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विज्ञान कथा - बर्बरीक उवाच / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

बर्बरीक' उवाच!

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कितना अन्तर है, इस प्राकृतिक वायु में, जो अभी भी परिस्थितियों के कारण अपने नैसर्गिक रूप में सुरक्षित है । उन एटामिक-शेल्टरों में, परमाणु रोधी सुरक्षा कक्षों में वास कर रहे व्यक्तियों को यह सौभाग्य कैसे मिल सकेगा । हिमालय के उस ऊँचें शिखर पर बैठा मैं, असुर बालक बर्बरीक पृथ्वी पर चल रहे मृत्यु के नर्तन को, हत्या, मानव हत्या के ताण्डव को जाग्रत होकर तटस्थ भाव से देख रहा हूँ । एक पल रुकिये । वह विनाशकारी विस्फोट, परमाणु बम का विस्फोट जो अभी अमेरिका के न्यूर्याक नगर पर हुआ है उसकी सेसमिक मेला, कम्पन युक्त भू-तरंगों की अनुभूति मैं कर रहा हूँ । मैं आप को उन आतंकवादियों की नृशंस गतिविधियों से, जो मानव के मानवता के विनाश के प्रयास में लिप्त हैं, के विषय में बताता रहूँगा ।'

'कर्नल कहाँ हो'' की ध्वनि ने उनके ध्यान को भंग कर दिया । अनीता उस एटामिक शेल्टर की स्वचालित सीढ़ियों पर खड़ी, स्वनियंत्रित, स्वचालित द्वार से निकल कर बाहर आ गईं थी । 'क्या बात है, अनीता?'' कर्नल ने पूछा । 'एक अतिशक्तिशाली विस्फोट हुआ है, उसी के चित्र आ रहे हैं, स्क्रीन पर ।

''कहां पर यह विस्फोट हुआ है?''

''भारत पर इतना शक्तिशाली विस्फोट था कि उत्तरी भारत के कुछ प्रदेश पूर्णरूपेण विलुप्त हो गए हैं । आशंका है कि अभी और परमाणु विस्फोट होंगे....हाइड्रोजन बमों की भी वर्षा की संभावना है ।'' ''ओह! यह तो बहुत बुरी खबर है त्रासदायक समाचार है'' कहते हुए कर्नल उठ गए । तेजी से एटामिक शेल्टर के कांग्रेस कक्ष में लगी स्क्रीन के समीप वे अन्य लोगों की तरह खड़े हो गए ।

दृष्य विनाश के, स्क्रीन पर उभर रहे थे.. .कक्ष में श्मशान का सन्नाटा छाया हुआ था ।

हयूस्टन के एटामिक शेल्टर में लगी इंडिकेटर बटन को मारिया ने प्रेस किया । विश्व के नक्शे पर लगी उनकी राजधानियों की स्थिति दर्शाने वाले इलेक्ट्रानिक इंडिकेटर कहीं पर किसी देश की लिए आन होते तो कहीं पर कोई लाइट आन नहीं होती ।

''दिल्ली, काबुल, तेहरान के इंडिकेटरों का मौन इन नगरों के, इनके समीपवर्ती क्षेत्रों के विनाश की सूचना थी । लंदन पेरिस, बर्लिन का क्या समाचार है? '' जनरल वागनर ने अपरेटर जैकलिन से कुछ रुकते हुए' कहा ।

'नो इंडिकेटर लाइट सर! 'ओह! कहते हुए जनरल स्क्रीन की तरफ बढ़ गए । फ्लोरिडा .हम बंकर में, एटामिक शेल्टर में तीन हजार तकनीकि व्यक्तियों के साथ सुरक्षित हैं... थैंक्स फार कालिंग'' उत्तर के साथ संपर्क कट गया ।

''कर्नल नारायणनम् आपके देंश के मूर्धन्य वैज्ञानिकों, विचारकों ने भी वही किया होगा जो हमारे देश ने किया है'' अनीता ने नारायणन के चहेरे पर अपनी विषाद भर आखों को गड़ाते हुए कहा । 'भारत ने ही नहीं वरन् विश्व के सभी विकसित देशों ने अपने अति मेधावी विशेषज्ञों को, वैज्ञानिकों, तकनीकी व्यक्तियों को अन्तरिक्ष यानों द्वारा हमारी आकाश गंगा में सुरक्षा की दृष्टि से भेज दिया है ।'' 'क्या इन अन्तरिक्षयानों में प्रत्येक देश के प्रतिनिधि ही हैं अथवा कुछ यानों में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि एक साथ भी हैं?'' ' अनीता तुम्हारी अवधारणा ठीक है विशेष सुरक्षा को तथा मानव के भविष्य को ध्यान रखते हुए विभिन्न देशों

के विशेषज्ञों को भी तीस अन्तरिक्ष यानों द्वारा हमारी आकाश गंगा की ओर प्रक्षेपित किए गए हैं' ' कर्नल नरायणन ने अनीता की जिज्ञासा को शान्त करते हुए उत्तर दिया ।

जैकलिन ने अनीता की तरफ देखा और बरबस कह उठी, कब रुकेगा मानव नाश का, प्रकृति के विनाश का यह ताण्डव' '

'इस प्रश्न को तो तुम्हें उन से पूछना चाहिए जो, इस विनाश लीला के सूत्रधार हैं ।'' में आज तक उनके विषय में कुछ जान नहीं सकी । मुझे उन लोगों के, उस देश के विषय में कोई सूचना नहीं मिल सकी ।'' ''अच्छा होगा यह प्रश्न तुम जनरल वागनर से करो'' कहती हुई अनीता ने उनकी तरफ आते हुए जनरल की तरफ इशारा किया ।

''जनरल इस विनाश का, मानव हत्या का, विश्व की सभ्यता को नष्ट करने में कौन और कितने देश लगे हैं? '' जैकलिन ने पूछा ।

'ओह! इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है । इसमें विकसित राष्ट्रों की कोई भूमिका नहीं है ।'' ''ओह! आप तो बड़ी विचित्र बात बता रहे हैं ।''

