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कहानी / व्रत भंग / डॉ. श्रीमती तारा सिंह

नेहा राजपूत की कलाकृति

व्रतभंग

अश्व के पद-शब्द जैसे पाँव से आवाज निकालकर बेटी सालवी का चलना, उसकी माँ, मैनकी को बिल्कुल पसंद नहीं था । वह अपने पति करोड़ी से बार-बार कहती थी, सालवी के बाबू गाँठ बाँध लो --”तुम्हारे लाड़ में यह लड़की,इस कदर बिगड़ गई है देखना ,एक दिन हमदोनों को कहीं का नहीं छोड़ेगी’ । इस बेढ़ंगी को ढ़ंग सिखाओ, क्योंकि मुझे इसका पैर पटक-पटक कर चलना, असह्य हो जा रहा है । तुम पिता होकर, क्यों इसके भविष्य को अनिष्ठ करने पर तुले हुए हो ?

पत्नी की बात सुनकर करोड़ी के गुस्से की अग्निशिखा उसके मुख तक पहुँच गई । उसका मुख-मंडल लाल हो गया; जिसे देखकर मैनकी हतबुद्धि सी खड़ी ताकती रह गई । फ़िर अचानक एक ठंढ़ी साँस खींचकर बोली---- माफ़ करना, सालवी के बाबू ! तुम्हारे अन्याय पूर्ण हठ का मैं सम्मान नहीं कर पा रही हूँ, करूँ भी तो कैसे ? मैं एक माँ जो हूँ , नजर के सामने बेटी के भविष्य को बर्बाद होते नहीं देख पाती हूँ । लड़की तुम्हारे लाड़ –प्यार में खुद को लड़का समझती है । करोड़ी ने पत्नी की बात पर खिसियाकर कहा----- चुप भी करो, दिन भर बक-बक करती रहती हो ; तुम्हारा मुँह नहीं दुखता ।

मैनकी को पति की बात शर सी लगी; वह तिलमिलाकर बोली----- इसी गाँव में सज्जन की बेटी को देखो । तुम्हारी ही बेटी के उम्र की है ; कितनी समझदार , अच्छे भावों से परिपूर्ण , अपना समय और चित्त,हमेशा अपनी माँ के साथ घर के काम-काज में लगाये रखती है न कि इसकी तरह बेढ़ंगी । देखना, जब यह लड़की ससुराल जायगी, सबों से झिड़की सुनेगी, तब तुम इसकी जगह रोने जाना ।

मैनकी और करोड़ी के झगड़े की तरह सालवी भी दिनों-दिन बढ़ती चली गई, उसकी यौवनमयी उषा, उसके गोरे कपोलों पर फ़ैलने लगी । उसकी धवल आँखें गुलाबी होने लगी, अंग-कुसुम से मकरंद छलकने लगा; जिसे देखकर मैनकी ने करोड़ी से कहा---- सालवी के बाबू,अब सोच क्या रहे हो, सालवी जवान हो गई है । अच्छा घर-वर देखकर इसका ब्याह कर दो, अपने घर चली जायगी । हमलोग कब तक पराये धन को अपना समझकर रखे रहेंगे ।

करोड़ी क्रोधित हो बोला------ तुम्हारे कहने का तात्पर्य, मैं उसकी शादी कर दूँ, उसे अपने घर से निकाल दूँ । अरि भाग्यवान ! माता-पिता को अपनी संतान कभी भारी नहीं लगती । ऐसे भी सालवी अभी बच्ची है । दूसरे के घर जाकर वह जी नहीं सकेगी ; थोड़े दिन और ठहर जाओ, फ़िर अच्छे घर-वर भी तो मिलने चाहिये । सिर्फ़ चाहने भर से कुछ नहीं होता ।

तभी मैनकी को चक्रधरपुर के मास्टरजी (जीवत राम ) की याद आई । उसने कहा----चक्रधरपुर वाले मास्टर जी का बेटा, कैसा रहेगा ? 20 बीघा जमीन है, लड़का बी० ए० में पढ़ता है, और सबसे बड़ी बात , मास्टर जी , नेता भी हैं । एक बार बात चलाकर तो देखो, ऐसे सब कुछ भाग्य- भोग है । कहीं बात बन गई, तो सालवी रानी बनकर राज करेगी ।

मैनकी की बात करोड़ी को भा गई ; बोला---- ठीक है , जब तुम्हारा यही विचार है, तो प्रयास कर देखता हूँ ।

इधर सालवी को शादी की जीवन-लालसा, उसके हृदय-आकाश के क्षितिज को रंजित करने लगा था । उसे उछल-कूद , अब अच्छा नहीं लगता था । वह किसी थके पथिक की तरह

चाहती थी कि किसी के बाँहों पर सिर रखकर विश्राम करूँ ।

मैनकी जैसा चाहती थी, सालवी की शादी , मास्टर जी के एकलौते बेटे के साथ बड़े धूम-धाम से हो गई । सालवी ससुराल जाकर बहुत खुश थी ; विशेषकर ज्वाला प्रसाद जैसे गठीले रूपवान पति को पाकर । करोड़ी भी बहुत खुश था, यही तो उसकी अभिलाषा थी कि सालवी खुश रहे ।

लेकिन , सालवी का ससुर बहुत ही कड़े स्वभाव के थे , विशेषकर औरतों के प्रति । मजाल क्या, कि घर की औरतें दरवाजे पर जाकर खड़ी हो जाएँ । उसका कहना था, औरतें घर की लाज होती हैं, इसलिए उन्हें घर में चहारदीवारी के भीतर रहना चाहिये । स्वेच्छाचारिता का भूत स्त्रियों के कोमल हृदय पर बड़ी सुगमता से कब्जा कर लेता है, जिससे औरतों में निर्लज्जता आ जाती है , और मैं ऐसी हरकतों को बर्दाश्त नहीं कर सकता । औरतों को मर्द के वनिस्पत अधिक गर्वणी, दृढ़-हृदय और शिक्षा सम्पन्न होना चाहिये ,लेकिन आत्मिक बल का विनाश न हो । इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि कोई स्त्री , स्त्री-धर्म ही भूल जाय ।

