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आलेख / कवि कर्म की अवधारणा / रेवती रमण शर्मा

आलेख

कवि कर्म की अवधारणा

रेवती रमण शर्मा

विश्वनाथ प्रसाद तिवारर हिन्दी के एक समर्थ समकालीन कवि हैं. उनका ‘गद्य में, पद्य में समाभ्यस्त’ होना बड़ी बात है, किन्तु उससे भी बड़ी बात है उनका एक बेहतर आदमी होना, जिसके जीने के पीछे एक तर्क हो. शरीर में जैसे ‘रीढ़’ होती है, उनके शब्द और कर्म में वैचारिक-नैतिक दृढ़ता है. वह नदी का द्वीप नहीं है, न बहती धारा है. उन्हें हम किनारे का गायक भी नहीं कह सकते. उनका प्रोटेस्ट उनके समष्टि चित्त का प्रतिबिम्बन है. विश्वनाथ जी का जीवन-संघर्ष कड़ा है, जिसे प्रतिबिम्बित करनेवाला उनका लेखन भी विविध रूपात्मक है. उसकी एक अवधारणा है. हम उन्हें कलावादियों के परिसर के बाहर चहलकदमी करते देखते हैं. उनका देश-राग अलक्षित नहीं है, अभिजनान्मुख नहीं है. शास्त्र और लोक में से एक को चुनना पड़े तो विश्वनाथ जी लोक का वरण ही करेंगे, लेकिन वह वस्तुस्थिति है कि वह शास्त्र को जानते और मानते हैं. उनका आधुनिक होना परम्परा की पुकार कान लगाकर सुनने जैसा है. उनकी सिसृक्षा अमूर्तन नहीं जानती, बल्कि उनके साहित्य में अन्तर्दृष्टि ही संरचना है. उन्होंने शिल्प को अनुसन्धान का विषय न बनाकर अहसास की सांस के रूप में अर्जित किया है.

विश्वनाथ जी जाहिर है, कलाकार और अदीब हैं. उनका मूल्यांकन इस रूप में ही अपेक्षित है, किन्तु क्या वह व्यक्ति विश्वनाथ से अलग है? विश्वनाथ जी अपने से किसी को छोटा करके नहीं देखते. उन्हें नदी की वेगपूर्ण धारा गति का सुख देती है और हिमालय पर उनकी दृष्टि टिकी रहती है. सहत् और उदात्त के प्रति उनका आकर्ष स्वाभाविक है. उनका पैत्रृक घर उनके गोरखपुर वाले आवास से उत्तर दिशा में है, जहां से हिमालय उत्तर दिशा में विद्यमान है. उनके व्यक्तित्व को अनन्य साधारण बनाने वाली चीज है उनकी अंतःप्रज्ञा यानी वैयक्तिक प्रतिभा लोक संवेदना से रस ग्रहण करती है और समाजोन्मुख सहज ही बनी रहती है. वे अक्सर ‘अनन्त रूपात्मक जगत’ की चर्चा करते हैं और ‘लोकमंगल’ की भी. ये दोनों आचार्य शुक्ल के समीक्षा शास्त्र के शब्द हैं. इन्हें सार्थकता मिली है विश्वनाथ जी के साहित्य में. उन्होंने एक अवधारणा के साथ स्वानुभूत यथार्थ की अभिव्यक्ति की है, घूम-घूमकर दुनिया देखी है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन और अज्ञेय की परम्परा में विश्वनाथ जी यायावर हुए हैं. जीवन यायावर हो तो साहित्य विश्व-बोध से सम्पन्न होगा ही. उनमें कुछ कबीर जैसी बातें हैं-सत्यनिष्ठा और आनृशंस्य. भाषा में एक खास चमक के साथ नैतिक और जातीय स्मृति को लाने का उपक्रम.

विश्वनाथ जी की कविताएं जिन्दगी से संवाद करती हैं. कहीं वे खुद से तो कहीं अपने अनन्यों से संवादरत हैं. अपनी सदिच्छा और लोक चिन्ता में वे भारतीय मनुष्य की छवि प्रस्तुत करते हैं. जयादा लोग जो जी रहे हैं, वह नहीं लिख रहे हैं. साहस का अभाव लालच का मध्यवर्गीय संस्कार होता है. विश्वनाथ जी में साहस पर्याप्त है, वह कभी-कभार दुस्साहस भी हुआ है.

