रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

विज्ञान कथा / प्रिया फकड़ी गयी / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

साझा करें:

उ स दिन दोपहर को घटित घटना को देखकर मुझे ऐसा लगा कि मैं अपने प्रतिद्वन्दी से पराजित हो जाऊँगा। मेरी गर्ल फ्रेण्ड प्रिया मुझ से दूर चली जाये...

स दिन दोपहर को घटित घटना को देखकर मुझे ऐसा लगा कि मैं अपने प्रतिद्वन्दी से पराजित हो जाऊँगा। मेरी गर्ल फ्रेण्ड प्रिया मुझ से दूर चली जायेगी। मेरे प्रतिद्वन्दी ये बुद्धिमान-प्रौद्योगिकी जनित नवीन, घर के कार्यों में उपयोग किये जाने वाली कुछ वस्तुयें और एक वैक्यूम-क्लीनर जिसमें अनेक प्रकार के इन्टर चेंज करने वाली प्रणाली गैजेट लग सकते थे।

मेरी बुद्धिमान,स्वचालित चेयर (जिसे काश! मैंने न खरीदा होता) किचन का मिक्सर-(मेरा सर दर्द) और वह मेडिकईटेड इन्टेलीजेन्ट कम्बल-लाइफ ब्लैंकेट, इन तीनों ने आई-पाड इमार्मेशनपाड, के साथ ब्लैब बना लिया था। यह ब्लेब किन्हीं बुद्धिमान वस्तुओं के एक साथ मिलने से बन सकता है और फिर यह ब्लैब अपनी (इच्छा के) अनुसार अजीबो-गरीब हरकतें करने लगते हैं- यह मैं आपकी जानकारी के लिये बता रहा हूँ क्योंकि उनकी यही हरकत मेरे सर की और दिल की दर्द बन गयी।

यह इन चारों का ब्लेब मेरी गर्ल फ्रेन्ड पर काफी दिनों से डोरे डाल रहा था। उनकी यह लीला भी चलती रही होगी...

गलती भी मेरी ही थी- मैं इतना अधिक कार्यों में डूबा हुआ था कि मैं प्रिया की आवश्यकताओं को भूल ही गया था। फल स्वरूप यह ब्लेब-मेरा प्रतिद्वन्दी बन बैठा। यह असह्य था मेरे लिये-मैं प्राणवान जो ठहरा. .और ब्लेब निर्जीव लेकिन मात्र इतना ही नहीं! ओह ब्लेब की वह हरकत .वह घटना... मैंने जिस दिन से प्रिया का अनुरोध, कि ''अब बहुत हो चुका छुप-छुप कर रहना- मिलना, अब हम साथ क्यों न रहे?'' सुना था, मेरे मन में इस प्रकार की कल्पना साकार हो उठी थी। प्रिया की बात प्रिय थी. पर उसे स्वीकार करने में मुझे इस प्रौद्योगिकी प्रधान समय में; धबराहट सी होती थी और प्रिया थी कि वह घर को सर पर उठाये, मेरे घर में घुस आने के लिये बेताब थी।

एक दिन शाम को प्रिया रूठ गयी। मेरे लाख मनुहार पर भी वह मुंह-फुलाये बैठी रही। बहुत मिन्नतें की तो अपने कारे कजरारे आंखों से आग के शोले बरसाती वह कहने लगी ''अजय! तुम मुझसे प्यार नहीं करते। तुम्हें तुम्हारा, पामेरियन कुता ज्यादा प्यारा है। मैं तुम से बातें नहीं करुँगी।'

मैंने कहा '' मेरी दिलरुबा। मेरी बुलबुल! तुम बेवजह नाराज हो।''

''तुम मुझे बहला रहे हो! तुम मुझे प्यार का नाटक दिखाकर बेवकूफ बनाते रहे हो'' वह अपनी आंखों को नचाते हुये उनसे मिर्च और मिश्री की फुलझड़ी निकालते हुये, कह रही थी।

''मेरी दिलवर! मैं तुम को प्यार करता हूँ। तुम्हारी हर अदा पर कुरबान हूँ मगर।''

''मगर क्या? क्या हम साथ रह कर मकान का किराया नहीं बचा लेंगे। क्या तुम मेरे स्वभाव से पूरी तरह से परिचित नहीं हो? क्या मैं तुम्हारे मन के भीतर की बात नहीं समझती हूँ? डियर तुम मुझे चाहते हो तभी मैं तुम्हारी जेब ज्यादा हल्की नहीं कराती हूँ और तुम्हारे ट्वायलेट सीट को... बाद क्या मैं रिप्रोग्राम नहीं कर देती?'' प्रिया अपनी खनकदार रूठी आवाज में कह रही थी।

''मैं जानता हूँ प्रिया तुम सिस्टेमैटिक हो, सफाई पसंद हो, और तुम्हारे सीने में एक प्यार भरा दिल तेजी से, धड़क रहा है.।''

प्रिया यह सुनते ही मुझसे चिपटकर बैठ गयी। उसके बाजू मेरे सीने से लिपट गये। चलते हुये वह कह उठी ''अजय! अब दूरी बर्दाश्त नहीं होती। अब तो हर पल मैं, तुम्हारी बाहों में गुजारने के लिये बेताब हूँ। इतना ही नहीं सप्ताह में सात दिनों में सिर्फ तीन दिन तुम्हारे साथ बिताना, मुझे खटकता है।''

''ऐसा क्यों?'' कुछ चौंकते हुये मैंने कहा।

''कहीं किसी और से तो तुम्हारी नजरे चार तो नहीं हो रही ' हैं? प्रिया ने अपने सुन्दर ओठों पर व्यंग की मुस्कान लाते हुये कहा।

'' '' तुम लड़कियाँ बहुत शक्की होती हो?''

