गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

नाद का महत्व-आध्यात्मिक एवं धार्मिक परिप्रेक्ष्य में - श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता



नाद का महत्व-आध्यात्मिक एवं धार्मिक परिप्रेक्ष्य में

श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता
(एम.ए. संस्कृत विशारद)

अनादि काल से मानव का सम्बन्ध नाद से रहा है। पृथ्वी का आरम्भ भी नाद से ही हुआ है। वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि एक धमाकेदार नाद के साथ ही पृथ्वी का प्रादुर्भाव हुआ। वही नाद आज भी हमारे जीवन में ऐसा रच बस गया है कि हमारे धार्मिक स्थल निनाद से गुंजायमान हैं। भारत ही नहीं विश्व की अनेक धार्मिक धरोहरों में घंटी की प्रतिध्वनि कर्णगत होती है। भारत के प्रत्येक भारतीय हिन्दू घरों में भी प्रातः सायं की जाने वाली भगवान् की आरती में भी घंटियों की चिरपरिचित मधुर ध्वनि सुनाई देती है। विद्वानों ने घंटियों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया है-

गरुड़ घंटी- यह आकार में छोटी एवं मधुर ध्वनि वाली होती है। इसे एक हाथ से बजाया जाता है। बच्चे भी इसे सुगमता से बजाते हैं। सामान्यतः घंटी के ऊपरी भाग पर गरुड़जी का मुख बना होता है।

द्वार घंटी- यह घंटी मंदिर के द्वार पर लगी होती है। मंदिर में प्रवेश के पूर्व ही इसे बजाया जाता है। मंदिर के आकार-प्रकार, प्राचीनता एवं प्रसिद्धि के अनुसार इन घंटियों की बनावट बड़ी या छोटी होती है।

हाथ घंटी- यह घंटी गोल किन्तु प्लेट के समान चपटे आकार की होती है। इसका निर्माण ठोस पीतल से किया जाता है। मंदिरों में आरती के समय लकड़ी के हथौड़े से ठोकर कर इसे बजाया जाता है। विद्यालयों में भी इस प्रकार की घंटियों का प्रयोग किया जाता है।

घण्टा- यह आकार में विशाल होता है। सामान्यतः पाँच फुट से भी अधिक लम्बा व चैड़ा होता है। इस घण्टे की गूँज (प्रतिध्वनि) कई किलोमीटर तक आसपास की बस्तियों में सुनाई देती है। वहाँ के रहवासियों के लिये यह समय सूचक भी है और आरती में सम्मिलित होने की सूचना भी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्राचीनकाल में राजाओं के दरबार में विशाल घंटे द्वार पर ही मोटी-मोटी चेन से बंधे होते थे। यदि किसी भी व्यक्ति को न्याय की याचना राजा से करनी होती थी तो वह व्यक्ति किसी भी समय उपस्थित होकर विशाल घंटे को बजाकर राजा से न्याय की गुहार कर सकता था।

ढोल तथा नगाड़ा: ढोल तथा नगाड़े की ध्वनि का भी आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व है। प्राचीन समय में राजाज्ञा का प्रसारण नगरों के चैराहों पर नगाड़े बजाकर किया जाता था। षिव एवं देवी मंदिरों में आज भी आरती के समय नगाड़े की ध्वनि का विषेष महत्व है। भारत में आज भी सभी सुप्रसंगों पर ढोल बजाये जाते हैं। महिला-संगीत, पूजन कार्य, भजन-कीर्तन तथा बालक के जन्म आदि के समय भी ढोल वादन किया जाता है। ढोल एक सर्वसुलभ वाद्य है। ‘‘दूर के ढोल सुहावने होते है‘‘ यह मुहावरा आधुनिक समाज के उन युवक युवतियों पर लागू होता है जो विदेषों की चकाचैंध भरी जीवन प्रणाली को देखकर वहाँ बसने की मनोकामना करते हैं।