संगठनों ओर संस्थानों के खिलाफ शुरू से ही लिखने-बोलने वाले विश्वनाथ जी अकेला होने को कभी गौरवान्ति नहीं करते. उन्होंने सार्त्र के प्रसिद्ध कथन, ‘द अदर इज हेल’ का विखंडन किया है. अस्तित्वाद की इस अवधारणा के खिलाफ उन्होंने अपने अनुभव का आख्यान लिखा है, ‘द अदर अज हेवेन’. वे जब भोगी हुई जिन्दगी की इबारत लिखते हैं तो उनकी सिसृक्षा का रहस्योद्घाटन होता है. जिन्दगी की कविता भाषा की सलीब पर प्रत्यक्षानुभूति की तरह प्रभावशाली होती है. उनमें यात्रा के प्रसंग आते हैं, अविराम यात्रा के, ‘आत्म की धरती’ और ‘अंतहीन आकाश’ के. उन्हें जो प्रश्न बेचैन करते हैं, वे आज की राजनीति और समाज-व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करनेवाले प्रश्न हैं. उन प्रश्नों से अज्ञेय भी जूझते रहे, निर्मल वर्मा भी, किन्तु प्रसन्न अभिव्यक्ति तो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की ही है. इसलिए भी कि वे ‘अंत’ को नहीं शुरुआत को अहसास में जगह देते हैं. ‘हर आशा कहीं कुछ तोड़ देती है, हर जिज्ञासा प्रश्नों की अन्धी गली में छोड़ देती है’-यह विश्वनाथ जी की आरम्भिक स्थिति है, किन्तु ज्यों-ज्यों उनकी रचना-यात्रा आगे बढ़ती है, ‘मानव की जय-यात्रा’ का विश्वास बढ़ता जाता है.

विश्वनाथ जी के लिए कविता लिखना पौधा रोपने की तरह है. वह घटित यथार्थ की जमीन पर सम्भावित यथार्थ का सपना है. उसमें स्वार्थ-सम्बन्धों के संकुचित मंडल से ऊपर उठकर लोक सामान्य भावभूमि के उपार्जन की कोशिश है. मुक्तिबोध जिसे ‘परम अनिवार आत्मसम्भव अभिव्यक्ति’ कहते हैं, उसी की तलाश में उनके शब्द सृष्टि की कुंजी बने हैं. एक धारणा यह भी हे कि जो बेहतर कविता लिखता है, वही श्रेष्ठ गद्य भी लिख सकता है. भाव-विचार का उत्कृष्ट संकेन्द्रण, मितकथन का अभ्यास गद्य-शिल्प को समृद्ध करता है. वह सदैव काव्याकांक्षा का प्रसार ही हो, आवश्यक नहीं. कविता शब्द चित्र है, भाव-नृत्य है और गद्य विचार विह्वल. गद्य में विचार-मात्रा लोकेट होती है, कविता की तुलना में अधिक स्पष्टता से, तथापि हम मानते हैं कि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी मूलतः और स्वाभावतः कवि हैं. वे भाषा और साहित्य के गम्भीर अध्येता और आर्चा भी रहे हैं, यह हमें नहीं भूलना चाहिए, लेकिन उनकी संवेदनशीलता और आत्म सजगता ने उन्हें ‘साहित्य का दारोगा’ बनने से रोका है.

अच्छी-अच्छी बातें बोलना, लय के आरोह-अवरोह के साथ और दूसरों की अपेक्षा अपनी अनुगूंजों से खुद ही प्रमुदित होते रहना एक खास तरह की असह्य आत्ममुग्धता के अधीन होता है. श्रोता-समूह को प्रसन्न करनेवाली अभिव्यक्ति ईमान की बात कम ही होती है. सत्याग्रही की वाणी सदैव श्रुतिमधुर नहीं होती. एक सच्चे सर्जक की सबसे बड़ी मुश्किल होती है सत्य को स्वार्थवश अनाहत रखने की. याचिक परम्परा के आचार्य समाज के अंतर्विरोधों पर संकेतों में बोलते हैं तो चीजों को उनके वास्तविक नाम से पुकारने की कला का सत्यानाश हीकरते हैं. विश्वनाथ जी के बोलने और लिखने में उनकी मान्यताओं की शक्ल समझौतावादी नहीं दिखती. स्वत्व और समाज के दो कगारों पर उनकी अभिव्यक्ति उस प्रसन्न पुल की तरह होती है, जिसका निर्माता आत्मा का इंजीनियर है. वह भवभूति को कभी भूलता नहीं, इसलिए कविता उसके लिए आत्मा की कला बनी रहती है.