''वास्तव में बात कुछ उलझी सी है'' कहते हुए जनरल, कर्नल नरायनन के साथ तेजी से चल दिए । जैकलिन को ऐसा लगा कि जनरल उसे इस प्रश्न का पूरा उत्तर देना नहीं चाहते हैं । कुछ सोचती हुई वह कयूनिकेशन कंट्रोल रूम में चली गयी । वहाँ पर भी उसकी मित्र मारिया शान्ति से कंट्रोल पैनेल पर दृष्टि गड़ाये ध्यानावस्थित थी । जैकलिन ने उसके कंधे को थपथपाया । ''ओह! जैकी, तुम दो दिनों बाद मिली हो मुझसे'' पैनेल पर अपनी दृष्टि स्थिर रखते हुए मारिया ने कहा । ''तुम्हारी कमी मुझे लग रही थी, इसी कारण मैं इथर आई ।''

''बैठो में एक मिनट में फ्री हो जाऊँगी'' कहती मारिया ने बगल की खाली चेयर की तरफ इशारा किया । ''अति विचित्र स्थित है, कौन इस मानव विनाश का प्रणेता है, इस शेल्टर के मुख्य व्यक्ति जानते हैं, पर वे मुझे बता क्यों नहीं रहे है? क्या मैं मारिया से इस विषय पर बातें करूं. . .विचारों के भंवरजाल में जैकी उलझी थी । मारिया की कुर्सी घुमाने की आवाज ने उसे स्थिति का बोध करा दिया ।

''कब तक चलेगा यह मानवता के नाश का खेल?'' जैकी ने कहा-''तुम इसे खेल मत कहो, सारा विश्व इस नाश की आग में जल रहा है..... .लगता है तुम्हें वास्तविकता का पता नहीं है'' मारिया ने कहा- ''वही जानने के लिए ही मैं तुम्हारे पास आई हूँ मारिया डियर'' कहती हुई जैकलिन मारिया के और पास आ गई । ''हम मानव इतिहास का वह अंश देख रहे हैं जो इतिहास का, मानवता के इतिहास का अन्तिम पृष्ठ हो सकता है । पर रुको, अन्तरिक्ष यान ''ब्रह्मा'' से संदेश आने लगा है... ।

''अन्तरिक्ष यान नेपचून की तरफ बढ़ता हुआ हमारे सौर्य परिवार के इस सदस्य को अगले पाँच दिनों में पीछे छोड़ देगा.. .वह आगे बढ़ जाएगा. .उस का पथ और पृथ्वी वासियों का पथ एक साथ संबद्ध होते हुए भी विपरीत दिशा में हैं.. .अलग-अलग हैं'' मारिया जैकी से कहने लगी । मारिया ने कुर्सी घुमकर कंट्रोल के डेटा में रिफाइनमेंट करना शुरू कर दिया और कहने लगी जैकी स्पीड के और अन्य डेटा तो उसी प्रकार हैं जैसे वे छ: वर्षों पूर्व थे । उनमें और न यान में कोई विशेष प्रभाव, मेरा तात्पर्य है कि विनाशकारी प्रभाव, दिखाई पड़ रहा है... .यान के तीन हजार व्यक्तियों के मध्य दस आत्महत्यायें और पच्चीस स्वाभाविक मृत्यु की घटनाएं इस वर्ष घटित हुई हैं.. .धरती पर चल रहे विनाश की तुलना में यह कुछ भी नहीं हैं'' कंट्रोल रूम में काफी की महक भरी थी । कंट्रोल रूम में सदस्य अब तनाव रहित होने का प्रयास कर रहे हैं । यान अपनी सामान्य गति से स्क्रीन पर नेपचून को पीछे छोड़ने का प्रयास करने में गतिशील था. .थके कंट्रोल परसन अन्तरिक्ष के संदेशों के डेटा को आटोमेटिक रेकार्डर के भरोसे पर छोड़ कर पृथ्वी के ऊपर चल रहे नर-संहार के विवरणों को सुनने, देखने, रेकार्ड करने में व्यस्त हो चले थे ।

''हमारे प्रतिनिधि,विभिन्न राष्ट्रों के देशों के प्रतिनिधि उसी नेपब्यून से आगे बढ़ते चले जा रहें हैं.. .यह बात अलग है कि कोई आधे प्रकाश वर्ष आगे है और कोई एक प्रकाश वर्ष के दस घण्टे पीछे । यदि वे आकाश गंगा में गन्तव्य पर पहुंच जायें तो इस नाश हो चुकी मानवता को, पृथ्वी को पुन: अपनी विकसित प्रौद्योगिकी का संबल लेकर, इस विनष्ट धरती पर जीवन का नव स्पन्दन प्रारम्भ कराने में सक्षम हो जाएंगे, जैसे अरबों वर्षों पूर्व पैन-स्पर्मिया द्वारा इस धरा पर जीवन का प्रस्कुटन हुआ था' ' एक भविष्य दृष्टा की भाँति जैकलिन को संबोथित करते हुए मारिया कह रही थी ।

''मानव मस्तिष्क की विशेषता है तर्क और सदैव इसी के सहारे अपने जीवन का अस्तित्व बनाए रखने का प्रयास करता है । जिससे माँ का पुत्र उससे दूर चला जाता है तो वह उसके चित्र को देखकर अपनी भावना को उस पुत्र की रमृति से जोड़कर पारिवारिक पूर्णता का, नारी होने की पूर्णता का, जननी हो ने के सुख का आभास कर-संतोष कर लेती है'' जैकलिन ने उसके मनोभावों को समझते हुए उत्तर दिया । मारिया का पुत्र भी इस अन्तरिक्षयान में था

मारिया और जैकलिन की बातें, मनोभावों के प्रति कोई रुचि प्रदर्शित नहीं करते हुए डॉ. फ्रेजर तटस्थता से प्रत्येक यान के यात्रियों के स्वस्थ संकेत मेडिकल पैनेल-स्क्रीन पर एक यात्री की तन्मयता से देखने में व्यस्त थे । उनके रक्तचाप, हृदय गति की स्पन्दन तंरगें, मस्तिष्क तरंगें, स्क्रीन पर रेखाओं में, पल्सों में, उभरती और विलीन होती जा रही थीं । ''सुदूर अन्तरिक्ष' में इन संकेतों के आने के समय को ध्यान में रखते हुए आकाश गंगा के दूसरे ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण के कारण उन यात्रियों के सामान्य रक्तचाप में, हृदय स्पन्दन में, मस्तिष्क की रक्त वाहिनों में जो परिवर्तन हो जायेंगे उसे वे किस सीमा तक सहन कर. सकेंगे, यह एक महत्बपूर्ण प्रश्न है'' मारिया को संबोधित करते हुए डॉ .फ्रेजर कह रहे

