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January 2016
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पूर्व प्रसंग 

समय लगभग ईस्वी पूर्व 500. ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध लोगों तक अपनी देशना पहुँचाने के लिए गाँव गाँव भ्रमण करते थे. भ्रमण करते हुए एक बार वह कोशल महाजनपद की राजधानी सावत्थी (श्रावस्ती) के एक गाँव में थे. वहाँ वह अपने शिष्यों के बीच अपनी देशना देते थे. आस-पास के गाँव के लोग भी उनकी देशना सुनने आते थे. धर्म-देशना के समय तथागत को अनुभव हुआ कि गाँव के लोग कुछ सहमे-से लग रहे हैं. कोई भी पुरवासी खुले मन से इस देशना में नहीं आ रहा. जो आ रहे हैं उनका भी ध्यान देशना को सुनते समय उनकी ओर न होकर अन्य ओर विचलित होता रहता है जैसे कि उनके मन में उनकी ओर किसी हानि पहुँचाने वाले तत्व के आ जाने का भय लगा हो. उन्होंने इस भासित होने वाले तथ्य से अपने शिष्यों को आगाह किया. क्योंकि वे भिक्षाटन के लिए गाँवों में जाते रहते है.

उन्होंने स्वयं भी पुरवासियों की मनस्थिति को जानने की चेष्टा की. उन्हें ज्ञात हुआ कि इस अंचल के पुरवासियों के मन पर किसी अंगुलिमाल नाम के डाकू का आतंक छाया हुआ है. वह दुर्दांत है. वह जंगल से होकर जानेवाले पथिकों और व्यापारियों की हत्या कर उनके दाएँ हाथ की एक-एक उँगली काट लेता है. उँगली के लिए वह तीर्थयात्रियों की भी हत्या कर देता है. वहाँ के वासियों के मन में उसका भय इस कदर समाया हुआ है कि उन लोगों ने जंगल के बाट से जाना आना बंद कर दिया है. वह जंगल से निकल कर पुरवासियों के घर में भी घुस जाता है और उस घर के सदस्यों की हत्या कर उनकी उँगलियाँ काट लेता है. उन काटी गई उँगलियों की माला बनाकर उसने अपने गले में पहन रखी है. वह यहाँ के लोगों में अंगुलिमाल के नाम से जाना जाता है. उसका शरीर विशाल है. उसके चेहरे पर बड़ी बड़ी मूँछें हैं. घने लटियाए हुए बिखरे बाल हैं. बड़े बड़े, लाल लाल, आग बरसाते नेत्र, उँगलियों में बड़े बड़े कटार-से नाखून और उसकी बलिष्ठ भुजाओं की कसी हुई मांसपेशियें ने उसे इतना खूंखार बना रखा हैं कि प्रतीत होता है वह हाथियों को भी चनौती दे डालता होगा.

तथागत को एक दिन यह भी ज्ञात हुआ कि अंगुलिमाल ने अबतक 999 उँगलियाँ अपनी माला में गूँथ ली है. माला में 1000 उँगलियों के गूँथने की उसकी प्रतिज्ञा है. उन्हें किसी स्रोत से यह भी ज्ञात हुआ कि इन्हीं दिनों उसकी माँ उससे मिलने जाने वाली है. वह उससे अक्सर मिलने जाती है. लेकिन इस बार वह थोड़ी डरी हुई है. सम्राट उसे जीवित या मृत पकड़ने की आज्ञा अपने सैनिकों को दे चुके हैं. उसीसे उसे अवगत कराने वह उसके पास जानेवाली है. उसके मन में उधेड़बुन है कि जाने इस बार क्या होगा. क्योंकि अगुलिमाल की माला के पूरी होने अब केवल एक उँगली की ही आवश्यकता है..

तथागत को जब ये तथ्य ज्ञात हुए तो वह कुछ चिंतित हो उठे. उन्होंने सोचा, हत्या करने का अंगुलिमाल का यह कृत्य अब चरम पर पहुँच चुका है.

तथागत को मनुष्य के मनस की गहनतम जानकारी थी. उन्होंने अंगुलिमाल के डाकू बनने की पृष्ठभूमि की सूक्ष्म छानबीन की. उन्हें ज्ञात हुआ कि अंगुलिमाल मगध जनपद के किसी गाँव के ब्राह्मण का पुत्र है. वह कोशल महाजनपद के सम्राट प्रसेनजित का राजपुरोहित है. ध्यान में डुबकी लगाकर उन्होंने उसके मनस की गति को भी जाना. उन्होंने अनुभव किया कि उसके अंतस्तल में, गहरे में कहीं करुणा की बूंदें दबी हुई हैं. वे उद्रेक की स्थिति में नहीं हैं. इसका कारण उसके मन पर हिंसा का अनिवार भार है.