आचार्य शुक्ल कविता को ‘मनुष्यत्व की साधना’ मानते थे. विश्वनाथ जी शुक्ल जी से सहमत हैं. मनुष्यत्व की साधना के भीतर मानवेतर प्राणियों-पशु-पक्षियों और शेष सृष्टि से लगाव भी आता है. इसलिए विज्ञान के प्रभाव में सब समय मानववादी निष्कर्ष सही नहीं माने जा सकते. विश्वनाथ जी कवि-कलाकार को दार्शनिकों-वैज्ञानिकों से श्रेष्ठतर मानते हैं. यह सृजन में उनकी ‘निज की उपस्थिति’ का सुदृढ़ आधार है. वे जिस माध्यम के प्रयोक्ता हैं, उसमें अटूट आस्था रखते हैं. ‘करुणा’ की हिमायत उनकी इस रचना-मनीषा का ही प्रतिफल है. करुणा भाव नहीं, महाभाव है. कबीर को विश्वनाथ जी याद करते हैं-

पाती तोरेउ मालिनी, पाती माहे जीउ.

जा मूरति का पाती तोरे, ता मूरति निरजीउ...

(मालिनी फूल तोड़ रही है. पत्ती में जीव है. जिस मूर्ति के लिए वह पत्ती तोड़ रही है, वह मूर्ति निर्जीव है. वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस ने इसे छह सो वर्ष बाद अपने प्रयोग में सिद्ध किया कि वनस्पतियों में जीवन होता है.)

(अस्ति और भवति)

विश्वनाथ जी ब्रह्माण्ड के रहस्य-रूपकों पर विज्ञान साहित्य के विशष अध्येता की तरह बोलते हैं, पर उनकी वाग्मिता ज्ञान-गर्व से दूर ही रहा करती है. उन्हें पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी सदैव याद रहते हैं, इसलिए अपनी पंडिताई को वे पाठक पर बोझ नहीं बनने देते. उनके लेखन में अहंकार से बचाव की तमाम हिकमतें हैं. परदुःखकातरता और कृतज्ञता को भारतीय जीवन मूल्यों में रेखांकित करना उनकी आदत में शामिल है. सबसे बड़ी विशेषता उनके लेखन में गूढ़ बात को भी सादगी और सफाई से व्यक्त करने की कला है. उनकी काव्य-भाषा भी उतनी ही सहज है, लेकिन अनुभव-संसार व्यापक है. यायावरी ने विचार-व्यवहार में उन्हें उदार बना दिया है. विश्वनाथ जी पेंचदार आदमी नहीं हैं, सब मानते हैं, तथापि लेखक के रूप में स्वीकृति पाने हेतु उन्हें बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं. वह अवांगार्द हो सकते थे, बोहेमियन हो सकते थे, खानाबदोशों में शामिल हो सकते थे, पर नहीं हुए. उन्होंने सन्तुलन बनाए रखा. इसलिए कि उनमें एक भारतीय किसान का धीरज है. वह इन्तजार करते हैं और विश्वास डिगने नहीं देते. उन्हें दुर्गम यात्राओं का खासा अभ्यास है. उन्हीं का कथन है-

मैंने खुद अपनी आंखों से

सूरज को डूबते हुए देखा है (साथ चलते हुए)

‘देखना’ संक्रमक क्रिया है और यह वैविध्य के साथ उनके साहित्य में घटित हुआ है. उनकी कविताओं में ‘अंधकार’ के नितय नूतन बिम्ब आते हैं. अंधकार में असंख्य ध्वनियां हैं. उन ध्वनियों की पहुंच मिट्टी, पानी, धूप और हवा तक है. सब मिलकर उनकी भाषा रचते हैं. संशय के द्वीप आस्था के प्रवाह को रोक नहीं पाते. अपनी रचनाशीलता को लेकर कहीं एक संशय भी उन्हें हुआ है. उन्हीं की पंक्तियां है-

‘कुछ निकम्मे लोग/जो ठेकेदारी नहीं कर सकते

मेम का पेटीकोट नहीं धो सकते/लिखते रहेंगे कविताएं

उनके बीवी-बच्चे/राशन, तेल की चिन्ता में

उन्हें कोसते रहेंगे/कविता किसी को नहीं मार सकती

सिवा अपने रचयिता के.’ (साथ चलते हुए)

सच है, साहित्य में बने रहने के लिए साहित्य से निर्वासन जरूरी है. एक दौर उनके जीवन में ऐसा भी आया था, जब उन्हें लिखना पड़ा था-

भाषा की ताकत आजमाते हुए जहां पहुंचा हूं-एक खाली

कोटर है/अंडों को निगल गए हैं सांप/

एक चिचियाती चिड़िया साथ में/

साथ में न कोई संपादक न आलोचक.

