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गेरुआ - कविता संग्रह : विद्यानंद कुमार

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  कविताओं की पुस्तक
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  मदालसा
क्यों रोदन करता हैं पुत्र ?
तन मन ये तेरा हैं कुत्र ।
रुह तेरा अविनाशी निर्मल ,
नित्य निरंजन वीर तू उज्जवल ।

आँखों से जो देख रहा तू ,
सारे - के - सारे हैं आँसू  ।
मिली अभी ये नाम की डोरी ,
तुझे सुनाती मेरी लोरी ।

माँ देती क्या ऐसी शिक्षा ?
मुक्ति लाभ क्या माँ की इच्छा ?
ऐसा भी एक हुआ अतीत ,
मातृ मदालसा का वह गीत ।

बार - बार तन पाता आत्मा ,
इसी जन्म मैं तेरी माँ ।
माता-पिता हैं वही तेरा सब ,
तुझपर मम अधिकार हैं कब ।

अलस त्याग तू बन ब्रह्मज्ञ ,
बना दो अपना जीवन यज्ञ ।
शुद्ध आत्मा तू नहीं रोदन ,
भूल न जाना मेरा स्वरण ।

आज खुशी के अश्रुधार ,
मुक्त तुम्हारा हैं संसार ।
पुत्र धरा तेरा परिवार ,
प्राप्त करो जीवन का सार ।

☺☺☺☺☺☺☺
     गेरुआ
दुग्ध फलों के नित सेवन से ,
तोंद हैं आते काले धन से ।
भिक्षा करके हर दरबारे ,
बीड़ी गांजा सेवन सारे ।

नंगे रहना महावीर को ,
न देता परिचायक ।
छान लो चाहे जितना नीड़ को ,
सूक्ष्मजीव तो हैं हर हद तक ।

मुफ्त में जाते रेलों में ,
वसन गेरुआ धारी ।
दौड़ जनों की अलबेलों में ,
चोले करते भारी ।

जिनके हस्त पाद में बल हैं ,
वे भी भिक्षा को अपनाते ।
आलसियों का मार्ग सरल हैं ,
द्वेष दर्प को भूल न पाते ।

भगवा का कुछ हैं आशय ,
सत्य राह में स्वयं विलय ।
योद्धा और धर्मज्ञ भी ,
करता जो बलिदान कभी ।
     
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तीन शब्द
जिससे तुमने ब्याह रचाया ,
आज ये कैसा दिन आया ।
तीन शब्द में सब कुछ टूटा ,
कैसा तुम्हारा प्रेम अनूठा ।

अब नन्हों को पाले कौन ?
तीन शब्द में तुम जो मौन ।
घर - घर जाकर भोजन माँगे ,
या फिर सतीत्व सीमा लाँघे !

या बच्चों को जहर खिलाकर ,
बाँध ले रस्सा कंठ लगाकर ।
दिवस-दिवस आँसु पीने से ,
अच्छा है मरना जीने से ।

मन उन्नत वह भी मानव है ,
प्रेम दया उनमें भी सब है ।
क्रय की हुई नहीं वह दासा ,
या फिर नहीं हैं खेल तमाशा ।

तीन शब्द में नहीं चुकेगा ,
मानवता न आज्ञा देगा ।
खुदा करेगा क्या स्वीकार ?
जीना उनका भी अधिकार ।

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         केनो ऐमोन कोरो
संसारे माया जाले ,
केनो फेसे जाई गो बंधु ।
केनो बंधु ,केनो ऐमोन ,
कोरेछो मोरे सन ।

चाई आमि बाचिते ,
तुमि केनो कोरो ऐमोन ।
की तुमि चाओ रे ,
बेचे गेछे कुन धन ।

सुनिते पारो तुमि ,
देखिते पारो तुमि ।
ताओ केनो फेसे जाई ,
जगत् केनो मोने पाई ।

केनो तोके भालो बासि ,
माया छूटे जाए ना ।
केनो फाँसि केनो बंधु ,
आमार ऐईटी प्रश्न टा ।