उन्होंने मन में कुछ निश्चय किया और बिना किसीसे कुछ चर्चा किए जंगल की ओर चल पड़े.

डाकू अंगुलिमाल का यह अंगुलिमाल नाम उसके बचपन का नाम नहीं था. बौद्ध-धर्म की पुस्तकों में उल्लिखित है कि कोशल नरेश सम्राट प्रसेनजित के दरबार के राजपुरोहित के घर एक बालक ने जन्म लिया, सुंदर गोलमटोल. उसके चेहरे पर एक कांति खेलती थी. घर में आनंद ही आनंद था. परंपरा के अनुसार राजपुरोहित बच्चे की जन्मकुंडली बनवाने राजज्योतिषी के पास गए. राजज्योतिषी ने बच्चे के जन्म की घंटा-घटी पूछी. राजपुरोहित ने बताई. बच्चे के जन्म की घटी सुनते ही राजज्योतिषी के माथे पर बल पड़ गए. माथे पर बल पड़ते देख पुरोहित जी कुछ घबड़ाए. पूछा-

         “क्या हुआ ज्योतिषी जी? सब ठीक तो है न?”

         “इस घटी में आकाश में अशुभ नक्षत्रों का उदित होना दिखाई दे रहा है. शिशु के जन्म के समय क्या आपको कोई अनहोनी दिखी थी?”

          “हाँ ज्योतिषी जी, रात के जिस प्रहर में इस शिशु का जन्म हुआ, वह घड़ी बहुत डरावनी प्रतीत हो रही थी. आकाश में तारों की जो स्थिति हो रही थी उसे देखकर प्रतीत हो रहा था कि किसी यात्री को लूटने के लिए डाकू आकाश में तलवारें उछाल रहे हैं.”

“ राजपुरोहित जी, इस अशुभ योग में जन्मे बच्चे डाकू और हत्यारा होते हैं. कुंडली से यह भी संकेत मिल रहा है कि यह पिछले जन्म में कोई यक्ष था, मनुष्यों का हत्यारा.”

यह सुनकर राजपुरोहित को तो मानो काठ मार गया. बहुत मन्नतों के बाद घर में एक बालक भी आया तो ऐसा भवितव्य लेकर. घर में सभी के मन में उदासी छा गई. उनके मन में आया, क्यों न इस शिशु का नाम ‘हिंसक’ ही रख दिया जाए.

किन्तु पुरोहित दम्पति विचारवान थे. उन्होंने बहुत सोचा. युगप्रचलित तर्क-वितर्कों का सहारा लिया. अंततः उनका मन इस निषकर्ष पर आकर स्थिर हो गया कि भवितव्य पर किसी का वश नहीं चलता. बहुत विचार विमर्श के बाद उन्होंने निश्चित किया कि यह बालक परमात्मा की देन है. परमात्मा के आगे किसी की नहीं चलती. राजज्योतिषी से परामर्श कर उन लोगों ने उस बालक का नाम लोक-प्रथा के अनुसार ‘अहिंसक’ रखा. इस प्रथा में यह माना जाता है कि ऐसा नाम रखने से वैसा ही प्रभाव उसपर पडेगा. स्यात कहीं ऐसा हो भी जाए कि बार-बार उसे ‘अहिंसक’ कहकर पुकारने से उसके मन पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़े कि उसके मन में कभी हिंसा का भाव आए ही न. राजपुरोहित के इस प्रयास में उनके दो-एक शिक्षक साथियों ने भी उनका साथ दिया. गुरुकुल के एक आचार्य ने अहिंसक की प्रारंभिक शिक्षा को संभाला और हर संभव प्रयास किया कि उसके मन में हिंसा का विचार कभी आए ही न. उसके आगे की शिक्षा पर दूसरे आचार्य ने मनोयोगपूर्वक ध्यान दिया. इसतरह उसके स्नातक के पूर्व की शिक्षा सम्पन्न हुई.

अहिंसक पढ़ने में बहुत तेज था. वह बहुत मेधावी भी था. हर विषय में उसकी प्रतिभा बढ़ी चढ़ी थी. चाहे शास्त्र चाहे शस्त्र, सबमें उसकी प्रतिभा अनूठी थी.