''और पुरुष क्या एक पत्नी व्रती होते हैं?''

' 'छोड़ो प्रिया इन बातों को'' मैंने बात बदलने के इरादे से कहा। ' 'अजय! आज तुम मुझसे मिलने आये हो। टैक्सी का आने जाने का भाड़ा जोडकर तीन से गुणा करो और फिर इस बढ़ती महगाई में रेस्ट्राँ में खाना वह जोड़ो। अगर मैं तुम्हारे साथ रहती हूँ तो यह सब बच जायेगा। खाना मैं बनाऊँगी, उसे खाकर मेरे खाना-बनाने की कला पर तुम खुश हो जाओगे।

' 'इतना ही नहीं अजय, मेरा आफिस जहाँ मैं काम करती हूँ वह भी तो तुम्हारे घर से करीब पड़ता है। मैं तुम्हारे घर से पैदल वहाँ दस मिनट में पहुँच सकती हूँ। और तुम्हारा फ्लैट बड़ा है। उसका बेड रूम सुन्दर है और उसमें वह फ्रेंच-बेड कितनी आनन्ददायक है जरा सोचो। ''

चतुर नायिका की भाँति शब्द ताण्डव दिखाती प्रिया मुझसे पूरी तरह लिपट गयी थी। मैं भी मौन था। पर यह मौन अधिक देर तक टिक न सका। '

'क्या सोच रहे हो? प्रिया मेरे कान के पास, उसे अपने ओठों से छूती हुई कह रही थी।

'' तुम्हारे पास बहुत अधिक सामान है।''

''पर तुम्हारा फ्लैट भी काफी बड़ा है, उसमें सारे सामानों को मैं कायदे से अरेंज कर दूँगी। तुम्हें इसके लिये परेशान होने की जरूरत नहीं है।''

''पर मुझे डर है. '' मैंने बात पूरी नहीं की थी कि प्रिया व्यग्रता वश पूछ पड़ी''

“पर किसका?''

“ब्लेब का'' मैं. ' धीरे से बोला।

मेरी बात.. .सुनकर प्रिया जोर से हँस पड़ी।'' ओह ब्लेब'' यह तो बड़ी सामान्य सी बात है, आज के युग में। जब सामान अधिक और वे सभी इंटेलीजेन्ट चिप्स युक्त होंगे तो वे आपस में' ब्लेब बनायेंगे और फिर उन्हें तो हम पकड़ कर अलग कर सकते हैं वान-डर-वाल फोर्स अधिक शक्तिशाली नहीं होता -उसे झटका देकर तोड़ा जा सकता है।''

''वैसे यह ब्लेब'' सामान्य होते हैं, इनसे कुछ नुकसान तो हो नहीं सकता'' प्रिया पूर्ण विश्वास के साथ, आशामय शब्दों का प्रयोग कर रही थी।

पर मैं जानता था कि ब्लेब सदा सामान्य नहीं होते। ब्लेब तो पिछले पच्चीस सालों से हमारी दुनिया में है। शुरू में इन्डस्ट्री ने सिलीकान का एक मिलीमीटर के साइज का चिप प्रत्येक प्रयोग में आने वाली वस्तुओं में लगाना प्रारम्भ किया। लेकिन विकास की गति रुकती तो है नहीं। कुछ वर्षों बाद प्रौद्योगिकी ने अधिक संवेदनशील चिप्स विकसित कर लिये। परिणाम था इण्डस्ट्री ने इन इन्टेलीजेन्ट चिप्स को प्रत्येक वस्तु जो दैनिक कार्यों में आती है, लगाना प्रारम्भ कर दिया। फिर तो टूथ-ब्रश, मिक्सर, काफी मेकर, जूते, और किचन में रखे सील्ड-खाद्य पदार्थों के डिब्बों, ने अपनी यांत्रिक बुद्धि कर कौशल दिखाना प्रारम्भ कर दिया। आप की घड़ी जो कलाई पर बंधी है, आपके पसीने में नमक की मात्रा को चेक करके तुरन्त रेफ्रीजरेटर को आदेश देगी कि वह अब कम नमक-इलेक्ट्रोलाइट का ताजा ड्रिंक प्रस्तुत करे। आप की बुद्धिमान बेड शीट वाशिंग मशीन को निर्देश देगी कि वह ठीक से सफाई करे। जीवन इस प्रकार सुखद हो गया था। प्रौद्योगिकी की प्रगति से सभी अभिभूत थे। लेकिन.. .इस प्रकार के प्रौद्योगिकी की गति को रोकने के विचार से, किसी असामान्य मानसिकता से ग्रसित धर्मान्ध मध्य एशिया के कप्यूटर विशेषश ने ' लडाकू' नामक वाइरस को इन स्वविवेकवान वस्तुओं में भेजना शुरु कर दिया।