''क्या ही अच्छा होता यदि आपने इस दिशा में

पहले विचार किया होता या आप स्वत: यात्रियों के साथ होते'' मारिया की वक्रोक्ति सुनकर 'ओह!'' इससे अधिक डॉ .फ्रेजर कुछ कह न सके । उनके मेज पर रखा कॉफी का प्याला फर्श पर एक जोरदार धमाके के प्रभाव के कारण गिर गया । ' 'विस्फोट कहीं समीप ही हुआ है... इस शेल्टर की छत कहीं गिर न जाए । साइरन को आवाज में डॉ. फ्रेजर की आवाज दब गई । सिस्मोग्राफ विस्सेट के प्रभाव को दिखा रहा था । इस स्थान से दो हजार किलोमीटर पूर्व.. .हाइड्रोजन बमों का विस्फोट.. .माइक पर धवनि गूँज उठी । सभी सतर्क हो गए थे । सभी के मन में मात्र एक कल्पना थी.. .स्वरक्षा की... अपना जीवन बचाने की... । मानसिक रूप से असंतुलित विक्षिप्त उनके संगठन अल.. .इन पागल आतंकवादयों ने' '.... डी .फ्रेजर कहते हुए रुक गए ।

''उस शिप 'ब्रह्मा' पर सभी का स्वास्थ्य सामान्य है सभी का हृदय स्पन्दन सामान्य है, रक्त चाप सामान्य है । उनके ट्रांसमिटरों ने, प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में लगे ट्राँसमिटरों ने अब संकेत भेजने प्रारम्भ कर दिए हैं... .हम अभी तक सकुशल है और अन्तरिक्ष यान के यात्री भी 'गुड न्यूज' कहते हुए डॉ. फ्रेजर जैकलिन की प्रतिक्रिया समझने के लिए उसकी तरफ देखा ।

' 'उनका स्वास्थ्य, उनका सकुशल रहना, हमारी भावना के अनुरूप है जैकलिन । ''

' 'डॉक्टर. जब मरीज की हालत बिगड़ जाती है तो स्वभावतः आप उसे जीवित और सकुशल रखने हेतु दूसरे उपचार शुरू कर देते हैं । हमारी सद्‌भावना विशेष कर जब हमारी पृथ्वी पर मृत्यु का नतर्न हो रहा है, उन अन्तरिक्ष यात्रियों के मनोबल को बढ़ाने में ओषधि का कार्य करेगी । ' 'तुम्हारे विचार से उन अन्तरिक्ष यात्रियों को हमारी तरफ से '' हम सकुशल हैं' ' संदेश भेजना उचित होगा?''

' 'ही डॉ. फ्रेजर' '

शेल्टर, ट्रांसमिटिंग सेण्टर से सभी अन्तरिक्ष यानों के यात्रियों को संदेश प्रेषित होने लगा ।

''पृथ्वी वासियों, हमारे स्वजनों की कुशलता का संदेश, हमें उनकी योजना स्रई प्लानिंग की सफलता का ही संदेश नहीं देता, वरन महहमें अपने अन्तरिक्ष अभियान को अबाध गति से करने रखने की प्रेरणा भी देता है ।''

मुख्य अंतरिक्षयान 'ब्रह्मा' के कैप्टन इंजीनियर जेलनिक के शब्द उनकी केबिन विस्तारक पर गूँज उठे ।

मुझे आशा है हमारे स्वजनों का संदेश प्रत्येक यान जो हमारे फ्लीट में गतिमान हैं, को प्राप्त हो गया होगा । ''कहते हुए' सेकेण्ड इन कमाण्ड इंजीनियर जेलनिक ने आकाश गंगा में प्रकाश की गति से चल रहे ब्रह्मा का कोर्स चेक करने की सलाह दी ।

- ''हम पोलर स्टार ध्रुव तारे से तीस अंश नीचे हैं। मैं यान को पाथ करैक्शन करके लिपट करूँगा ।''

''पृथ्वी पर मृत्यु का दानव मानवता का भक्षण का रहा है अनुमान से मानवता का नाश पचहत्तर प्रतिशत तक पहुँच गया है..... इन दुर्दान्त आतंकवादियों ने लगता है पूरे यूरोप, अमेरिका, और चीन तथा भारत के वासियों के पूर्ण विनाश की योजना बना रखी है'' जनरल वागनर स्वत: घबराहट भरे स्वर में जैकलिन से कह उठे ।

''जनरल!'' अपने मतावलंबियों, अनुयायियों को छोड्‌कर यदि आतंकवादियों ने समस्त मानवता का विनाश करने की योजना बना रखी है उस हालत में इन परमाणु बमों, नहान बमों के प्रभाव से वे और उनके अनुयायी स्वत: किस प्रकार अपने को सुरक्षित. रख सकेंगे? इस पक्ष पर आपकी क्या अवधारणा है?'' जैकलिन का प्रश्न गम्भीर था । ''हो सकता है वे भी हमारी तरह ही एटामिक शेल्टरों में रह रहे हो.. यह भी संभव है कि उनके शेल्टर हमारे शेल्टरों की ही भाँति न्यूट्रानों के प्रभाव से सुरक्षित हों. .वे हम सभी से किसी भी अर्थ में न्यून नहीं हैं । हमारी सेनाओं की प्रत्येक पक्ष पर, हर फ्रन्ट पर पराजय, उनकी युद्ध शैली और मारक क्षमता, स्ट्रेटिजिक प्लानिंग का संकेत देती है ।''

ओह इसका अर्थ, यदि मैं सही समझ रही हूँ तो यह है, कि... .जैकलिन अपनी बात को पूरी न कर सकी ।' ' एनाउंसमेन्ट चैनेल पर डॉ. फ्रेजर की आवाज आने लगी ''अन्तरिक्ष यान 'ब्रह्म' और उसके साथ के समान आकार के एक सौ पचास यानों के यात्रियों की मेडिकल रिपोर्ट चकित करने वाली है ।''

''प्रत्येक अन्तरिक्ष यान के वासियों की हृदयगति, रक्त चाप, एवं अन्य शारीरिक क्रियाएं, अद्‌भुत समानता दिखा रही हैं । प्रत्येक अन्तरिक्ष यात्री के हैत्य-चिप्स एक प्रकार की ही सूचना प्रेषित कर रहे हैं ।''