पुरोहित ने सम्राट से परामर्श कर अहिंसक को स्नातक की शिक्षा के लिए तक्षशिला भेज दिया. सम्राट एवं उनके दो-एक अन्य अधिकारियों के पुत्र-पुत्री भी स्नातक की शिक्षा के लिए वहीं जा रहे थे. उस समय उँची शिक्षा के लिए तक्षशिला विश्वविद्यालय ही एकमात्र ऐसा स्थान था जहाँ बहुत ही प्रतिभाशाली शिक्षक पढ़ाने का कार्य करते थे. दूर-दूर से प्रतिभाशाली विद्यार्थी उँची शिक्षा ग्रहण करने के लिए यहाँ आते थे.

विद्या के ये सभी अर्थी एक ही आचार्य के अधीन शिक्षा ग्रहण करने लगे.

कुछ ही समय में अहिंसक अपने गुरु का प्रिय हो गया. सीखने, समझने और मेधा में वह बहुत कुशाग्र था. अपने अन्य साथियों से वह हर बात में बढ़ा चढ़ा था. गुरु ही नहीं गुरु-पत्नी भी अहिंसक के सौम्य व्यवहार से बहुत प्रसन्न थीं. कोशल-राजकुमारी भी शस्त्राभ्यास अधिकतर अहिंसक के साथ ही करती थी. आचार्य के शिक्षालय में उसे अन्य शिष्यों की अपेक्षा अधिक सुविधाएँ उपलब्ध थीं. अहिंसक के साथ इन लोगों का अपनी अपेक्षा अधिक प्रिय व्यवहार और उसे उनसे अधिक सुविधाएँ दिए जाते देख उसके कुछ साथियों के मन में उसके प्रति ईर्ष्या होने लगी. उसके प्रति उनकी यह ईर्ष्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही चली गई. कभी कभी ये अहिंसक से उलझ भी जाते थे. लेकिन उससे पार नहीं पा पाते थे. कहते हैं उसमें सात हाथियों के बराबर का बल था.

जब अहिंसक को किसी भी तरह उसके साथी नीचा नहीं दिखा सके तब उन लोगों ने सोचा, क्यों न ऐसा प्रयास किया जाए कि आचार्य जी उसे दीक्षा ही न दें. इसके लिए वे उनके मन में उसके प्रति घृणा के भाव उत्पन्न करने की चेष्टा करने लगे. वे आए दिन गुरु के पास उसकी उलाहना लेकर आने लगे. ऐसी ऐसी उलाहनाएँ जो आचार्य के मन में अहिंसक के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करते थे. एक दिन इन लोगों ने उसपर यह भी दोष मढ़ दिया कि अहिंसक गुरुमाता के प्रति कुदृष्टि रखता है. वह आचार्य से अपने को अधिक बुद्धिमान भी समझता है.

अहिंसक के प्रति निरंतर इन उलाहनाओं को सुनकर गुरुजी के क्रोध का पारावार नहीं रहा. उनकी भौंहें क्रोध वमन करने लगीं. वह उसे कठोर दंड, कदाचित मृत्युदंड देने का अवसर ढूँढ़ने लगे. किंतु शिक्षक के रूप में वह ऐसा नहीं कर सकते थे. ऐसा करना संस्था के नियमों के प्रतिकूल तो था ही, उनकी प्रतिष्ठा के भी प्रतिकूल होता. अतः उन्होंने शिक्षा-सत्र के समाप्त होने की प्रतीक्षा की.

धीरे धीरे शिक्षा का सत्र समाप्त हुआ. आचार्य ने अहिंसक से कहा-

          “अहिंसक, अब तुम्हारी शिक्षा समाप्त हुई. गुरुदक्षिणा देने के लिए तत्पर हो जाओ”.

उस समय शिक्षा सम्पन्न हो जाने पर दीक्षा दी जाती थी. किंतु उसका स्वरूप आज के दीक्षांत जैसा नहीं था. उस समय जिस आचार्य के अधीन शिष्य शिक्षा ग्रहण करता था वह आचार्य ही उसे दीक्षा देते थे. और दीक्षा के लिए आचार्य को शिष्य द्वारा दक्षिणा देने की परंपरा थी. शिष्य आचार्य से पूछते थे- “गुरुजी, क्या देकर मैं आपको प्रसन्न करूँ”. और गुरुजी जो माँगते थे उसे उन्हें देना पड़ता था.

दीक्षा के लिए जब अहिंसक आचार्य के सामने आया तो गुरुजी ने उससे दक्षिणा में 1000 उँगलियाँ माँग लीं. गुरुजी किसी तरह उसे मारना चाहते थे. सोचा, उँगलियाँ इकट्ठा करने के लिए उसे अनेक हत्याएँ करनी पड़ेंगीं. ऐसा करने में वह स्वयमेव मारा जाएगा. और उनका प्रतिशोध भी पूरा हो जाएगा. उन्होंने अहिंसक से कहा-

“दक्षिणा में तुमसे मुझे मनुष्य के दाएँ हाथ की एक हजार उँगलियाँ चाहिए. और प्रत्येक उँगलियाँ अलग अलग मनुष्य की होनी चाहिए.”

