समीक्षा- राम भरोसे : व्यंग्य संग्रह

समीक्षा-

राम भरोसे - व्यंग्य और रोचक आलेख

लेखक - डॉ. सुरेंद्र वर्मा.

उमेश प्रकाशन

इलाहाबाद,2011.

 

जीवंत व्यंग्य-विधा का प्रतीक <राम भरोसे>

किसी भी रचना की श्रेष्ठता और सम्पूर्णता इस तथ्य पर निर्भर करती है कि उसका प्रभाव पाठक पर कैसा पड़ता है. इस दृष्टि से डॉ. सुरेन्द्र वर्मा का व्यंग्य निबंध-संग्रह, राम भरोसे

कसौटी पर सही उतरता है. इस संग्रह का प्रत्येक निबंध अपने शीर्षक के अनुरूप लेखक के उद्देश्य की पूर्ति करता है.

डॉ. सुरेंद्र वर्मा का यह निबंध संग्रह उनके अन्य व्यंग्य आलेखों की श्रंखला की एक कड़ी है और एक मज़बूत कड़ी है. इन निबंधों की तीन ऐसी प्रमुख विशेषताएं हैं जो इनकी पठनीयता को विशेष धार देती हैं. एक, निबंधों का समसामयिक होना, दो, व्यंग्य

से पहले विषय के विविध पक्षों का विश्लेषण और तीन, व्यंग्य का ऐसा स्मित प्रहार कि सम्बंधित पक्ष यदि तिलमिलाए भी तो कुछ कह न पाए. ये विशेषताएं लेखक के गहन अध्ययन, सहज सरल स्वभाव और कूट हास्य के परिणाम हैं. इसी कारण उनका व्यंग्य अधिक सम्प्रेषणीय है.

संस्कृत साहित्य में व्यंग्य विषय को लक्षणा अथवा व्यंजना में प्रस्तुत किया जाता रहा था. अमिधा में व्यंग्य द्विवेदी कालीन युग या उससे पहले भातेंदुमंडल के रचनाकारों को प्रिय था. भार्तेंदु का अंधेर-नगरी नाटक अमिधात्मक होते हुए भी पूर्णतः लक्षणा की ओर उन्मुख है. वह तत्कालीन ब्रिटिश राज्य पर व्यंग्य है. बालकृष्ण भट्ट या बालमुकुंद गुप्त के व्यंग्य भरे निबंध एक व्यंजनात्मक समीक्षा के बाद अपने निष्कर्ष पर पहुंचते हैं. डॉ.वर्मा के व्यंग्य प्रतीक्षा नहीं कराते. उनके व्यंग्य की प्रभावशीलता प्रथम वाक्य से ही प्रारम्भ हो जाती है. यह उनकी विशेषता के साथ-साथ काल-सापेक्ष स्थिति का भी प्रभाव है.

सबसे बड़ी बात इन व्यंग्य निबंधों में स्तरीयता है. ये कभी भोंड़े और आपत्तिजनक शब्दावली में नहीं होते. विषय विवेचन और भाव प्रवाह दोनो साथ चलते हैं. इससे एक कौतूहल सा बना रहता है. कभी-कभी वे लघु कथाओं का सहारा लेकर व्यंग्य की धार और तीखी करने का प्रयास करते हैं. संग्रह के प्रथम निबंध, अंतरात्मा की आवाज़, को ही लें. उसका यह वाक्य,

अंतरात्मा हो या न हो लेकिन उसकी आवाज़ से शायद ही कोई बच सका हो
उसकी आवाज़ हमारी बोलती बंद कर देती है.

देखने और पढने में यह एक साधारण वाक्य लगता है परंतु इसकी <आवाज़> सचमुच प्रत्येक व्यक्ति की अंतरात्मा को जैसे टटोल लेती है और वह अपने पर ही स्मित हास्य

कर बैठता है. इसमें जो मीठा और छोटा सा उदाहरण उन्होंने प्रस्तुत किया है उसमें यह छोटी सी टिप्पणी, <आज तक तड़प रहे हैं> कचोट कर ही रख देती है.

इन व्यंग्य निबंधों की एक और बड़ी विशेषता लोकोक्तियों और मुहावरों के अंतरतम को टटोलना है. इसमें लेखक की अध्ययन-शीलता परिलक्षित होती है. अंतरात्मा की आवाज़, उंगलियों के पंचशील, चढना चरबी का, चल दरिया में डूब मरें, ढम-ढम बाजे ढोल, नंग बड़े परमेश्वर से, बंदर बुखार, बग़लगीरी, बयानो की बाजीगरी, बिना भेजे के मुरगे, मै इक बादल आवारा और राम भरोसे, आदि, शीर्षक अपनी व्यंग्य क्षमता को शुरू से ही व्यक्त करने लगते हैं.

निबंध बहुमुखी हैं. इनमें विविधता है. न कहते हुए भी व्यंग्यकार जीवन के विविध पक्षों पर बहुत कुछ कह जाता है. समाज, राजनीति, आडम्बर, धर्म, सभी क्षेत्रों में डॉ वर्मा की लेखनी स्मित हास्य बखेरती है. साथ ही लेखक इतनी बहुलता के बावजूद उसे संवारने में कहीं गड़बड़ाया नहीं है. राम भरोसे, शीर्षक लेख भी, जिसे इस पुस्तक का नाम भी दिया गया है, संग्रह की एक महत्वपूर्ण कड़ी है.

मेरा यह आग्रह और अनुरोध है कि डॉ वर्मा अपनी यह व्यंग्य परम्परा निरंतर हमें परोसते रहें ताकि उदास मन को एक मधुर हास्य का आनंद मिलता रहे.

(श्रीधर दीपेश)

22, पत्रकार कॉलोनी

अशोक नगर, इलाहाबाद

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