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विज्ञान-कथा / उंगलियाँ / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

इस जगह पर आने की कभी भी उसकी इच्छा नहीं थी पर क्या करे। कोई दूसरा विकल्प भी तो उसके पास नहीं था। उस पर बेहोशी के इंजेक्शन का प्रभाव क्रमश: उसी भाँति छाता जा रहा था जिस प्रकार वर्षा ऋतु में बादल धीरे-धीरे सूर्य को अच्छादित का लेते हैं। उसका अचेतन मस्तिष्क कार्यरत था। उससे मिलना मुझे अच्छा लगता था। खास के बाद कैन्टीन में हम दोनों उसी चिर परिचित टेबल के चारों ओर पडी कुर्सियों पर बैठ जाते जिस के ऊपर मतिमंद राजनीति की भांति, जब यह विश्वविद्यालय बना था, उसी समय का पंखा अपनी धीमी गति से चलता रहता था।

हाँ वे कुर्सियों जो कभी रंगीन आबनूसी रही होंगी उनका रंग ही नहीं उड़ गया था वरन् उनमें लगी बेंत की बुनायी भी ग्‌ल गयी थी। उन पर हम संभल कर बैठने के अभ्यस्त हो गये थे। लेकिन इन कुर्सियों पर बैठने के बैलेंसिंग एक्ट में कभी भी काफी का स्वाद खराब नहीं हुआ था। पता नहीं यह उसके साथ बैठकर काफी पीने के कारण से था अथवा वहाँ उस स्टूडेन्ट्स कैन्टीन में काफी बनती ही अच्छी थी।

एक बार काफी पीते हुये मधुर की दृष्टि उंगलियों से फिसलते हुए मेरे नाखूनों पर टिक गयी। वह काफी का सिप लेता जा रहा था और मौन था. पर उसकी निगाह मेरी उंगलियों के नाखूनों पर टिकी रही। हम दोनों काफी पीने के बाद टैगोर लाइब्रेरी के सामने निर्मित सुन्दर लम्बे टैंक जिसमें होली आने के पहले छात्रगण अपने मित्रों को इसी में फेंककर, होली का प्रारम्भ कर देते थे, टैंक में तैरती रंगीन मछलियों को निरखते, बाटल-पाम के नीचे लगी बेंच पर बैठ गये।

' 'इन रंगीन मछलियों में किस रंग की मछली तुम्हें अच्छी लगी? मधुर का प्रश्न था।

. 'गोल्ड फिश।'

''क्या तुम्हें किसी सुर्ख लाल रंग की मछली का पता है ?''

''यह तो तुम्हीं बताओ।''

मधुर मौन हो गया और ध्यान से छोटी ब्लैक मोली जो टैंक में तेजी से तैर रही थी, को देखने लगा। वह मुझे टीज करने के लिए यह हरकत कर रहा था; मैं जानती थी।

वह मेरी हल्की गुलाबी ड्रेस का व्यंग्य कर रहा था।

उस दिन शाम को मैंने हजरतगंज जाकर जीवन में पहली बार सुर्खलाल रंग की नेल पालिश खरीदी थी। विज्ञान वर्ग की छात्रायें उस समय में कम फैशन परस्त हुआ करती थीं। उनके लिये तो, जैसा कि ऑल इंडिया मुशायरे में कभी सुना था ''सादगी गहना है, इस सिन के लिए'' की बात अधिक खरी उतरती थी। दो दिनों बाद हम काफी पीने फिर कैन्टीन पहुंच गये। आमने-सामने बैठ कर आने वाले छात्र-चुनाव की बातें कर रहे थे कि पिछली बार की तरह मधुर की निगाह मेरी उँगलियों पर जाकर टिक गयी।

उसके होठों को बीच एक पतली मुस्कान की रेखा खिल गयी। वह इतनी क्षणिक भा कि कोई दूसरा शायद इस ओठों के कुतूहल को देख भी नहीं पाता। मैं-अंतरंगता के महत्व, उसकी मीठी अनुभूति से पूर्ण परिचित थी।

मधुर कुछ बोला नहीं। उसकी आंखों, में, नेत्रों में विचारों के, भावनाओं के बिम्ब झलक रहे थे। उसने भरपूर निगाहों से मुझे देखा और कहने लगा ' 'वोट किसको दोगी ?''

''उसे नहीं, जिसको तुम वोट दोगे'' मेरा मुस्कान भरा उत्तर था।

''तुम तो मेरी हर बात पर प्रतिवाद करती हो ?''

