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व्यंग्य / सोने की पाठशाला / डॉ. प्रवीण कुमार झा

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चंदू मामा उन मामाओं में से थे जो रिश्ते में तो मामा होते हैं पर उम्र में समवयस्क। ऐसे मामा उन दिनों के बड़े संयुक्त परिवारों में पाए जाते. जब 'हम दो हमारे दो के नारे नहीं लगे थे। इन मामाओं पर बचपन से ही बहुत जिम्मेदारी होती। नाक बह रही होती. पर मामागिरी में सीना तना होता। चॉकलेट पे झपट्टा नहीं मारते, भांजों को लेने देते । कभी नानी से पैसे मिलते तो लमनन्चूस फ्लेवर आईसक्रीम खरीद कर भांजों को देते। जब से बंगाली मुहल्ले की छम्मक-छल्लो बुबली के पीछे पड़ा, चंदू मामा कभी बुबली को ओंख उठा के भी नहीं देखते। होने वाली बहू से ससुर नजरें कैसे मिलाए?

पढ़ाई में औसतन ही रहे, इसलिए चंदू मामा को नौकरी की तलाश में दिल्ली आना पडा। दिल्ली में सबका कुछ न कुछ जुगाड लग ही जाता है । एक दिल्ली में दूजा अमरीका में. हर कोई तरक्की कर ही लेता है ।

बिहार में पहली श्रेणी वाले विज्ञान, दूसरी श्रेणी वाले आर्ट्स, और तीसरी श्रेणी वाले कॉमर्स पढ़ते। बम्बई में उल्टा था। तभी बिहार पिछड़ गया, बम्बई तरक्की कर गया। चंदू मामा बिहार के कॉमर्स ग्रेजुएट लक्ष्मीनगर में सीए की तैयारी में लग गए। उन दिनों सीए एक ऐसी पढ़ाई थी. जो साल-दर-साल चलती रहती। अंडर-वर्ल्ड वाला हिसाब था। जो एक बार अंदर जाता, बाहर नहीं निकल पाता। चंदू मामा भी अटके रह गये। जब परिवार का बोझ आया किसी छोटी कंपनी में बही-खाता संभालने की नौकरी कर ली। टैली-शैली तो सीख ही ली थी।

कुछ ही दिनों में चंदू मामा दिल्ली में सेट हो गये। अब वो दौर आ गया था, जब लोगों ने डिग्री पूछनी बंद कर दी थी। हर तीसरा इंजीनियर होता. और हर चौथा कंप्यूटर डिप्लोमा। अनुभवी और स्ट्रीट-स्मार्ट लोगों की पूछ होने लगी। ये प्रतिभा तो चंदू मामा में कूट-कूट कर भरी थी। नेहरू प्लेस और साउथ-एक्स के कंप्यूटर दलालों से दो-चार तमगे और लगवा लिए। चंदू मामा भी किसी विभाग में वाइस-प्रेसीडेंट' बन गए। नयी वैगन-आर गाड़ी, बुरारीं मुहल्ले में कोठी, और बच्चों का बाराखम्बा रोड के हाई-फाई स्कूल में एडमिशन। ये कोई उपहास नहीं. दिल्ली के मुख्यमंत्री हों या आम आदमी की चाहत हर किसी की वैगन-आर गाड़ी होती है। यूँ समझ लें. ये भी दिल्ली में सेट होने की एक परिभाषा है।

गाडी का क्या? फगुनी महतो बंबई जाने लगा तो मांझी के घर अपनी गैया बांध दी। अब गोबर-लीपी और दूध का धंधा करे मांझी. और ब्याज खाए महतो की मेहरारू। प्राइवेट बैंक वाले ऐसे ही चंदू मामा के घर गाड़ी बांध गए।