‘एक चिचियाती हुई चिड़िया हाथ में’ युद्ध का संकेत है. बचाने का उद्यम, जीवन के पक्ष में, जिजीविषा के पक्ष में.

‘कविता क्या है?’ काफी मशक्कत के बाद विश्वनाथ जी समझ पाते हैं कि ‘रचना सतय की सगुण और संवेदानात्मक अभिव्यक्ति है.’ ‘अभिव्यक्ति की खोज कवि-कर्म है और कविता अभिव्यक्त करने की क्रिया.’ एक कवि को अर्थहीन दुनिया को अर्थ देना होता है. उसे शब्दहीन को शब्द देना होता है. ‘शब्द और अर्थ की साधना है कविता.’ सत्य को अधिक सार्थक ढंग से पकड़ने की कोशिश ही उनकी कविता-यात्रा है. एक कवि क्या करता है? वह मौन जीवन को मुखरित करता है यानी नश्वरता को निर्मूल करता है. उसे जो मिलता है, वह जिन्दगी को लौटा देता है.

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की छवि शुरू से अब तक व्यवस्था-विरोधी कवि की रही है. उनका आत्म-रूप `िसिफस का मिथक है. नश्वरता के संज्ञान के बावजूद, सब समय अमरता की आराधना में लगे. वह महारथियों के चक्रव्यूह को भेदने को अभिमन्यु भी बना है. वह लड़ता है और मारा जाता है. जो मारते हैं, पर मारने पर उसे अमर घोषित कर देते हैं-

अपने अंधकार के मलबे में ही

चमकदार कणों को टटोलता हूं

तो भी टूटे शस्त्र हैं मेरे पास

उन्हीं से लड़ता हूं. (साथ चलते हुए)

कवि का जुझारूपन व्यक्तित्व और विचार की दृढ़ता में भी झलकता है. वह देख पाते हैं-

सब अपनी-अपनी आग में जल रहे हैं....

अलग-अलग/अकेले-अकेले

आग केवल आग

सब अपनी-अपनी आग में जल रहे हैं

(बेहतर दुनिया के लिए)

कवि के भीतर आग है. उस आग में वह खुद भी जला है, बल्कि खुद ही जला है, झुलसा है, कंचन की तरह निखर आया है. वह व्यवस्था की विसंगतियों को जला देना चाहता है, पर शब्द के जलाने से व्यवस्था नहीं जलती. शब्दों पर भी कवि का कब्जा नहीं रहा. समाज में चाटुकारों की चलती है. उन्हें शब्दों कोमांजना आता है, भांजना भी. कभी वे शब्दों के जाल को फैलाते हैं, तो कभी उसे सिक्के-सा भुनाते हैं. वे मसीहा हैं, उद्धारक हैं, हैं नहीं, होने की अफवाह फैलाते हैं. विश्वनाथ जी महसूस करते हैं कि ‘शब्द के लिए यह वक्त बहुत बुरा है.’ खासतौर से प्रतिरोध की शब्दावली इतनी बेअसर कभी नहीं हुई. जबकि होना यहा चाहिए कि-

जब मैं कहूं आग तो जले लग शहर

जब मैं कहूं ‘प्यार’ तो बच्चे सटा दें अपने नर्म-नर्म गाल

मेरे होंठों से.

