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विज्ञान कथा / शिव के सानिध्य में / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

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यान-त्रिशंकु

अजितेय और केन विस्मित नेत्रों के सबसे ऊँची डेक पर खड़े गरुढ को अन्तरिक्ष में बढ़ते हुए देख रहे थे। यह अन्तरिक्ष स्थित पूर्ण रूपेण सज्जित वेधशाला उस विशाल अन्तरिक्ष यान के उद्यान में स्थित थी और उसमें चारों ओर क्यारियों में खिले सुन्दर गुलाब के पुष्प नेत्रों को एव् तोषदायक शान्ति प्रदान कर रहे थे। प्रोब क्रमश: गति बढाते हुए अदृष्य सा होता जा रहा था। अजितेय ने केन को ध्यान से देखा। वह प्रोब को अब भी देखने का असफल प्रयास किये जा रही थी।

त्रिशंकु पृथ्वी से एक हजार प्रकाश वर्षों को दूरी पर अंतरिक्ष में स्थित था। उसके चारों ओर अंतरिक्ष गैसों और उनसे निर्मित बादलों का लीला नर्तन नैनाभिराम था, मोहक था और त्रासद भी। त्रासद इस कारण, क्योंकि अजितेय के मानस में अपने अस्तित्व का प्रश्न भी यदाकदा इन्हीं अन्तरिक्षचारी अभ्रों की गति की भांति, बरबस कौंध जाता था, तथा समय के, काल के परिपेक्ष्य में एक प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देता था।

अति सघन श्याम-विवर जो वृश्चिक राशि में स्थित था, वह अतीव तीव्रता से तप्त गैसों को उदस्थ कर रहा था। उससे पश्चिम में एक त्रिकोणीय चक्री प्लाज्मा, तप्त गैसों का पुंज जो तीन प्रकाश वर्ष विस्तार का था, क्रमश: शीतल तो हो रहा था परन्तु उससे निसृत रेडियेशन, अति घातक था। उसकी चमक सर्वत्र चकाचौंध उत्पन्न कर रही थी। दूसरी ओर पूर्व में, वृश्चिक राशि के मध्य बिन्दु के पूर्व में एक विचित्र विस्तृत होती गतिविधि चल रही थी। यह एक सहस्र वर्ष पूर्व हुआ अन्तरिक्ष विस्फोट था, जो विस्तृत होता हुआ बढता जा रहा था।

श्याम विवर में रक्त तप्त तारे टूट कर अदृश्य हो रहे थे और उस गतिमान अंतरिक्ष में नाश का, विनाश का नृत्य, रेडियो मैग्नेटिक ऊर्जा सृजन के साथ, चल रहा था।

'तुम्हें कैसा लग रहा है" अजितेय के स्वरुप ने केन के स्वरुप से प्रश्न किया।

''यही प्रश्न तो तुम त्रिपथगा से भी कर चुके हो' केन का उत्तर था।

'क्या कहा था उसने?" . क्या बताया था उसने ?

'हम सभी के स्वरुप उस अतिसूक्ष्म नैनों क्रिस्टल कम्यूटर कैप्सूल में बन्द हैं और उसी के माध्यम से हम इस विशाल श्याम विवर के मध्य में जाकर इस अंतरिक्ष नर्तन के विभिन्न पक्षों का अध्ययन कर सकते हैं।

वहाँ हम मन व शरीर से जा नहीं सकते" त्रिपथगा ने कहा, ।

_ "उसका कथन ठीक है। इस भीषण रेडिएशन को मापने के लिए, ऊर्जा कणों की क्षणभंगुरता मापने के लिए, मात्र यही विकल्प है" केन ने स्पष्टीकरण दिया।

''यही शिव का नृत्य है" अजितेय ने कहा।

'मैं समझी नहीं केन ने तत्काल कहा।

"|तुम समझोगी भी नहीं" अजितेय का उत्तर सुन केन मौन हो गयी।

''आओ चलें त्रिपथगा" अजितेय ने संकेत दिया।

'उस प्रोब में, विशेष रूप से निर्मित कैप्सूलों को, सभी प्रकार के वैज्ञानिक प्रश्नों के समाधान हेतु, जो उस तप्त दिक काल रहित प्लाज्मा पुंज में घटित हो रहे हैं, के अध्ययन हेतु भेज तो दिया गया है, परन्तु उनके विवरण हमें कब प्राप्त होंगे, यह ज्वलन्त प्रश्न मेरे मानस में लगातार कौंध रहा है" एक दार्शनिक की भांति त्रिपथगा ने कहा।

"समय की प्रतीक्षा ही मात्र उचित विकल्प है", अजितेय ने स्पष्ट किया।

केन त्रिपथगा की तलाश में अजितेय के कैबिन में आ गयी उसने अजितेय को देखा कुछ पलों तक, और कहने लगी मैं तुम्हारे शिव के नृत्य को नहीं जानती, क्या तुम मुझे स्पष्ट कर सकते हो?"

