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सत्य और अहिंसा का रास्ता बताने वाले गुरु घासीदासजी -अनामिका

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समाज अपने महापुरुषों का आरंभ से अनुयायी रहा है। सांसारिक जीवन जीते हुए मनुष्य को कई बार अपनी गलती का अहसास नहीं हो पाता है और वे गलत को ही सही मानते हैं। ऐसे में अपनी दिव्य दृष्टि से मानव की सोच बदलने वाला व्यक्तित्व को हमने महापुरुष कहकर बुलाया है। यह वही लोग हैं जो हमें मार्गदर्शन देते हैं। जीवन जीने का रास्ता बताते हैं और कहते हैं कि जीवन में किस तरह लोगों का उपकार किया जाए  और किस तरह इस मानव जीवन को सार्थक बनाया जाए। सभी महापुरुष सत्य और अहिंसा के रास्ते को जीवन का श्रेष्ठ रास्ता मानते हैं। इन्हीं महापुरुषों में एक हुए हैं गुरु घासीदास। छत्तीसगढ़ की धरा में अवतरित होने वाले इस महान व्यक्तित्व ने न केवल छत्तीसगढ़ के लोगों का मार्गदर्शन किया अपितु पूरे संसार में गुरु घासीदास का नाम हो चला है। संत वाणी उनकी गूंज रही है। 

गुरु घासीदासजी  का जन्म 1756 ई. में छत्तीसगढ़ के रायपुर जि़ले में गिरौद नामक ग्राम में हुआ था। उनकी माता का नाम अमरौतिन तथा पिता का नाम मंहगूदास् था। युवावस्था में घासीदास का विवाह सिरपुर की सफुरा से हुआ। भंडापुरी आकर घासीदास सतनाम का उपदेश निरंतर देते थे। घासीदास की सत्य के प्रति अटूट आस्था की वजह से ही इन्होंने बचपन में कई चमत्कार दिखाए, जिसका लोगों पर काफ़ी प्रभाव पड़ा। इस प्रभाव के चलते भारी संख्या में हज़ारों-लाखों लोग उनके अनुयायी हो गए। गुरु घासीदास ने समाज के लोगों को सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होंने न सिर्फ सत्य की आराधना कीए बल्कि समाज में नई जागृति पैदा की और अपनी तपस्या से प्राप्त ज्ञान और शक्ति का उपयोग मानवता की सेवा के कार्य में किया। इसी प्रभाव के चलते लाखों लोग बाबा के अनुयायी हो गए। फिर इसी तरह छत्तीसगढ़ में ‘सतनाम पंथ’’ की स्थापना हुई। इस संप्रदाय के लोग उन्हें अवतारी पुरुष के रूप में मानते हैं। गुरु घासीदास के मुख्य रचनाओं में उनके सात वचन सतनाम पंथ के ‘‘सप्त सिद्धांत’’् के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए सतनाम पंथ का संस्थापक भी गुरु घासीदास को ही माना जाता है।

गुरु घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। वे सत्य की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड पर समाधि लगाये इस बीच गुरूघासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी तपस्या भी की।

गुरु घासीदास जी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरु घासीदास ने मूर्तियों की पूजा को वर्जित किया। वे मानते थे कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है।

गुरु घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरतापूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। गुरु घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस वक्त लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरु घासीदास के सिद्धांतों का गहरा प्रभाव था। गुरु  घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है।

इनके सात वचन सतनाम पंथ के सप्त सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिसमें सतनाम पर विश्वास, मूर्ति पूजा का निषेधए वर्ण भेद से परे, हिंसा का विरोध, व्यसन से मुक्ति, परस्त्रीगमन की वर्जना और दोपहर में खेत न जोतना है। इनके द्वारा दिये गये उपदेशों से समाज के असहाय लोगों में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व की पहचान और अन्याय से जूझने की शक्ति का संचार हुआ। सामाजिक तथा आध्यात्मिक जागरण की आधारशिला स्थापित करने में ये सफल हुए और छत्तीसगढ़ में इनके द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ के आज भी लाखों अनुयायी हैं। संत गुरु घासीदास ने समाज में व्याप्त कुप्रथाओं का बचपन से ही विरोध किया। उन्होंने समाज में व्याप्त छुआछूत की भावना के विरुद्ध ‘‘मनखे.मनखे एक समान’’ का संदेश दिया।

छत्तीसगढ़ राज्य में गुरु घासीदास की जयंती 18 दिसंबर से माह भर व्यापक उत्सव के रूप में समूचे राज्य में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस उपलक्ष्य में गाँव-गाँव में मड़ई-मेले का आयोजन होता है। गुरु घासीदास का जीवन.दर्शन युगों तक मानवता का संदेश देता रहेगा। ये आधुनिक युग के सशक्त क्रान्तिदर्शी गुरु थे। इनका व्यक्तित्व ऐसा प्रकाश स्तंभ है, जिसमें सत्य, अहिंसा, करुणा तथा जीवन का ध्येय उदात्त रुप से प्रकट है। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में सामाजिक चेतना एवं सामाजिक न्याय के क्षेत्र में ‘गुरु घासीदास सम्मान’ स्थापित किया है। गुरु घासीदास शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे अत: उनकी स्मृति में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में गुरु घासीदास विष्वविद्यालय स्थापित है। राज्य सरकार ने उनके जन्मस्थली गिरौदपुरी में विशाल जैतखंभ का निर्माण कराया है जिसे देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में लोग आते हैं।

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