कवि की मुश्किल यही होती है. इस मुश्किल से जूझने वाले कवि का नाम है विश्वनाथ प्रसाद तिवारी. उनकी आकांक्षा का भूगोल वागर्थ का वैभव है. एक कवि के रूप में विश्वनाथ जी चाहते हैं कि दुनिया को बेहतर बनाने में उनकी एक भूमिका हो. वक्त बुरा है ता किस युग के कवि का वक्त अच्छा होता है? क्या वेद व्यास को वह मिला था, भवभूति और कबीर को अच्छा वक्त मिला था? समय का अच्छा या बुरा होना कवि के महसूस करने पर निर्भर है. बोलने-लिखने की आजादी तो चाहिए ही, पर्यावरण भी अनुकूल चाहिए. चारों तरफ चीख-पुकार मची हो तो कवि कृष्ण की तरह बांसुरी कैसे बजा सकता है? बहरहाल, विश्वनाथ जी की आकांक्षा अर्थसघन है. उन्होंने लिखा है-

मैं अपने लाल-लाल शब्दों के साथ

पहुंचना चाहता हूं धमनियों के रक्त तक

मैं अपने उजले-उजले शब्दों के साथ

पहुंचना चाहता हूं स्तनों के दूध तक.

आखिर एक कवि क्या करता है, जो दूसरे नहीं करते हैं? वह हर मुश्किल में जीवन के प्रति आस्था रखता है. वह अपना लहू पाठक के दिल में उड़ेलकर उसे सहृदय बनाता है. अंततः वह जो गाता है, वह स्वछन्द वायुमण्डल का गान होता है.

विश्वनाथ जी आज के कवि हैं, आधुनिक और मुठभेड़ करने वाले कवि हैं. लिख-छपकर सन्तुष्ट हो जाने वाले नहीं. इसलिए ‘स्वगत’ में भी कई बार वे प्रश्नाकुल हो उठते हैं-

कवि जी, लिखीं आपने खूबसूरत कविताएं

तो दुनिया क्यों नहीं हुई खूबसूरत

चला नहीं सकते थे आप सुदर्शन चक्र

उठा नहीं सकते थे गोवर्धन

पर पहुंचा तो सकते थे घायल को अस्पताल.

(आखर अनन्त)

सही है कि विश्वनाथ जी संगठनों, प्रतिष्ठानों की प्रतिबद्धता के साथ नहीं हैं. उन्हें हम नास्तिक भी ठीक-ठाक नहीं मान सकते. उनका आत्मा पर बल है. वे ऐसे किसी शरीर पर विश्वास नहीं करते, जिसमें आत्मा न हो और ऐसी किसी आत्मा पर भी नहीं, जिसका न हो शरीर. आत्मा बड़ी चीज है. वह शरीर में रहती है तो ही प्राणी सजीव होता है. अब जीवन है, मनुष्य का जीवन तो कर्म-योग से दूर कैसे रह सकता है? बड़ी तपस्या से मानव-देह मिलती है तो सिर्फ भोग के लिए नहीं. स्वार्थन्धता से जीवन व्यर्थ हो जाता है. विश्वनाथ जी भयमुक्त समाज चाहते हैं. इसके लिए मनुष्य-मात्र को भयमुक्त करना होगा. शरीर तंत्र पर अधिक भरोसा करना अनुचित है.

इसलिए कवि का अपनी कविताओं में प्रयुक्त शब्दों की सार्थकता को लेकर प्रश्नाकुल हो उठना बेवजह नहीं हो सकता. उसके मूल में नैतिकता का आग्रह है. उसे उपयोगितावादी कहकर टहलाया नहीं जा सकता. विश्वनाथ जी ने

अवधारणात्मक लिखते हुए यदि अवधारणाओं के संकट को महसूस किया है और विचारधारा का उपनिवेश बनने से मना कर दिया है तो उनकी चर्चा उत्तर-आधुनिकतावादी के रूप में भी हो सकती है. उन्होंने स्त्रीवादी विमर्श को अपनी रचनात्मक सहमति दी है. उनकी शुरू की कविताओं पर अस्तित्ववाद का असर ढूंढ़ा जा सकता है. जीवन की तरह मृत्यु भी उनकी चिन्तन-सरणि में मिल सकती है, किन्तु कालानतर में स्थितप्रज्ञता दृढ़ हुई है. विश्वनाथ जी उतने ही आधुनिक या अनाधुनिक हैं, जितने महात्मा गांधी थे, पर मैं एक और बात कहना चाहूंगा. विश्वनाथ जी की लघुकाय कविताएं ऊपर-ऊपर समकालीन काव्य-धारणा के अनुरूप हो सकती हैं, जबकि तत्त्वतः वे कुछ और ही हैं. हम उन्हें महाआख्यान की मनीषा से परिचालित देखते हैं. विश्वनाथ जी करुणा को ‘महाभाव’ कहते हैं और अर्थ के बिना शब्द का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते. वे उन लोगों के गायब होने की खबद देते हैं, जो अच्छे-खासे हट्टे-कट्टे होने पर भी एक अदृश्य हाथ के छूने भर से छूमन्तर हो जाते हैं. उन्हें ‘मनुष्यों की दुर्लभ प्रजाति के गायब होने’ की चिन्ता है. ‘आत्मा की धुन’ कविता में कवि अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर का चित्र खड़ा कर देता है-

