना जा सकता है। जब अंत में दर्शक एक मिनट से भी कम समय अपने राष्ट्रगान को नहीं दे पाये, तो अब शुरूआत में वहीं कवायद सफल हो पाए, इसमें संशय है। साथ ही रूपहले पर्दे पर राष्ट्रगान के साथ लहराते झंडे का प्रतिबि?ब भी जरूरी कर दिया है। हम तो चाहते है कि राष्ट्रगान का स?मान सर्वोपरि हो, किंतु क्या इसे अनपढ़ जनता से लेकर उच्च शिक्षित लोगों ने पहने स्वीकार किया है? इस पर पुनःविचार जरूरी लग रहा है। कहीं इसे भी वापस न लेना पड़े। राष्ट्रगान के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक हमनें इसके स?मान के लिए शालाओं में कड़े नियम नहीं बना पाये है। राष्ट्रगान चलता है तो चलता रहे...लोग अपनी दिनचर्या में व्यस्त काम करते देखे जा सकते है। यह राष्ट्रगान का कौन सा स?मान है? मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं।

सर्वोच्च सत्ता में बैठे लोगों ने भी किया अपमानित!

देश के गौरव माने जाने वाले राष्ट्रगान का अपमान देश के आम जनता द्वारा तो होता आ ही रहा है। देश की सर्वोच्च सत्ता पर बैठे जवाबदार लोगों ने भी राष्ट्रगान को अपमानित करने से परहेज नहीं किया है। अक्टूबर ख्क्भ् में अंतिम दिन फ्क् अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के मु?यमंत्री अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल विस्तार कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल रामनायिक ने राष्ट्रगान को बीच में ही रूकवा दिया था। इसके पीछे एकमात्र कारण यह था कि राज्यपाल राष्ट्रगान से पूर्व सरदार पटेल जयंती के अवसर पर मंत्रिमँडल को राष्ट्रीय एकता की शपथ दिलाना चाहते थे। इसी मामले को लेकर उच्चतम न्यायालय ने फ् नवंबर ख्क्म् को अपने एक आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि एक बार शुरू किया गया राष्ट्रगान समाप्ति से पूर्व बीच में नहीं रोका जा सकेगा। राष्ट्रगान के अपमान का यह पहला और अंतिम मामला नहीं था। ऐसा ही एक वाक्या पश्चिम बंगाल की मु?यमंत्री ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण समारोह के समय दिखाई पड़ा, जब कश्मीर के मु?यमंत्री फारूख अदुल्ला राष्ट्रगान चलने के दौरान अपने मोबाईल पर चर्चा करते देखे गये। बाद में इसी मामले पर विवाद गहराने की स्थिति में फारूख अदुल्ला को राष्ट्रगान के अपमान के कारण माफी मांगनी पड़ी। राष्ट्रगान के गौरव को लेकर गंभीरता न बरतने के अनेक मामले इस लेख को बड़ा कर सकते है। हम तो यही कहना चाहते है कि महज छविगृहों में राष्ट्रभक्ति का पाठ नहीं पढ़ाया जा सकता। इसके लिए जन जागरूकता और राष्ट्रप्रेम जैसी भावना ही स?मान की प्रतीक मानी जा सकती है।

हम नहीं गा रहे संपूर्ण राष्ट्रगान

वर्तमान में हम जिस राष्ट्रगान का सस्वर गायन अनेक अवसरों पर करते आ रहे है, वह संपूर्ण राष्ट्रगान नहीं है। राष्ट्रकवि रबिन्द्रनाथ टैगोर जी ने मूल रूप से भ् पदों वाले राष्ट्रगान की रचना की थी। हम उसमें से केवल एक पद को ही राष्ट्रगान के रूप में गा रहे है, जिसे गाने में भ्ख् सेकेंड का समय लगता है। राष्ट्रगान के सभी भ् पदों के गायन में ब् मिनट भ्फ् सेकेंड का समय लगता है। स?मान की दृष्टि से शायद इतनी देर तक सावधान की मुद्रा को कठिन मानते हुए उसका संक्षिप्त रूप भ्ख् सेकेंड के रूप में मान्यता प्रदान किया गया हो, ऐसा प्रतीत होता है। वास्तव में राष्ट्रगान के पांचों पदों की जानकारी हमारे देश के युवाओं सहित बहुत बड़ी आबादी को शायद न हो। राष्ट्रगान के मूल स्वरूप को मैं इस लेख के माध्मय से पाठकों की जानकारी में लाना जरूरी मानता हूं, जो इस तरह हैः-