उसके इर्ष्यालु साथियों ने जब यह सुना तो वे बहुत प्रसन्न हुए. उनकी मनोकामना पूरी हो रही थी. लेकिन गुरुमाता और राजकुमारी के हृदय को बहुत ठेस लगी. ये दोनों अहिंसक से बहुत स्नेह करतीं थीं. गुरुदक्षिणा में अहिंसक से गुरु की ऐसी माँग को लेकर वे भौंचक थीं. ऐसा क्या हो गया कि आचार्य अहिंसक के प्रति इतने असहिष्णु हो गए. अहिंसक के व्यवहार में पूरे सत्र में ऐसा कुछ नहीं दिखा जो आचार्य को रुष्ट करने का कारण बने. और किसी तरह उससे रुष्ट ही हो गए हों तो दीक्षा देने के लिए उसे हत्या की ओर उन्मुख करने की क्यों आवश्यकता आ पड़ी.

वे गुरुदक्षिणा में आचार्य की इस माँग को लेकर बहुत असहज थीं. उनके मन में विद्रोह के भाव उठने लगे थे. किंतु विश्वविद्यालय के नियम बहुत कठोर थे. उनके अभिभावक भी उनसे सहमत नहीं हो सकते थे.

आचार्य ने अहिंसक से दक्षिणा में जब मनुष्य की उँगलियाँ माँगी तो वह  हतप्रभ हो गया. स्तब्ध होकर आचार्य की ओर देखता रह गया. उसके नेत्रों में विस्मय और उदासी थी. नेत्रों के कोरों में आँसू की कुछ बूँदें छलक आईं थीं. वह समझ नहीं पा रहा था कि आचार्य ने उससे उँगलियाँ क्यों माँगी. इससे तो मेरे प्रति उनकी घृणा ही व्यक्त हो रही है. शस्त्र और शास्त्रज्ञान में उनको उसने कभी निराश नहीं किया. उनकी सेवा में उसने कोई त्रुटि नहीं की. हाँ अपने साथियों से अवश्य वह कभी कभी उलझ पड़ता था. पर इसमें भी उसके साथी ही उसे उलझने के लिए बाध्य कर देते थे. उनका चिढ़ाना कोई कबतक सहता रहे.

एक बार उसके मन में हुआ कि दक्षिणा में आचार्य की इस अव्यावहारिक माँग पर वह प्रश्न उठाए. पर कुछ सोचकर मौन रह गया. विशवविद्यालय के नियम आचार्य के ऐसी अव्यावहारिक माँगों पर कोई व्यवस्था नहीं देते.

वह संकल्प का पक्का था. अबतक वह विश्वविद्यालय के नियमों का पालन करता आया था. दीक्षा के नियमों के प्रति भी वह आदर ही बरतेगा. उसने सोचा- इस माँग के पीछे गुरुजी के मन में क्या है यह तो वह नहीं जानता पर दीक्षा पूरी तभी हो सकेगी जब गुरु द्वारा माँगी गई दक्षिणा दे दी जाए. वह यह दीक्षा पूरी करेगा ही. गुरु की आज्ञा का पालन करना धर्मानुकूल कहा गया है.

जब उसके माता-पिता को इसका पता चला तो वे बहुत उद्विग्न हो गए. उन्हें ज्योतिषी की भविष्यवाणी सचमुच में घटती प्रतीत हो रही थी. उन्होंने अभीतक अहिंसक से ज्योतिषी की भविष्यवाणी की चर्चा नहीं की थी. अब उन्हें उचित प्रतीत हुआ कि उसकी चर्चा अहिंसक से कर दें. अहिंसक ने इस भविष्यवाणी को सुना, पर विचलित नहीं हुआ. किंतु उसके नेत्र अदृष्ट में टिक गए. कुछ क्षण तक उसके चेहरे पर अनेक भाव चढ़े उतरे, फिर स्थिर हो गए. कदाचित उस क्षण उसके मन में जो भाव तिरे उनमें क्रोध और क्षोभ दोनों का मिश्रण था. उसके मन में अपने साथियों के प्रति एक क्षण के लिए वितृष्णा उत्पन्न हो गई. उसके अधरों के हलचल और उससे खिंची कपोल की रेखाओं में यह स्पष्ट दिखा. उसके विषण्ण चेहरे पर उसका क्षोभ भी स्पष्ट दिख रहा था-

