मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

समीक्षा : उसके लिए (कविता व चित्र संग्रह)

समीक्षा-

उसके लिए, (कविताएं और चित्र)

डॉ. सुरेंद्र वर्मा

जागृति प्रकाशन, इलाहाबाद, 2012

 

अनुरति के क्षणों का गीतिमय संदेश

कविता जीवन के अंतरंग क्षणों को समीकृत रूप से व्याख्यायित करती है. -यह कथन हमें उस समय भाव-विभोर कर देता है जब हम कविता संग्रह, उसके लिए, की कविताओं का अवगाहन करते हैं. डॉ सुरेंद्र वर्मा इन कविताओं में आंतरिक भाव-भूमियों का स्पर्श करते हुए प्रकृति की सहजता का भी दिग्दर्शन कराते हैं. इनमें प्रकृति के जीवंत क्षणों से एक सहिभागिता है. कवि ने विविध प्रकार के प्रकृति उपादानों का संग्रह कर अप्रितम शक्ति का उनमें अनुभावन करते हुए प्रत्येक कविता को एक ही संदर्भ से संयुक्त करने का प्रयत्न किया है. डॉ. वर्मा दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं. शायद यही कारण है कि उनका आत्मिक प्रेम जीवन के विविध पक्षों को स्पर्श करता हुआ असीम की अनुभूति में समीकृत सा हो जाता है.

इन छोटी-छोटी कविताओं में एक अद्भुत और अतर्क्य भावानुभूति मिलती है जो कवि की विस्मृतियों, संकल्पनाओं और उद्वेगोंको व्यंजित करती है. यह् व्यंजना किसी सामान्य पाठक को सहज में प्राप्त नहीं हो सकती. उसे तो अपना ज्ञान सम्वर्धन करना ही पड़ेगा.

संग्रह की आरम्भिक कविताओं को छोड़ दें तो शेष में रागात्मक जीवन की व्यथा-कथा अधिक है. <लालच मेरे मन में> कविता का यह अंश दर्शनीय है –

मुस्कान के फूल हैं/उल्लास की नदी है

उफनता दरिया है तुम्हारे पास

ताज़गी की हरी पत्तियां हैं तुम्हारे पास

ऊर्जा के सूर्य हैं

शीतलता के चंद्र हैं तुम्हारे पास.

यहां कवि जो कुछ कहता है, वह भावावेश में. प्रेम के आरम्भिक क्षणों में ऐसा प्रायः हो जाता है. यह उसका ही प्रतीक है. <प्रहर प्रतीक्षा के> शीर्षक में अनुराग, प्रतीक्षा, विरह की अनुभूति और संकल्पना अपने अनेक संदर्भों के साथ उपस्थित है-

बेला खिलता रहा रात दिन

रात भर महकती रही/रजनी गंधा

तुम्हें क्या पता

सुबह से शाम /और शाम से सुबह

कितने कठिन होते हैं/प्रहर प्रतीक्षा के.!

यह प्रतीक्षा प्रकृति की नहीं है क्योंकि उसका तो यह एक नियमित क्रम है परंतु प्रेम से उद्वेलित हृदय की प्रतीक्षा असहनीय होती है. कई कविताओं में कवि ने प्रकृति से आत्मिक सम्बंध स्थापित करने का भी प्रयास किया है. –

संघटनाओं के अंतराल में/निवास है उसका

मौन निवेदन सी वह/कोई संघटना नहीं है

या

भावना और कामना/खुशी और ग़म

उपलब्धि और विवशता/प्राण और संवेदना

वही तो थी.

यहां निरंतर साथ रहती किसी शक्ति का अनुभव है. यही तो मुक्तिबोध की आत्म-संभवा शक्ति है. यह रहस्य या प्रेम की शक्ति नहीं है. यह प्रकृति का वह सचेतना तत्व है जो हमें प्राणमय बनाए रखता है.

कुल मिलाकर ये कविताएं तथाकथित प्रगतिशीलता की लहर और उत्तराधुनिकता को चुनौती देती प्रतीत होती हैं. इनमें जीवन के शाश्वत तत्वों की अनुभूतिपरक व्याख्या है जो मानस मन के विविध पक्षों को उद्-गारित करती है. संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है.

-श्रीधर दीपेश. 22, पत्रकार कॉलोनी, /अशोक नगर,/ इलाहाबाद.

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