परिणाम था कि इन वस्तुओं के सामान्य कार्यकलापों के साथ साथ उनकी अस्वाभाविक गतिविधियों में बढ़ोतरी। इन्डस्ट्री ने इस वाइरस के लिए प्रतिरोथी सिस्टम तो विकसित कर लिया था परन्तु इस विकास के मध्य में, ' लड़ाकू' ने अपने गुल- खिलाने शुरु कर दिये थे।

गलती इस दिशा में इंडस्ट्री से हुयी। इंडस्ट्री ने. अपने उपकरणों पर एक विशेष प्रकार के पालीमर की त्वचा चढ़ा दी थी, जिसके कारण यह वस्तुयें मानव त्वचा की भाँति संवेदनशील और अनुभूति युक्त हो गयीं। पर इतना ही नहीं- यह वस्तुयें अपने विवेक एवं प्रेरित विवेक का सहारा लेकर आपस में चिपक सकती थीं और फिर दो अथवा तीन वस्तुयें आपस में चिपक कर इधर से उधर चल सकती थी, हरकतें कर सकती थीं। ठीक छिपकली की भाँति जो अपने पैरों में लगी झिल्ली- बचा में वैक्यूम-शून्य-उत्पन्न कर दीवारों पर इधर से .उधर नाच सकती हैं। इसी प्रकार यह वस्तुयें सूक्ष्म बान-डर-वाल फोर्स से, शक्ति से चिपक कर लड़ाकू' वाइरस के प्रभाव में किसी भी दिशा में, कभी भी मनचाहा काम कर लेती थी। स्वविवेकवान वस्तुओं की चमत्कारिक कार्य क्षमता से प्रभावित समाज, इन ब्लेब'' फारमेशन, ब्लेबनिर्माण' का इतना अभ्यस्त हो चुका था, कि उसे इनके कार्यों की कुशलता को देखते हुये ब्लैब-फारमेशन' महत्वहीन लगने लगा था। इसी कारण हमारे यहाँ आये मेहमान के साथ दुर्घटना घटी थी। जी.राम मेरे मित्र के मित्र थे। एक दिन वे मेरे यहाँ आ धमके। जी.राम का पूरा नाम था गोबरी राम, पर हम सभी उन्हें उनके संक्षिप्त नाम से ही पुकारते थे। उन्होंने गेस्ट-रूम में ठहराया गया। मेरे मित्र विद्वान थे और साथ ही साथ जब वे रात्रि में सोते थे तो उनकी विद्वता की भांति, रात्रि में कोई भी व्यक्ति उनके समीप ठहर नहीं सकता था। कारण था कि उनके खर्राटे, किसी भूकम्प के विस्फोट की भाँति-प्रभावशाली होते थे। इन्हीं खर्राटों ने कमरे में, गेस्टरूम में रखे, बेडरूम क्लीनर, अलमारी में रखे कपड़े टाँगने के लिये एक, हैंगर और एक्सट्रा चप्पलों को प्रभावित कर दिया।

बगल के अपने बेड रूम में, मैं गोबरी राम के भीषण खर्राटों को सुनता कब सोया पता नहीं। परन्तु रात्रि में बारह बजे मेरी नींद किसी की चीखने की आवाज से खुल गयी। नींद से उठा था-उसका प्रभाव था, चीखने की दिशा का अनुमान लगा रहा था कि बचाओ। बचाओ। की आवाज फिर पूंजी।

दौड़कर मैंने गोबरी राम के रूम का दरवाजा खोला। दृश्य देखकर मेरे होश उड़ गये।

बैकुअम क्लीनर का पाइप गोबरी राम की नाक पर चिपका था और उनके दाहिने हाथ को हैगंर ने फँसा लिया था। बाँये हाथ में चप्पल चिपक गयी थी। बेचारे गोबरी राम जब दाहिना हाथ उठाने की कोशिश करते तो हैंगर उनके मुख पर चोट करता और बायें हाथ से प्रयास करना और मँहगा पड़ता, क्योंकि उस हाथ- में चिपकी चप्पल इतने जोर से उनके चेहरे पर चोट करती की वे चिल्ला पड़ते। वह दुष्ट बैकुउाम क्लीनर तो गजब किये था।

उसके लम्बे पाइप ने गोबरी राम को कमर से लपेट रखा था तथा उनके उठने के प्रयास को, हाथों में चिपके हैंगर ओर चपल के प्रहार, विफल कर रहे थे। वैकुअम क्लीनर आन था वह गोबरी राम की नाक से हवा खींच रहा था। गोबरी राम खुला मुख इस बात का साक्षी था कि किस तरह से मुख से साँस लेकर वे तड़पते पक्षी की तरह अपने फेफड़ों की रक्षा कर रहे थे। वैकुअम के प्रभाव से फेफड़े फट सकते थे।

मैंने प्रयास कर वैकुअम क्लीनर की स्विच आफ कर दी और उसके पाइप को गोबरी राम की कमर से घुमाकर निकाला। नाक से पाइप हटा कर हाथों से हैंगर और चिपकी चपल को दूर फेंका।

कांपते हुये गोबरी राम उठे और भागते हुये गेस्ट रूम से बाहर आ गये। सर्दी के मौसम में वे पसीने से तर थे। ' इन्टेलीजेन्ट वस्तुयें शायद उनके खर्राटों को बरदाश्त न कर सकीं ओर गोबरी राम तत्काल मेरे यहाँ से जा चुके थे। यह कृपा थी स्वविवेकवान वस्तुओं की। शायद वे भी मेरे मनोभावों को समझ गयी थी।