''इसका अर्थ क्या हुआ डॉ. फ्रेजर'' चकित अनीता का प्रश्न सभी ने सुना ।

''उनके यानों की, अन्तरिक्ष यानों की फ्लीट की क्या पोजीशन है? जनरल वानर ने कंट्रोल सेन्टर से प्रश्न किया । कुछ क्षणों तक मौन छाया रहा । मात्र स्कीनों पर बिम्ब ही उभरते रहे । ''उनकी फ्लीट के सिग्नल अतीव हल्के आ रहे हैं, सिग्नल वीक हैं, कमजोर पड़ते जा रहे हैं.. .उनकी फ्लीट हमारे यंत्रों की सूक्ष्म ग्राही सीमा से आगे चली जा रही है. .उनके यानों की गति प्रकाश की गति पर पहुँच चुकी है. .. '' कस्ट्रोल केन्द्र ने सूचना हेतु थोड़ा समय मांगा ।

''उन अन्तरिक्षगामी यात्रियों की, सभी यात्रियों की फ्लीट के व्यक्तियों की, हृदय गति, रक्त चाप, मस्तिष्क में रक्त संचार और भाव तरंगें क्यों एक समान हो गई हैं? वे सभी एक व्यक्ति की भाँति क्यों व्यवहार कर रहे हैं? यह विचित्र, अभी तक अज्ञात परिवर्तन क्यों हो रहा है? '' डॉ. फ्रेजर एवं हेल्थ पैनेल के सदस्यों के प्रत्येक विशेषज्ञ के मन में यही प्रश्न बारम्बार गूँज रहे थे । प्रश्न जटिल थे और अन्तरिक्ष की ही भाँति रहस्यमय ।

'हमारी गति अनियंत्रित रूप में प्रकाश की गति को पार कर चुकी है.. .हमारे फ्लीट के सभी अन्तरिक्ष यानों की यही गति है. .. .हम नियंत्रण खो रहे हैं. .किसी विचित्र प्रकार का आकर्षण हमें खींचता जा रहा है.. आपके सिग्नल हमें

कठिनाई से प्राप्त हो रहे हैं... ''कुछ घण्टों के उपरान्त कंट्रोल के पैनल पर रिसीवरों में संकेतों का आना बन्द हो गया ।

धरा पर विनाश के कारण मानवों के विनाश की सीमा अब नब्बे प्रतिशत पर जाकर रुक गई थी । परमाणु विकीरण में आतंकवादियों सहित अधिकांश मानवों को अपना ग्रास बना लिया था ।

''मैंने भीष्म पितामह को कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में बाणों की श्म्पा पर शयन कर प्राणों को त्यागते हुए देखा है । महारथी कर्ण और अन्यों द्वारा वीर बालक अभिमन्यु की हत्या, चक्रव्यूह में देखी है । उस दुष्ट जयद्रथ के, उसी दिन होने वाले सूर्यग्रहण के समय, महारथी अर्जुन के बाण से काट गए सिर को उसके पिता बृहद्रथ की गोद में गिरते देखा है । महाबली भीमसेन द्वारा दुष्ट दु:शासन का रक्त पान करते देखा है । देखा है मैंने अश्वथामा द्वारा पाण्डु पुत्रों की हत्या के दारुण कृत्य को । समय के साथ मैंने भारत पर बर्बर हूणों के, चंगेज खाँ, और तैमूरलंग की नृशंसता को देखा है । प्रथम विश्व युद्ध में रूस के जनरल क्रओपाटकिन और जापानी जनरल एडमिरल टोगो का मुझे स्मरण है । जापानियों की वीरता के विवरण मुझे उत्तेजित कर देते हैं । मैंने रक्त पिपासु नाजियों द्वारा निरीह निहत्थे यहूदियों की समस्त यूरोप में, हत्या देखी है । देखा है मैंने उन्हें गैंस चैम्बरों में तड़पते असह्य वेदना से कराहते हुए.. .मानवता को कलंकित करने वाले इन कृत्यों को... पर इन आतंकवादियों ने तो प्रत्येक सीमा पार कर ली है ।' '

' 'आप को यह ज्ञात नहीं होगा कि अन्तरिक्षयान ब्रह्मा',और उसके साथ यानी के फ्लीट ने अनजाने में एक विशाल कृष्ण-विवर को सकुशल पार कर लिया है । इस समय वे उस को पारकर बाहर निकल चुके हैं.. .अब वे एक दूसरे ब्रह्माण्ड में हैं जहाँ पर भौतिकी के नियम हमारे इस ब्रह्माण्ड के नियमों से विभिन है । तभी तो डॉ .फ्रेजर को उन अन्तरिक्ष यात्रियों की समस्त शारीरिक क्रियायें उनके यंत्रों पर एकीकृत प्रतीत होती हैं । उनके विचार मस्तिष्क के बीटा तरंगें आदि सभी एकीकृत घनीभूत हो चुकी दें ।''

' भद्रा मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था । किधर विचरण करने चली गयी थी'' कहते हुए सुबाहु ने उसके हाथों को अपने हाथों में ले कर उसे आलिंगन बद्ध कर लिया । हिमालय की तटवर्ती कंदरा से निकलकर दोनों साथ-साथ धान के खेत का निरीक्षण करने लगे ।

भद्रा क्या आज के सूर्य की आभा अधिक हल्की पीली नहीं हैं?'' सुबाहु के कथन पर मुस्कान बिखेरती भद्रा बोली- 'तुम्हें कभी भी उचित उपमा सन्दर्भों का ध्यान नहीं रहता । जब पृथ्वी के ऊपर छाया हुआ यह कुहासा बढ़ता है तो सूर्य का वर्ण सुवर्ण सम हो जाता है, इसी को तुम सहज ग्रामीणता वश पीली आभा कहते हो ।''

'क्या तुम बता सकते हो कि यह कुहासा जो हमारी पृथ्वी पर छाया है कितने हजार वर्षों से इसी रूप में रहा है?''