जन-गण-मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य-विधाता,

पंजाब-सिन्धु-गुजरात-मराठा-द्राविण-उत्कल-बन्ग

विन्ध्य-हिमाचल-यमुना-गन्गा उच्छल-जलधि-तरंग

तव शुभ नामे जागे तव शुभ आशीष मांगे,

गाहे तव जय-गाथा

जन-गण-मन-मंगलदायक जय हे भारत-भाग्य-विधाता

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।क्।।

अहरह तव आह्नान प्रचारित, शुनि तव उदार वाणी

हिन्दु-बौद्ध-शिख-जैन-पारसिक-मुसलमान-खृष्टानि

पूरब-पश्चिम आसे तव सिहांसनपाशे प्रेमहार, हय गाथा

जन-गण-मन-मंगलदायक जय हे भारत-भाग्य-विधाता

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।ख्।।

पतन-अ?युदय-वंधुर-पंथा, युगयुग धावित यात्री,

हे चिर-सारथी, तव रथ चक्रेमुखरित पथ दिन-रात्रि

दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे,

सन्कट-दुख-श्राता,

जन-गण-पथ-परिचायक जय हे भारत भाग्य-विधाता,

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।फ्।।

घोर-तिमिर-घन-निविङ.निशीथ पीङित मुर्च्छित-देशे

जाग्रत दिल तव अविचल मंगल नत नत-नयने अनिमेष

दुस्वप्ने आतंके रक्षा करिजे अंके स्नेहमयी तुमि माता,

जन-गण-दुखत्रायक जय हे

भारत-भाग्य-विधाता,

जय हे, जय हे, जय हे,

जय जय जय जय हे ।।ब्।।

रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि पूरब-उदय.-गरि-भाले,

साहे विहन्गमए पूएय समीरण नव-जीवन-रस ढाले,

तव करुणारुण-रागे निद्रित भारत जागे तव चरणे नत माथा,

जय जय जय हे, जय राजेश्वर, भारत-भाग्य-विधाता,

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।भ्।।

 

प्रयोग का विषय न बने राष्ट्रगान

हमने अपने देश के गौरवगान राष्ट्रगान से लेकर राष्ट्रीय प्रतीक तिरंगे को हमेशा प्रयोग का विषय बनाने से परहेज नहीं किया है। राष्ट्रगान को अनिवार्य करने और छविगृहों में बजाने का कोर्ट का आदेश भी किसी प्रयोग से कम नहीं माना जा सकता है। देश के राष्ट्रगान को देश प्रेम की भावना फैलाने या बढ़ाने के लिए इस तरह का प्रयोग अपना सार्थक और सकारात्मक रूप दिखा पायेगा? यह बात गले नहीं उतरती है। देश प्रेम का इजहार और भी तरीकों से किया जा सकता है। राष्ट्रगान के वादन के समय किसी युवा, बच्चे या बुजुर्ग के सावधान की मुद्रा में न आने पर उसे समझाईश देने के लिए शाला परिसरों से लेकर अन्य स्थानों पर जागरूकता कार्यक्रम का चलाया जाना शायद अधिक कारगर हो सकता है। यह बात देश के प्रत्येक नागरिक की समझ में आ सकती है कि देश के छविगृह संस्कृति की पाठशाला नहीं, बल्कि व्यवसाय की बड़ी मंडी है। क्या ऐसी मंडी में राष्ट्रगान का स?मान किया जा सकेगा। सरकार सभी शासकीय द?तरों और महाविद्यालयों में तो इसे अनिवार्य नहीं कर पायी और अब एक गलत प्रयोग बाजारवाद से शुरू किया जाना हर स्थिति में संदेहास्पद से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता है।

 

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

 

dr.skmishra_rjn@rediffmail.com

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