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कहानी - विदाई / धर्मेन्द्र राजमंगल

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  आज चंदा की सहेली माधुरी की शादी थी, चंदा ने दौड़ दौड़ कर खूब काम किया। जिस दिन से उसे माधुरी की शादी के बारे में पता चला तब से लेकर आज तक उसने माधुरी की खास देखभाल की थी, और करती भी क्यों न? माधुरी उसकी सुख दुःख की सहेली जो ठहरी, उसे माधुरी से बिछुड़ना भी तो था।

चंदा मोहल्ले की दुलारी लड़की थी, बूढ़े से लेकर बच्चे तक सभी चंदा से प्यार करते थे। चंदा जब भी घर से निकलती सर पे चुनरी जरुर ओढ़े होती थी। मोहल्ले के बुजुर्गों की नजरों में चंदा के लिए सम्मान था, सभी से रामराम करती हुई जाती, छोटे बच्चों से छेड़ती हुई जाती। चंदा के माँ बाप थे, उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी न थी लेकिन उन्होंने चंदा को पढ़ाया लिखाया। उसे बारहवीं तक पढ़ाई करवा दी, उसके बाद पढ़ाई बंद करवा दी। उसके साथ पढ़ने वाली उसकी सहेली माधुरी की शादी होने जा रही थी।

अब चंदा के माँ बाप को भी चंदा की शादी की फिकर होने लगी, चंदा की माँ उसके बाप से रोजाना कहती कि इस लड़की के पीले हाथ करवा डालो, बेटी पराया धन होती है न जाने कब क्या हो जाय। चंदा के पिता बाबूलाल भी चंदा की शादी को लेकर फिकर मंद थे, उन्होंने इधर उधर के लोगों व रिश्तेदारों से कह रखा था कि कोई सही सा लड़का हो तो बताना, अपनी चंदा की शादी के लिए।

चंदा का मन शादी से कोसों दूर था, उसका मन तो अभी पढ़ाई करने को करता था लेकिन माधुरी की शादी ने चंदा को सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया था। घर वालों ने अकेली पड़ने के कारण उसकी पढ़ाई रुकवा दी और उसकी शादी के लिए लड़का भी ढूंढना शुरू कर दिया।

माधुरी की बारात आ चुकी थी, चंदा अपनी प्रिय सहेली माधुरी के साथ उसके कमरे में बैठी हुई उससे मजाक किये जा रही थी, चंदा माधुरी से कह रही थी, “क्यों माधुरी देवी ससुराल जाकर अपनी इस बुरी सहेली को तो भूल ही जाओगी, और वहां तो तुम्हें एक तुम्हारा साथी भी मिल जाएगा जो दिन भर तुम्हें हाथों में लिए घूमेगा।”

माधुरी जानकार भी अनजानी बनती हुई बोली, “कौन साथी”। चंदा तंज से बोली, “ओह हो कितनी भोली हो, साथी होगा तुम्हारा खूसट पति जो तुम्हें मुझसे दूर ले जा रहा है, अगर ये न आता तो तुम मेरे पास न रहती।”

माधुरी थोडा इतराकर बोली, “खूसट मत बोल बहन, इसमें उनका क्या दोष मेरी शादी तो मेरे घरवालों ने तय की है”। चंदा फिर से माधुरी को चिड़ा कर बोली, “हाय रे दैय्या अभी से 'उनके' गुण गाने लगी भूल गयी इस सहेली को, जा में तुझसे बात नहीं करती”। इतना कह चंदा मुंह फेर कर बैठ गयी।

माधुरी अपनी सहेली की इस तरह की मजाकिया तरकीबों से वाकिफ थी, उसे पता था कि चंदा उससे कभी रूठ ही नहीं सकती है, उसे चंदा को मनाने का तरीका भी पता था। माधुरी ने चंदा के पास जा उसे बाहों में भर लिया और बोली, “सुन मेरी प्यारी सखी आज में जा रही हूं, कल तू जायेगी, एक दिन हर लड़की को जाना होता है, कोई भी लड़की हमेशा तो क्वारी नहीं रह सकती है, तो फिर में कैसे तेरे पास हमेशा रही आऊंगी।”

चंदा की आँखों में आंसू आ गये, माधुरी भी अपने को गमगीन होने से न रोक सकी, चंदा रोते हुए माधुरी से बोली, “माधुरी ऐसा क्यों नहीं होता कि हम जाए और लड़के से शादी करके उसे अपने घर ले आये, हमें ही क्यों जाना पड़ता है, हम भी तो इंसान ही है, फिर हमारे साथ ऐसा बर्ताव क्यों।”

माधुरी ने चंदा के आंसू अपने साडी के पल्लू से पोंछे और उसका माथा अपने गुलाबी होंठों से चूमकर बोली, “मेरी बहन वो लड़के हैं और हम लड़की, हम ऐसा नहीं कर सकते, ऐसा करने का अधिकार तो सिर्फ उन लोगों का ही है, तू समझ रही है न में क्या कह रही हूं।”

चंदा ने माहौल को बदलते हुए ठिठोली की बोली, “हां में समझ रहीं हूं तू क्या कह रही है, तुझे तो अपने अपनी शादी की जल्दी पड़ी है, सोचती होगी जल्दी से जल्दी अपने पति के पास पहुंच जाऊं”। इतना कह चंदा ने माधुरी को उसकी कमर में नोच लिया।