भद्रा मुझे तो स्मरण है कि मेरे पितामह कहते थे, कि वसुंधरा को आच्छादित किए हुए यह कुहासा, यह अंधकार की संगिनी-कुहेलिका उनके पितामह के समय अधिक धनीभूत थी । अब इस की सांन्धता घट रही है ।'' सुबाहु की बात सुन कर, विचार करती भद्रा ने कहा ''ओह इस प्रकार यह घना अंधकार कम से कम छ: पीढ़ियों पूर्व और घना रहा होगा । अर्थात् यदि मैं एक पीढ़ी का अन्तराल पच्चीस वर्ष मान लूँ तो एक सौ पचास वर्ष पूर्व भी यह अंधकार पृथ्वी को आवृत्त किए हुए रहा होगा । यदि इसने इतने ही वर्ष और मैं जोड़ दूँ तो अनुमानत: तीन सौ वर्ष पूर्व २ यह विद्यमान रहा होगा ।''

'उस समय न तो इतनी हरीतिमा ही रही होगी,

न ही वनस्पतियाँ और पुष्प आदि । मेरे वृद्ध प्रपितामह.., अपने पूवर्जों से सुना था, कि वसुधा को वनानि संपदा

अधिकतर मानव और अन्य जीवों का विनाश विस्फोटों के

कारण हुआ था । प्रलंयकारी दृष्य रहा होगा । मैं तो उसकी कल्पना मात्र से कांप उठता हूँ'' सुबाहु भद्रा को बता रह था ।

इस वर्ष गोथूम गेहूँ की उत्पत्ति, शालि धान की उत्पत्ति से अधिक हुई!। सुबाहु मैं तो चाहती हूँ कि यह घना अंधकार दूर हो जाए जिससे पृथ्वी पुन: जागृत हो सके, जीव जन्तुओं का, हम सभी का जीवन सामान्य हो सके । हम एक बार पुन: जीवन की, मानव जीवन की पूर्णता से रसपान कर सकें ।''

कभी अपनी सुरम्य अट्टालिकाओं और विचारवान, तत्वदर्शी महर्षियों का विख्यात स्थल हरिद्वार, भग्न भवनों और उनमें वास करने वाले मनुष्यों के मन में एक दूसरे प्रकार की विभीषिका उत्पन्न कर रहा था । सदा नीरा पवित्र गंगा का जलस्तर गिरता चला जा रहा था । वर्षा नहीं हो रही थी.. .पीने के हेतु नदी में पानी मात्र कुछ सालों के लिए पर्याप्त था । गंगा तेजी से सूख रही थी । सभी नर नारियों, युवा, बालक और वृद्ध पुरुषों के मुख मंडल पर भय विद्यमान था । सभी विचार कर रहे थे दूसरे विकल्प का...गंगा के सूख जाने पर जीवन यापन करने के विषय में । समस्त उत्तर भारत जल विहीनता की कल्पना में, काँप रहा था । यमुना में भी जल प्रवाह घट रहा था । आदि काल से अपनी वनानि संपदा और अन्न के उत्पादन हेतु विख्यात गंगा-यमुना का क्षेत्र जल विहीन हो जायेगा-यह कल्पना सभी के मन में भय व्याप्त कर अकाल के अवर्षण जन्य संत्रास को उत्पन्न कर रही थी ।

''निकट भविष्य में हमे यह क्षेत्र छोड़ देना पड़ेगा'' कहते हुए नागानन्द उठ खड़े हुए ।

'परन्तु हम जायें किधर?? उनकी पत्नी दमयंन्ती ने पूछा ।

''जहाँ पर जल प्रचुरता से मिल सके, हमारे पशुओं के लिए अनाज और पशुचर क्षेत्र हो । हम धीरे-धीरे कर गंगा के तट पर चलते हुए उचित स्थल पर पहुँच सकते हैं'' नागानन्द का अतिसंशय पूर्ण उत्तर उन के पुत्र अनादि को अरुचि कर लगा ।

'भारत की राजधानी दिल्ली के वासी यमुना के सूख जाने और जल स्तर के घटने के कारण राजस्थान की ओर जा रहे हैं । हमें भी राजस्थान के किसी स्थल पर ही चलना उचित रहेगा'' उसने सुझाया- दिल्ली प्राकृतिक आपदा के प्रबल प्रहार के कारण उजड़ रही है । ''मैं भी इसी विचार का समर्थन करती हूँ नागानन्द की पुत्री सुनन्दा ने कहा । निर्णय लिया जा चुका था ।

लखनऊ के समीप रहमान खेड़ा में हरिहर अपनी भाभी उषा से कह रहा था, ''हमारे उद्यान में इस वर्ष फूल खिले हैं । देखें इस साल क्या हमारे आम के वृक्षों में मंजरी आएगी, बौर आयेंगे कहते हुए हरिहर ने आशा भरे नेत्रों से अपने आम के वृक्षों को देखा । अनेक वर्षों बाद धरती को घेरे हुए घना कुहरा, धुन्ध कुछ कम हुआ था । प्रकृति, ऐसा लग रहा था कि पुन: सामान्य होने का प्रयास कर रही हो । ''इस बार भी मेरा नवजात विकलांग -है पैर विहीन है'' कहती हुई नव प्रसूता ने अपने शिशु को भयपूर्ण नेत्रों से देख कर पति से कहा ।

''क्या करें, प्रकृति हम पर कुछ है । परन्तु यह मेरे ही परिवार के साथ ही वरन् अनेक दम्पतियों के साथ घटित हो रहा है । क्या इस घने कोहरे और शिशु विकलाँगता में कोई संबंध है?'' चिंतित सा उसका पति अपने से कह रहा था । ''हमें भोपाल छोड़ देना चाहिए'' उसकी पत्नी वहीदा ने सुझाया ।

''पर जाएं कहाँ हर तरफ तो यही त्रासदी है'' कहते हुए एक गहरी साँस लेकर अविनाश उठ खड़ा हुआ । वहीदा के आँखों में चमक आ गई...इस मनहूस शहर से मुक्ति मिलेगी ।

फ्रेंसिस तुम्हारे बेटे को वही रक्त रोग है । तुम्हारा यह सुन्दर पुत्र कितने दिनों तक जीवित रहेगा, मैं कह नहीं सकता'' कहते हुए डॉ. गिरीशन ने उस बच्चे को टेबल से नीचे उतर आने का संकेत किया ।

''क्या इसे! रक्त रोग हो सकता है?'' फ्रैंसिस ने डॉ. गिरीशन से जानने का प्रयास किया । 'रक्त कैंसर'' डॉ. गिरीशन के इस दो शब्दों ने इसिस के मस्तक पर पसीना ला दिया । कहीं जाएं इस के लिए'' उसने जानना चाहा । ''कोयम्बटूर'' डॉ. गिरशिन का उत्तर था ।