इलेक्ट्राॅनिक घंटी-आधुनिक समय में इलेक्ट्राॅनिक वाद्य यंत्रों के आविष्कार के फलस्वरूप एक बटन के दबाने से ही सभी वाद्य यंत्रों की ध्वनि का प्रसारण हो जाता है। यह विज्ञान के आविष्कार का ही प्रतिफल है।
मंदिर में घंटी बजाने के धार्मिक कारणों के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी परिलक्षित होता है। वैज्ञानिक आधार पर यदि हम विश्लेषण करें तो इस निनाद से होने वाले कम्पन के कारण आसपास के वातावरण में व्याप्त सूक्ष्म जीव, विषाणु तथा अन्य सरिसृप सावधान हो जाते हैं तथा अति सूक्ष्म जीव नष्ट भी हो जाते हैं। आसपास के वातावरण की शुद्धि हो जाती है। पहाड़ियों के निचले इलाकों में निवासरत ग्रामीण जन जो आरती में सम्मिलित होना चाहते हैं, वे भी अपनी उपस्थिति भगवान के मंदिरों में दे देते हैं।


नियमित घंटियों की ध्वनि से वातावरण में पवित्रता और शुद्धता आती है। अगर और देशी कपूर की सुगन्ध से आसपास का वातावरण सुगन्धित होकर मंगलकारी हो जाता है। सकारात्मक ऊर्जा के साथ ही देवी-देवताओं में भी चैतन्य का आभास होता है। उपस्थित भक्त अपने आराध्य के आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। चहु ओर वातावरण में आध्यात्मिक शान्ति से परिपूर्ण हो जाता है। दिनभर की दौड़-धूप और तनावपूर्ण वातावरण से भक्तजन को मानसिक शान्ति प्राप्त होती है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्तजन तन्मय होकर घंटी बजाते हैं, उनके पूर्व जन्म में किये गये पाप नष्ट हो जाते हैं। नदियों के किनारे बसे हुए शहरों में शाम के समय नदियों की आरती भी की जाती है। जो भक्तजन नदी आरती में सम्मिलित होते हैं, उन्हें भक्ति के आनंदातिरेक की अनुभूति होती है, उसे शब्दों मेे व्यक्त नहीं किया जा सकता है। क्षिप्राजी, नर्मदाजी तथा गंगाजी आदि नदियों की सांध्य आरतियों में उपस्थित होने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानों स्वर्गलोक से समस्त देवी देवता अपने भक्तगणों को आशीर्वाद प्रदान करने हेतु उपस्थित हो गये हों। आरती के समय बजाई जाने वाली घंटियों, झाझों तथा अन्य वाद्यों की ध्वनि विशिष्ट्य ही रहती है।

जैन, बौद्ध आदि मंदिरों में भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी यथा कम्बोडिया, थाइलैंड, नेपाल, जापान, लंका आदि देशों में घंटाध्वनि करने की परम्परा प्रचलित है। अभी प्रधानमंत्रीजी की जापान यात्रा में उन्हें भेंट स्वरूप एक सुन्दर कर्णप्रिय घंटी दी गई थी। ईसाई गिरजाघरों में भी मेरी-क्रिसमस तथा नववर्ष के स्वागत लिए ये घंटियाँ बजाई जाती है।

अनादिकाल से बजने वाली मन्दिरों की इन घंटियों का मानव समाज से गहरा सम्बन्ध है। इन घंटियों के वादन से हमारी सुप्त आध्यात्मिक चेतना जाग्रत होती है। आबाल वृद्ध सभी सायंकालीन ईश्वर प्रार्थना में सम्मिलित होकर दिनभर के तनाव तथा परिश्रम को विस्मृत कर अल्प समय में ही मानसिक शान्ति प्राप्त कर आने वाले कल के लिए नव स्फूर्ति और नव जाग्रति का अनुभव करते हैं।
आधुनिक युग की वर्तमान पीढ़ी भी यदि पूर्ण रूप से मानसिक शान्ति चाहते हो तो प्रातः पाँच मिनिट एवं सायं पन्द्रह से बीस मिनिट ईश प्रार्थना करते हुए अपने जीवन में स्वर्णिम सफलता प्राप्त करते हुए उत्तरोत्तर प्रगति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता
एम.ए. संस्कृत विशारद
Sr MIG 103 व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)
Ph.:0734-2510708, Mob:9406660280
----------------------------------------------------------- Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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