क्यों नहीं अजितेय का संक्षिप्त सा उत्तर था ।

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अजितेय अपने कक्ष के एक कबर्ड को खोल कर एक काँस्य की, ब्रॉज की प्रतिमा हाथ में लिए आ गया । वह विचित्र लगी केन को।

उस प्रतिमा को केन की हथेली पर रखकर' अजितेय ने कहा 'यह नटराज-शिव हैं।' इनके चारों ओर जो शक्ति पुंज बनाया गया है, जिससे ज्वाला निकलती दर्शायी गयी हैं, वह ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।''

ओह! तो यह प्रतिमा किसी विशेष क्रम का संकेत करती है' कुछ चकित भाव से केन ने कहा। तुम अब भारतीय चिन्तन को समझने के समीप हो '

अजितेय का उत्तर था। परन्तु भारतीय धर्म में इतनी भिन्नता है, इतने देवता, देवियां क्यों है ?

यह जान सामान्य के बौद्धिक स्वच्छन्दता की चरम पराकाष्ठा का, स्वतंत्र चिन्तन का परिणाम एवं प्रतीक है। ' बहुदेववाद भी 'अन्त में सिमट कर, पूंजीभूत होकर एक अदृश्य प्रेरक शक्ति में लय हो जाता है, लीन हो जाता है, उस शक्ति का अंश बन जाता है, जो इन अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों को नियंत्रित करती है, विस्तृत करती है, सृजन करती है, और विनाश करती है, संहार करती है'' अजितेय वैज्ञानिक-दार्शनिक सा लगा केन को। वह मौन श्रोता थी।

'शिव को यह प्रतिमा, उसी अनादि काल से सतत सृजन एवं संहार का, ऊर्जा के नर्तन का, शक्ति के क्षरण और पुर्नसृजन का प्रतीक है।

' अद्भुत है तुम्हारा भारतीय दार्शनिक चिन्तन । मुझे गम्भीरता से इस का अध्ययन करना पडेगा" केन ने प्रशंसायुक्त स्वर में कहा।

तुम्हारे इस विचार का स्वागत है" संक्षिप्त सा अजितेय का उत्तर था।

- गरुड

हम अपने यान के हाईपर जम्प के उपरान्त जाग गये। यह हाइपर जम्प अन्तरिक्ष में स्थित उस टनल का, उस बात विवर का क्षेत्र था जो जापानी वैज्ञानिक कलावीयू के द्वारा खोजा गया था। प्रौब को, गरुड को, अन्तरिक्ष में गैलेक्सियों के मध्य, सम्पेषित किए कई दिन हो चुके थे। वह पाँच प्रकाश वर्ष की दूरी तय कर चुका था, उसको स्पीड, गति बढ रही थी। वह एन्टीमैंटर चालित प्रोब था। उसका बाहरी कवच सुदृढ था और गति संतोष जनक। यह सूचना पैनल पर लगातार आ रही थी।

त्रिशंकु के ऊपर, चारों ओर छाये गैलेक्टिक बादल, निहारिकाओं के बादल और घनीभूत हो गये थे। चारों तरफ गहन अंधकार था। हमारा यान त्रिशंकु श्याम विवर से निकल कर , उस चमकीले तारे की ओर बढ़ रहा था जो स्वत: श्याम विवर वृश्चिक नक्षत्र स्थित, श्याम विवर में उदरस्थ होने से बच गया था। सम्भवत: उसकी आभा जो तीव्र थी, इसी तथ्य की घोषणा कर रही थी। स्क्रीन पर श्याम विवर का मध्य घनीभूत भाग जो तप्त नीले तारामंडल, जिसे हम बी.आर.एस-२० कहते थे, की तरफ बढ़ता दिख रहा था, और एक दूसरा लाल तप्त तारा बी.आर.एस-१० श्याम विवर के तेज चक्रवात से बचने का प्रयास कर रहा था, यह पैनल पर उभर रही गामा किरणों और इन्फारेड के उत्पन्न होने की गति से स्पष्ट हो रहा था। ,

अजितेय और केन उस तारों को ध्यान से देखने का प्रयास कर रहे थे जो न तो अतिशय घनीभूत थे और न ही अति स्थिर। वे यह जानने का प्रयास कर रहे थे कि यह प्लूटों के समान गति करने वाला तारा उस श्याम विवर के मुख में जाने से कैसे बचा है। ,.