          “माता-पिता ने इस तथ्य से मुझे अवगत नहीं कराया. किंतु मुझे अवगत कराके वे करते भी क्या. अवगत कराने पर यह भी हो सकता था कि शिक्षा ग्रहण करने के लिए मैं तक्षशिला तक पहुँच ही न पाता. तक्षशिला भेजने के पूर्व पिता ने मुझे योग्य गुरुओं के पास रखा. इन गुरुओं के पास रहकर मेरे मन में अनूठे-अनूठे भावों का संचार हुआ. किसीको हानि पहुँचाने की बात मैंने कभी सोची ही नहीं. हाँ कभी कभी क्रोध अवश्य आता था और मैं कभी बहुत उग्र भी हो जाता था पर किसी पर प्रहार कर उसे चोट पहुँचाने की बात मेरे मन में कभी नहीं आई. अब जब दक्षिणा के लिए 1000 उँगलियाँ इकट्ठी करनी हैं तो मुझे लोगों को गहरी चोटें पहुँचानी पड़ेंगी. इसके लिए उनकी हत्या भी करनी पड़ेगी.”

यह सोच कुछ पल के लिए वह बहुत उद्विग्न हो उठा. क्या भवितव्य लेकर उसने जन्म लिया है.

उसके माता-पिता से उसकी यह उद्विग्नता देखी नहीं जा रही थी. पर साहस भी नहीं हो पा रहा था कि वे उससे कुछ कहें. माता के नेत्रों में तो रुँधे आँसू पछाड़ खा रहे थे. पर पिता ने साहस किया.

“पुत्र, अदृष्ट को कदाचित तुमसे यही कराना अभीष्ट है. दीक्षा लेनी है तो गुरु को यह भेंट देनी ही पड़ेगी. दीक्षा देने में असमर्थ होने पर दीक्षा के लिए राजा से धन माँगने का विधान है. पर यहां तो कटी हुई उँगलियाँ जुटानी है. यह अमानुषिक कार्य है. सम्राट तो इसके लिए तुम्हें अनुमति भी नहीं दे सकते. उलटे ऐसा करने से रोकने के लिए तुम्हें कारागार में डलवा सकते हैं. हाँ एक विकल्प है तुम्हारे पास, दीक्षा तुम लो ही न. यह निर्णय तुम्हें ही करना पड़ेगा. हम चाहते हैं तुम जो भी निर्णय लो पूरे मन से लो. स्मरण करो, पिता की आज्ञा के पालन में भगवान परशुराम ने थोड़ा भी आगा-पीछा नहीं किया था. अपने फरसा के एक ही प्रहार से उन्होंने अपनी माता का सिर उनके धड़ से अलग कर दिया था. उन्होंने परिणाम की थोड़ी भी परवाह नहीं की थी. तब भगवान परशुराम को समाज का सामना नहीं करना पड़ा था किंतु आज तुम्हें लोगों का और स्वयं राज्यशक्ति का भी सामना करना पड़ेगा.”

पिता की बातों से उसे थोड़ा तोष हुआ. उसने मन बना लिया कि दीक्षा लेनी है तो आचार्य की आज्ञा का पालन करना ही होगा. और वह आचार्य द्वारा माँगी गई भेंट को जुटाने के लिए उद्यत हो गया.

उँगलियाँ इकट्ठा करने से पूर्व उसने पिता से परामर्श किया. क्यों न पहले कुछ प्रबुद्ध लोगों से उनकी सहमति लेकर उनकी एक उँगली माँगने की चेष्टा की जाए.

पिता से उत्तर मिला- “पुत्र, यह राजा शिवि का युग नहीं है”.

अंततः दीक्षा के लिए उँगलियाँ इकट्ठी करने का ध्येय अहिंसक के मन में दृढ़ हो गया. इसके लिए उसने ऐसे स्थान को ढूँढ़ा जहाँ से यात्रियों को मारकर वह उनकी उँगली भी काट ले और वह किसी की पकड़ में भी न आ सके. इस हेतु उसे कोशल महाजनपद के सावत्थी (श्रावस्ती) का जंगल अधिक सुरक्षित लगा. सावत्थी कोशल जनपद की राजधानी थी और मगध की सीमा से सटे मल्लगण से कुछ ही दूरी पर थी, घने जंगलों से घिरी (आज के गोरखजपुर और बस्ती जनपद के बीच कहीं, तब यह क्षेत्र घोर वनाच्छादित था). जंगल में घनी झाड़ियों से अटे एक स्थान पर उसने अपना अड्डा जमाया और अपना वांछित कार्य करने लगा. वह जंगल से होकर हाट-व्यापार के लिए जाने वालों, यहाँ तक कि तीर्थयात्रियों की भी हत्या करने लगा और उनकी उँगलियाँ काटकर वापस जंगल में लुप्त होने लगा. उसने हत्या करने के लिए हर तरह के अस्त्र–शस्त्र - तलवार, तीर धनुष आदि अपने पास रख छोड़े थे. जब पथिक जंगल से होकर जाना बंद कर देते तब वह निकट के पुरवासियों के घरों पर आक्रमण कर उनके परिवार वालों की हत्या कर उनकी उँगलियाँ काट लेता.