प्रिया के मेरे साथ रहने के अनुरोध को टालना अब आसान न था। मैं उसे नाराज नहीं करना चाहता था। मैंने उससे रविवार को अपना सामान शिफ्ट करने के लिये कह दिया। प्रिया अति प्रसन्न थी। वह मुझसे लिपट गयी। रविवार को प्रिया का सामान आ गया। कुछ अटैचियाँ, जिसमें उसके कपड़े रखे थे दो कुर्सियाँ और एक सेंट्रल टेबल सहित सोफा, किचन के कुछ सामान। एक हजार गानों का आई-पॉड और पचास साठ व्यू-मास्टर और पुस्तकें तथा कुछ इथर उधर की चीजें- सब मिलाकर बहुत अधिक सामान था ही नहीं- प्रिया के पास। यह देखकर मैंने संतोष की साँस ली।

प्रिया ने अपना सामान सुव्यवस्थित करना शुरू कर दिया। मैं चिन्तित दृष्टि से उसकी गतिविधियों को देख रहा था। मैं नहीं चाहता था कि अधिक स्वविवेकवान वस्तुयें एक ही स्थान पर एकत्रित रहें।

''प्रिया तुम उस मिक्सर को कपबोर्ड में रख दो और उस ओवेन को प्लेट फार्म पर मैंने सुझाया।

''नहीं अजय। यह ठीक नहीं रहेगा। मैं नहीं चाहती कि मिक्सी को प्रतिदिन कपर्बोड से निकालूं प्लेट फार्म पर रखा कर, चलाऊँ साफ करके फिर कपबोर्ड में रखूँ यह बहुत मुश्किल है। इसको रोज में चार बार निकालने, रखने में, मेरे हाथ की मसेल्स-माँसपेशियाँ-तन जायेगी। मैं कोई औरे काम नहीं कर सकूँगी। प्रिया बिना विराम लगाये कहती जा रही थी।

मैंने प्रतिवाद करना उचित नहीं समझा। चुपचाप उठा और ओवेन को कपबोर्ड में रख दिया।

मुझे पहिये बाले सामानों से भय था। प्रिया ने जैसे बैकुअम क्लीनर को खींचकर अपनी बेड के नीचे रखने का प्रयास किया। मैंने उसे सुझाव देते हुए कहा - ''इसे बेड के नीचे मत रखो। क्यों न हम इसको किसी आलमारी में रख दें?'' '

'इतनी दूर क्यों?'' चकित भाव से प्रिया कह रही थी। '

'यह बेहतर होगा''

''किसके लिये?''

''हम दोनों के लिये'' मैंने बात को समाप्त करने वाले अन्दाज में कहा।

प्रिया ने कुछ पलों तक सोचा फिर हमारे मास्टर बेड रूम के सामने वैकुअम क्लीनर को खींचते हुये किचन के खाली कोने में कवर कर पूरी सावधानी से रख दिया और अपनी विजयी मुस्कान की छटा बिखेरती बोली ''इज इट ओके. ?'' मेरी मुस्कान ही उसका उत्तर था।

प्रिया ने मेरी एरान-चेयर को शिफ्ट करना चाहा। इस चेयर में शरीर को आराम देने वाले उपकरण लगे थे, उसमें वाइब्रेटर थे, शरीर की मसेल्ल को, माँसपेशियों को दबाने के लिये यंत्र थे, पैर को खींचने की स्प्रिंगें थीं और सर पर मालिश के लिये सुविधाएं थी। यह चेयर नहीं, शरीर की थकान मिटा देने वाली राजा भोज की जादुई कुर्सी थी।

''प्रिया बेहतर होगा कि तुम इस चेयर को रूम के उस किताबों के पास मत रखो?'' मैंने कहा

' 'क्यों?''

' 'इस लिये कि वहाँ से किचन बहुत नजदीक है।''

'' तुम्हें भय है कि कहीं यह कुर्सी-किसी अन्य वस्तु के साथ संयुक्तीकरण-ब्लेब न बना लें ? मुझे लगता है कि तुम अधिक घबराते हो इसे ब्लेब से।

प्रिया मेरे ऊपर कटाक्ष का रही थी। यह मैं जानता था, परन्तु मैंने उसे बताया डियर! यह मत समझो कि यदि इन बुद्धिमान यंत्रों की स्विच-आफ है,तो यह ब्लेब बनाने में अक्षम

हैं। वास्तव में इनमें लगी बैटरियाँ जब भी यह यंत्र चाहेंगे इन्हें एनर्जाइज्ड-ऊर्जावान बना सकती हैं। और फिर स्विच इनके संकेत पर आन-हो जायेगी। इस प्रकार एक सेकेण्ड से कम क्षणों में यह कार्य करने के लिये तैयार हो सकते हैं।

'' तो फिर ?''

''प्रिया! इस प्रकार यह वस्तुयें ब्लेब कभी भी बना सकती हैं चाहे उनकी स्विच आफ ही क्यों न हो'' मेरा उत्तर सुनकर प्रिया हँसी और कहने लगी 'तुम्हारे कहने का अर्थ है यह वैकुअम क्लीनर, यह चेयर, मिक्सर, जब हम सो रहे हमारे ऊपर टूट पड़ेंगे। मैं अकेले इन सभी के ३० किलो वजन को झटके से दूर फेंक दूंगी और तुम्हें पता ही नहीं चलेगा। ० यहाँ मेरे रहते इन वस्तुओं का षडयंत्र सफल नहीं हो सकता ' अजय!''