इस आश्चर्यजनक तथ्य का अध्ययन करने के लिए मैं अजितेय अपनी आवजरवेटरी, वेधशाला में जाना चाहता हूँ।

तथ्यत: ऐसी वेधशाला थी ही नहीं, वहाँ न टेलिस्कोप था, न कुर्सी और न टेबल ही और न टेलिस्कोप को देखने के लिए सीढी ही। हम तो कम्यूटर कैप्सूल में बन्द थे। हमारी यान के संचालन की सफलता ही हमारी मानवीय प्रतिरूपों की सफलता थी। हमारा रूपान्तरण, इस भीषण ऊर्जा पुंज को. सहन करने में सफल था और इस प्रकार हमारे सृजन भी संतुष्ट थे। इस प्रकार केन वेधशाला के पैनेल के सम्मुख ''बैठ गयी" और 'ऊपर" सीढियाँ चढ कर टेलिस्कोप को नियंत्रित करने लगी। सब कुछ स्पष्ट दिख रहा था। अचानक मेरा मानस अपने जन्म स्थल जो अंतरिक्ष स्टेशन पर, था, हाँ ! ऊर्ट-बादलों के सोल नाम सिस्टम में स्थित था, के ऊपर चला गया। अन्तरिक्ष मेरा वास स्थल, जन्म स्थल था, इस कारण मैं आज तक यह न समझ सका कि कैसे भूमि-पुत्र मानव अंतरिक्ष में रह सकते हैं। वे किस प्रकार प्रदूषित वायु में जीवन यापन कर सकते हैं।

. जीवित रहने के लिए श्वास ले सकते हैं। केन और त्रिपथगा धरा वासी वैज्ञानिक थे, और मैं था वास्तविक प्रथम अंतरिक्ष जन्मा भारतीय।

किसी मानस स्वरूप की यह प्रथम निहारिकीय यात्रा थी। यही सोचता अजितेय सीढियों से नीचे उतर आया। "केन तुम इस त्रासद अन्तरिक्ष अभियान में बोर तो नहीं हो रही हो' अजितेय ने पूछा। ---

''प्रश्न ही नहीं है, यह विकिरण के रेडिएशन के आंकडे इतने जटिल और अस्पष्ट हैं, कि इनको स्पष्ट करने में ही मेरा सारा समय निकल रहा है' केन का उत्तर सुन कर अजितेय प्रसन्न हो उठा। उसने जानबूझ कर केन से पहले प्रश्न किया था। वह चाहता था कि केन उसके त्रिपथगा के प्रति आकर्षण को न जान सके। त्रिपथगा उसको आकृष्ट करती थी।

'और त्रिपथगा तुम'' अपने स्वर में मधु घोलते हुए उसने प्रश्न किया।

'मैं तो श्याम विवर में समा रहे पिंडों की गति निर्धारण के प्रयास में उलझी हूँ। मुझे मेरा विषय प्रिय है'' त्रिपथगा ने मुझे देखते हुए उत्तर दिया। अंतरिक्ष यान के कैप्टन का दायित्व होता है, अपने मनोभावों को व्यक्त न करना। मेरे भावों को त्रिपथगा जानती थी अव्यक्त रूप में। अजितेय ''केन के स्वर में उत्तेजना थी, वह मास स्पेक्ट्रोमीटर की रीडिग जहाँ पर कुछ नहीं दिख रहा है, उस क्षेत्र में घनीभूत 'मास' दिखला रहा है।' 'हो सकता है कि वहाँ कोई नवीन तारा उत्पन्न हो रहा हो' अजितेय ने सुझाया।"'

"'पर यह बिन्दु उस श्याम विवर के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बहुत दूर है'' केन ने कहा।

''हो सकता है कोई सुपर हैवी स्टार उदय हो!"

'पर वह कुछ करोड वर्षों का जीवन पायेगा"

"केन चिन्ता मत करो। यह विवरण मुख्य यान के कष्यूटर को प्रेषित कर दो' अजितेय के विचार से त्रिपथगा भी सहमत थी।

यान-त्रिशंकु

अजितेय और केन शतरंज खेलने में व्यस्त थे। वातावरण में शह-चेक और चेक नहीं की आवाजें थीं। अजितेय अच्छा खिलाड्री था। वह तीसरी बार भी जीत गया, परन्तु केन के चेहरे पर शिकन नहीं थी। वह उस खिलाड्री की भांति थी, जो जानता था कि हार-पराजय निश्चित है- पर डटा रहता है, खेल के मैदान में, क्रीडा-प्रांगण में। अंतरिक्ष की अज्ञात गहराइयों में उनके मनोविनोद का यही साधन था।

उनका शतरंज का खेल वैज्ञानिक सूचना के मिनी कैप्सूल की प्रतीक्षाजन्य आतुरता को शमनार्थ बढता गया। ऐसा लगता - था कि यह शतरंज का खेल अनिवार्य सा हो गया है, दोनों शहर और मात के ताने-बाने में रम गये थे। कभी केन जीत जाती तो कभी अजितेय। एकाएक अजितेय उठ गया और उसने शिव की ताण्डव नृत्य करती प्रतिमा को कवर्ड से निकाल कर सामने की शेल्फ पर रख दिया।

'"यहाँ क्यों ? केन का प्रश्न था।'

"तथ्यों के स्पष्टीकरण और साक्षातकार हेतु अजितेय का उत्तर था। 'इस नटराज शिव की मूर्ति के चारों ओर ज्वाला निकलनी क्यों दर्शायी गयी हैं?'! केन ने जानना चाहा। 'यह उसी स्थित का प्रतीक है जिससे हम इस समय साक्षात्कार कर रहे हैं' अजितेय ने उत्तर दिया।

'क्या अर्थ है, इसका?"