माधुरी 'उई माँ' करती हुई बोली, “ठीक है तू मुझे परेशान कर ले, में तेरे पास आया ही नहीं करुँगी तू मुझे...”। आगे बोलने से पहले ही चंदा ने उसका मुंह अपने नर्म हाथों से बंद कर दिया और बोली, “मेरी सखी, मेरी बहन दोबारा अपने मुंह से ये बात न बोलना, अगर तू न आया करेगी तो में जहर खा मर जाउंगी, या कुएं में कूद अपनी जान...”।

अभी चंदा कुछ कह ही रही थी कि माधुरी का मेहँदी लगा नाजुक हाथ चंदा के शरारती होठों पे आ लगा, माधुरी चंदा को अपनी बहन की तरह मानती थी, वो चंदा के मुंह से उसके मरने की बात सुन सहम उठी और चंदा का हाथ अपने चाँद से मुखड़े से हटाती हुई बोली, “चंदा मेरी बहन तुम मेरी मजाक की बातों को इतना दिल पर ले गयी और मरने मारने की बातें करने लगी, तुम क्या समझती हो मेरी सखी कि में तुम्हारे बिना खुश रहूंगी, अरे मेरी भी जिन्दगी तुम्हारे बिना अधूरी ही रहेगी, मुझे भी हर वक्त तुम्हारे साथ बिताये हुए वो आलसी दिन याद आयेंगे जिनमें न शादी की चिंता थी न अपने घर से जाने की।”

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माधुरी बोलती ही जा रही थी, “में ये कैसे भूल सकती हूँ सखी कि तुम हमेशा मेरे साथ मेरा साया बनकर रहीं, मेरे दुखों को बांटा, मेरे सुखों का कितना ध्यान रखा, मेरे साथ रोई, मेरे साथ हंसी, में तुम्हारे बिना अधूरी हूं मेरी सखी, और तुम हो कि सोचती हो कि में तुम्हें छोड़कर खुश हो जाऊंगी।”

चंदा के गुलाब की पंखुड़ियों की तरह गुलाबी और नर्म होठों पर माधुरी का मेहँदी लगा कोमल पतला हाथ अभी भी रखा था, लेकिन चंदा ने उसका हाथ अपने से अलग न किया और चुपचाप माधुरी की भावुक बातों को सुनती रही, चंदा की आँखें किसी झरने की तरह वह रहीं थी, जिसके पानी से चंदा का मुंह व माधुरी का कोमल हाथ भीग रहा था।

फिर दोनों सहेलियां ने एक दूसरे को अपनी बांहों में भर लिया, दोनों के हाथ एक दूसरे को ऐसे जकड़े थे मानो ये अब कभी एक दूसरे से अलग नहीं होंगी, दोनों की साँसे एक लय में चल रहीं थी, दोनों की आँखे अपनी सखी से बिछड़ने के गम में रोये ही जा रहीं थी।

माधुरी के कमरे का वातावरण करुणा-युक्त हो गया लेकिन तभी माधुरी की माँ कमरे में दाखिल हुई और बोली, “अरे तुम दोनों यहाँ बैठी हो, चलो मंडप तैयार है, जल्दी अपने कपडे ठीक कर लो, माधुरी को संभाल के लाना चंदा और ये बाकी की लड़कियाँ कहाँ चली गयी उन्हें...”।

माधुरी माँ की बात बीच में काटती हुई रुंधे गले से बोली, “माँ सब हो जाएगा तुम परेशान मत होवो”। माँ ने माधुरी की आवाज को सुना जो रुंधी हुई थी, फिर उसकी आँखों में देखा जो आंसुओं से भरी हुईं थी। माँ का दिल बेटी के लिए तड़प उठा, उन्होंने माधुरी को गले से लगा लिया और बोलीं, “तू रो क्यों रहीं है मेरी बच्ची, तू कहीं विदेश में थोड़े ही जा रही है, वहां भी तेरा घर ही है और यहाँ भी, जब भी मेरी याद आये घूम जाया करना, क्या करूं मेरी बच्ची में भी नहीं चाहती कि तू मेरे पास से दूर जाय लेकिन ये एक न एक दिन करना ही पड़ता है।”

इतना कह माँ कमरे से बाहर चली गयी, चंदा ने नम आंखों से माधुरी को तैयार किया, फिर मंडप ले कर गयी। माधुरी की शादी पूरी हुई, अब उसकी विदाई होनी बाकी थी। चंदा और माधुरी दोनों के दिलों में बिछुड़ने का गम था और गम ऐसा कि लगता था कि अभी जान निकल जायेगी, लेकिन दुनिया का दस्तूर है मिल के बिछड़ना जो आज उन्हें भी निभाना था।

माधुरी का पति इतनी सुन्दर बीबी पा खुश था, उसे तो अपने घर जाना था तो रोये क्यों, रोने का काम तो माधुरी का था जो अपने आधे जीवन की यादें अपने पीहर छोड़ चली थी। सहेली, माँ, बाप, घर द्वार, पड़ोसी, मोहल्ला, गाँव, गलियाँ, नुक्कड़, बस्ती, सारी शरारतें, अठखेलियाँ और न जाने क्या क्या।

उसका सब कुछ तो यहीं था फिर वो ये सब छोड़कर क्यों जा रही थी, इसका जवाब आज तक कोई भी आदमी किसी भी पीहर से विदा होती लड़की को नहीं दे पाया है। आखिरकार माधुरी जैसे तैसे विदा हुई। चंदा माधुरी के जाने के बाद वहां एक पल भी न रुकी, सीधे अपने घर आई और कमरे में औंधे मुंह लेट गयी, सोचती थी अब जल्दी ही ये सब उसके साथ भी होना है।

[समाप्त]

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