गाड़ी-बाड़ी तो महानगरों में चुटकियों का खेल है । असल चक्कर तो स्कूल का है।

भारत महान कई कारणों से है लेकिन बच्चों के लिये अपनी जिंदगी कुर्बान करने का जज्बा शायद और कहीं नहीं। पश्चिमी देशों में भी नन्हे-मुन्नों पर खूब पैसे बहाते हैं. पर नन्हें-मुन्ने होने की भी एज लिमिट होती है। यहाँ तो नर्सरी से खून चूसना शुरू होता है और फिर चक्रवृद्धि-ब्याज से पिता को कंगाल करके छोड़ता है। पी. एफ. ग्रैव्यूटी सब साफ। बेटा तब भी कैरियर ऑप्शन तौल रहा होता है। 'थी ईडियट्स से प्रेरणा लेकर हर चलती-फिरती पढ़ाई को लात मार रहा होता है। कहता है मुझे वाइल्ड-लाइफ फोटोग्राफर बनना है । मतलब खून चूसने के नये आयाम।

चंदू मामा की वैसे अभी रक्तदान की शुरूआत ही हुई थी और भगवान का दिया सबकुछ था। अब तक।

नर्सरी कक्षा की महीने की फीस चंदू मामा के अपने स्कूली जीवन की पूरी फीस के बराबर थी। पर स्कूल भी तो लाजवाब था। सिविल लाइंस के लाट साहबों के बच्चे और चंदू मामा के बच्चे एक ही क्लास में। ड्राइवर छोड़ने आते बच्चे, जो भी बड़ी गाड़ियों में। चंदू मामा कीं उन ड्राइवरों से दोस्ती भी हो गई थी। ज्यादातर बिहार के ही थे।

बच्चे भी खिटपिट अंग्रेजी बोलने लग गये। चंदू मामा सुर में सुर मिलाते। मामी भी ग्रैजुएट थी। दोनों ने मिलकर सिंड्रेला, हैसल-ग्रैटल और सारे विदेशी डायनों, भूत-प्रेतों की कहानी रट ली। आई-पैड पे पढाई करते और टीवी पे कार्टून देखते। फीस तो लेते हैँ पर पूरे परिवार को अंग्रेज भी तो बना देते हैं । क्या बुरा है?

हर हफ्ते कुछ न कुछ होम-वर्क भी आता मामा-भाभी की हवाईयां उड जाती । बच्चे को अपने मनपसंद फल लेकर उसके बारे में बोलना है. अंग्रेजी मे।

मँगो ठीक रहेगा' मामा ने सुझाव रखा ।

तुम तो हो ही मैंगो आदमी' मामी दुत्कारती।

ठीक है। चीकू कर दें। वो तो दिल्ली का है।.'

''हाँ पर चीकू को अंग्रेजी में कहते क्या हैं?'. मामी ने पूछा । चीकू तो अंग्रेजी ही है। चलो पाइन-ऐपल ठीक रहेगा।.'

''भारी होता है पहन-ऐपल। मोनू से न संभलेगा ।'. मामी ने वाजिब तर्क रखा।

''काट कर दे देंगे डब्बे में'

मोनू सुबह पाइन-एपल काट कर ले गया, उसके शिक्षकों ने खूब चाव से खाया और हथेलियों पर स्टार बनाकर घर भेज दिया। मामा-मामी फूले न समाये।

ऐसे ही कभी फल, क्मी फूल । तरह तरह की स्टेशनरी। पेंट कलर और ब्रश। मोनू को तो एम एफ हुसैन बना देंगे ये लोग।

अब तो स्विमिंग भी शुरू कर दी। पहली तक शायद घुड़सवारी भी कर ले। मोनू की फीस दिन-दोगुनी रात-चौगुनी बढ़ रही थी। चंदू मामा अब बस से काम पर जाते। पेट्रोल बचाकर मीनू की घुड़सवारी का जुगाड़ करते।