''मैं तुम्हारे विचार से सहमत हूँ। शायद मैं आवश्यकता से अधिक सचेष्ट हो गया हूँ इन वस्तुओं के प्रति'' कहते हुये मैंने अपनी एवॉन चेयर को अपनी स्टडी टेबल के पास कर दिया।

मैंने प्रिया से गोबरी राम मेरे मित्र की घटना, जानबूझकर नहीं बतायी थी।

हम रात्रि का खाना खाकर लेटे थे। इतने में बाथरूम की ड्रेसिंग टेबल पर कुछ खट-पट की आवाज आयी। मैं सतर्क हो गया- मुझे लगा कि अ शीशे से टकरा रहा है। प्रिया भी सुन रही थी। मैं झटके से उठा। बाथरूम की टेबल पर मेरा और प्रिया का टूथब्रश, पानी पीने के ग्लास जो कि क्रिस्टल-ग्लास का था, के साथ ब्लेब बनाकर (दोनों ब्रश ग्लास से चिपके थे और उनका हैंडिल टेबल की फर्श पर सीधा था। उसे पुश कर रहे थे। आगे पीछे थक्का मार रहे थे।

प्रिया भी यह दूथब्रशों का खेल देख रही थी। वह जोर-से हंसी और कहने लगी ''यह हम लोगों के साथ रहने के अवसर को सेलीब्रेट कर रहे हैं। मैं इनका ब्लेब समाप्त करती हूँ।'' यह कहती हुयी उसने टूथ ब्रशों को ग्लास से अलग कर दिया और ग्लास को किचन में रखकर, आराम से सो गयी। दूसरे दिन सजधज कर प्रिया आफिस जाने को तैयार थी। ० घूरते हुये मैंने कहा '' आज तो आफिस में तुम्हें देखने वालों का ब्लैब' बनेगा। तुम तो बहुत ही सुन्दर लग रही हो''

तुम्हें ईर्ष्या हो रही है?''

''स्वाभाविक है, प्रिया।''

''अच्छा है, आज तुम अपने आफिस की बुलबुलों को दाना नहीं चुगाओगे' हँसते हुये प्रिया ने मुझे किस कर ''बाई-बाई'' कहा और आफिस के लिये चल दी।

आज की सुबह की यह अच्छी शुरुआत है-सोचकर मैं प्रसन्न था। समाचार पत्र की हेड लाइनों को देख रहा था, इतने में हमारे बेड रूम में, मेरे गोल-मटोल- पमेरियन ' फुटबाल ने' भूँकना शुरु कर दिया। वह हर अट खटाहट पर भूँकता। मैंने सोचा ''फुटबाल'' खेल रहा है किसी-चीज से। मैं अखबार पढ़ने का पूरा आनन्द उठाना चाहता कि एकाएक एक टेनिस-बाल से बड़ी-कड़ी गेंद की तरह की बाल मेरे सर पर जोर से आकर लगा।

मैं चोट के प्रभाव से घबराकर इधर उधर देखने लगा। कहीं से बाल के क्रिकेट के बाल के आने की संभावना नहीं थी।

जो बाल मेरे सर पर लगी थी वह तेजी से हमारे बेड रूम की तरह भाग रही थी ओर उसे मेरा ''फुटबाल'' से मुख से 'पंजों से रोकने की कोशिश कर रहा था पर वह विचित्र बाल हर बार उसको चक्का देकर ऊपर उछल जाती। उसे पकड़ने के अभियान में मैं भी कूद पड़ा।

वह बाल कमरे के छत से टकरायी और मेरे सर पर आ गिरी। मैं उसे कैच न कर सका। वह फर्श पर गिरी और बेड के नीचे चली गयी।

बेड के सर की तरफ ''फुटबाल'' दौड़ गया ओर दूसरी तरह से मैं बेड के नीचे घुस कर उसे अजीब बाल को पकड़ने में लग गया। बाल मेरे हाथ के गिरफ्त में आने से बच निकली पर मेरा ''फुटबाल'' एलर्ट था। वह बेड को नीचे घुसा और बाल को अपने मुख से पकड़ लिया। मैं तेजी से दौड़ा और बात को ''फुटबाल'' के मुख से खींचकर निकाल लिया।

' 'बाल'' की वास्तविकता देखकर मेरी आंखें आश्चर्य से फैल गयीं।

यह सारी करामात मेरे मोजे जो कि इंटेलीजेंट ऊन के बने थे, प्रिया के ऊनी मोजे तथा बेड रूम में रखी-इलायची की चाँदी की डिबिया, की थी। इन तीनों ने ब्लेब'' बना लिया था, बाल बन गये थे और मुझे सुबह समाचार पत्र न पढ़ने देने के इरादे से यह सुनियोजित बदतमीजी कर रहे थे (काश यह इन्टेलीजेन्ट न होते)!