कल्पना ने माछेर झोल बड़े परिश्रम से बनाया था । कुछ मेहमान आने वाले थे । सभी ने चावल और माछेर झोल खाया । सभी का कहना था कि इस खाने का स्वाद पता नहीं चलता है जैसे मुंह का जायका बदल गया है, या फिर जीभ पर स्वाद के केलू स्वादांकुर समाप्त हो गए हैं । कल्पना उनकी बातों से सहमत थी, बोली ''यह घना कुहरा जब तक बंगाल पर छाया रहेगा चावल मछली और सभी मिठाइयाँ स्वादहीन रहेगीं ।''

'यह मुर्गा है या बत्तक?'' पर में आते ही इतने बड़े मुर्गे को देख कर जसविन्दर सिंह ने अपनी पत्नी दलजीत से प्रश्न वाचक स्वर .में कहा ।

'है तो यह अपना मुर्ग पर न जाने क्यों यह इतना पड़ा और तगड़ा हो गया है । मैं खुद हैरान हूँ इसे देख कर ।'' दलजीत कौर का उत्तर सुन कर सरदार जसविन्दर सिंह सोच में पड़ गए । उन्होंने अपने दोस्त हरभजन सिंह के यहाँ जाकर उनके मुर्गों को देखना जरूरी समझा ।

''सरदार जी आप के मुर्गे कहीं हैं? बैठते ही जसबिन्दर सिंह ने प्रश्न वाण चला दिया । ताज्जुब है यार मेरे सभी मुर्गे कद बड़ा लिए हैं । वे अपने के दूने हो गए हैं । उनका गोश्त न मुर्गों का सा है और नहीं बत्तकों जैसा । पता नहीं क्या हुआ है उन्हें'' कहते हुए सरदार हरभजन सिंह ने गहरी साँस ली । कहने लगे ''गनीमत है कि हमारी गायों के ऊपर यह असर नहीं हुआ, नहीं तो गजब हो जाता ।'' 'ऐसा हो क्यों रहा है?'' जसविन्दर सिंह ने आकुलता दिखाते हुए पूछा ।

''मुझे तो लगता है, यह सब इस न कटने वाले कुहासे की घने धुन्थ की करामात है । पता नहीं कब तक हम

इसे सहन करेंगे'' हरभजन सिंह कुछ हताशा भाव से कह उठे ।

केरल के समुद्र तट पर बैठी सारा अम्मा, अपने पति की प्रतीक्षा में थी । एकाएक जिस स्थान पर वह बैठी थी वह समुद्र में समा गया । उसके बाद शुरू हो गया सिलसिला केरल और तमिलनाडु के समुद्र तटवर्ती क्षेत्रों की जल समाधि लेने का । समुद्र के जल वृद्धि ने विकराल स्वरूप धारण करना आरम्भ कर दिया था । सर्वत्र कुहराम मचा हुआ था । विपत्ति सूचक सर्वत्र विद्यमान घने कुहासे से लोग त्रस्त थे, परेशान थे और चाहते थे सूर्य के दर्शन । पर वह तो कभी-कभी अपनी पीत आभा लेकर दिख जाता था, अन्यथा आशिक अंधकार सदैव छाया हुआ था ।

''पानी... .पानी.. .नई नदी.. .उसका साफ स्वच्छ जल... '' कहते हुए ग्रामीण उस नदी के तट पर पहुँच रहे थे । एक विशाल सोते का सा दृष्य था, नवीन सरिता को निखरने का उसके जल का लाभ उठाने का । रणवीर ने अपने चाचा जो वहीं खड़े थे, से कहा 'यह नदी कहीं से आ गई? '' 'मेरा घर तो दो किलो मीटर दूर है यहाँ से । रात में अजीब सी घरघराहट हुयी । मैंने इसे धम समझा पर जब यह आवाज बढ़ती चली गई तो मैं चिन्ता के कारण सो न सका । प्रातः काल जिधर से यह ध्वनि आई थी उसी तरफ चल पड़ा । देखा दूर-दूर तक पानी फैला था, यही नदी तेजी से बह रही थी । दोनों तरफ देखने पर इसका ओर छोर दिख ही नहीं रहा था । अतीव वेग से यह नदी अपने तटों को काटती जा रही थी । लगता था जैसे इसमें कोई पानी ऊपर से ऊँचाई से छोड़ रहा हो ।''

'यह नवीन नदी जरूर किसी पुरानी नदी के पथ परिवर्तन के कारण इधर आ गई है'' रणवीर ने कहा ''यह भी संभव है कि धरती कहीं पर फटी हो और उसके फटने से निकला पानी, किसी पुरानी नदी के पानी में जा मिला हो, फल स्वरूप यह नदी बन गई होश रणवीर के चाचा ने कहा । 'लेकिन यह नदी बहुत दूर से आ रही है, इतनी दूर कि इसका ओर छोर का पता नहीं चल रहा है'' रणवीर ने चाचा से कहा ।

-हमारे लिए यह नदी वरदान है अब हमारा रेगिस्तानी मरुभूमि-मय क्षेत्र एक बार फिर हरा भरा हो जायेगा'' यह कहते हुए दोनों जन समुदाय में जा मिले । 'हरी भाई अब हमारा नगर डूब जाएगा । पता नहीं कहाँ से साबरमती में इतना पानी आ गया है'' केशरभाई ने बढ़ते पानी के जल स्तर को आंखें फाड़ कर देखते हुए कहा । ''लगता है कोई तटबंध टूट गया है? '' हरीभाई का चिन्तापूर्ण स्वर गूँज उठा ।

''यह भी हो सकता है कि पृथ्वी की हलचल ने किसी नदी की जलधारा को इधर मोड़ दिया हो । उसका पानी इस नदी में मिल कर बाढ़ उत्पन्न कर रहा हो'' केशरभाई ने सुझाया ।

''संभावना तो प्रत्येक प्रकार से साकार हो सकती है । लेकिन अब हमें सभी की भाँति यह शहर छोड़ देने का इन्तजाम करना होगा' ' हरीभाई ने कहा । सभी की भाँति दोनों ' ने अपने परिवार सहित गुजरात के उस नगर को छोड़ दिया, उसे अन्तिम बार देखकर, जल में डूब कर साबरमती का अंश बन जाने हेतु ।

''सतलज ने अपना रास्ता न जाने क्यों बदल दिया है । यह एक दूसरी नवीन नदी में जाकर मिल गई है'' कर्त्तार सिंह ने अपनी पत्नी से कहा ।