दो-तीन महीने गुजरे तो अभिभावक-शिक्षक मिलन का न्यौता आया। चंदू मामा का तो दिल दोहरी गति से धड़कने लगा। मोनू की मैडम मिस चोपडा किसी मॉडल से कम न थी। मामा रोज सुबह कसरत करने लगे । मामी को भी एक हाई-हील सैंडल और काली वन-पीस ड्रेस ला दी। बाल अच्छे लौरियल के हजाम से कुतरना दिये। दोनों चिट-फंड कंपनी के फ्रॉड एजेंटों की तरह नजर आ रहे थे। मामी तो स्कूल की चिकनी फर्श पर कदम रखते ही फिसल कर गिर पड़ी। वन पीस 'टू पीस हो गया। बड़ी मुस्किल से सेपटी-पिन लगाकर इज्जत बचाई।

मिस चोपड़ा ने मोनू पर पावर-फाइंट विश्लेषण तैयार किया था। मोनू न हुआ अमरीका का राष्ट्रपति हो गया । मोनू का विकास-ग्राफ। मोनू की खूबियाँ और खामियों। मोनू का आत्मविश्लेषन। मोनू का मानसिक झुकाव। मोनू से उम्मीदें। मोनू के लिये हमारे टारगेट। मोनू ये। मोनू वो। चंदू मामा को कुछ पल्ले नहीं पड़ा। इसलिये नहीं कि अंग्रेजी थी। मिस चोपड़ा की नेकलाइन ने चंदू मामा को जिंदा लाश बना दिया था। एक ही बिंदू पर लटक गए थे । भाड़ में गया मोनू। मामी ने भी ताड़ लिया और अगले तीन दिन तक घर में लौकी बनाई।

मोनू पहली में गया. तो पिंकी नर्सरी में। एक के लिए पाइन ऐपल तो दूजे के लिए सेब। चंदू मामा भी 'ओवर-टाइम करने लगे, मामी भी एक पार्लर में बाल काटने लगी। मामी गुस्से में हो, न हो। औसतन धर में अब लौकी ही बनती। गाँव से चावल की बोरियाँ लाद कर लाते. और हफ्ते में एक दिन पुरानी दिल्ली से राशन लाते। सस्ती पड़ती।

स्कूल २६ जनवरी की परेड की तैयारी कर रही थी। मोनू भी भाग ले रहा था 1 मोनू का स्कूल तो सबसे पहले आयेगा। झंडे को सलामी देगा। बड़ी तमन्ना थी चंदू मामा की परेड देखने की। सालों हो गये दिल्ली में, पर बस रेलमपेल में कभी मौका न लगा। मामी फटी वन-पीस सिलने लगी तो मोनू ने समझाया. ड्रेस-कोड साड़ी है। चंदू मामा ने भी अपना पुराना कुर्ता निकाला। बुरारी में छोटे तिरंगे बिक रहे थे। खोंस ली अपने कपड़ों में।

मोनू देखो बडे स्कूल जाकर कितना बड़ा हो गया। राजपथ पर झंडे को सलामी दे रहा है। वो देखो तीसरी पंक्ति में चौथा। पता नहीं टीवी. वाले ठीक से दिखायें या नहीं । चंदू मामा आगे बैठे लोगों के बीच सर घुसाकर वीडियो बनाने की कोशिश में थे पर मोनू की परेड झट से आँखों से ओझल हो गई। मन मसोस कर रह गये पर कोई बात नहीं. अगले साल फिर ले लेंगें। अब तो अपनी जागीर है राजपथ।

चंदू मामा की जीवन-पूंजी हर साल राजपथ पर लेफ्ट-राइट लेफ्ट-राइट करती, और चंदू मामा का सीना तनता जाता। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में हम पर लमनचूस आईसक्रीम न्यौछावर कर सीना तनता।

***

(व्यंग्य संग्रह - चमनलाल की डायरी से साभार. आप इस किताब को यहाँ - https://books.google.co.in/books?id=m7SdDAAAQBAJ&printsec=frontcover  से खरीद/पढ़ सकते हैं)

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