केनो बासो अन्तरे ,
छाड़ितेओ  पारि कोई  ।
आसो ना आर एई घोरे ,
केनो चोखेे....ना लोई ।

केनो कोरो आमार संगे ,
जाईते ना चाई ऐबार ।
जाबो कोथाए तोके छाड़े ,
घूरे आसिबो आबार |

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     सुन लो मुझे भी
तुम बिन जैसे प्रभु तड़पता ,
दर्शन को हूँ आहें भरता ।
वैसे तू भी मेरे बिन ,
नहीं तड़पता होकर हीन ।

धूप-छाँव में जैसे भक्त ,
तुझको रखता है अपनाए ।
जैसे तुझको देता रक्त ,
तू देता क्या अपनी साएँ ।

सदा ही तो तू चुप रहता है ,
उत्तर तू क्यों न कहता हैं ।
आकर क्यों नहीं करता बातें ,
तुझे कभी तो सुन नहीं पाते ।

लोग तुझे दिन रात बुलाते ,
सांझ सुबह तुझको ही गाते ।
अगर तू सबको सुनता है ,
मुझको क्यों नहीं चुनता हैं ?

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      कैसी नारी तुम ?
नारी होकर भी नारी का ,
कैसे दर्द समझ न पाओ ?
तौर नहीं मालूम साड़ी का ,
कैसे हत्या कर जाओ ?

माता-पिता का सात्विक प्यार ,
ब्याही कन्या समझ रही थी ।
ऐसा भी होता संसार ,
अब तक भान नहीं थी ।

माता-पिता के तीखे मुख को ,
अब तक नहीं सुनी थी ।
सहसा उसने आई दुख को ,
घर में नहीं भुनी थी ।

कैसे तेल छिड़कती हो !
कैसे दाहन करती हो !
क्यों नहीं माता होती सास ?
जिंदी अंत को होती लाश ।

नारी होकर नारी को ,
कैसे करती हो शोषण ?
तेरी बेटी जैसी ही तो ,
मानव कैसे दूँ संज्ञन ।

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      नोट बंदी
कुछ हैं स्वार्थी लोग ,
परेशान हैं नोट बंद से।
बता रहे जनता का रोग ,
चोट लगी हैं नोट द्वन्द्व से ।

लंबे चौड़े उनके भाषण ,
चिंतित हैं डूबेगा धन ।
जैसे कपोत झपट हैं जाते ,
श्वान के मुख से निकल न पाते ।

लाखों कड़ोरो जनता को ,
खोया अपना मान मिलेगा ।
काले धन के गुप्त पता को ,
नहीं कहीं स्थान मिलेगा ।

अपने ऊँचे राज कली से ,
करते हैं बकवास ।
पूँजीवाद की झुकी डली से ,
व्यर्थ हुए बोड़ी के ताश ।

ह्रदय सरसता आँखें नम ,
जैसे धुल गए सारे गम ।
निष्ठा से आँसू हैं छलकते ,
देख प्रेम में जन-जन रंगते ।

गाँव-गाँव हैं खुशी में आज ,
मेहनत के सिर होगा ताज ।
अंत हुआ झूठों का दिन ,
भोर खिला हैं नव रंगीन ।

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       कौन हो तुम ?
तुम कौन हो ? अनजाना या पहचाना ,
इस मानव जीवन में अब तक नहीं तुम्हें हूँ जाना ।
मेरे पग-पग में परछाईं बनकर ,
क्यों देते हो अपना कर ।

सबने तो ठुकराया हैं ,
तू क्यों मुझको करता प्यार ।
सच या तू भी माया हैं ,
या अपने लिए तू रहा हैं ताड़ |

तेरा मुझसे क्या नाता हैं ?
सखा-प्रेमिका या भ्राता हैं ।
देर न लगती होते ओझल ,
क्यों ऐसा करते हो छल ?