' 'कैसे यह हो गया? कर्त्तार की पत्नी सुमेधा ने पूछा । ''यह तो मैं नहीं जानता । परन्तु पंजाब में पानी की कमी हो जायेगी और यदि यह नदी जैसा कि लोग बता रहे हैं, राजस्थान के बीच से होती हुई गुजरात की तरफ चली गई है, तो राजस्थान की मरुभूमि एक बार फिर हरीभरी हो जाएगी । पानी ही तो हरियाली की जान है'' कर्त्तार ने कहा । ''जो होता है, अच्छा ही होता है । वह विशाल मरुभूमि यदि पहले की तरह हरीतिमा युक्त हो जाये तो क्या बुरा है'' सुमेश भावातिरेक में लड़ रही थी ।

इस नदी को तुम क्या कहोगी? '' कर्त्तार ने सुमेघा की तरफ देखते हुए कहा । सुनो करीब दस हजार साल पहले एक नदी यहाँ बहती थी । लोग उसे सरस्वती कहते थे । मैं तो इसे नई सरस्वती कहूँगी । यह नदी हमारी प्रिय नदी बन जायेगी' ' सुमेधा का उत्तर कर्त्तार को कुछ उचित लगा । फिर वह कहने लगा चलो सभी को हम यह नाम बताते हैं । सभी को यह नदी अपने जल का वरदान तो दे ही रही है'' कहते हुए उसने सुमेधा को चलने का इशारा किया ।

उस गाँव के सभी लोग खांसी से बेदम हैं, उनके कफ में खून आता है । कुछ तो सांस भी नहीं ले पाते हैं । वे बुरी तरह से पुट-पुट कर प्राणों का त्यागकर रहे है'' जीवन के अन्तिम पड़ाव पर आ गया, वह वृद्ध कांपते हुए, खाँसते हुए कह रहा था ।

''मैंने सुना है कि उस नगर में सारे के सारे लोग खून की बीमारी से मर रहे हैं । नगर श्मशान सा हो गया है । क्या होगा आगे कोई जानता ही नहीं है । रोते हुए अपनी नवजात कन्या की मृत्यु पर तड़पती सायरा कहती हुई रोती रही थी ।

''जब यह घना कोहरा हटेगा, सूरज निकलेगा, उसी समय हम स्वस्थ हो पायेंगे'' उसकी बड़ी बहन मेहरुन्निसा समझा रही थी । ''पता नहीं कब वह दिन आएगा । मुझे तो लगता है उस वक्त तक हम सभी मर जायेंगे'' हार मानती हुई सायरा सिसकियाँ लेकर कह रही थी ।

''इतनी वर्षा तो हमारी चार पीढ़ियों में नहीं हुई थी । चार मास हो गए हैं, वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही है । एक ओर घना कोहरा हम को मार रहा है और दूसरी तरफ यह न रुकरने वाली वर्षा सभी को पानी में डुबो कर ही रुकने की योजना बनाये हुए लगती है'' वह वृद्ध लाठी टेकता हुआ, पेड़ के नीचे भीगता कह रहा था । ' 'सभी प्राणी इस अनवरत हो रही वर्षा से त्रस्त थे, भयभीत थे । सभी की कामना थी, कि यह वर्षा बन्द हो जाए । यदि मनुष्य वसुधा पर परमाणु विस्फोटों से उसे और उस पर वास करने वाले प्राणियों को भस्म कर सकता है तो प्रकृति का भी अधिकार है कि वह उसे अपने कुकर्मों के लिए प्रायश्चित करने पर बाध्य कर सके । अनवरत वर्षा मानव के कुकृत्यों को धोने का प्रयास है ।

आज मैं अतिशय प्रसन्न हूँ । कारण है-कि आज ही चार सौ वर्षों के उपरान्त सूर्योदय हुआ है । चार सौ साल तक छाये रहे कुहरे का रूक-रूक कर होने वाली वर्षा का अन्त हुआ और अन्त हो गया उन घने बादलों का जो धरा को आच्छादित किए हुए थे । यही बादल यही कुहासा ही तो परमाणु विस्फोटों का परिणाम था, यही तो ग्रीन हाउस गैसों का एवं परमाणु विस्फोट का मिश्रित प्रभाव था । वसुधा पर हरीतिमा ने अपने पंख पसार लिए हैं । वन-वनस्पतियाँ सभी प्रमुदित हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि वे जीवन के संवाहक तोषदायक ऊष्मा प्रदान करने वाले सूर्य का अभिनन्दनकर रहे हों ।''

' 'मैंने आपको भारत के संदर्भ में जो परिदृष्य सुनाया है दिखाया है, उसके दो सौ वर्षो बाद- पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध अपने नैसर्गिक स्वरूप को प्राप्त कर चुका है । सदैव हिम मंडित उत्तरी ध्रुव क्षेत्र नवीन वनस्पतियों से ढक गया है । उत्तरी ध्रुव हिम रहित हो कर अपने सर पर हरीतिमा का पर्ण मुकुट धारण कर हँसता सा दिख रहा है । लेकिन दक्षिणी गोलार्ध, धरा का दक्षिणी भाग इतना सौभाग्यशाली नहीं रहा ।

समरस दक्षिणी गोलार्थ हिम मंडित हो चुका है । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानों इस क्षेत्र का समस्त भाग एक अतिशय विशाल आकर्टिक का अंश होने की लालसा अनादिकाल से अपने हृदय में छिपाये हुए बैठा था । अन्त में वही हुआ, प्रकृति पृथ्वी की भाषा समझती है ।''

''अंशुमाली की रश्मियों के प्रभाव से मानव की सजना पुन जागृत हुई है । वह प्रौद्योगिकी के विकास में लग गया है ।''

उत्तरी अमेरिका के हयूस्टन क्षेत्र में पुर्ननिर्माण तीव्र गति से चल रहा है । नव निर्मित अन्तरिक्ष केन्द्र में प्रसिद्ध चिन्तक प्रो. कुसूमोतो का भाषण सुनने के लिए सामान्यजन, वैज्ञानिक, शिक्षक, छात्रगण हाल में उपस्थित थे । सभी भाषणकर्ता की प्रतीक्षा कर रहे थे । ट्रैफिक जाम में फंस जाने के कारण डॉ. कुसूमोतो किंचित विलम्ब से पहुंचे । सामान्य औपचारिकता एवं क्षमा मांगे हुए उन्होंने अपनी वार्ता का प्रारम्भ किया ।

