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ग़ुरबत से होकर निकले गुरदयाल - वीणा भाटिया

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गुरदयाल सिंह भारतीय साहित्य की यथार्थवादी परंपरा के ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने पूरी दुनिया में पंजाबी उपन्यास और कथा साहित्य को एक विशिष्ट पहचान दिलाई। विश्व साहित्य में इन्हें प्रेमचंद, गोर्की और लू शुन के समकक्ष माना जाता है। प्रेमचंद के बाद शायद ही किसी भारतीय साहित्यकार को दुनिया में यह सम्मान मिला। यह अलग बात है कि ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें निर्मल वर्मा के साथ साझे में मिला, पर साहित्य में उनका जो योगदान है, उसके आगे बड़े से बड़े पुरस्कार का कोई महत्व नहीं रह जाता है। वैसे तो पंजाबी में एक से बढ़ कर एक यथार्थवादी रचनाकार हुए, पर गुरदयाल सिंह का स्थान सबसे बढ़ कर है। गुरदयाल सिंह के जीवन और लेखन में पूरा साम्य है। उनके लेखन में पंजाब के ग्रामीण जीवन का यथार्थ सामने आया है। दलित-उत्पीड़ित और वंचित तबकों के प्रति गुरदयाल सिंह की जो प्रतिबद्धता है, वह कम ही लेखकों में दिखाई पड़ती है। कहा जाता है कि उनका लेखन समकालीन इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। समकालीन ग्रामीण जीवन का इतिहास उनके लेखन को अलग करके नहीं लिखा जा सकता। 1964 में उनका उपन्यास ‘मढ़ी दा दीवा’ प्रकाशित हुआ, तो आलोचकों ने उसे टॉल्सटॉय के विश्वविख्यात उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ के समकक्ष माना। यह उनका पहला उपन्यास था। जल्दी ही इसका अनुवाद अन्य भाषाओं में हुआ। इस उपन्यास की सर्वाधिक बिक्री हुई। रूसी भाषा में जब इस उपन्यास का अनुवाद हुआ तो लगभग 10 लाख प्रतियां प्रकाशित हुईं। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम द्वारा निर्मित इस उपन्यास पर आधारित फिल्म को राष्ट्रीय अवॉर्ड मिला। 2012 में उनके एक और उपन्यास ‘अन्ने घोड़े दा दान’ पर बनी फिल्म पर भी सर्वोत्तम पंजाबी फिल्म नेशनल अवॉर्ड मिला।

गुरदयाल सिंह के उपन्यासों और कहानियों में शोषित गरीब लोगों के जीवन का जैसा यथार्थ चित्रण हुआ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भारतीय ग्रामीण जीवन का ऐसा सशक्त चित्रण हिंदी में प्रेमचंद ने आजादी मिलने के पूर्व किया था। आजादी मिलने के बाद उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने का काम गुरदयाल सिंह ने ही किया। कहा जाता है कि जिस तरह क्रान्ति पूर्व के रूस के जनजीवन को टॉल्सटॉय और गोर्की की कृतियों को पढ़े बिना नहीं जाना जा सकता, चीन के जनजीवन और वहां की जनता के दुख-दर्द और संघर्षों के लु शून की कृतियों को पढ़े बिना नहीं समझा जा सकता, उसी प्रकार पंजाब के ग्रामीण जीवन को गुरदयाल सिंह के उपन्यासों को पढ़े बिना नहीं समझा-जाना जा सकता है। इस उपन्यास के बाद उनके कई उपन्यास प्रकाशित हुए, जिनमें 'अध चांदनी रात', 'परसा', 'घर और रास्ता', ‘सांझ सवेर’, ‘पांचवां पहर‘, ‘अन्ने घोड़े दा दान’ ‘भर सरवर जब उच्छलै’ प्रमुख हैं। इसके साथ ही चार सौ से अधिक कहानियां भी लिखीं, निबंधों की रचना की और बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान किया। उनकी आत्मकथा 'क्या जानूं मैं कौन' विश्व आत्मकथा साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती है। गुरदयाल सिंह ने विपुल लेखन किया है। 1957 में साहित्यिक पत्रिका पंज दरिया में कहानी ‘भागवाले’ के प्रकाशन के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह जीवन के आखिरी समय तक जारी रहा। कुल 10 उपन्यास, 12 कहानी संग्रह, तीन नाटक, चार कविता संग्रह, बाल साहित्य की नौ पुस्तकें और दो खंडों में आत्मकथा। इसके अलावा समीक्षा और अन्य लेख आदि।

गुरदयाल सिंह का जन्म 10 जनवरी, 1933 को फरीदकोट जिले के जैतो मंडी में हुआ था। उनका परिवार बहुत गरीब था और इसी वजह से उन्होंने पढ़ाई की जगह बढ़ईगिरी वाला अपना पुश्तैनी पेशा अपनाया। छह-सात साल तक उन्होंने परिवार के साथ बढ़ईगिरी और लोहार का काम किया, लेकिन आगे चल कर पढ़ाई भी शुरू की और उच्च शिक्षा हासिल कर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हुए। फिर भी उनका जीवन बहुत ही सादगी से भरा था। लेखन में लगातार उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद वे बहुत ही सहज और सरल बने रहे। आम लोगों से उनका संपर्क बहुत ही जीवंत था। कहते हैं कि प्रोफेसर बन जाने के बावजूद उन्होंने बढ़ईगिरी का काम बंद नहीं किया। सारे औजार रखते थे और घर के छोटे-मोटे काम खुद कर लेते थे। उनकी तुलना मक्सिम गोर्की से भी की जाती है, क्योंकि उन्होंने भी बहुत खाक छानी थी, तरह-तरह के काम किए थे और बढ़ईगिरी भी की थी। गुरदयाल सिंह भारतीय गांवों, किसानों, कामगारों और तमाम दबे-कुचले लोगों के लेखक थे। उनके आत्मीय थे और उनसे लगातार संपर्क रखते थे। उनके समग्र लेखन में उन्हीं दबे-कुचले उत्पीड़ित लोगों की आवाज सामने आई है।

16 अगस्त को 83 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु होने पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए पंजाबी की अप्रतिम कथाकार दलीप कौर टिवाणा ने कहा कि उनकी लेखनी की सबसे ख़ास बात थी कि वे ग़रीब, मज़बूर, हाशिए पर रहने वाले लोगों की बात अपनी कहानियों में करते रहे, क्योंकि वो उनके दिल से निकली हुई बात थी, वो ख़ुद मुश्किल हालात और ग़ुरबत से होकर निकले थे। उन्होंने यह भी कहा कि गुरदयाल कभी किसी वाद से बंधे हुए नहीं थे, किसी इज़्म में उनका भरोसा नहीं था। वो आंखों देखी सच्चाई को अपने उपन्यासों में उकेरते थे। आखिरी दम तक उनका संघर्ष जारी रहा।

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