न की हैं मुहब्बत ,
न मदद को लिखा खत ।
फिर कौन तुम ? क्या पहचान तेरी ,
बँधाते ढ़ाढ़स दुख पर मेरी |

मित्र जैसे हो कोई अपने ,
जैसे बार-बार हूँ देखा मैंने ।
तुम हँसे सम्मुख हो अनेकों दफा ,
शायद मैं ही बन गया बेवफा ।

सुनसान मैदानों में पुकारुँ तुझे जोरों से ,
पुकारुँ तुझे लाँघ चुप्पी की छोड़ो से |
और जब थक-हार बैठ जाऊँ ,
नैन खोलूँ तुझे मुस्कुराता पाऊँ ।

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        एक दिन पेये जाबो
जब सोबाए घूमे पोड़े ,
आसो तुमि मोनेर घोरे ।
सहज हाँसी मुखे साज ,
छाड़े आसो सबटी काज ।

तुमि प्रेम कोरो कोतो ,
केयो दिते पारे न जोतो ।
सुखे-दुखे सोबे कालेर ,
तुमि साथी माया जालेर ।

जेखन पाई चेतन हारा ,
तेखन तुमि आलोर धारा ।
नूतन थेके तुमि नूतन ,
तुमार काछे सब पुरातन ।

प्रभु जानते पारबो कि ना ?
ऐ जीवनेर जे साधना ।
डेगे-डेगे लाज डर ,
कोखन धरा कोखन शिखर ।

किन्तु तुमि आछो जानि ,
मिथ्था न जे तोके मानि ।
एक दिवसे पाबो तोके ,
पेये जाबो ढाल लोके ।

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       प्रतिकार
रोक न देना ये प्रतिकार ,
चाहे आए कितनी बाधा ।
बुरका नहीं बनो अंगार ,
सत्य वहाँ जहाँ नेक इरादा ।

तेरे उठती एक कदम से ,
मानवता को मिलेगा प्राण ।
जाग उठेगी लाखों गुलामी ,
वसुंधरा में होगा प्राण ।

मिटेगा शोषण वर्षों का ,
तेरे ईस प्रतिकार से ।
न्याय नहीं हैं तीन तलाक ,
उखाड़ दो आधार से |

प्रश्न उठेंगे , झुकना नहीं ,
रण भी होंगे रुकना नहीं ।
जीवन चाहे चल जाए ,
फिर भी न निर्बलता आए ।

पीछे पड़ेगे लोग तुम्हारे ,
हो भी सकता हैं बलिदान ।
फिर भी आगे बढ़ते जाना ,
तुझको ही ये धरा बनाना |
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        नारी मुक्ति
जिन आँखों में आँसु हैं ,
उनमें दहका दो शोले ।
तोड़ दो सारे बेड़ी बंधन ,
मुक्त गगन का कण-कण बोले ।

डरो नहीं तुम चलो निरंतर ,
ध्वंस करो अब सारे रीति ।
एक हैं सारे नर का न्याय ,
एक दो मानवता की गीति ।

आज तुम्हारी मुक्ति की ,
बिगुल बजी हैं चारों ओर ।
अभी चाहिए और बुलंदी ,
बस आने ही वाला भोर ।

अंधकार से पूरित धरा को ,
मिलेगा एक उज्जवल प्रकाश ।
छटेंगे बादल होगा एक दिन ,
फिर न होगा कोई दास ।

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      तलाक
क्या तुम्हें मेरी आसुँए दिखाई न देती ?
बंद द्वार में रोती छिपकर ।
क्यों पिता क्यों ? आखिर जन्म क्यों लेती ?
अश्रु बहाऊँ बस जीवनभर ।

मैं चीख चीख कर रह जाती हूँ ,
वह तीन बार कहता हैं तलाक ।
मैं गहरे सदमे को पाती हूँ ,
क्या ईश्वर मैं हूँ कोई चाक ।
 