''इतिहास वेत्ताओं में गहन विचार विमर्श चल रहा है कि इस धरा पर मानव सभ्यता एवं संस्कृति के विनाश का प्रयास सर्वप्रथम किसने प्रारम्भ किया । किसने सर्वप्रथम परमाणु बमों से सज्जित प्रेक्षेपात्रों के बटन को प्रेस किया था । जब तक कुछ स्पष्ट तध्य और प्रमाण नहीं प्राप्त हो जाते उस समय तक यह वैचारिक मंथन चलता रहेगा ।''

''आप सभी इस कटु तथ्य से अपरिचित नहीं हैं, कि हमारे भीतर, हमारे मस्तिष्क में बर्बता के सूत्र अनादि काल से विद्यमान हैं । फलस्वरूप हिंसक प्रवृत्ति हमारी सोच 'का, जीवन पद्धति का अंश बन गई है । इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए, विचारकों ने धर्म प्रवर्तकों ने प्रारम्भ से ही किसी भांति हिंसा न करने की, हत्या न करने की आवथारणा का प्रचार प्रसार अपने अनुयायियों मे किया था । इसी श्रृंखला में जरथ्रुस्ट, जैन र्तीथंकर और उनके उपरान्त सिद्धार्थ गौतम ने जिन्होंने कालान्तर में बुद्ध हो कर अपना प्रसिद्ध धर्म-बौद्ध धर्म'' का प्रारम्भ किया था, प्राणिमात्र पर दया करने का उपदेश दिया था । कालान्तर में यही अवधारणा अन्य दूसरे धर्म द्वारा भी प्रतिपादित की गई थी ।' '

डॉ. कुसूमोतो एक क्षण के लिए रुके उसी बीच एक श्रोता ने उनसे प्रश्न किया ''दया, क्षमा, करुणा आदि गुण शाश्वत हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे हिंसा, और हिंसात्मक प्रकृति मानव स्वभाव का अविभाज्य अंग है । इस हिंसात्मक प्रवृत्ति को हम आधुनिक प्रौद्योगिकी के द्वारा किस प्रकार समाप्त कर सकते हैं अथवा घटा सकते है? ''

'' आप का प्रश्न प्रशंसनीय हैं' ' डी कुसूमोतो ने उत्तर दिया । मैं स्वत: इसी बिन्दु पर आ रहा था ।

प्रयोगशाला में हमने, अर्थात मैं और मेरे सहयोगियों ने हिंसक जीवों की जेनेटिक संरचना में, दया, करुणा, क्षमा आदि भावनाओं वाली जीनों को अलग करने में सफलता प्राप्त की है । निकट भविष्य में हम इस जीनों को आणुविक स्तर पर हिंसक जीवों की जेनेटिक संरचना में प्रविष्ट कराकर उनके परिवर्तित स्वभाव का अध्ययन करने वाले हैं ।

''आप. का तात्पर्य है, कि उस हिंसजीवों की प्रवृत्ति में, स्वभाव में परिवर्तन हो सकेगा'' एक महिला ने डॉ. कुसूमोतो से प्रश्न किया ।

''संभावना इसी तथ्य की अधिक है'' कहते हुए डॉ. कुसूमोतो कुछ कहना चाहते थे, कि एक दूसरे प्रश्नकर्ता ने पूछा ''इस प्रकार इस धरा पर से हिंसा का विनाश होना सुनिश्चत हो सकेगा? ''

''अवश्य !.. निकट भविष्य में'' डॉ. कुसूमोतो का उत्तर था ।

ह्यूस्टन के नवनिर्मित अन्तरिक्ष अभियान केन्द्र के कंट्रोल रूम में किसी दूसरे ब्रह्माण्ड से आया संदेश विचित्र था । यद्यपि संदेश की भाषा प्राचीनता मिश्रित थी, पर उसे स्पष्ट करने में कोई समस्या नहीं थी । संदेश इस प्रकार था- ''मैं.... अन्तरिक्षयान ब्रह्मा का..... था और मेरे साथ.... यानों का फ्लीट था । हमने एक दूसरे ब्रह्माण्ड के ''तर्वसु '' नामक ग्रह पर अपने प्रयासों से, इसे मानव-वास योग्य ही नहीं बनाया है वरन् यहाँ पर एकात्मकता की विचारधारा से युक्त मानव परिवार में वृद्धि भी हुई है । मानव के महान दुर्गुण हिंसा कारक जैविक तत्वों को अपनी प्रौद्योगिकी द्वारा, हमने समूल उच्छेदन करने में सफलता प्राप्त की है । अब इस ग्रह पर सर्वत्र शान्ति है, सौहार्द है, मानवता की चिरवाँच्छित कामना-यहाँ पर अब पूरी हो चुकी

है । यद्यपि हमारा संदेश पृथ्वी पर हजारों वर्षों के अन्तराल से पहुंचेगा, परन्तु हम पृथ्वी के दर्शन की धरा को विनाश के उपरान्त निरखने की कामना से यह संदेश प्रेषित कर रहे हे । आप हमें इस तथ्य को स्पष्ट करें कि क्या धरा वासी मानव ने अपनी स्वाभाविक हिंसक प्रवृत्ति को समूल उच्छेदन करने में सफलता प्राप्त की है? यदि नहीं तो अभी पृथ्वी पर शान्ति और हिंसा हीन होने में कितना समय लगेगा ?'' इस संदेश ने सभी को चकित कर दिया है ।

विचार विमर्श चल रहा है कि - हिंसाकारी जीनों को मानव में आणुविक स्तर पर किस विधि का प्रयोग कर निष्क्रिय किया जाय । उनके शमनार्थ किस तकनीक का प्रयोग किया जाए तथा इस क्षेत्र के कार्य प्रगति एवं संभावनाओं के विवरण को दूसरे ब्रह्माण्डों में स्थित अपने बंधुओं को किस प्रकार दिया जाय?

' 'मैं मानव रक्त सरिता को देख कर सुख पाने वाला बर्बरीक मानव की हिंसा पर विजय प्राप्त करने के प्रयास से चिंतित हूँ । रक्त रंजित धरा के दर्शन, रक्तपात का दृष्टिलाभ, मेरे स्वभाव का मुख्य अंश है । यदि मानव का यह प्रयास सफल हो जाता है, उस स्थिति में मैं शयन करना चाहूँगा, मुझे पुर्नर्जाग्रत करने का प्रयास मानवता के लिए अशुभ होगा, घातक होगा, अनर्थकारी होगा परन्तु इन प्रयासों के उपरान्त भी क्या धरावासी मानव हिंसामुक्त रहेगा?'.

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