मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

श्रद्धा सुमनांजली : ब्रम्हलीन गजानंद प्रसाद देवांगन

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हजारों-हजारों साल नरगिस , अपनी बेनूरी पे रोती है ,

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ।

युग युगांतर से मां शारदा के ऋचा –पूत देवालय में एकात्मिक साधनारत जितने भी मनीषियों ने अपनी प्रतिभा की सुरभि विकीर्ण कर दिव्य आराधना की है , उनमें परम श्रद्धेय ब्रम्हलीन गजानंद प्रसाद देवांगन ( बाबूजी) का अन्यतम स्थान है । मेरा सम्पर्क पूज्य बाबूजी से गंगा मैय्या के प्रांगण में मानस संगोष्ठी में वर्ष 2004 में हुआ था । उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व के स्वर्णिम आभा से आलोकित उनका आभा मंडल मेरे जेहन में आज भी जीवंत है । धवल वस्त्रों में अलंकृत उनकी सुगठित काया ने अनायास ही मेरी दृष्टि को अपनी ओर आकृष्ठ किया । मैं उनके निकट गया , शिष्टाचार से चरण अभिवंदन की रस्म अदायगी के पश्चात आत्म परिचय की औपचारिकता का निर्वहन किया । आशीर्वचन के रूप में यशस्वी भव के हृदयोदगार पूज्य बाबूजी की अमृतवाणी से श्रवण कर अनिवर्चनीय आनंद की अनुभूति हुई , जो आज भी मुझे सतत अपनी अज्ञात मंजिल की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा दे रही है ।

जिज्ञासा , जिजीविषा एवं निष्काम कर्म यदि जीवन के पर्याय हैं तो पूज्य बाबूजी का व्यक्तित्व इनका अनूठा जीवंत दृष्टांत है । मैंने उन्हे कभी आदर्शों के हिमालय से नीचे उतरते नही देखा । जब भी मिले , आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित किया , उन बुलंदियों की ओर , जहां पहुंचकर राह भी श्रांत पथिक की भांति चिर निद्रा के आगोष में समा जाती है , और फिर सुनहरे जगत के रंगीन स्वप्न जीवन के यथार्थ से परिचय प्राप्तकर वास्तविक जगत के धरातल पर लौट चलने के लिए मचलते लगते हैं । मानव विश्व नियंता की सर्वोत्कृष्ट संरचना है । उसके जीवन में आशा , निराशा , लाभ हानि , जय पराजय का द्वंद हमेशा बना रहता है । किंतु जो इंसान निःस्पृह भाव से इस द्वंद के भंवर जाल में भी अपनी मंजिल की तलाश जारी रखता है , वह निश्चय ही एक दिन अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है । पूज्य बाबूजी का जीवन इसकी जीवंत मिसाल है । शिक्षकीय व्यवसाय को अपने जीविकोपार्जन के रूप में अपनाकर उन्होने कितने ही साधारण कांच के टुकड़ों को अपनी प्रतिभा से तराश कर ऐसा हीरा बना दिया , जिसकी आत्मा से प्रदेश की धरती गौरवांवित हुई है । चाहे सदगृहस्थ हो या मां सरस्वती का अनन्य अराधक संत अथवा अध्यात्म पंथ का अक्लांत अनुयायी , सभी टाइटिल उनके व्यक्तित्व पर सटीक प्रमाणित होते हुए परिलक्षित होते हैं ।

शासकीय दायित्व से अवकाश ग्रहण के उपरांत भाषा विषयक पाठ्यपुस्तकों की संरचना में उनकी अपनी अहम सहभागिता रही । 9 दिसम्बर 2011 की दुखद बेला में इस महामानव ने जगत के कोलाहल से दूर जाकर चिर निद्रा का आलिंगन किया , साधना पथ के अनुययियों के लिए दिव्य प्रेरणा का यह सुमधुर गीत चिरस्मरणीय रहेगा और उन्हे आनद की अलौकिक स्वर लहरियों से आप्लावित करता रहेगा ।

संध्या का यह ढलता सूरज

श्रम की अमिट निशानी है ।

जो तपता रहा दोपहरी भर

पर जिसने हार न मानी है ।

पथ के कांटे सब बीन लिए

जो पाया वह स्वीकार किया ।

फूलों की चादर फैलाकर

हर अतिथि का सत्कार किया ।

उस महासंत की यादों को

विस्मृत करना बेमानी है ।

रजनी के भीगे आंचल की शबनम भी

उसकी ही करूण कहानी है ।

डा. प्रदीप गुप्ता

शिकारीपारा , बालोद ( छ.ग.)

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