'यह ज्वालायें, इस अनन्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त शक्ति को उसने विविध रूपों के रेडियेमान को, तथा उससे उत्पन्न ऊर्जा की प्रतीक हैं' अजितेय ने स्पष्ट किया।

''सूचना का मिनी कैप्सूल का गया है'' त्रिपथगा के इस कथन ने सभी को चैतन्य कर दिया।

गरुड

मानव मस्तिष्क के विचार नैनो कम्पयूटर से पुन: उत्पन्न होने पर मानवीय विचार ही होते हैं। यद्यपि उनमें जैविक क्रियाओं की आवश्यकता, जैसे वे एन्जाइम जो जैविक इच्छाओं, भूख, प्यास, निद्रा, काम, क्रोधादि को नियंत्रित करते हैं, नहीं होते परन्तु स्वभाव के गुण तो विकसित रहते ही हैं। इसी कारण मेरा दायित्व था कि मैं इन गुणों को संरक्षित रखने में सक्षम रहूँ। अब सोने का समय हो गया है। केन और त्रिपथगा विगत १८९ घण्टों से कार्यरत थीं। उनकी क्षमता का क्षरण न हो इस कारण निद्रा आवश्यक थी।

"त्रिपथगा अब सो जाओ' केन ने कहा।

वहाँ प्रोग्राम के संतुलन से लिए यह आवश्यक है इस प्रोग्राम में उत्पन्न हुयी त्रुटियों के निराकरण के लिए यह आवश्यक है तथा यह भीषण रेडिएशन जो हमारे प्रोग्राम के लिए घातक है उसके द्वारा उत्पन्न हुई समस्याओं को ठीक करने के लिए भी" कहती हुई त्रिपथगा मौन हो गयी। निद्रा ने उस पर अधिकार कर लिया।

'मैं भी सोने चला" कहते हुए अजितेय ने केन को देखा। पर वह आँखों को बन्द कर मौन हो गयी थी। और आठ घंटे बाद."... केन तुम मुझे डेटा के विषय में बताना प्रारम्भ करो। निद्रा पूर्ण होने के फल स्वरूप चैतन्य अजितेय ने केन से कहा।

'यह भारी नवीन तारे वहाँ है जहाँ पर इन्हें होना नहीं चाहिए। इसका कारण या तो वे गतिशील मैटर पदार्थ हैं जो वहाँ पर सतत हैं, बन रहे हैं, अथवा वहाँ पर कोई श्याम विवर.. ... पर इसके सत्यापन के लिए हमें प्रोब को, आगे बढाना होगा।'

परन्तु इस प्रोब के पावर पैक में मात्र दो जम्पों को क्षमता है और वह भी बिना मेरी अनुमति के सम्भव नहीं है। मैने केन को बताया।

मैं एक विशेष बिन्दु पर सुपर हैवी कणों को फायर करना चाहती हूँ" प्रयास करो।

कुछ पलों बाद.....

मॉनीटर पर यह कण नष्ट हो गये। उस क्षेत्र का गुरूत्व इन को डिस्टार्ट कर रहा है, पर यह गुरुत्व......"

"हाँ केन, मुझे लगता है कि वहाँ पर एक छोटा श्याम विवर है, इसी कारण यह तुम्हारे भेजे कण डिफ्लेक्ट हो गये परावर्तित हो गये '"अजितेय ने स्पष्ट करते हुए कहा।

बहुत पहले भौतिकविद हाकिन्स ने घोषणा की थी कि 'तीन सोलर मास से, छोटे ब्लेक होल, श्याम विवर नहीं हो सकते और मास डिटेक्टर यही दिखा रहे हैं।'

यह सूचना तुम त्रिशंकु को प्रेषित कर दो'।

केन ने अजितेय को प्रशंसा भरे नैनों से देखा। संदेश प्रेषित हो चुका था।

दूसरे दिन २४ घण्टों के बाद अजितेय को एक विचित्र नजारा देखने को मिला। उसने केन को दिखाते हुए बताया, उस 'अणुतिक केन्द्र के समीप से जाती हुई गैसों की, उनके बादलों की गति असमान्य है, यह देखो सभी वृश्चिक नक्षत्र स्थित उस सुदूर पश्चिमों बिन्दु पर मुड जाते हैं।' 'यह तो आर.एस-२० का वातीय प्रवाह है केन का उत्तर था। नहीं यह सम्भव नहीं है, क्यों कि मैंने गणना करके देख लिया है।'

"तो क्या यह बी.आर.एस-१० के चुम्बकीय गुणों द्वारा सृजित नहीं हो सकता अजितेय?" अजितेय मौन धारण कर कुछ सोचने लगा।

'गैसों के बादल अतीव तीव्र गति से केन्द्रीय नाभिक, अपने केन्द्रीय अणुविक बिन्दु से, जिस तीव्रता से शंकु आकार धारण कर उस श्याम विवर में समाहित हो रहे हैं'और परिणाम स्वरूप करोडों डिग्री सेल्सियस का ताप उत्पन्न होता है, यह प्रक्रिया तो स्पष्ट है, परन्तु गैसों के चक्रण की यह विचित्र गति, और फिर उनका उस विवर में समाहित होना, हमारी गणनानुसार क्यों नहीं हो रहा है?"