''यह मेरा अधिकार है।''

और कर्त्तव्य?

''तुम्हारे साथ काफी पीना।

वह खुलकर हंसा था-उसके दाँत सफेद और सुन्दर थे। हंसने पर वह और सुदर्शन हो उठता था।

मेरी सहेलियाँ कहती थीं कि हम दोनों की मित्रता सुन्दर दाँतों के कारण है। हो सकता है उनकी बातें, उनका अनुमान सही हो।

शिक्षण-सत्र समाप्त हो रहा था, जिस दिन अन्तिम पीरियड था. -मधुर के आग्रह पर मैंने उसके साथ क्वालिटी में चलकर काफी पीने के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया था उसने संकेतों से मुझे अपने बगल बैठने का इशारा किया था।

पर मैं बैठी उसके सामने। मुझे उसको सामने से देखने में और टीज करने में मजा आता था। क्रीम काफी आयी। हम खामोशी से उसे सिप करते रहे। कोई खास बात हुयी ही नहीं। सिर्फ 'क्वालिटी' में दूसरों की आवाजें और चम्मचों की खड़खड़ाहट ही हम सुनते रहे। पेमेन्ट कर मधुर उठा और एकाएक मेरे बालों पर, अपनी उंगलियां फिसलाता हुआ धीरे से फुसफुसाया ' 'उमा तुम्हारे बाल मुझे बहुत सुन्दर लगते हैं।''

''इसीलिये लेक्चर थियेटर में तुम मेरे पीछे बैठते हो'' अपनी आंखों में कृत्रिम रोष झलकाते हुये, मैंने उसकी आँखों में देखते हुये उत्तर दिया था।

वास्तविकता के आकलन हेतु उसने गहरायी से मेरी आंखों में झाँका था परन्तु वह बोला कुछ नहीं। वह मौन रहा। मैं उसके इस नो कमेन्ट की आदत से पूर्ण परिचित थी और यह मुझे पसन्द नहीं थी।

मधुर ने रिक्शे पर बैठने का आग्रह किया। न चाहते हुये भी मैं उसके आग्रह को अस्वीकार नहीं कर सकी। उसके साथ रिक्शे पर बैठना। मंकी ब्रिज पर गोमती की शीतल बयार ने मेरे शरीर में ऊष्मा का संचार कर दिया था। परन्तु मधुर निश्चेष्ठ बना रहा। शायद उसे मेरी कोई बात चुभ गयी थी या वह मुझे तटस्थ रहकर टीज' करना चाहता रहा हो।

समय के पंख होते हैं।

मैंने शोध कार्य प्रारम्भ कर दिया और पता चला कि मधुर को किसी इन्टरनेशनल कम्पनी में अच्छा जाब मिल गया। हम लोगों का संपर्क बर्थ डे ग्रीटिंग और न्यू इयर ग्रीटिंग द्वारा बना रहा। फोन करने से हम दोनों ने परहेज सा कर रखा था, शायद हम यथार्थ को स्वीकार करने में कतरा रहे थे।

विवाह मेरे लिये एक कटु अनुभव था। मैंने डाईवोर्स लेकर अपनी शक्ति को अपने शोध छात्र और छात्राओं के साथ जैव विज्ञान की समस्याओं के निराकरण करने में लगा दिया था। कभी-कभी शारीरिक जैव रसायन मेरे मानस को उद्वेलित कर देते थे। किसी की आवश्यकता तीव्रता से सताती थी, कष्ट देती थी, मेरे मन को, उन क्षणों में मुझे मधुर....।

एक बार. हिम्मत करके मैंने मधुर को फोन किया। पहले तो वह मेरी आवाज को पहचान नहीं पाया। पहचानता कैसे. दस साल एक लम्बा समय होता। इतने वर्षों में दुनियां बदल जाती है, लोग बदल जाते हैं।

मेरा नाम सुनकर उसने कहा था उमा! अभी मैं मीटिंग में हूँ मैं आज ही तुम्हें कॉल करूँगा।''

और उसने रात्रि दस बजे मुझे कॉल किया।

हमेशा की भाँति उसने मेरा नाम लिया और बात को प्रारम्भ करने की प्रतीक्षा करने लगा।

' 'अब तुम्हारे बच्चे तो बडे हो गये होंगे?''

' 'नहीं।''

' 'क्या मतलब ?''

