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एलोरा अजंता की गुफा - कामिनी कामायनी

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। एलोरा अजंता की गुफा ।

सुदूर अतीत से  ,कभी एलपुरा ,फिर वेरुल ,एलोर ,फिर एलोरा कहलाता हुआ ,विश्व प्रसिद्ध एलोरा  अपनी गुफाओं के साथ  ,महाराष्ट्र में ,बड़ी शान से ,गौरवान्वित होती हुई आज भी अवस्थित है । यहाँ से करीब सौ किलोमीटर दूर अजंता की गुफाएँ है ,वहाँ भी मूर्तियाँ हैं,दोनों सहोदरों की तरह ।  

भारतीय सभ्यता को अपने कलेजे पर सँजोये ,काल को मुंह तोड़ जवाब देता हुआ ,यह ये गुफाएँ अजंता और एलोरा की हैं । अपने चरम यौवन के पश्चात न जाने यह किससे सी घबड़ा कर  काल के पर्दे में छुप कर बैठ गई थी । फिर यहाँ घनघोर जंगल स्थापित हो गया ,जहां भांति भांति के जंगली जानवर अपना आधिपत्य जमा बैठे । इन्हीं जानवरों और जंगलों के आकर्षण में ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर जौन स्मिथ अपने दल के साथ सन 1819 के किसी खूबसूरत दिन यहाँ शिकार खेलने आया तो इन खूबसूरत गुफाओं को देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई थी । उसी के बाद सम्पूर्ण दुनिया को प्रकृति और मनुष्य द्वारा सृजित इन आश्चर्यचकित करने वाली विशाल ,एवं ,भव्य गुफाओं की जानकारी मिली ।

इसकी शोहरत सुनकर न जाने कितने दशकों से हमें इसे देखने की अभिलाषा प्रगाढ़ हो गई चली गई थी ।

मुंबई से हम लोग ट्रेन से औरंगाबाद आए ,। यहाँ रात्री विश्राम के पश्चात टैक्सी लेकर कुछ अन्य स्थान के भ्रमण के पश्चात एलोरा गुफा में दोपहर के बहुत बाद पहुंचे थे । दूर से ही ये पहाड़ी अट्ठहास करता दिख पड़ती है ।  

भीतर प्रवेश करने पर प्रथम निगाह सामने वाले मैदान में खड़ी सुस्ता रही ,तीन चार बसों पर गईं थी । लगता है पुरातत्व विभाग इसपर समुचित ध्यान दे रही है । पत्थर के ईंटों से बने विशाल परिसर में सड़के काफी अच्छी है ,फूल पौधे लगे हुए हैं । सड़क के एक किनारे के घेराव पर कुछ लोग बैठे थे ,कुछ इधर उधर घूम रहे थे । बड़े बड़े वृक्षों के एक किनारे कुछ स्त्री पुरुष अपने गीले कपड़े सुखा रहे थे । “ जैनियों का एक बड़ा समूह तीर्थाटन पर यहाँ आया है “ यह गाईड ने बताया । टिकट घर से टिकट लेकर ,लंबी कतारों को चीरते हुए हमलोग शीघ्रताशीघ्र आगे बढ़ते गए थे । हमारी सासुमाँ भी हम लोगों के साथ थीं । दूर से ही दो –तीन मंजिले मकान की तरह दिखाई पड़ता ,अपने ऊपर पहाड़ी पर हरियाली सँजोए यह वाकई बहुत ही मनोरम दिखता है । गुफा मंदिर परिसर में बहुत से समान बेचने वाले ,पानी बोतल वाले ,पेशेवर गाईड, फोटोग्राफर भी घूम रहे थे । हमने उनसे फोटो निकलवाए,और  अपने कैमरे में भी उसी से  खिचवाए । यहाँ भी हम शाम के उस वक्त पहुंचे ,जब हमारे पास समय की कमी नहीं थी ,मगर सूरज और स्थानीय समय का आदेश तो मानना ही था । गाईड ने कहा ,यहाँ  आने के लिए कम से कम तीन चार घंटा तो रखना ही चाहिए । अजंता और एलोरा के लिए पूरे दिन का समय सही रहता है ।