क्या हमें पुन: हमारी गणना के सत्यापन हेतु गरुड को दूसरे बिन्दु पर भेजना चाहिए ? अजितेय असमंजस में था।

यान-त्रिशंकु

केन, अजितेय और त्रिपथगा भूखे भेडिये की भांति प्राप्त आंकडों को, डेटा को समझने में लगे थे। मिनी कैप्सूल के डेटा, मिनी नहीं थे, वे विस्तृत थे, और अस्पष्ट थे। विशेषकर मास-स्पेक्ट्रोमीटर के डेटा तो चौंकाने वाले थे। उसकी स्पष्ट करने हेतु, वे हर सम्भव प्रयास कर रहे थे। ऊब कर केन ने कहा, मैं विगत ४८ घण्टों से इस पहेली को सुलझाने में लगी हूँ। थक गई हूँ और मैं भी, कहती हुई त्रिपथगा झटके से उठ खडी हुई। उनके चेहरों पर थकान थी। अजितेय भी थक गया था, पर कुछ कहना नहीं चाहता था, इस कारण कार्यरत था। सभी ने अपनी निद्रा की अवधि का लाभ उठाया। सभी प्रमुदित थे, चैतन्य थे और तनाव रहित थे, निद्रापूर्ण होने के बाद।

‘मैं स्वप्न में भी उन बादलों की विचित्र गति के विषय में सोचती ही रही, और ....." कहते हुए केन रुक गयी। "क्यों क्या हुआ?" त्रिपथगा का प्रश्न था।

"ओह तो यह संभव है...पर"

'पहेलियाँ मत उछालो" त्रिपथगा ने कहा।

'अजितेय हमें प्रोब को गरुड को दूसरे बिन्दु की ओर मोड्ना होगा।'

'या वृश्चिक राशि के पश्चिमी छोर पर स्थित उस श्याम विवर के समीप?"

'समीप नहीं उस से तीन प्रकाश वर्ष दूर, जिससे उसे डेटा प्राप्त हो सके’

"हूँ, अजितेय, अपनी गणना के सत्यापन हेतु और नवीन अवधारणा को स्थापित करने हेतु, यह अब मुझे आवश्यक प्रतीत हो रहा है।'

केन नेत्रों को बन्द करके कहती जा रही थी। अजितेय को ऐसा प्रतीत हुआ कि केन के नेत्र सम्भवत: इस कारण बन्द हैं क्योंकि उसे भय है कि नेत्र उन्मलिन से कहीं कोई दूसरा उसके मनोभावों को पढ़ न ले।

गरुड

गरुड केन की अवधारणा को विस्तार देने हेतु वृश्चिक राशि के उस . पश्चिमी बिन्दु की तरफ अग्रसारित कर दिया गया। सभी को आशा थी कि पहेली अब सुलझ जायेगी।

''मुझे उसकी ट्रेजेक्टरी चाहिए" केन ने कहा।

''वह तुम्हारे टरमिनल पर ट्राँसफर कर दी गयी है" अजितेय ने सूचित किया।

प्रोब गरुड गुरुत्व एवं रेडिशन के आघात के कारण नष्ट हो गया है। हमारे वास्तविक स्वरूप जो रक्त और मांस से निर्मित दूर बैठे हैं, कभी सोच भी नहीं सकते थे कि प्रोब गरुड इस निहारिका मंडल से, वृश्चिक राशि से जुड़े श्याम विवर के भीतर जाकर अदृश्य हो रहे बादलों को सूचनाएँ.....मेरा तात्पर्य है उनसे संबंधित समस्त सूचनाएँ, प्रेषित भी कर सकेगा। निश्चय ही वे मिनी कैप्सूल के द्वारा एकत्र किये गये विवरणों को, एक ईश्वरीय चमत्कार की भाँति स्वीकार करते" केन ध्यानावस्थित सी कह रही थी।

