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शब्द संधान / बाबू / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

जिस तरह किसी व्यक्ति के नाम से पहले हम सम्मान सूचक कोई शब्द, जैसे श्री, श्रीमान आदि, लगाते हैं, उसी तरह ‘बाबू’, भी एक सम्मान सूचक शब्द ही है | बंगाल में तो विशेषकर बाबू कहकर ही नाम पुकारा जाता है | बाबू मोशाय | किन्तु यह संबोधन अब बंगाल के बाहर आ चुका है | हमारे प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद, जनता में बाबू राजेन्द्र प्रसाद या राजेंद्र बाबू नाम से जाने जाते हैं | बाबू एक मात्र ऐसा सम्मान सूचक शब्द है जिसे नाम से पहले या नाम के बाद में भी लगाया जा सकता है | बाबू राजेन्द्र प्रसाद या राजेन्द्र बाबू दोनों ही प्रचलन में हैं | यह छूट शायद केवल “बाबू” को ही मिली हुई है | ‘जी’ हमेशा नाम के बाद में ही प्रयुक्त होता है और श्री हमेशा नाम के पहले !

बाबू शब्द अंग्रेजों के भारत आने के बाद ही गढ़ा गया और उसे अंग्रेजों ने ही गढ़ा भी | इसके पीछे एक दिलचस्प किम्वदंती है | फारसी पढ़ने के दौरान जब अँगरेज़ शासक ‘बू’ और “बदबू” जैसे शब्दों से वाकिफ़ हुए तो उन्होंने बदबू को “बाबू” बनाकर बंगालियों के ऊपर ही लाद दिया | बंगाली लोग क्योंकि मछली बहुत खाते थे और कड़वा तेल भी खूब लगाते थे (हैं), इसलिए गरीब बंगालियों के शरीर से हमेशा बदबू आती रहती थी | अत: अँगरेज़ हाकिमों ने उन्हें तिरस्कार पूर्वक “बाबू” (अर्थात, गंदा या बदबूदार) कहना शुरू कर दिया | किन्तु धीरे धीरे लोग इसकी व्युत्पत्ति भूल गए और शब्द को संमान मिलना आरम्भ हो गया और यह भी श्री या मिस्टर की तरह इस्तेमाल होने लगा | अंग्रजों का गढ़ा हुआ यह शब्द बेशक अंग्रेज़ी का नहीं है लेकिन अब यह अंग्रेज़ी शब्द-कोष में भी स्थान प्राप्त कर चुका है |

‘बाबू” शब्द को लेकर एक और किम्वदंति भी है | इस दूसरी दंतकथा के अनुसार ‘बाबू’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘बाबून’ से है | बाबून बन्दर की एक जाति है | अंग्रजों की सेवा करने वाले, हिन्दुस्तानी सेवकों का मज़ाक़ उड़ाने के लिए अँगरेज़ हाकिमों ने उन्हें ‘बाबून’ कहना शुरू कर दिया | उन्हें न जाने क्यों अपने सेवक बाबून-बंदरों की तरह लगते थे | बाबून का ’न‘ धीरे धीरे हटता गया और सेवक ‘बाबू’ हो गए |

जो भी हो, इन किम्वदंतियों से एक बात तो स्पष्ट है कि “बाबू” शब्द आरम्भ में निंदापरक ही था | लेकिन धीरे धीरे इसने प्रतिष्ठा हासिल कर ली | क्लर्क ‘बाबू’ कहलाने लगा | उसकी और कम पढ़े लोगों की टूटी फूटी अंग्रेज़ी ‘बाबू इंगलिश’ कहलाने लगी | बाबूओं का पूरा एक समाज विकसित हो गया | आज भी हम क्लर्कों के लिए, ऑफिस के लिपकीय कर्मचारियों के लिए, ‘बाबू’ शब्द ही इस्तेमाल करते हैं | और वे इसे बड़े प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करते हैं | इस संबोधन के चलते वे सामान्य लोगों से स्वयं को कुछ अलग ही समझते हैं | वेतन कितना ही कम हो लेकिन बाबू शब्द में उन्हें मिथ्या प्रतिष्ठा की एक बू आती रहती है

बाबू सिर्फ लिपकीय कर्मचारी ही नहीं है | बड़ा क्षत्रीय या ज़मींदार भी बाबू ही कहलाता था | आज शिक्षित प्रतिष्ठित जन भी बाबू या बाबूजी कहलाते हैं | बाबूजी पिता या अन्य आदरणीय जनों का सम्बोधन है | बाबूजी की तरह ही आदरणीय लोगों को बाबूसाहब भी कहा जाता है | बाबू से अब निंदा की बू पूरी तरह गायब हो गई है |

पिछले दशक के फिल्मी गानों में बाबू की उपस्थिति ध्यान आकर्षित करने वाली थी | “बाबूजी धीरे चलना...” बाबू, समझो इशारे ....” आदि, गाने आज भी गुनगुनाए जाते हैं |

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.) ९६२१२२२७७८

१०, एक आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहादाद -२११००१

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