पूरा गुफा मंदिर परिसर विशाल कैनवास पर किसी महान चित्रकार की परिकल्पना सी दिखती है । लोग तड़ातड़ फोटो के बहाने उस अविस्मरणीय पल को अपने अपने कैमरे में कैद करते जा रहे थे । कहते हैं कि,खंडहर को देखकर ही अंदाज लगाया जा सकता है कि ,ईमारत कभी कितनी बुलंद रही होगी ।

मंदिर का बाहरी दीवार भी सुंदर भित्तिचित्रों से सजा हुआ है । प्रवेश मार्ग दोमंजिला इमारत की खूबसूरती का बयान करता है ,इस सौन्दर्य को निहारने के लिए पहले से आए कुछ लोग ऊपर चढ़े हुए थे ।  यह गुफामंदिर तीन मंज़िला है ,जिसका ऊपरी तल बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चला है । प्रवेश करते ही एक बड़े से प्रस्तर दीवार पर खूबसूरत चित्र है । मंदिर के आँगन में अनेक आकृतियाँ ,,करीने से बने कमरे आदि हैं । आँगन के एक तरफ एक बड़ा सा विजय स्तम्भ जैसा है ,एक बड़ी हाथी है । यह सभी कृतियाँ पहाड़ की लंबाई में बनाई गई है । यहाँ का सबसे बड़ा और प्रमुख मंदिर कैलाश मंदिर है ।

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कैलाश मदिर - ,हिन्दू मंदिर का सबसे प्रमुख कैलाश मंदिर है ,जहां मुख्य भाग कैलाश का एकाश्म विमान मंदिर है ,जिसके साथ प्रदक्षिणा पाठ पर अनेक गुफा मंदिर बने हैं ।

यह गुफा नंबर सोलह ,जो की अपेक्षाकृत अच्छी हालत में है ,यहाँ  दो मंज़िले पर अच्छी सीढ़ियाँ चढ़ कर हम पहुंचे । सासुमाँ तो नीचे प्रवेश द्वार के अंदर बहुत सी मराठी ,गुजराती महिलाओं के साथ बैठ गई थीं । ऊपर चढ़ाई तो थी । हम कैलाश मंदिर के द्वार पर पहुंचे ,भव्यता के चरमोत्कर्ष पर ,बाहरी कलाकृतियाँ ,सुंदर आयताकार दरवाजा , बगल में ,अनेक स्त्री पात्रों की मूर्तिओं के साथ नटराज की एक खूब सूरत आकृति ,हाथ में फूल लिए ।

भीतर एकदम अंधकार था ।भीड़ काफी थी ,हमने धीरे धीरे ,बड़े से कक्ष को पार कर उस विशाल शिवलिंग का दर्शन किया जो वाकई में अनोखा है । वापस भीतर कक्ष में टॉर्च जला कर गाईड ने उन सभी सोलह खंभों पर उकेरे हुए चित्र हमें ,दिखाते हुए संक्षेप में जानकारी दी । ऊपर छत में शिवजी की मूर्ति बनी थी जिसका चेहरा किसी भी कोने से देखने पर खुद को ही घूरता हुआ नज़र आता है । गाईड ने अपनी टॉर्च से ही चारों ओर शिव और पार्वती से जुड़ी अनेक चित्रित कथाओं को दर्शाया ।

इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर अन्य सभी शिव मंदिर की भांति नंदी महाराज बैठे हुए हैं ।

यहाँ इस मंदिर परिसर में गंगा देवी ,जमुना देवी ,और सरस्वती देवी की मूर्तियाँ हैं । एक स्थान पर दस शिरों वाला रावण को अपने हाथ में कैलाश पर्वत उठाया दर्शाया गया है ।

लंका गुफा ,इन्द्र सभा ,इन्द्र कि सवारी ,ऐरावत ,हाथी ,कल्पवृक्ष ,सूर्य ,चंद्रमा आदि इत्यादि सभी कलाकृतियाँ अत्यंत मनोहारिणी है ।