 
      प्रभु तुम न बिसरो
विकल हूँ ईश्वर कहाँ को जाऊँ ,
प्रकाश करो पथ कैसे पाऊँ ।
तुझको ढूँढू किन गलियों में ,
किन डलियों में किन कलियों में ।

प्यासु हूंँ पाने को अनंत ,
मिलकर तुझमें होऊँ अंत ।
धरती बड़ी है कहाँ को भटकूँ ,
या फिर अपना मस्तक पटकूँ ।

भूल हुई क्या तुम्हीं बताओ ?
फिर क्यों मन में न आओ ?
जीवन अब तो लगता विष ,
अच्छा होता कटता शीश ।

सागर जैसे जल से खाली ,
जैसे पत्तों बिन हैं डाली ।
सूख गया रौशन से थल ,
ताप से बंजर मरूस्थल ।

तूफाँ आया है जीवन में ,
आशा फिर भी रिक्त गगन में ।
भोर के होने की आशा में ,
जिंदा हूँ इस विश्वासा में ।


      देखना
क्या तुमने देखा है कभी ?
पुष्प मचलते डाल पर ।
आए फिर तूफान तभी ,
कुछ झोकों में जाए झड़ |

हाथापाई में आखिर तरुवर ,
खो देता कुछ पत्ते टहनी ।
मुड़ जाता है पेड़ से धड़ ,
जो देता था छाँव घनी |

दिनों बाद टूटा वह डाल ,
फिर बन जाता है विकराल  ।
तम शक्ति का आज बवंडर ,
फैल रहा है जाकर घर-घर ।

मर नहीं सकती मानवता ,
चाहे कितना हो अन्याय ।
ध्वंस हुआ तब दानवता ,
धरा में जब भी हुआ न न्याय ।

तुम देखना बनेंगी मशाल ,
मानवता की चिन्गारी ।
लद जाएंगी फल से डाल ,
आए तूफाँ या हिम भारी ।


        स्वर्गेच्छा
स्वर्ग कहाँ ?  हैं ईच्छा दर्शन ,
सुना हैं होता सुधा का वर्षण ।
दूध की नदियाँ बहती हैं ,
उदर क्षुधा न सहती हैं ।

परमेश्वर की ऐसी नगरी ,
होता न अन्याय ।
न चिंता है धन गगरी ,
न चिंता है आय ।

नरकलोक में दी जाती है ,
कर्मों की सजा बेरहमी से ।
अग्नि सागर तन पाती है ,
जीवन जाती बिनु नमी से ।

डर लगता है परमेश्वर ,
कैसा होगा न्याय का वह दिन ।
पाप किया बहुतेरे ईश्वर ,
पर तेरा हूँ अंग अभिन्न ।

मन में तेरी भीनी खुशबू  ,
पाकर पाया हूँ सुरलोक ।
खुशी में धुल गए गम के आँसू ,
नहीं हैं चिंता नहीं हैं शोक ।

स्वर्ग नहीं हैं नर्क नहीं ,
देखा हूँ न लोक कोई ।
आँसू खुशी सब मन में कहीं ,
मन के ही हैं सारे बोई ।

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         कालिमा
एक ही क्षण में ही लाखों की ,
जलती हैं फुलझड़ियाँ ?
घुटन हैं एक साँस में भी ,
जलती पटाखों की लड़ियाँ |

कुछ बच्चे भूखे भी हैं ,
और कमी पोषण की |
नैन धँसी मुरझाई सी हैं ,
नहींं अर्थ हैं कहीं वसन की |

गंध पटाखों की सब ओर ,
जीना मुश्किल सुनकर शोर ।
बलि भी होंगी , नहीं भूलना ,
नभ में धुँधला धुँआ घना ।

कहीं पुस्तकें नहीं हस्त में ,
नहीं औषधि कहीं बिना धन ।
मरते हैं कहीं वीर गश्त में ,
शोषित होता कहीं हैं बचपन ।