''यह प्रोब अभी अपने सुरक्षित फ्यूएल भण्डार के कारण वृश्चिक राशि स्थित....उसके पश्चिमी छोर पर स्थित श्याम विवर के समीप नहीं पहुँच सकता। समीप से मेरा अर्थ है कि वह पाँच प्रकाश वर्ष की दूरी भी नहीं पा सकता, परन्तु यदि कभी...जो सम्भव है यह उसके गुरुत्व क्षेत्र में प्रवेश करेगा तो निश्चय ही यह गरुड उस भीषण खिंचाव-जन्य आकर्षण को सहन कर सकने को स्थित में, उस विवर में समाहित हो जायेगा और फिर उसका जीवन समाप्त हो जायेगा...... लेकिन उस समय हम कहाँ होंगे पता नहीं" कहते हुए केन रुक गयी। गरुड प्रोजेक्टेड ट्रेजेक्टरी के अनुसार, श्याम विवर के बादलों को चीरता हुआ, उससे दूर होता जा रहा था। ¦ ''यह गुरुत्वाकर्षण नहीं है, अजितेय"' केन चीख सी पडी।

''यह प्रोब गरुड हमारी गणना के विपरीत जा रहा है।" ¦

"मुझे उसे आगे बढाना चाहिए कहते हुए अजितेय ने त्रिपथगा से प्रोब के पाथ करेक्शन करने के लिए, संकेत प्रेषित कर दिया। वे सभी प्रोब पथ पर दृष्टि गड़ाए बैठे थे। उनको यह साधना विगत तीन घंटों के निरीक्षण के उपरान्त भी परिणाम देती देखी नहीं। .

गरुड अपनी निर्धारित कक्षा में पहुँच नहीं पा रहा था। वह किसी विचित्र प्रकार के आकर्षण से प्रभावित लग रहा था |

प्रबल आकर्षण जो गरुड को निर्धारित कक्षा में, जाने में गतिरोध पैदा कर रहा था। '

त्रिपथगा अपने निरीक्षण कम्यूटर पर एक विचित्र दृश्य देख रही थी। वृश्चिक नक्षत्र के सूदूर छोर पर, उसके पश्चिमी छोर पर भीषण अंधेरे में चक्रवाती बादलों का समूह उस नक्षत्र को अपने में छिपा लिए था और सामने बी.आर. एस-१० का नीला तारा तेजी से चमक रहा था। गरुड के संकेतों की प्रतीक्षा सब को थी। त्रिपथगा की सूचना पर केन ने अजितेय की तरफ अर्थ पूर्ण दृष्टि से देखा।

""लगता है तुम किसी परिणाम पर पहुँच गयी हो" केन को देखते हुए अजितेय ने कहा।

''मुझे लगता है कि सामान्य धारणा अब मान्य हो जानी चाहिए केन का संक्षिप्त सा उत्तर था।

'कौन सी सामान्य धारणा" त्रिपथगा ने कौतुहल पूर्ण स्वर में कहा, "'मिंसिग मैटर की डार्क मैटर की" केन ने कहा।

यह अवधारणा पाँच सौ वर्ष पूर्व प्रतिपादित की गयी थी और उस समय लोगों ने इसका उपहास किया था परंतु आज हम इसके अस्तित्व को स्पष्ट देख रहे हैं। इस डार्क मैटर की उत्पत्ति तो महाविस्फोट-बिग बैंग के उपरान्त ही हुई होगी"' त्रिपथगा का प्रश्न था।

"हाँ यह महाविस्फोट के १० सेकेन्डों के उपरान्त हुई होगी'' केन ने स्पष्ट किया।

"परन्तु केन इस महा विस्फोट के पूर्व क्या था ? क्या यह अपने इसी स्वरूप में था ? क्या वह घना पुन्जीभूत बिन्दु मात्र था?! त्रिपथगा जिज्ञासु की भांति प्रश्न कर रही थी। केन उत्तर पर विचार करने लगी। कुछ क्षणों बाद उसने कहा इसके संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण इस प्रकार की व्याख्या देता है-

''आपो हवा इदमग्रे.सलिलमेवास । ता आकामन्त । कथं नु जायेमहि इति।" (शतपथ ब्राह्मण ११,१/६ /१-२)

''आप: ही निश्चय ही सलिलावस्था वह अवस्था जिसमें सब लीन हो जाते हैं, में थी, उसमें कामना हुई कि हम कैसे प्रज्ञारूप - में फैलें।"'

'यह तो आश्चर्यजनक तथ्य है, जिसकी कल्पना भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्षों पूर्व की, और वह भी पूर्ण वैज्ञानिक रूप में चकित" त्रिपथगा ने कहा।

'हाँ यहाँ देखो, कि आप: में उसी घनीभूत बिन्दु में कामना हुई, अर्थात उसमें गति हुई, वह सचेतन हो उठा, विस्तार हेतु" केन कह रही थी कि उत्साहित त्रिपथगा कह उठी, यह चेतना तो :उस तथ्य का संकेत है, जिसे ऋषियों ने स्फोट कहा है, बिग-बैंग कहा है- महाविस्फोट बताया है, और इसी के उपरान्त इस ब्रह्माण्ड का विस्तार हुआ! कितनी वैज्ञानिक, कास्मालोजिकल अवधारणा थी यह ।'