''मेरे या इस तरह कहूँ कि हम निःसन्तान हैं।''

' 'क्यों ?''

''मेरी पत्नी के यूटेरस को कैंसर ने ग्रसित कर दिया था। उसको निकालना पड़ गया।''

ओह! बेरी सैड'', कहते हुए उमा स्वर काँप उठा। ''और तुम्हारा परिवार कैसा है? '' मधुर ने प्रश्न किया। ''मैने डाईवोर्स ले लिया था पिछले दस वर्षों से अकेली हूँ'' मैं ने उत्तर दिया।

''कठिन है तुम्हारा जीवन।''

' 'मैंने अपने को शोध में डुबा दिया है, मधुर, .मेरे स्वर के दर्द को मधुर शब्दों के माध्यम से देख रहा था।

''फोन तो तुमने सकारण किया होगा?''

हां मधुर! एकाकीपन कभी कभी त्रासद हो जाता है। '

'तुम .अभी चालीस की भी नहीं हो।''

''मैं तुम्हारे संकेत को समझ रही हूँ। पर वह मैं चाहती नहीं।

उमा का स्वर मधुर को कहीं दूर से आता हुआ लगा। '

'फिर. '' मधुर ने संशयात्मक स्वर में कहा।

' 'उस शहर में स्पर्म बैंक तो होंगे ही यों कहना चाहिये कि दो स्पर्म बैंक हैं वहाँ'' उमा, ने बात पूरी नहीं की।

' अच्छा फिर'' मधुर के स्वर में विस्मय का मिश्रण था।

फोन पर कुछ क्षणों का मौन रहा फिर उमा की आवाज आयी मधुर (यह नाम उमा ने दस वर्षों के बाद लिया था) क्या तुम अपना स्पर्म वहाँ डोनेट कर सकते हो?''

''ओह। तुम्हारा तात्पर्य ?'' उधर से आश्चर्य भरी ध्वनि थी। ''

तुम्हें याद है क्वालिटी से तुम्हारे साथ रिक्शे पर वापस आते समय तुम्हारा पाषणवत बने रहना।

'' तो तुम्हें वह क्षण अब भी याद है?'' अचरज भरा मधुर का स्वर उमा को प्रिय लगा।

' 'यदि तुम साहस किये होते, तो यह दस वर्षों की घटना घटित नहीं हुई होती'' उमा के स्वर में उलाहना की पीड़ा थी.

' 'ओह। '' एक गहरी सांस लेकर मधुर कुछ कहना चाहते हुये भी कह न सका।

' 'वह मेरी '' मधुर की बात अधूरी रही ।

' 'तुम अब क्या चाहती हो''

' 'कर सकी तो कहूँ''।

''हां कहो।'

''क्या तुम अपना स्पर्म - स्पर्म बैंक में डिपाजिट कर सकते हो ''

' 'तुम्हारा तात्पर्य है कि तुम उससे. ''।

' 'माँ मधुर। तुम ठीक समझ रहे हो। मैं यही चाहती हूँ.

' 'उमा के स्वर की व्यथा और अनुरोध को मधुर समझ गया था।

''मैं प्रिया से भी बातें कर लूँ-प्रिया मेरी पत्नी है उमा 'मधुर ने कहा।

'' मैं प्रतीक्षा करूँगी'' कहते हुये उमा ने फोन रख दिया। बीते क्षण कितने मधुर होते हैं- वह सोच रही थी।

मधुर का फोन आया तीन दिनों के बाद परन्तु यह तीन दिन उमा को बहुत ही लम्हे लगे। मधुर ने उमा को बताया कि उसकी पत्नी ने स्वीकृति दे दी और वह इसी संदर्भ में उससे बात करना चाहती है। उमा ने धड़कते दिल से मधुर की पली से बात की।

फोन के बाद वह प्रसन्न थी, उसका उद्वेलित मन शान्त था।

'' इन.. इन-वीट्रो-इम्प्लान्टेशन ''सफल रहा है। उमा की डाक्टर ने समयानुसार चेकिंग के बाद उसे सूचित किया। उमा इस समाचार से उत्साहित थी। मधुर को उसने एसएमएस कर दिया था ।

उमा की डाक्टर ने अस्ट्रा साउन्ड की रिपोर्ट देखी। वह विस्मित नेत्रों से प्लेट के देख रही थी।

. 'क्या बात है डाक्टर आप कुछ चकित दिख रही हैं' उमा का प्रश्न सुनकर डाक्टर मौन रही।