...देखा मन्दिर के सिंहद्वार के ऊपरी भाग में

बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स सिखों के बलिदान की

आरे से चीरा जा रहा था एक

तवे पर भुना जा रहा थ दूसरा

दीवार से चुना जा रहा था तीसरा

हाथों से कुचलवाया जा रहा था चौथा...

इस दृश्य से कवि का रोमांचित होना, उस महान जाति को माथा झुकाना क्या साबित करता है कि ‘अब भी इच्छा होती है/ सुनने की वह धुन/ वह धुन विपाशा की तरह उसे पाशमुक्त करती है, शतद्रु की शत-शत धाराओं की तरह/ हीर और रांझाा की तरह/ वह धुन मन से नहीं निकलती/ वेदना की जिजीविषा की/ आत्मा की वह धुन.’

(आखर अनन्त)

कवि तो संतोष तो यही कि ‘उसने चुराए कुछ अमर बीज/ और छींट दिए कागज पर.’ वह स्वयं बेहतर दुनिया के सपने देखता है और जो भी दुनिया को बेहतर बनाने में लगे हैं, उन्हें नमस्कार करता है. उनकी दृष्टि में शब्द और अर्थ अभिन्न हैं, किन्तु ‘शब्द और अर्थ नहीं है कविता/ सबसे सुन्दर सपना है/ सबसे अच्छे आदमी का.’ स्वप्न के बिना कवि क्या, एक सही अर्थ में आदमी होना भी असम्भव है. कवि स्वप्न-दृष्टा होता है और दुनिया से प्रेम करता है. प्रेम करना और कविता लिखना दोनों साथ-साथ हैं-

जो लिखते हैं कविताएं

और करते हैं प्यार

वो धरती को थोड़ा और चौड़ा करते हैं

थोड़ा और गहरा

थोड़ा और नम! (बेहतर दुनिया के लिए)

‘बेहतर दुनिया के लिए’ विश्वनाथ जी ने समर्पित किया है ‘उसे जो महान है हमसे भी/ जिसके लिए हम मर जाते हैं.’ हक के लिए, आजादी के लिए मरते हुए साथियों को देखकर कवि का विश्वास पुख्ता हुआ है-

कि कुछ है

कुछ है जो महान है हमसे भी

जिसके लिए हम मर जाते हैं

(बेहतर दुनिया के लिए)

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अधिसंख्य कविताएं मुक्ति-संघर्ष का रूपक हैं. उसमें बचे हुए के, लड़ते हुए जीने और मरने के वृतान्त हैं. वह एक ऐसे व्यक्ति की छवि है, जो सपने देखता है-

सपने आकाश की तरह अनन्त

सपने क्षितिज की तरह अजनबी

सपने बच्चों की तरह मुलायम

सपने परियों की तरह पंख फैलाए

सपने कोहरे में सोए जंगलों की तरह

उगते दिन की तरह सपने. (एक बेहतर दुनिया के लिए)

कवि का मनोजगत शायद ऐसा ही होता है. कविता भी सपना ही है. कवि के भीतर थोड़ी आसक्ति होती है तो थोड़ी अनासक्ति भी, वैराग्य भी, पर विश्वनााि जी लिखते हैं-

मगर मैं वहां नहीं हूं/जहां वे देख रहे हैं मुझे

मैं उस हरे मैदान में हूं/

जहां रंग-बिरंगे बच्चे खेल रहे हैं

मैं उस समुद्र के किनारे हूं/

जहां प्रेमी-प्रेमिकाएं टहल रहे हैं

मैं उसे आकाश के नीचे हूं/

जहां पक्षी उड़ानें भर रहे हैं

बाहर पराजित/भीतर मैं अजेय हूं

(बेहतर दुनिया के लिए)

याद आते हैं ‘गीतांजलि के रवि ठाकुर-

Where the mind is without Çer

And the head is held high;

Where knowledge is free;...

where word come out from the depth of truth...

Into the heaven of freedom, my mother, let my

Country wake

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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