' थी नही- यह अवधारणा, सत्यापित हो चली है। हम इसी के सत्यापन हेतु तो यह डेटा, ये आंकडे एकत्र कर रहे हैं" अजितेय जो अब तक मौन था, ने टिप्पणी की। 'इस प्रकार पदार्थ की उत्पत्ति के साथ ही डार्क मैटर भी उत्पन्न हो गया और वह कल्पनातीत शीघ्रता से कुछ नैनो सेकेन्डों में इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो गया'' केन ने स्पष्टीकरण दिया।

“ इतना ही नहीं यह अधिक मात्रा में नक्षत्र के उस क्षेत्र में विद्यमान है जहाँ पर हमने प्रोब को प्रक्षेपित किया है" कहते हुए केन के नेत्रों में चमक आ गई।'

''और इसी कारण हमारा गरुड निर्धारित मार्ग से हट रहा है" त्रिपथगा ने तथ्यों की अन्तिम कड्डी को पूरा कर दिया। केन ने यह तथ्यों भरी सूचना त्रिशंकु को प्रेषित कर दी और अजितेय प्रोब की स्थिति में परिवर्तन लाने के प्रयास में लग गया। _, केन और त्रिपथगा विगत बीस घण्टों से कार्य में लगे थे। अजितेय ने अपने कार्यों को बन्द करने का संकेत उनको दिया, और स्वत: भी शट-डाउन कर के सोने चल दिया। प्रोब वृश्चिक राशि की सर्पिल-निहारिका के पूर्वी भाग में प्रविष्ट कर गया था। विगत कई करोड वर्षों पूर्व हुए विस्फोट के परिणाम के फलस्वरुप, इसका निर्माण हुआ था। यह क्षेत्र कम्यूटरों को दृष्टिगोचर तो नहीं होता था परन्तु गामा-किरणों के मापी यंत्र, इसकी उपस्थिति को सूचना दे रहे थे। रेडिएशन प्रत्येक प्रकार के घातक है, हम इसमें अधिक सम्बन्धित: सूचनाएँ एकत्र कर उसे त्रिशंकु को सम्प्रेषित कर सकें, बेहतर होगा।

यान त्रिशंकु

प्रगाढ निद्रा ने हमें नवीन शक्ति प्रदान कर दी थी। हमारे न्यूरानों में स्पन्दन सामान्य गति से हो रहा था। त्रिपथगा भी प्रफुल्लित थी परन्तु केन की प्रतीक्षा थी। त्रिपथगा केन को जगाने अपने स्थान से उठ कर गयी पर केन ''सो'' रही थी।

त्रिपथगा ने केन को कई बार हिलाया। वह अंगडाई लेकर उठ बैठी। थकान उसके चेहरे से गई नहीं थी। 'क्या हुआ'' चैतन्य होते ही उसने प्रश्न किया। 'दूसरा मिनी कैप आ गया है और तुम्हारे प्रतिरूप ने सूचना दी है कि डार्क मैटर के विषय में और डाटा चाहिए।'

त्रिपथगा क्या जो आंकडे हमने प्रथम मिनी कैप से भेजे थे वे उसी स्वरूप में मिले हैं अथवा उनमें कुछ परिवर्तन हो गया है?"

सशंकित केन का प्रश्न था।

"उनमें कोई परिवर्तन तो नहीं हुआ है, परन्तु तुम्हारा प्रतिरूप इसे डार्क मैटर को सर्वस्वीकार्य कराने के लिए कुछ और डेटा चाहता है,” त्रिपथगा ने स्पष्ट किया।

‘’ओह’” कहती केन उठ गयी।

गरुड़

प्रोब के इस नवीन पोजीशन से प्राप्त डेटा संतोषजनक हैं।' केन इतना ही नहीं यह रीडिंग स्पष्टत: दिखा रही है कि एक शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण का केन्द्र उस क्षेत्र में विद्यमान है जो हमारे प्रोब को भी, उन गैसों की भाँति अपने ओर खींच रहा है। .

'मैं प्रोब को थोडा और खिसका कर इस तथ्य का सत्यापन करना चाहता हूँ" अजितेय ने बताया।

डिटेक्टर क्या बता रहा है?' केन को प्रश्न था।

''उसकी सूचना है कि हम पाँच करोड सूर्यों के मास के तरफ खिंचते चले जा रहे हैं।' अजितेय के स्वर में चिन्ता स्पष्ट थी। 'पर इसकी उपस्थिति को न तो एक्स-रे-डिटेक्टर, न रेडियो सेंसर और नही गामा-रे-डिटेक्टर दर्शा रहे हैं," चकित भाव से केन कह उठी।

केन उठ कर आबजरवेटरी पर जाना चाहती थी। पर वह उठ न सकी।

आटोमेटकि सायरन गूंज उठा। हम सभी केन को उठाने दौड पडे। केन का शरीर अकड़ गया था। अजितेय ने डायगोस्टिक आन कर दिया।

