गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

बकर पुराण से - गर्लफ्रेंड और चादर की खरीदारी : अजीत भारती

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गर्लफ्रेंड और चादर की खरीदारी

आमतौर पर लड़कियों की सारी बातें हमें काफी पसंद हैं, सबको होती हैं। जैसे नजर झुका के मुस्कुराना, फर्जी की डाँट, बुलाकर इंतजार करवाना और कहना, '' मेरे लिए इतना भी वेट नहीं होता?' लौंडों को बेबी बुलाने पर मजबूर करना (कुछ तो मम्मा कहलवाती हैं अपने आपको, हम भुक्तभोगी हैं और हमारे तीन चार और दोस्त भी) प्यार से किस कर लेना, छुप-छुप के बाथरूम से फोन पर खुद ही बोलकर सुनना, पता चलने पर कि आप बात करने की स्थिति में नहीं हैं तो ज्यादा कॉल करना, आप वैसा करें तो ब्रेकअप कर लेना...

अजीत भारती

मतलब, भरे बैठे हैं मुँह ना खुलवा! साला प्यार नहीं किया कि बवासीर पाल लिया। लड़कियों को आहत होने की जरूरत नहीं है, एक लाइन में स्वीकार रहे हैं कि लौंडे अधिकतर हरामखोर होते हैं और उनके साथ जितनी ज्यादती हो कम है। पर हम साला ऐसा आदमी नहीं हैं। हम साला मालिक-मोमिन कीट्स बायरन, बच्चन-साहिर टाइप के हैं पर क्या करें, मानस में तुलसी लिख गए है:

होईहैं वही जे राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावा साखा।।

( होगा वही जो राम ने रच रखा है, तर्क -वितर्क में वक्त बर्बाद मत करो) ख्वाहिश थी कि हसीन हो ना हो पर कविता समझती हो लेकिन जब हसीना सामने हो तो आदमी उसके कविता समझने को भूलकर खुद कवि बन जाता है। हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ। हसीन थी, दिलरुबा थी, बहार के पहले खिले फूल की तरह थी। हमने प्रपोजल से पहले माहौल बनाने के लिए सोचा कि थोड़ी शेर- ओ-शायरी की जाए। मैसेज किया :

लफ्ज जब तक बुजू नहीं करते

हम तेरी गुफ्तगू नहीं करते।

(जब तक मेरे मुँह से निकलने वाले शब्द खुद को पवित्र नहीं कर लेते, तब तक हम तुम्हारे बारे में किसी से बातें नहीं करते।)

जवाब जब आया तो लगा... खैर, पहले जवाब जान लीजिए '' अच्छा है। वाह! अब मतलब भी मैसेज करो.. : -) '' स्माइली देखकर तो मेरी जल गई यारो! लगा कि सारा कुछ मटियामेट हो गया। दुनिया पागल है और जीने के लिए कुछ नहीं है। क्या हमारे जैसे लोगों को ढंग की लड़की नहीं मिल सकती? मतलब क्या सारी लड़कियाँ मर गईं जो लिटरेचर की क्लासों में भरी होती हैं मतलब समझिए कि कुछ पैसा लगाकर गर्लफ्रेंड रखना होता तो पैसा डूब गया सारा हमारे स्टार्ट- अप का।

बात हो गई कि ' मैं करता हूँ बेबीलोनिया की बातें, वो कहती है लिप्स्टिक दिला दो!' लेकिन फिर वही बात कि ' ये दिल, ये पागल दिल मेरा.. ' साला माने तब ना। प्रेम कंटीन्यू हो गया जी। वही तरह-तरह की बेवकूफियाँ, ' बेबी यहाँ आ जाओ ' वहाँ चले जाओ ' बेबी तुम डूब मरो ' ' बेबी मेरी जींस का कलर क्या है ' ' बेबी ये गले की जंक ज्वेलरी कितनी सही है ना... ' वगैरह-वगैरह

यह तो सबके साथ होता है। फिर एक दिन, लड़कियों का आम दिन और लौंडों के बाल नुचवाने टाइप का दिन, मोहतरमा को चादर खरीदने जाना था। हमें ये खरीदारियों में जाने से बड़ा डर लगता है।

एक तो प्राइमरी कलर, और ज्यादा इंटेलीजेंट हैं तो इंद्रधनुष के सात रंग छोड्‌कर रंग का कुछ मालूम नहीं होता। लेटेस्ट ट्रेंड के नाम पर दस साल से जींस और टीशर्ट वो भी एक ही कंपनी का। क्योंकि पहली बार सही फिर हे गया होगा। खाने में चिकन चिली और तंदूरी रोटी, चाइनीज हुआ तो मोमो के चाउमीन कॉफी में कैपुचीनो और जूस की दुकान पर बिना रिस्क लिए मिक्स जूस। दुकानदार जहाँ पूछे कि मसाला डालें तो फटाक से बोल दो '' यार! तुम्हें जो समझ में आता है डाल दो ''! बाल भी नाई को ये कहकर कि उसे जो मेरे चेहरे पर अच्छा लगता है काट दे।

ये जो ऊपर का वर्णन है, वो लड़कियाँ दो बार पढ़ें और इसे बाइबिल माने लड़की की। लौंडा इंजीनियर है तो एक लाइन में जान लो कि वो हर दुकान पर अपने ही जैसे एक लौंडे को ले जाता है और बाद में दुकानदार से कपड़ा, बाल जूस, कॉफी, सिनेमा, जूता... हर जगह) कह देता है, '' यार तुम क्या खाते / पहनते / पीते हो, वही दे दो!''