जब वह प्रथम उँगली के लिए एक पथिक की हत्या करने चला था तो उसे लगा था कि उसका हृदय जैसे विद्रोह कर देगा. उसने कभी कोई हत्या नहीं की थी. पल भर के लिए उसके भागते डग शिथिल होते होते रह गए थे. उस क्षण उसे अपने मन को कड़ा करना पड़ा था. मन कड़ा करने में ही उसके हाथ से तीर चल गया था और पथिक ढेर हो गया था. घायल पथिक की छटपटाहट देख उसे मूर्च्छा सी आने को हुई थी. वह कभी किसी व्यक्ति को पीड़ा से छटपटाते नहीं देखा था. पीड़ित की चीख ने उसके हृदय को मानो चीर दिया था. पर तत्क्षण उसके मन में गुरु को दीक्षा देने की विवशता सामने तड़ित सी झलकी मार गई थी. वह शीघ्र ही संभल गया था. प्रतिज्ञा मनुष्य से क्या-क्या नहीं करा लेती है.

इसके बाद क्रूरता जैसे उसकी संगिनी हो गई.

पहले तो लोगों ने इसे अप्रत्याशित आक्रमण समझा. पर जब आए दिन हत्याएँ होने लगीं और गाँव-घरों में भी घुसकर निर्दोष गृहस्थ परिवारों की  हत्या कर उनकी उँगलियाँ काटी जाने लगीं तब लोगों की समझ में आया कि ये हत्याएँ संज्ञान में की जा रही हैं. क्योंकि इसमें लूट की घटनाओं के चिह्न नहीं थे. तब इन अप्रत्याशित और आपात घटनाओं के प्रति लोग सतर्क हो गए. धीरे धीरे उन लोगों ने पता भी लगा लिया कि ये हत्याएँ एक डाकू कर रहा है. किसीने यह भी लक्ष्य कर लिया कि वह डाकू उन काटी गई उँगलियों की एक माला बनाकर अपने गले में पहन रखा है. उस दिन से वह लोगों में अंगुलिमाल के नाम से जाना जाने लगा.

अंगुलिमाल की क्रूरता का ओर नहीं था. वह उंगलियों को काट कर उनकी गिनती ठीक रहे इसके लिए वह उन्हें वृक्षों की डालों पर एक जंगली डोर से बाँधकर टाँग देता था. किंतु वन की चिड़ियाँ उनका मांस खाने के लिए उसे बिखेर देती थीं. इससे जब उँगलियों की गिनती में अव्यवस्था होने लगी तब उसने उन उँगलियों को वन की एक पतली और दृढ़ लत्तर में बाँधकर माला बनाकर उसे गले मे पहन लिया था..

अंगुलिमाल के इस कृत्य से पुरवासी भयाक्रांत हो उठे थे. लोगों में भीतर तक डर समा गया था. प्रत्येक क्षण वे अपने और अपने परिवार को असुरक्षित मानने लगे थे. बुद्ध की देशनाओं में जब वे बैठते थे तो इसी अँगुलिमाल का भय उन्हें सताता रहता था. वे देशना को भयोद्विग्न मन से ही सुनते थे. जब उन्होंने किसी भी तरह इस संकट को टलते नहीं देखा तो अपनी रक्षा के लिए सम्राट से याचना की. और आए दिन हो रही इस घटना की समूची कहानी बताई. सम्राट को लोगों ने यह भी बताया कि उनके सैनिकों ने बहुत प्रयास किया पर इस हत्या को वे रोक नहीं सके. सम्राट ने सुना और एक बड़ी सेना लेकर वह लअंगुलिमाल को मारने के लिए चल पड़े.

तथागत बुद्ध की धर्म-देशना उस जंगल के निकट के ही एक गाँव में हो

रही थी जो अंगुलिमाल के विचरण-क्षेत्र से बहुत दूर नहीं था.