दूसरे क्षण डायगनोस्टिक की सूचना थी ''केन के शरीर का एक तिहाई भाग क्षतिग्रस्त हो गया है।'

अजितेय और त्रिपथगा ने हर संभव रिपेयर का प्रयास किया पर रेडिऐशन द्वारा किया जाने वाला डैमेज अपना प्रभाव दिखा चुका था। "हमारे मस्तिष्कों में रक्त का संचार नहीं होता, और न हम अपने प्रतिरूपों की भाँति श्वास ही लेते हैं। हम सामान्य मांसपेशियों से युक्त भी नहीं होते और न ही हममें हारमोन्स और एन्जाइम ही होते हैं। हम एक विशुद्ध प्रकार के त्रियामी प्रतिरूप होते हैं, जो कम्पयूटर के ब्रेन से संचालित होते हैं और इस कम्यूटर ब्रेन का सीधा सम्बन्ध मुख्य कम्यूटर से होता है, जिसमें हमारे प्रतिरूपों के मस्तिष्क की गतिविधियाँ सुरक्षित रखी जाती हैं। हमारा नियंत्रण मुख्य कप्यूटर से तो होता ही है, साथ ही साथ हमारी मानवीय भावनायें, कार्य-कलाप भी हमारे प्रतिरूपों के, वास्तविक स्वरूपों की भाँति होते हैं।

'हमारा निर्माण इस ब्रह्माण्ड के रहस्यों के उद्घाटन हेतु किया गया है। यहाँ हमारे मानवीय रूप आ ही नहीं सकते, इसी कारण हम यहाँ पर भेजे गये हैं", अजितेय सोच रहा था। अजितेय का चिन्तन त्रिपथगा के आने के कारण भंग हो गया। दोनों मिलकर केन के मस्तिष्क में हुये, डैमेज को, आघात को दूर करने के प्रयास में लग गये।

उसके ब्रेन का स्पन्दन, उसमें लगे न्यट्रानों का, नैनो चिप्स का 'स्पन्दन, रेडियेशन जनित घातक प्रहार के परिणाम स्वरूप टूटे चिप्स को हटाने और उस स्थान पर उसी प्रकार के नैनों चिप्स को लगाने के, उपरान्त पूर्ववत हो गया।

केन . पुन: जाग उठी। 'मैं क्या कर रही थी' उसने त्रिपथगा से प्रश्न कियां।

'तुम डार्क-मैटर पर कार्य कर रही थीं।"

' 'कौन सा? कैसा, डार्क मैटर ?" वही जो मिनी कैंप ने भेजा था" त्रिपथगा ने याद दिलाने का प्रयास किया।

''ओह ! कुछ याद आ रहा है'' कहते हुए केन उठ गयी। * ''ओह !" अब सभी कुछ स्पष्ट हो गया, कह कर वह मुस्कुराई और अजितेय से चलने का संकेत देकर अपने टर्मिनल पर जा. पहुँची। केन अब अपनी प्रखर मेघा का प्रमाण दे रही थी।

इस घटना के दूसरे दिन, चौबीस घण्टे के बाद, वह अपनी प्रतिपादित: डार्क पदार्थ डार्क मैटर के अवधारणा के सत्यापन विवरण ला कर सभी को दिखा रही थी। ऐसा प्रतीत होता था कि रेडिएशन डैमेज ने परोक्ष में उसमें नवीन ऊर्जा भर दी थी। गरुड प्रकाशवर्ष के पाँचवे अंश की गति प्राप्त कर उस वृश्चिक राशि के सर्पिल-पश्चिमी मंदाकिनी की ओर बढ रहा था।

यह सूचना हमने त्रिशंकु को संप्रेषित कर दी।

पर उनका कोई संदेश संकेत नहीं आया। हम संशय में थे क्या हम और हमारा प्रोब इस घातक रेडिएशन से बचा रहेगा? क्या हमारा यान: डार्क मैटर के उद्गम को खोजने में, कहीं उसी का अंश न बन जाये ? कहीं वह उस श्याम विवर का अंश बन न जाये, उसमें समाहित न हो जाये?"

यान की गति प्रोब की गति बढ रही है, केन, त्रिपथगा और स्वत: मैं आगत की आहट सुन रहे हैं। हमारे वास्तविक स्वरूप कोई संदेश- मार्ग निर्देश नहीं दे रहे हैं।

एकाएक मेरी दृष्टि शिव की प्रतिमा पर, उनके मुख मंडल पर जा पडी।

मुझे लगा कि वे कह रहे हैं, '' इस श्याम विवर में प्रवेश करने के उपरान्त तुम सभी इस नृत्य मग्न ब्रह्माण्डीय लीला का अंश बन जाओगे, मेरा अंश बन जाओगे।" .

मैंने अपने साथियों को तैयार रहने का संकेत दे दिया शिव के अनन्त नर्तन के सानिध्य हेतु !

 

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