ऊपर का पैरा लडकियाँ तीन बार पढ़ें। इंजीनियर बेचारे भी लड़के हैं, उनके भी जज्बात हैं। वो डायरेक्ट शादी करने के लिए नहीं बने हैं। उन्हें भी प्यार करवाने का और बेबी-मम्मा कहने' कहलवाने का हक है। बेचारों को मौका दीजिए एक बार। निराश नहीं करेगा बस टाइम दीजिए। जब खुलकर आएगा तो उनसे ज्यादा ओपन माइंडेड कोई लड़का नहीं होगा। ओपन माइंडेड इतने होते हैं कि सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर सॉफ्टवेयर डेवलपर की जॉब ले लेते हैं क्योंकि कैम्पस सलेक्शन हो गया।

हाँ, तो हुआ यूँ कि फोन आया। शनिवार (सैटर-डे, ज्यादा हॉट चिक मत बनो। पता है फिर भी मन में पूछ रही है कि व्हाट्स दिस शनिवार्र?) को फोन आया कि उन्हें चादर खरीदना है। हमने हँसी-खुशी कह दिया कि आ रहे हैं। चादर ही खरीदना है। कौन-सी बड़ी बात है! बहुत-बहुत चादर खरीदे हैं सैनिक स्कूल में तो डिमांड पर हमेशा व्हाइट ही खरीदा था, सोचा पूरी दुनिया ऐसे ही चलती है।

इलाके के बेहतरीन मार्केट में गए। कोई बारह-पंद्रह दुकानें थी, जो चादरें बेचती थीं (ये शाम में पता लगा)। शुरू हुई बात, चादरों के तमाम पैकेट निकले। सेल्समैन खूबसूरत लड़कियों को देखकर ज्यादा इंथूझियास्टिक हो जाता है।? मांगे

एक, दिखाए चार। लड़की एक-एक चादर पूरा खुलवा रही है। पहले मैंने भी इंटेरेस्ट लिया फिर अपनी औकात पता चल गई।

'' ये पिंक नहीं भैय्या, दो शेड लाइट। बेबी पिंक में दिखाइए!'' साला हम सोचते थे पिंक तो पिंक होता है, यहाँ तो शेड्‌स में डील हो रही थी। फिर मोहतरमा ने कहा, '' ये टॉर्क्वाइज वाला कैसा है? तुम कुछ बोली ना, यहाँ क्या दुकान देखने आए हो?''

'' ब... ब. बढ़िया है, तुम्हारे वाल्स के साथ मैच करेगा। '' मैंने अपना पूरा ज्ञान लगाकर, उसकी दीवार का रंग याद करके कह दिया। '' ओप्फो दीवार का . रंग तो इंडिगो है। तुम किसी काम के नहीं हो!'' ये बात सीरियस होकर कहा। मन में आया कि अपनी डिग्री निकालकर मुँह पर मारूं फिर सोचा, छोड़ो यार। सह लो। ये भी एक एक्सपीरियेंस है।

दस दुकानें देख लीं। बारह से सात बज गए। ग्यारहवें में खुदा के रहम- ओ-करम से मैडम को एक चादर का कलर पसंद आ गया। हमने हनुमान जी को लड्‌डू कबूल दिया मन-ही-मन। कुछ देर हुआ, मैं खुशी से दुकान मैं टहलने लगा कि अब तो पैकिंग करा लेंगी। फिर थोड़ी आवाज हुई। मैं पास गया।

'' आप बीस रुपये तो कम करो और!''

'' मैडम, उतने की खरीद ही है। आपसे बिलकुल ज्यादा नहीं ले रहा। ये देख लो प्राइस लिस्ट। ''

'' नहीं भायाँ, बीस और कम कर लो। ''

'' मैडम बिलकुल पॉसिबल नहीं है। आपको दो घंटे से करीब सौ पीस खोलकर दिखा दिया। मुझे बेचना है, आप समझो बात को। ''

'' मैं तो नहीं लेती। आप रख लो फिर। ''

ये कहकर गुस्से में बड़बड़ाते हुए निकल ली। हमने बेचारे सेल्समैन की ओर देखा और मजबूरी में निकल लिए। पूरे रास्ते हमारी मोहतरमा उसे लालची. घूसखोर, चोर और भी पता नहीं क्या- क्या बोलती रहीं और हम सुनते रहे। कौन साला मधुमक्खी के छाते में ढेला मारे!

अगली सुबह मैं जगा तो लगा कि मेरे पास एक ही चादर है। इससे पहले ऐसा नहीं लगा था। लौंडों को कभी फ़ील नहीं होता कि जींस दो हैं, शर्ट तीन हैं (जिसमें एक किसी दोस्त की है जो दो साल पहले एक्सचेंज हो गई थी उसके कमरे पर), चादर एक है वो भी कोई आए तब बिछती है। हमने सोचा कि हम भी चादर खरीदेंगे।

उसी मार्केट में गए और अंतिम वाली दुकान में गए। वही सेल्समैन था, हमें देखकर मुँह बना लिया उसने। हमने कहा, '' यार, आज अकेले हैं। टेंशन मत लो।

चादर दिखाओ। ''

उसने तीन पैकेट निकाला। हमने उसमें से दो चुन लिया और उसने जितना बोला उससे बीस रुपये ज्यादा देकर ले आए।

शाम में मोहतरमा मिलने को आईं। नया चादर देखा तो पूछीं कि ये कब ली।

हमने कहा, '' आज! प्लीज ये मत पूछना तुम्हें क्यों नहीं बताया। ''

उसके बाद सात दिनों तक हमारी बातचीत बंद रही।

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