प्रौद्योगिकी को मन ही मन गालियाँ देता, मैंने अपने और प्रिया के मोजों को अलग-अलग रखकर, उस चांदी की डिबिया को सदा के लिये अलमारी में बन्द कर, राहत की साँस ली।

सुन्दर सुहावनी सुबह इस ब्लेब' को कारण खराब हो गयी। मैं जिस सरकारी संस्था में काम करता था, उसने गिरगिट की तरह कई रंग तो नहीं पर नाम जरूर बदले। जब मैं उस संस्था में आज से बीस. वर्ष पहले आया था, उस समय नाम था ''सूचना संग्रह स्त्रोत संस्थान''। करीब दस वर्ष बाद उसका नाम बदला सूचना संग्रह स्रोत संचार संस्थान''। जब इस देश में आतंकवादी गतिविधियाँ बढ़ी, तो इस संस्था ने फिर अपना नाम बदला-सामान्य सूचना संग्रह स्रोत संस्थान'' परन्तु कार्य उसका वही रहा।

हमारे ऐजेन्ट विशेष ''साफ्टवेयर'' द्वारा समस्त संचार प्रणालियों से सूचना एकत्र कर हमारे केन्द्र को, समस्त देश के प्रदेशों से प्रेषित करते थे। इन सूचनाओं में जो महत्वपूर्ण लगती उन्हें एक कम्प्यूटर में एकत्र कर विश्लेषण किया जाता। इसके बाद इन में से पाँच प्रतिशत घटनायें- प्रमुखता से छानबीन-चेकिंग के लिये विशेष एजेन्टों को दी जाती। वे विविध प्रकार के संवेदी मानीटरों द्वारा संदेहास्पद व्यक्तियों पर ध्यान रखकर उनके गतिविधियों की (प्रत्येक क्षण) कम्पूटर को विशेष कोडों पर प्रेषित करते रहते।

मैं उन चुने हुये पाँच प्रतिशत व्यक्तियों की गतिविधियों, कार्यकलापों पर निगाह रखता और आवश्यकतानुसार अन्य विभागों को भी सूचनायें देता रहता। मैं इस संस्थान की रेटिना की तरह था। दिन रात चैतन्य और जागरुक।

इसी जागरूकता का परिणाम था प्रिया से मुलाकात। एक बार सूचना आयी कि नागरिक सुरक्षा विभाग के आफिस में कुछ संदेह उत्पन्न करने वाली गतिविधियों चल रही हैं। मैं तत्काल चैतन्य हो गया।

उस आफिस में मैने एक रोबोटिक मक्खी को इस सावधानी से उठाकर भेजा कि वह संदेह के घेरे के व्यक्ति के ठीक ऊपर की छत पर चिपक कर अपने संवेदी अस्त्रों से प्रत्येक पल फोटो-हमारे सूक्ष्म विश्लेषकों को भेजती रहे. यह अभियान कई दिनों तक चला।

वह व्यक्ति एक युवती से विभिन्न फाइलें मंगवाता और उसे बैठाकर कुछ डिक्टेट भी करता था।

हमारी रोबोटिक मक्खी-छत से चिपकी सारी फाइलों के पृष्ठों को हमारे पास प्रेषित करती रहती थी। मैंने इन गतिविधि को सूक्ष्मता से अध्ययन किया और यह निश्चित किया कि इस लड़की के लिए भी एक ''बग'' लगाया जाये (रोबोटिक संबेदी य़ंत्र)।

दूसरे दिन एक बग-ड्रोन (नानों-मक्यी) उस लड़की के सर के ऊपर की छत पर जा चिपकी।

उसकी गतिविधियाँ मानीटर होने लगीं

मुझे वह लड़की अच्छी लगी। वह गलत कामों में फंस न जाये यह चिन्ता न जाने क्यों मेरे ऊपर छाती- जा रही थी। दूसरी बात थी कि यद्यपि वह सेक्सी नहीं थी पर थी बहुत सुन्दर और सुकुमार तन वाली।

मेरे पास उसके समस्त विवरण थे और उसकी वाइटल-स्टैटिस्टिक भी।

मैंने उससे मिलने का निश्चय किया।

प्रिया आफिस से निकल रही थी, कि मैंने उसका नाम लेकर पुकारा। वह चौंकी और मुझ जैसे अजनबी को देखकर घबरायी थी। मैंने शालीनता से अपना परिचय दिया और दूसरे दिन मेरे साथ लंच लेने का अनुरोध भी कर दिया। और न जाने क्या सोचकर इस नियंत्रण को झिझकती हुयी प्रिया ने स्वीकार कर लिया।

लंच के बाद हमारा अपरिचय दूर हो गया। नजदीकियाँ बढ़ी और समय के साथ हम मित्र बन गये।''

इस प्रकार प्रिया गलत काम में फँसने से बच भी गयी। लेकिन. .यह ब्लेब' सभी के लिये समस्या बन बैठी।

आफिस में लंच ब्रेक के समय इन ब्लेब' फारमेशन के नयी नयी हरकतें चर्चा में होतीं। मैंने भी सुरक्षा की दृष्टि से अपने प्रत्येक कमरे में ''हाउस-फ्लाई-ड्रोन'' लगा दिया था। इन कमरों की निगरानी और उसमें होने वाली ब्लेब हरकतों की संरचनाएं, मुझे आफिस में, मेरे व्यू-मास्टर पर दिखती रहती। मेरे आफिस का काम बहुत बढ़ गया था। उसे सुलझाने के लिए मुझे अक्सर बाहर-घर से-शहर से बाहर जाना पड़ता था, प्रिया घर पर रहती।