. 'यह विचित्र केस है, ऐसा तो दो करोड़ केसों में मात्र एक बार देखा जाता है'' कहती हुयी डाक्टर ने फिर रिपोर्ट को और प्लेट को ध्यान से देखा।

''जी मुझे भी बताइये '' उमा के आग्रह पूर्ण स्वर में निहित वेदना की पीडा को डाक्टर अनदेखी न कर सकी। ''तुम्हारा डिम्बाणु पहले दो भागों में विभाजित हुआ और फिर एक भाग दो में पुर्नविभाजित हो गया। इस प्रकार तीन पुत्र तुम्हारे गर्भ में पल रहे हैं'' कहकर डाक्टर ने उमा को ध्यान से देखा। उमा का चेहरा रक्ताभ था और उसके होठों पर मंद मुस्कान थिरक रही थी। तीन समान गुण के बच्चे.

आईडन्टिकल ट्रिपलेट, वह -'सोच रही थी।

मेरे लिए एक शिशु पर्याप्त है. शेष दो मैं।

प्रकृति के संवेग को समझना कठिन है। उमा को पीड़ा की अनुभूति हुयी।

उमा कराह रही थी। पीड़ा ने उसकी बेहोशी जनित चेतना को जागृत कर दिया था। वह सिस्टर को देखकर धीरे से बोली '' वे लोग अभी तक नहीं आए'

दूसरे पल दरवाजे पर नाक करने की आवाज आयी। सिस्टर ने दरवाजा खोला।

दरवाजे पर एक पुरुष और महिला प्रतीक्षारत थे।,,

''मैं मधुर हूँ क्या मैं उमा से मिल सकता हूँ ?''

''आइये'' कहती हुयी सिस्टर हट गयी।

मधुर तो भीतर आ गया, पर उसकी पत्नी बाहर रुक गई।

सिस्टर ने दरवाजा बन्द कर किया। धड़कते दिल से घबराया, हुआ मधुर रूम में आ गया।

मधुर को देख उमा के चेहरे पर प्रसन्नता हिलोरें लेने लगीं. मधुर ने उमा का हाथ पकड लिया . दूसरे क्षण मधुर का हाथ उमा के होठों पर था।

उमा कराह उठी।

सिस्टर ने मधुर को बाहर जाने का संकेत कर आप्रेशन थिएटर की तरफ बेड को बढ़ा दिया उमा के चेहरे पर चादर उसके दाहिने हाथ की उठी हुयी दो उँगलियों पर लगी पोलिश को मधुर ध्यान से देख रहा था।

***

परिचय:

डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय; जन्म; ४ मार्च १६५२, शिक्षा: एम-एस-सी. लखनऊ विश्वविद्यालय), पीएच.डी. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय-वाराणसी, नोराड (नारवे) एव अलैक्जैंडर-फान हनवोल्ट-फेलो (जरमनी), पूर्व प्रोफेसर कैंसर शोध, तबरीज़ विश्वविद्यालय, ईरान । विज्ञान कथाओं की दशाधिक पुस्तकें एवं अखिल भारतीय स्तर के प्रतिष्ठित पत्रों एवं पत्रिकाओं में अनेक विज्ञान कथाएँ प्रकाशित तथा कुछ हिब्रू बंगला में अनुवादित, पुरस्कार-सम्मान : ईरान का कैंसर शोध पुरस्कार 1978, अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीट्‌यूट के रिसर्च बोर्ड का सम्मान 1991 विज्ञान-वाचस्पति मानद उपाधि 1996, विज्ञान-कथा-भूषण सम्मान 2001, पद्मश्री सोहनलाल द्विवेदी जन्मशती हिन्दी-सेवी सम्मान 2005, अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कार रजत अलंकरण 2006, साहित्य दिवाकर ( २००७, सम्पादक सरताज २००७, भारत गौरव २००७, सम्पादकश्री २००८, शान्तिराज हिन्दी गौरव अलंकरण 2008, सम्पादक सिद्धहस्त 2008, सम्पादक शिरोमणि 2011, वितान-परिषद प्रयाग सम्मान 2013, गणेशदत्त सारस्वत सम्मान (२०१३), विज्ञान परिषद् प्रयाग : सारस्वत-सम्मान 2015 आदि । सम्प्रति स्वतंत्र रूप से विज्ञान कथा लेखन ।

संपर्क:

ईमेल : rajeevranjan.fzd@gmail.com

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