पहाड़ काट काट कर बनाया गया अद्भुत ,कलाकृतियों से सम्पन्न यह मंदिर श्रृंखला यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर में शामिल किया गया है । दुर्गम पहाड़ियों वाला एलोरा तकरीबन 600से 1000 ईस्वी में बनाई गई है ,ऐसा इतिहास कारों का अनुमान है । इसको रंगने का काम भी प्राचीन काल में ही किया गया था , जो अभी तक कहीं कहीं दिखाई पड़ जाती है , हालांकि समय की जिल्लत तो झेल ही चुकी है ।

कैलाश  मंदिर के निर्माण के संबंध में बताया गया कि राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम द्वारा बनवाया गया था । कहानी है कि राजा कि तबीयत बिगड़ गई थी ,तब उनकी रानी ने शिव की बहुत पुजा आराधना की । राजा स्वस्थ हो गए । तब रानी ने प्राण किया कि जब तक वह शिव मंदिर का कंगूरा नहीं देख लेगी ,तब तक अन्न जल नहीं ग्रहण करेगी । इतने कम अवधि में मंदिर बनाना असंभव था । मगर एक मूर्तिकार ,कलाकार ने एक सप्ताह में कंगूरा बना दिया ,उसने पहाड़ पर पहले मंदिर का कंगूरा ही बना दिया था ।

एलीफेंटा की गुफाओं के ऊपर भी भगवान शंकर की मूर्ति है । ,इसके अलावा दशावतार में विष्णु के दसो अवतार ,दुर्गा ,गणेश ,अर्धनारीश्वर आदि के मूर्ति हैं ।

एलोरा मंदिर गुफा ,हिन्दू,बौद्ध और जैन तीनों समुदायों के लिए आस्था का केंद्र है । सबसे प्राचीन मंदिर बौद्ध का ही बताया जाता है । यहाँ बौद्ध कालीन निर्माण तीन चरणों में विभक्त किया जा सकता है । सबसे प्राचीन गुफा न 0 1,2,3 5 है ,जो चौथी सदी के आसपास का हो सकता है । गुफा 4 तथा 6 से 10 तक छठी सातवीं सदी की है ,11 ,12  सातवीं सदी की । बौद्ध गुफाओं की कलाकारी और निर्माण शैली बहुत ही सुंदर है । विशाल पूजा स्थल जहां ध्यान मग्न महात्मा बुद्ध अवस्थित हैं । गुफाएँ दुमंजिली है ,मगर ऊपर का कुछ खंड खंडित हो चुका है ।

बुद्ध की गुफाओं में जातक कथाओं ,और बुद्ध के जीवन चरित को दर्शाया गया है ।

इसी तरह जैन गुफाओं में जैनी तीर्थंकरों की कथाओं को उभारा गया है । गुफाओं के स्तम्भ आयता कार ,वर्गाकार ,षटभुजाकार बनाए गए हैं ।

एलोरा को इतनी प्रसिद्धि मिलने का कारण यह भी रहा कि यह तत्कालीन भारत का अन्य देशों के साथ व्यापार के मार्ग पर था । यह खुद भी एक बड़ा व्यापारिक और प्रसिद्ध शहर था ।

कहा जाता है कि औरंजेब ने अपने पुत्र को एक पत्र में लिखा था ,कि कभी जब यहाँ आए ,तो ऐलोरा की इन विलक्षण गुफाओं को वह अवश्य देखे ।

यह भी कहा जाता है की करीब 7000 मजदूरों ने 150 साल की विभिन्न अवधि में इस अप्रतिम कृति को सम्पन्न किया होगा ।

वास्तव में यह वर्णनातीत है । उस जमाने में ,स्थापत्य काला ,मूर्ति कला ,और तकनीक इतना मजबूत था ,यह आज की और भावी पीढ़ी को जानना बेहद जरूरी है । उन महान काला कारों को ,उन हस्तशिल्पियों को ,उन नक्शा बनाने वालों को कोटिश नमन है ।

कामिनी कामायनी ॥

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