जब तथागत को अंगुलिमाल के संबंध में कुछ पुरवासियों से और कुछ उनके अपने अंतर्ज्ञान से सारी स्थिसि समझ में आ गई तब वह बिना किसी से कुछ कहे जंगल के पथ पर आगे चल पड़े.

पुरवासियों ने समझा कि तथागत दैनिक भ्रमण के लिए निकल रहे हैं. कुछ दूर जाएँगें फिर लौट आएँगें. किंतु उनके कुछ दूर जाने के बाद उन्होंने लक्ष्य किया कि तथागत जिस पथ पर अग्रसर हो रहे हैं वह तो अंगुलिमाल के विचरण-क्षेत्र की ओर जाता है. उन्होंने तथागत को सावधान किया. “भगवन, उस ओर ही डाकू अंगुलिमाल का बास है. वह आपको पाएगा तो मार डालेगा. बहुत निर्मम है वह. उधर आप मत जाइए. शिष्यों ने भी उन्हें रोका.

लेकिन तथागत नहीं माने. तथागत ने उन लोगों से कहा- “मुझे रोको मत. आज मैं रुक गया तो अनर्थ हो जाएगा.

जब वह नहीं माने तो कुछ शिष्य उनके साथ हो लिए. किंतु तथागत ज्यों ज्यों घने बीहड़ में आगे बढ़ते गए, शिष्य धीरे धीरे कम होने लगे. तथागत जब अंगुलिमाल के निकट पहुँचे तब वह अकेले थे.

उधर उसकी माँ भी उससे मिलने के लिए चल पड़ी थी. उसे मारने लिए सम्राट के एक बड़ी सेना लेकर चल पड़ने की सूचना उसे सूचना देने के लिए..

इधर अंगुलिमाल चौकन्ना हो जंगल से होकर जाने वाले बाटों को देख रहा था. उसे एक बाट से उसकी माँ आती दिखी. अपनी माँ को अपनी ओर आते देख वह कुछ सोच में गड़ गया. विधाता ने क्या लिख रखा है मेरे लिए. एक हजारवीं उँगली के लिए अन्य कोई नहीं मिला तो मुझे अपनी माँ की भी हत्या करनी पड़ सकती है. एक पल के लिए लाल डोरों से पटे उसके नेत्रों में माँ की वह गोद स्मरण हो आई जिसमें उसने कभी किलकारी मारी थी. जिसके अधरों के स्पर्श से उसके कपोलों में स्नेह का संचार हो उठता था, एक गुरु को दिए वचन से बँधा मुझे माँ की भी हत्या करनी पड़ेगी. ऐसा उसके मन में होते ही उसके नेत्रों से अश्रु की कुछ बूँदें उसके कपोलों पर ढुलक आईं.

तभी अन्य मार्ग से आते एक बटोही उसे दिख गया जो कदाचित उसी की ओर आ रहा था. वह कोई बटोही नहीं, स्वयं तथगत थे.

अंगुलिमाल तथागत के आने के प्रति अनभिज्ञ था. उसने समझा कोई पथिक आ रहा है. वह प्रसन्न हुआ कि अब उसे एक हजारवीं उँगली पाने की प्रतीक्षा में अपनी माँ की हत्या नहीं करनी पड़ेगी.

वह उस पथिक की ओर झपटा. किंतु कुछ निकट आने पर उसने देखा, वह उसी की ओर आ रहा है. उसकी चलने की गति देखकर थोड़ा अचंभित हुआ. कोई भूले भटके ही इधर आता है, वह भी चौकन्ना और भयभीत हुआ-सा. पर इसके शरीर में तो तनिक भी भय के चिह्न नहीं दिखाई देते. यह चौकन्ना हुआ आगे नहीं बढ़ रहा है. उसकी चाल में एक मतवालापन है. फिर भी उसने पथिक को तेज स्वर में टोका-

“ऐ पथिक”.

यह कड़क स्वर सुन बुद्ध पीछे मुड़े तो देखा, सामने एक काला पहाड़-सा विकराल व्यक्ति खड़ा है. और अंगुलिमाल ने देखा, यह कोई पथिक नहीं, एक संन्यासी है. इसके मुख पर शांति के भाव छलक रहे हैं.. उसकी समूची देह में एक सरलता खेल रही है. यह किसी सामान्य पुरुष की अपेक्षा प्रभावान है. इसके साथ एक आभामंडल-सी है. यह देख कुछ क्षण के लिए वह अपनी क्रूरता को भूल गया. उसने सोचा- “यह संन्यासी किसी अन्य देश से आया प्रतीत होता है, तभी यह मेरे भय से अपरिचित है. इसे सावधान कर देना चाहिए. मैं तो अपनी क्रूरता के लिए तो अभिशप्त हूँ किंतु इस संन्यासी के निश्छल भाव को देखकर इस संन्यासी पर हथियार चलाना मुझे उचित प्रतीत नहीं होता“. यह सोच उसने संन्यासी को चेतावनी दी.