जो पैसे जलते हैं गगन में ,
होगा रक्षण कहीं प्राण में ।
वितरित हो हरि रुपी जन में ,
सार्थक होगा देना दान में ।

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       पूँजीवाद
यदि धरा सबका अधिकार ,
तो पूँजीपति क्यों राज करें ।
जब सबके पिता हैं सृष्टिकार ,
फिर एक पुत्र भूखा क्यों तड़पे ।

कहाँ कमी हैं मुझे बताओ ?
धन दानी को समझ न पाओ ।
दान नहीं तुम लो अधिकार ,
पट्ट बाँध छीना आधार ।

बीघा एक में जीते हो तुम ,
वह बीघा हजारों के व्यापारी ।
पूँजीवाद का श्वेत कुसुम ,
आज भी आँखें बँधी तुम्हारी ।

मीठी मीठी जहर घोलकर ,
शोषण करता पूँजीवाद ।
खून चूसता जोंक-सा धरकर ,
बिन बाँधे कर पाद ।

नहीं मिटीं हैं अभी गुलामी ,
अभी अनेकों हैं बंधन ।
अभी अनेकों गुमनामी ,
अभी नहीं आजाद हुआ जन ।

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       मानवता
चार अक्षरों की मानवता ,
ढूँढ़ रही दर दर में पता ।
छालें होकर लहूलुहान ,
बचा रही मुश्किल में प्राण ।

वह रो रोकर व्यथित होती ,
ध्वंस देख वह अश्रु पोंछती ।
जगजननी तू मेरी माँ ।
फिर भी तू देती है पनाह ।

आसूँ को मैं देख तुम्हारे ,
पोंछ भी नहीं पाता हूँ ।
भीख माँग रही द्वारे द्वारे ,
देख तुझे दुख आता हूँ ।

तेरे ही प्यारे संतान ,
तुझपर ही ताने कृपाण ।
सुधाधार तन से बरसाकर ,
गतित किया था जीवन निर्झर ।

उसकी आँखें जल बिन रंगी ,
छाती चीरता मानव जंगी ।
पर कुछ लोग हैं सींच रहे ,
जिन उर में बस प्यार बहे |

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       दुख जाल
कुछ बच्चे है भूखे तेरे ,
कुछ बच्चों का नहीं है नाथ ।
कुछ के जीवन है अँधेरे ,
कोई ढूँढ रहा है साथ ।

कला बेचकर जीवन चलता ,
राहों में कोई जीवन पलता ।
कोई जीवन से लड़ता ,
आतंकों के कोई डरता |

अस्थि के पंजर सा चेहरा ,
पोषण का शिकार ।
छुपा हुआ एक गम का सेहरा ,
सुखी नहीं तेरा परिवार ।

खोकर सारी आशा आखिर ,
करता खुद की घात ।
लहू का ऐसा रंग अबीर ,
हो रण में बरसात |

एक नहीं हैं लाखों करोड़ों ,
तेरे संतानों का सवाल ,
दुख ही दुख क्यों जीवन मोड़ो ?
छूटे कैसे दुख का जाल ?  

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     जगजननी
हाथों में तू लिए कटारी ,
चमक प्रेम की मुखमंडल में ।
आदिशक्ति तम संहारी  ,
बसी हुई चिर अंतरतल में ।

जगतपालिनी शक्तिजीवनी ,
स्नेहधारिनी जगजननी ।
हर सृष्टि की तू माता ,
संतानों को पालन दाता ।

प्रेम का निर्झर धोता मम ,
ध्वनि की ऊर्जा में नम ।
पवित्रता से नहलाकर ,
अश्रु पोंछती कंठ लगाकर ।

मेरा मस्तक तुझको अर्पण ,
मुझको दो भक्ति का धन ।
हर जीवन में तुझको पाऊँ ,
मन से भी न दुख पहुँचाऊँ ।

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     एक होओ
नहीं लेखनी रुके तुम्हारी ,
अंग अंग में ऊर्जा भर दो ।
पर्वत को भी कर दो वारि ,
रोती मानवता को अमर दो ।

पीसता जाता आज समाज ,
नीतिवानों को दो ताज ।
देख न्याय में काली छाया ,
क्या मन में राग नहीं आया ?