सालवी भी ससुर द्वारा बनाये संविधान का अक्षर-अक्षर पालन करने के लिए मजबूर थी । किसी से आँख उठाकर बात नहीं करती थी , आँखें अपने आप झपक जाती थीं । फ़ुर्सत मिलने पर सास के साथ बैठकर रामायण पाठ करती थी । एक दिन ससुर के मुँह से सिर्फ़ इतना निकला---- बहू दाल में नमक हिसाब से डाला करो । सुनकर सालवी के हाथ-पाँव काँपने लगे थे, मानो इससे अधिक वेदना उसने अभी तक नहीं पाई हो ।

एक दिन जीवतराम संध्या समय रामयण पढ़ रहे थे । भरत जी , रामचंद्र जी की खोज में निकले थे । वे भरत- विलाप के दृश्य का वर्णन करते-करते इस कदर खुद भरत के किरदार में घुस गये कि वहीं विलख-विलखकर रोने लगे, जिसे छुपकर देख रही सालवी , गाँव वालों की मौजूदगी में , नियम का घड़ा और धर्म का किला तोड़ती हुई खिल-खिलाकर हँस पड़ी । लगा जैसे वर्षों से घड़े में बंद हँसी अचानक फ़ूटकर निकल आई हो । यह देखकर जीवतराम की क्रोधाग्नि भभक उठी । मगर, अपने अपमान और इस प्रकार के कुठाराघात को बड़ी ही उदारता के साथ सहने की कोशिश करने का अभ्यास करते हुए वहाँ बैठे लोगों से बोले---- भाइयो ! अन्य यात्राओं की तरह ,विचारों की यात्रा में भी पड़ाव होते हैं , लेकिन हम सभी इस बात को भूल जाते हैं । इतिहास साक्षी है , हम उस वातावरण में पले हैं , जहाँ स्त्रियों की उँची आवाज को लोग अपशकुन मानते थे । आज वैसी बातें नहीं हैं, और होनी भी नहीं चाहिये । अगर मर्दों को दिल खोलकर हँसने का अधिकार है तो स्त्रियों को क्यों नहीं; जब कि दोनों को जन्म देने वाला ईश्वर एक है । अगर स्त्रियाँ ,अपनी स्वेच्छा से जी नहीं सकतीं, तब केवल सदभावना के आधार पर उनकी दशा नहीं सुधारी जा सकती । अगर कोई स्त्री अपनी स्वेच्छा से अपना स्वार्थ छोड़ दे, तो अपवाद है; मगर शासन और नीति केवल किसी के स्वार्थ को छोड़ने के लिए बनाया जाय, तो यह कायरता है । उपजीवी होना शर्म की बात है, लेकिन अधिकार के साथ जीना ,प्राणी मात्र का धर्म है । यह भी सच है कि रूढ़िवादी किला की दीवार को तोड़ने का अर्थ, अपने चारो तरफ़ शत्रु को जनम देना होता है । मगर जीवतराम को यह सब कहते, लेशमात्र भी याद नहीं रहा कि स्त्रियों के प्रति उनका यह वक्तव्य उनके अब तक के विचारों का कहीं मखौल तो नहीं उड़ा रहा ! मगर वहाँ बैठे हुए लोगों पर बज्राघात सा हो गया ,लोग एक-एककर उठकर चले जाने लगे । किसी ने कहा--- बाबूजी ! अपना भाषण अग्निदेव को अर्पण कर देना ; क्योंकि अब आपके आत्मिक बल का विनाश हो चुका है । आप में स्वार्थग्यान आ गया है ।

जीवतराम आसन से उठ खड़े हो गये, और कठोर दृष्टि से देखकर गंभीर भाव से बोले ---- सज्जनो ! मित्रो ! क्या आप जानते हैं, अति -उदारता वास्तव में सिद्धांत से गिर जाने, आदर्श से च्युत हो जाने का ही दूसरा नाम है । आज मैं ऐसा कहने के लिए विवश हूँ, आप सभी मुझे क्षमा करें । हम बाहर से पूर्व और भीतर से पश्चिम होते जा रहे हैं । हमारा शत आदर्श लुप्त होता जा रहा है, पूर्व की भावना हमारे संचित समय के जड़ों को हिलाने लगी है ।

ससुर जीवतराम की , हर बात को सालवी बड़े ही ध्यान से सुन रही थी । जब सभी लोग चले गये, तब सालबी दौड़कर जीवतराम के पाँव पकड़कर चिपट गई ; बोली-----पिताजी ! मैं सिर्फ़ आपका ही नहीं, पूरे समाज का गुनहगार हूँ : आप जो चाहें, मुझे सजा दें , मगर आप इस कदर उदास न हों ।

यह सुनकर ,मिश्रित पशुता और बर्बरता के कृत्यों से भरा जीवतराम का हृदय पसीज गया । उसने सालवी को उठाकर अपने गले से लगाते हुए कहा-----’ बेटा ! स्मित हास्य की वह छटा है, जो सदैव गंभीरता के नीचे दबी रहती है । मैं जानता था, चेतना पद और अधिकार को भूलकर चहकती फ़िरने वाली मेरी बहू चपल है, तो सतर्क भी कम नहीं है । ईश्वर सबको ऐसी बहू दे ।

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