वापस आने पर वह शिकायत करती और मैं उसका मनुहार करता-पर मेरा काम घटता ही नहीं था। दिन-रात की भाग दौड़ थका देती थी। मैं घर पर अतिशय थका बेसमय और सिर्फ सोने के लिये आ पाता। पिछले एक महीने से यही रुटीन था। मैं प्रिया को समय नहीं दे पा रहा था और न उसे कहीं बाहर आउटिंग के लिए ही ले जा पा रहा था।

कभी किसी टैंकर में विस्फोट, तो कभी किसी ट्रेन की पटरी का उखड़ जाना, किसी नेता की हत्या, इन सभी के पीछे आतंकवादियों का हाथ होने न होने की संभावना की एनालेसिस ने मुझे वास्तव में .थका दिया था। पर धीरे-धीरे कर समस्यायें सुलझने लगीं और मेरा आफिस का टेबेल वर्क फिर शुरु हो गया।

मेरी 'हाउस-फ्लाई-ड्रोन' ने सूचनाओं से मेरे व्यू-मास्टर को भर दिया था जिनकी मैं पाँच व्यू-विन्डोज से देख सकता था। एक दिन प्रिया आफिस से आयी धी और घर में आते ही वह लड़खड़ा गयी। उसकी पैर की मांस-पेशी तन गयी थी। घबरायी सी वह बेड पर बड़ी देर तक लेटी रही। थोड़ी देर के बाद हिम्मत करके उठी और मेडिकेटिड कम्बल को उठा लायी, जो इन्टेलीजेन्ट था और अपनी पीठ के दर्द को दूर करने के लिये, इसे मैंने कभी खरीदा था। उसे लेकर वह बेड पर न बैठकर मेरी एरान चेयर पर जा बैठी। उसने अपने ड्रेसिंग गाउन की पाकेट में रखे आई-पॉड को आन कर उसके ईयरफ़ोन को कान में लगाकर एरान-चेयर पर बैठ गयी।

एरान-चेयर ने उसके शरीर को सुविधा देने के अनुरुप अपने को एडजेस्ट कर लिया। उसके पैर को आराम देने के लिये उसमें लगे क्लैम्प धीरे से ऊपर उठ गये। अब वह आंखों को बन्द कर मेडिकेटेड-कम्बल (ब्लैंकेट) को पैर में लपेटकर, चेयर पर लेट गयी उसे आराम मिल रहा था। कोने में रखे वैकुअम क्लीनर का पाइप एकाएक, सांप की तरह ऊपर उठने लगा। उसके पाइप ने इधर उधर हवा में घूम कर हवा की महक का अन्दाज लिया।

यह दृश्य कुछ पलों तक चला। शायद प्रिया का आई-पाड वैक्यूम क्लीनर (वह बहुत ही बुद्धिमान-इंटेलीजेन्ट था), मेडिकेटेड ब्लैंकेट और एरान चेयर का मूड ब्लेब'' बनाने को नहीं था, इसी लिए वैकुअम क्लीनर का पाइप हवा में लहराकर धीरे- ' कर बैठ गया, जमीन पर, वैकुअम क्लीनर के बाड़ी के पास।

मैंने यह देखकर राहत की साँस ली। मुझे लगा कि यह संवेदी-बुद्धिमान वस्तुयें प्रिया की मानसिक स्थित का आंकलन करने के बाद, उसे परेशान नहीं करना है, इस विचार से, शान्त हो गयी।

उनका विचार (यदि यह वास्तविकता रही हो) स्वागत योग्य था।

पैर के स्प्रेन के समाप्त होते ही, प्रिया ने मेडिकेटेड-ब्लैंकेट को हटाया। उठी, उसे कप-बोर्ड में रखा और काम में लग गयी। एरान-चेयर अपनी पूर्व अवस्था में जा चुकी थी।

इस घटना के बाद मेरी हाउस-लाई-ड्रोनों ने कोई और विशेष विवरण नहीं दिया था।

यह अच्छा संयोग था कि मैं आफिस में काम निपटाकर व्यूमास्टर को देख रहा था।

प्रिया ने उस दिन आफिस से लीव ले रखी थी। वह घर की चीजों को सुव्यवस्थित करती हुयी, किचन में पहुँची थी। प्रिया अपने लूज ड्रेसिंग गाउन में, वैकुअम क्लीनर से किचन के कप-बोर्ड की सफाई कर रही थी। लगता है उसका सफाई अभियान काफी देर से चल रहा था। क्यों कि वह थक कर मेरी एरान चेयर को किचन में घसीट कर लायी, जिसकी सीट पर आई-पाड और मेडिकेटेड-ब्लैंकेट रखा हुआ था, उसी पर वह बैठ गयी। मिक्सर में पहले से तैयार किया हुआ गाजर-टोमैटो का जूस, हाथ से लेकर चेयर के हैंडिल पर रखकर, मेडिकेटेड-ब्लैंकेट को अपने पैरों पर लपेट कर, कानों में म्यूजिक-आई-पाड-ईयरफ़ोन लगा, सीट को पैंतालिस डिग्री पर सेट करके उस पर थकान दूर करने के विचार से बैठ गयी।

