रविवार, 18 दिसंबर 2016

शब्द संधान / मिथ्या / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

 

अद्वैत वेदान्त का एक प्रसिद्द सूत्र है, “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” | इस सूत्र की कड़ी आलोचना की गई है | लेकिन देखने वाली बात यह है कि इसके अनुसार जगत मिथ्या तभी ठहराया जा सकता है जब ब्रह्म की सत्यानुभूति हो जाए | सत्यानुभूति से पहले भला कौन जगत को जिसमें हम चलते-फिरते, उठते बैठते, सोते जागते हैं, मिथ्या कह सकता है ? व्यावहारिक रूप से तो जगत ही सत्य है | ब्रह्म की सता तो पारमार्थिक है ! लेकिन मेरा मंतव्य यहाँ अद्वैत वेदान्त के सूत्र की व्याख्या करना नहीं है |

पर इस सूत्र से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं | एक तो यह कि मिथ्या मूलत: संस्कृत का शब्द है जो हिन्दी में ज्यों का त्यों अपना लिया गया है | दूसरे यह कि मिथ्या, सत्य का विलोम है | जो असत्य है, झूठ है- वह मिथ्या है | जो बनावटी है, कपटपूर्ण है –मिथ्या है | जो भ्रामक है.गलत है –मिथ्या है | जो अनुपयुक्त है, आधारहीन है –मिथ्या है | जो अयुक्त अ-तार्किक है, नियम-विरुद्ध है –मिथ्या है | जो कल्पित है, अयथार्थ है –मिथ्या है |

‘मिथ्या-कथन’ वास्तविकता से मेल नहीं खाता | ‘ मिथ्या-तर्क’ कथन का वह भाग है जो अतार्किक हो, जिसमें कोई न कोई तर्क-दोष (fallacy) निहित हो | मिथ्याग्रह सत्याग्रह न होकर दुराग्रह है | ‘मिथ्या-दृष्टि’ गलत दृष्टिकोण है | ईश्वर की सता में विश्वास करने वाले नास्तिकता को मिथ्या-दृष्टि मानते हैं | ‘मिथ्या-जल्प’ झूठी चर्चा है | ‘मिथ्याचरण’ कपटपूर्ण आचरण है , मक्कारी है | ‘मिथ्या- पुरुष’ छाया पुरुष है | |’मिथ्या-साक्ष्य’ झूठी गवाही है | ‘मिथ्या-नाम’ जिसे अंग्रेज़ी में “मिसनोमर” कहते हैं एक ऐसा शब्द या नाम है जो किसी व्यक्ति, वस्तु या कार्य के लिए उपयुक्त न हो | ‘मिथ्यारोपण” गलत आरोप लगाना है, तुहमत लगाना है | आजकल राजनीति में मिथ्यारोपण एक दूसरे की बात काटने का सबसे तेज़ हथियार बन गया है | कहते हैं, एक झूठ छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं | ‘मिथ्याध्यवसित’ साहित्य में एक अर्थालंकार है जहां कोई झूठी कही हुई बात साबित करने के लिए दूसरी झूठी बात कही जाती है |

मिथ्या एक ऐसा शब्द है जिसकी हमारे व्यावहारिक जगत में पुख्ता पैठ है | एक यह भी कारण हो सकता है कि पूरे जगत को ही माया या मिथ्या कह दिया गया हो | हम सभी कभी न कभी मिथ्या कथन करते देखे गए है | फिर भी यह तो मानना ही पडेगा कि सभी मिथ्या कथन “बुरे” नहीं होते | अपने मिथ्या कथन से जब हम किसी निराश व्यक्ति के मन में आशा जगाते हैं, या किसी अत्यंत बीमार आदमी को स्वस्थ हो जाने की सांत्वना देते है, तो यह बुरा तो कदापि नहीं है | वह जो मिथ्या है पूरी तरह सअसत्य भी नहीं होता | उसमें सत्यता का अंश पाया जा सकता है | कपटपूर्ण कथन कुछ इसी प्रकार के होते हैं जिनमें सत्य और असत्य का एक शरारतपूर्ण सम्मिश्रण होता है |

हिन्दी में प्राचीन कथाओं के लिए, जिनमें काफी कुछ मिथ्या-तत्व रहता है, कोई एक शब्द नहीं है | इन्हें कभी ‘पौराणिक कथाएँ’ कहा जाता है तो कभी, ‘पूरा कथाएँ’ कहकर इन्हें परिभाषित किया जाता है | ऐसी कथाओं में दो तत्व अनिवार्यत: उपस्थित रहते हैं | एक, अति-प्राचीनता और दो,मिथ्या-तत्व | अंगरेजी में ऐसी पूरा / मिथ्या कथाओं के लिए एक शब्द है, मिथ (myth). मिथ का अर्थ पूरा- कथा से तो है ही, लेकिन यह शब्द ‘मिथ’ असत्य और मन-गढ़ंत, कल्पित और तथ्यहीन, के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है क्या इस अर्थ में ‘मिथ’ संस्कृत/ हिन्दी के ‘मिथ्या’ का ही सरलीकृत रूप नहीं लगता ?

हिन्दी में अंग्रजी पद, ‘मिथ’ को पुरा-कथा के रूप में ज्यों का त्यों नहीं अपनाया गया है | उसे “मिथक’ कर दिया गया | हिन्दी का ‘मिथक’ अंग्रेज़ी के ‘मिथ’ का समानार्थी है | मिथक का अर्थ हिन्दी में केवल कोई मनगढ़ंत प्राचीन कथा ही नहीं है बल्कि उन कथाओं का ऐसा उपयोग भी हैं जिससे वे नई स्थितियों में नए अर्थ ग्रहण कर सकें | हिन्दी साहित्य में ऐसे मिथकों का वर्तमान स्थितियों की व्याख्या के लिए कई साहित्यकारों ने अच्छा प्रयोग किया है | उदाहरणार्थ, हरिशंकर परसाई ने अपने व्यंग्य आलेखों में इनका बखूबी प्रयोग किया है |

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद २११००१

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