नहीं मुझे कुछ तुझसे लेना ,
नहीं चाहिए यश औ नाम ।
मानवता को ऊर्जा देना ,
ईसीलिए करता हूँ काम ।

दुनिया सपनों की झूठी ,
वास्तव क्या है ? उसे खँगालो ।
आज भी रीति नहीं है टूटी ,
ढ़ोंग दिखावा को न पालो ।

अंगारें आँखों में लेकर ,
मरो नहीं जीवन को देकर ।
रणभूमि का रण है प्यारा ,
नहीं सुहाता डर का मारा ।

धरती का निर्माण करो ,
सारे ऊर्जा मिलकर ।
क्रांति का एक रूप धरो ,
भाग खड़ा हो तम हिलकर |

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       स्वीकार सुमन लो
तेरे आँचल में जीना , तेरे आँचल में मरना ।
तुझसा कोई हुआ कभी न , तू है तो न है डरना ।

चुपके चुपके से आकर ,
प्रेम का जल बरसाकर ।
धोते हो अपमान ह्रदय का ,
कली खिलाते प्रेम उदय का।

नहीं चाह कोई हो अपमानित ,
नहीं चाह हो मस्तक नीत ।
प्रसिद्धि रण तोड़ दिया हूँ ,
खुलकर दो पल साँस लिया हूँ

सब है परमपिता तू मेरा ,
दिवस-निशा-दोपहर-सवेरा ।
शौर्य शक्ति  मेरा कब ?
कला प्रतिभा  तेरा सब ।

स्वार्थमयी था प्रेम हमारा ,
पाने आया तेरा द्वारा ।
लेने आया आज तुझे ,
जाना तेरे साथ मुझे ।

मादकता के रंगों में ,
घुल जाता जब अंगों में ।
निकल नहीं मैं पाता हूँ,
निज दुख प्रभु बताता हूँ ।

क्या माँगू क्या न माँगू ,
कैसे रंजन सीमा लाँघू ।
कौन सा तुझसे माँगू वर ?
नहीं जानता हूँ ईश्वर ।

कितनी बार बोला हूँ तुझको ,
लिए चलो तेरे संग मुझको ।
हार चुका हूँ कहकहकर ,
स्वीकार सुमन लो परमेश्वर ।

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पग - पग में तू
मेरे हर एक पग में तू   रह ,
कार्य करूँ होकर न विरह |
जनम जनम हो तेरा नाम ,
आ माटी पर फिर करू काम |

कैसे पाया तेरा नाम ,
कोई अपने लगते जैसे |
जीवन में आया था शाम,
दूर की कोशिश थी अपनों से |

मैं अनजाना था तुमसे ,
दुख भी न कहता था किसी से |
दुख को चुराया , पता न पाया |
मुक्त हुआ व्याधि से काया |

भय संशय था तुझको लेकर ,
दूर हुआ सब खुद को देकर |
अहं मेरा तुझमें खोया हूँ,
ह्रदय सुमन दिल में बोया हूँ |

कभी काँटो में फूल खिलाया ,
कभी विष में ही तुझको पाया |
कभी लगता जीवन है सुन्दर ,
कभी जीवन से लगता है डर |

भीड़ में अकेला हो तुम्हारी याद पाता ,
प्रेम की तान मेैं तुम्हीं को सुनाता |
तुम्हारे बिना नहीं है आधार ,
जीने का नहीं मेरा सार |

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        खाई
एक तरफ रकमें हैं मोटी ,
एक तरफ दुर्लभ हैं रोटी ।
एक तरफ कमरें हैं खाली ,
एक तरफ सड़कें ही टाली ।