इसी समय 'ब्लेब' का बनना शुरु हुआ। मिक्सर स्टैण्ड खिसकता हुआ आगे बढा, वैकुअम क्लीनर जो चेयर के पास रखा' था सचेष्ठ हो उठा। उसका पाइप जिसके मुख पर खुरदुरा-दीवाल साफ करने का ब्रश लगा था, उठता हुआ प्रिया की गोद में आकर ड्रेसिंग गाउन के ऊपर चिपक गया। मेडिकेटेड-ब्लैंकेट पैरों से ऊपर चढ़ता हुआ उसके सीने तक आ गया। प्रिया चौंक उठी। उसने चेयर से उठना चाहा-परन्तु उस चेयर की बेल्ट ने उसकी कमर को जकड़ लिया था। उसी क्षण वैकुअम क्लीनर आन हो गया उसका ब्रश प्रिया की जांघों का थीरे-थीरे स्पर्श करने लगा और मेडिकेटेड-ब्लैंकेट प्रिया के सीने का मसाज करने में तल्लीन सा हो गया यह दृश्य देखकर मैं आफिस से सीध घर भागा । जब तक मैं वहाँ पहुँचा निश्चय ही प्रिया कई बार सुखद अनुभूति का लाभ उठा चुकी थी। उसकी आखें बन्द थी। मैं दरवाजा खोल घर में घुसा। सीधा किचन में पहुंचा। प्रिया की आखें अब भी बन्द थी, ब्लेब अपनी-' हरकतें कर रहे थे।

मैंने प्रिया को आवाज लगायी। उसकी आधी खुली आंखों में अविश्वास झलक रहा था। वह फुसफुसायी. .' तुम यहाँ कब आये?''

''अभी''

''क्यों?''

''तुम्हें देखने।''

''प्रिया क्या तुम एरान चेयर से उठ सकती हो?''

''मैं उठना नहीं चाहती?''

''क्यों? ''

''तुम मुझे अब प्यार नहीं करते, तुम मुझे पूर्ण आनन्द नहीं देते'' प्रिया के स्वर में व्यंग्य नहीं उलाहना थी।

''ऐसा नहीं है-डियर।''

''तुम्हें तो अपना कार्य अधिक प्रिय है। तुम से बेहतर तो यह समझदार वस्तुएँ हैं ''(एक कटु वास्तविकता )

मैं निरुत्तर था, चुप रहा।

फिर प्रिया ने अपनी आखों को खोला और कहने लगी '' तो तुम मुझे डिनर पर आज ले चलोगे?''

''श्योर-डियर''। मेरा उत्तर सुनकर प्रिया ने मेडिकेटेड जैकेट- कम्बल को, अपने सीने से उतार कर फेंक दिया और दूसरे पल उसने अपने दाहिने हाथ से अपनी जांघों से, गाउन के ऊपर से चिपके, वैकुअम क्तीनर के पाइप और ब्रश को एक झटके से दूर कर दिया।

मुस्कुराती, अंगड़ाई लेकर वह एरान-चेयर से उठकर खड़ी हो गयी और मेरा हाथ पकड़कर मुझे खींचते हुये किंचन से बेडरूम में लेकर चली गयी।

--

डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय; जन्म; ४ मार्च १६५२, शिक्षा: एम-एस-सी. लखनऊ विश्वविद्यालय), पीएच.डी. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय-वाराणसी, नोराड (नारवे) एव अलैक्जैंडर-फान हनवोल्ट-फेलो (जरमनी), पूर्व प्रोफेसर कैंसर शोध, तबरीज़ विश्वविद्यालय, ईरान । विज्ञान कथाओं की दशाधिक पुस्तकें एवं अखिल भारतीय स्तर के प्रतिष्ठित पत्रों एवं पत्रिकाओं में अनेक विज्ञान कथाएँ प्रकाशित तथा कुछ हिब्रू बंगला में अनुवादित, पुरस्कार-सम्मान : ईरान का कैंसर शोध पुरस्कार 1978, अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीट्‌यूट के रिसर्च बोर्ड का सम्मान 1991 विज्ञान-वाचस्पति मानद उपाधि 1996, विज्ञान-कथा-भूषण सम्मान 2001, पद्मश्री सोहनलाल द्विवेदी जन्मशती हिन्दी-सेवी सम्मान 2005, अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कार रजत अलंकरण 2006, साहित्य दिवाकर ( २००७, सम्पादक सरताज २००७, भारत गौरव २००७, सम्पादकश्री २००८, शान्तिराज हिन्दी गौरव अलंकरण 2008, सम्पादक सिद्धहस्त 2008, सम्पादक शिरोमणि 2011, वितान-परिषद प्रयाग सम्मान 2013, गणेशदत्त सारस्वत सम्मान (२०१३), विज्ञान परिषद् प्रयाग : सारस्वत-सम्मान 2015 आदि । सम्प्रति स्वतंत्र रूप से विज्ञान कथा लेखन ।

संपर्क:

ईमेल : rajeevranjan.fzd@gmail.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

---***---

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|नई रचनाएँ_$type=complex$count=8$page=1$va=0$au=0

|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3830,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,335,ईबुक,191,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2770,कहानी,2095,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,485,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,49,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,820,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,307,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1907,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,644,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,685,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: विज्ञान कथा / प्रिया फकड़ी गयी / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
विज्ञान कथा / प्रिया फकड़ी गयी / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
https://lh3.googleusercontent.com/-GPX-viCgo4s/V4XhfIpNohI/AAAAAAAAu8M/jzuLUv_FlsA/image_thumb.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-GPX-viCgo4s/V4XhfIpNohI/AAAAAAAAu8M/jzuLUv_FlsA/s72-c/image_thumb.png?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2016/12/blog-post_97.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2016/12/blog-post_97.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