शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

शब्द संधान / अन्दर की बात / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

हिन्दी-संस्कृत में ‘अंतर’ विशेषण / क्रिया-विशेषण की तरह प्रयुक्त होता है | इसका अर्थ है, भीतर का | जो बाहर का न हो | यही ‘अन्तर’ फारसी में ‘अन्दर’ हो गया | और यह ‘अन्दर’ भी हिन्दी में सहज ही आया | अर्थ वही है, भीतर | हम किसी इंसान के आचरण को देख सकते हैं, लेकिन उसके अन्दर क्या है, कोई नहीं जानता |

‘अन्दर’ और ‘अंतर’ में कोई अंतर नहीं है | बात समझ में आती है | लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है | यदि हम कहें ‘अंतर’ और ‘अन्दर’ में कोई अंदर नहीं है, तो यह समझ से परे है | वस्तुत: ‘अंतर’ का एक अर्थ फर्क करना भी है | लेकिन ‘अंदर’ फर्क करने के अर्थ में इस्तेमाल नहीं होता | यह केवल भीतर के अर्थ में ही प्रयुक्त होता है |

हम ऐसा मानते हैं कि की इंसान के अन्दर उसकी आत्मा होती है | अन्दर की आत्मा और बाहर की आत्मा अलग अलग नहीं होती | आत्मा हमेशा अंतरात्मा ही है | संत महात्माओं का कहना है, हमें अंतरात्मा की आवाज़ (अंतर्ध्वनि) सुननी चाहिए | पर वह अक्सर अनसुनी ही रह जाती है | ‘अंत:करण’, भले बुरे का विवेक करने वाली,भीतरी इन्द्रिय है | भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार – इन चार वृत्तियों से मिलकर अंत:करण बना है |

ह्रदय को भी अंतर कहा गया है | वह भी अन्दर ही होता है न | यहाँ मतलब शरीर के अन्दर धड़कते भौतिक ह्रदय से नहीं है | इंसान का “अंतर” उसका वह ह्रदय है जिसमे उसका विवेक और उसकी सद्भावनाएं बसती हैं | कभी कभी हमारे व्यवहार को हमारा “अंतर” स्वीकार नहीं कर पाता | तब हम मुश्किल में पड़ जाते हैं | और एक आतंरिक संघर्ष में,“अंतर्द्वंद्व” में, घिर जाते है | |ह्रदय को तो अंतर कहते ही हैं, लेकिन बात अधिक स्पष्ट करने के लिए इसे “अंतर्घट” भी कहा जाता है | अंतर इस प्रकार हमारा मन है, आत्मा है, ह्रदय है, | अंतस है, दिल है |

हम खिड़कियों में,दरवाजों में, परदे डाल देते हैं ताकि कोई बाहर से अन्दर न देख सके | यही कारण है कि परदों को “अंतरपट” कहा गया है | हिन्दी में अंग्रेज़ी शब्द underwear के लिए प्रचलन में कोई अच्छा शब्द नहीं है | इसे अन्तरीय या अंतर्परिधान या अंतर्वस्त्र कहा गया है | लेकिन इनमें से कोई भी प्रचलन में अभी तक नहीं आसका है | पर अन्डर्वेयर को भी हिन्दी स्वीकार नहीं कर सकी है |

अंग्रेज़ी में एक शब्द है “इंटर” (आई-एन –टी -ई-आर)| यह दो चीजों के मध्य की स्थिति का द्योतक है | स्कूल और कालेज की शिक्षा के बीच एक ‘इंटरमीडियट’ मध्यवर्ती शिक्षा भी है | ‘इंटर’ वह है जो दो के मध्य सम्बन्ध स्थापित कर सके | अंग्रेज़ी का ‘इंटर’ हिन्दी के “अंतर” के बहुत नज़दीक है –अर्थ में भी और उच्चारण में भी | दोनों में एक तरह का पारिवारिक साम्य है | भारत में विवाह-सम्बन्ध अधिकतर एक जाति के ‘अंतर्गत’ (मध्य) ही होते हैं | लेकिन अब काफी छूट मिलने लगी है | पर आज भी इन ‘अंतरजातीय’ विवाहों को बहुत अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता | ज़ाहिर है अन्तर्जातीय को अंग्रेज़ी में inter-caste ही कहेंगे | ‘मध्यवर्तीय’ के अर्थ में इस ‘इंटर’ या हिन्दी में,‘अंतर’, को लेकर अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों में हीं अनेकानेक शब्द बन गए हैं | “अन्तर्विद्यालयीन” “अंतर्राष्ट्र्वाद” “अंतरप्रांतीय” “अंतरसंबंध” “अन्तर्क्षेत्रीय” , इत्यादि |

अंग्रेज़ी में एक शब्द है, intuition. हिन्दी में इसके लिए कोई उपयुक्त शब्द ढूँढ़ पाना मुश्किल ही है | इसे अंत:प्रज्ञा कहा गया है | अंतर्बोध और अन्तर्ज्ञान भी कहा गया है | (इसी तरह जो आपके मन की बात जान ले उसे अन्तरज्ञ कहते हैं | )

आज इंटरनेट का ज़माना है | इन्टरनेट का अनुवाद हिन्दी में “अंतरजाल” किया जाया है | लेकिन अन्तेर्जाल पुराने ज़माने में कसरत करने की एक लकड़ी हुआ करती थी | मुझे लगता है कि अनुवाद के इस मकडजाल में हिन्दी को फंसना नहीं चाहिए | कम्प्यूटर के इस युग में इन्टरनेट, इण्टरकॉम, जैसे, शब्दों से कौन कम्प्यूटर-साक्षर व्यक्ति परिचित नहीं है ? इन शब्दों को हम, हिन्दी में ज्यों का त्यों रहने देकर, ज़बरदस्ती अनुवाद की तवालत से बच सकते हैं |

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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