एक तरफ कालाबाजारी ,
एक तरफ दिन रात पसीना ।
एक तरफ बंग्ला और गाड़ी ,
एक तरफ कुपोषित सीना ।

एक तरफ मँहगें विद्यालय ,
एक तरफ मजदूरी बाल ।
एक तरफ धन है संचय ,
एक तरफ निर्धन हैँ हाल।

खोलो अपनी आँखें अब ,
सबकी धरती सबका रब ।
रूप खाई का है विकराल ,
ऊँच नीच क्यों ? मेरा सवाल ।

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    GOD LOVES EVERYONE.
        बैठा हूँ न्याय को
प्रभु तुम्हारे नाम को लेकर ,
काट रहे आपस में सर ।
वर्ण रुप में कलियाँ नव है ,
पर मानव तो मानव है ।

तू हरता है सबका मन ,
पर मानव करता है शासन ।
खेल रहे हैं रक्त की होली ,
निकली दानवता की टोली ।

ईश्क तुम्हारा कण - कण से ,
पशु खग सबके जीवन से ।
प्राणी के तू अर्पण से ,
खुश होता क्या तू मन से ?

न्याय को तेरे दर पर आया ,
हैँ पुत्री के अधिकार में छाया ।
करते अत्याचार हैं नर ,
जीती हैं वस्त्रों के अंदर ।

ऊँच नीच और जाति - पाति ,
अश्रु हैं माता की छाती ।
प्रेम का उजड़ा है सागर ,
लाल हैं पाखंडों का कर ।

तुझको प्रेम मैं करता हूँ ,
दिल से तुझपर मरता हूँ ।
बैठा लिए न्याय का आस ,
तोड़ न देना ये विश्वास |

☺☺☺☺☺☺☺☺☺☺☺☺
      तुम्हारी गुलामी
कब तक रखोगे पर्दे पर ,
देकर धर्म का नाम ।
एक दिन वह खो देगी डर ,
होगे तुम बदनाम ।

कोशिश कर लो लाखों बार ,
तलवारों को कर लो धार ।
चाहो तो हत्या भी कर दो ,
जिएगी वह खुलकर संसार ।

सत्य जहाँ फिर  कैसा डरना ,
उठों बेटियों लो आजादी ।
न्याय नहीं प्रतिकार ही करना ,
शोषित हो अंत से आदि ।

तू संतान है ईश्वर की ,
पिता तुम्हारा है परमेश्वर ,
सुनो तुम्हारे अंदर की ,
क्या प्रेम में वो करता है अंतर ?

शोषित होकर पिसती रही ,
अर्सो अर्सो से ।
चुप होकर कुछ भीं न कही ,
वर्षों वर्षों से ।

पति को है परमेश्वर माना ,
उसने  दिया जहर का खाना ।
जली आग में दान की खातिर ,
फाँसी पर लटकाया सिर ।

नहीं साधना चुप्पी अब ,
संग तुम्हारे पल पल रब ।
जुल्म सहना  बहुत हुआ ,
नहीं कोई तुम हो जुआ ।

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   तुम्हारे अधिकार
तुम्हें तुम्हारे हक के खातिर ,
आना होगा रण में ।
तोड़ना होगा ये जंजीर ,
जीओगी कब तक लांछन में ?

देखो एक संसार खुला है ,
गूँज रही तेरी किलकारी ।
आजादी अब रहा बुला है ,
परदे पर न हैं नारी ।

बादल न हैं दूर गगन में ,
सूरज निकल रहा मुस्काता ।
फैलती नव किरणों के वन में ,
राह नहीं अँधेरा पाता ।

छिन्न-भिन्न कर दो जंजीर ,
बाँधों न बुरके पर सिर ।
एक दफा स्थिति विचारो ,
अबतक तुमने क्या कुछ हारो ?

उसने शोषण किया तुम्हारा ,
फिर भी क्यों चुप रहती हो ?
जन्म सिद्ध अधिकार को मारा ,
फिर भी क्यों न कुछ कहती हो ?

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