         “संन्यासी, क्या तू नहीं जानता कि यह अंगुलिमाल का क्षेत्र है? मैं अंगुलिमाल हूँ. मैं स्वभाव से क्रूर हूँ. जो भी इधर आता है मैं उसे मार डालता हूँ. लगता है तू इधर भटक कर आ गए हो.”

“अंगुलिमाल, मैं भटककर इधर नहीं आया हूँ. मैं स्वयं अपनी इच्छा से तुम्हारे पास आया हूँ. मैं तुम्हें जानता हूँ. हत्या को तुमने अपना धर्म बना लिया है. पर हत्या करना तुम्हारा स्वभाव नहीं है, यह भी मैं जानता हूं. मुझे यह भी ज्ञात है कि आज किसी की हत्या कर तू 1000 वीं उँगली अपनी उँगलियों की माला में जोड़ने वाले हो. तुम्हें 1000 उँगलियाँ अपने गुरु को दक्षिणा में देनी है. तुम मुझे नहीं जानते. मैं गौतम बुद्ध हूँ. अबतक तू निर्दोषों की हत्या करता रहा है शिकार की तरह. तुम मेरी हत्या कर उस 1000 वीं उँगली को प्राप्त करो. उँगलियाँ प्राप्त करने के लिए प्रारंभ में तूने लोगों से स्वेच्छा से उँगलियाँ देने की प्रार्थना की थी. मैं स्वेच्छा से तुम्हें अपनी उँगली देने आया हूँ. यही इच्छा लेकर तुम्हारी माँ भी तुम्हारे पास आनेवाली है. किंतु मैं नहीं चाहता कि तुम मातृहंता बनो. अभीतक तुम पूर्ण पापी नहीं बन सके हो. माता की हत्या कर तुम पूर्ण पापी बन जाओगे. जिसकी कहीं क्षमा नहीं हो सकेगी.“

अंगुलिमाल बुद्ध की ये बातें सुनकर चौंका. इस संन्यासी को तो सबकुछ पता है. उसके प्रभाव को एक ओर झिटक कर बोला-

“संन्यासी, मैं किसी बुद्ध को नहीं जानता. मैं केवल अपने गुरु को जानता हूँ. प्रारंभ में लोगों ने मुझे उँगलियाँ नहीं दी इस कारण मैं हत्या में प्रवृत नहीं हुआ हूँ. मुझे ये 1000 अँगलियाँ अपने गुरु को दक्षिणा में देनी हैं. इस समय मुझे एक ही धुन है, 1000 वीं उँगली को प्राप्त करने की. तेरी बातें सुनने में अच्छी लगती हैं किंतु मैं अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हट सकता. किंतु तुम्हें मारना भी नहीं चाहता. अतः मैं पुनः कहता हूँ तू चला जा. मैं किसी और को मारकर 1000 वीं उँगली प्राप्त कर लूँगा.”

अंगुलिमाल तथागत को नहीं जानता था. उनके संबंध में हवा में तिरती सूचनाएँ भी उस तक नहीं पहुँच सकीं थीं हालाँकि सम्राट प्रसेनजित तक बुद्ध के सावत्थी में आने की सूचना हो चुकी थी. वास्तव में तक्षशिला में अंगुलिमाल जब अभी अहिंसक नाम से ही स्नातक का छात्र था बुद्ध अभी गौतम ही थे. वह अभी बुद्ध नहीं हुए थे. उन्हें 43 वर्ष की अवस्था में बुद्धत्व की प्राप्ति हुई. उस समय अंगुलिमाल वनस्थ हो गया था.

बुद्ध ने कहा-

“मैं यहाँ से जाने के लिए नहीं आया हूँ. मैं तुझसे पुनः कहता हूँ. तू मुझे मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर.“

“तू नहीं मानता, तो ठहर मैं अभी तुझे मारता हूँ. “

अंगुलिमाल खाँड़ लेकर संन्यासी को मारने दौड़ा. लेकिन यह देखकर वह अचंभा में पड़ गया कि जितना ही वह संन्यासी की ओर दौड़ रहा है संन्यासी से उसकी दूरी कम नहीं हो रही. तेज गति से भागने वालों को भी दौड़ कर पकड़ते उसे देर नहीं लगती थी. पर इस संन्यासी को वह नहीं पकड़ पा रहा है. उसे लगा, जितना वह संन्यासी की ओर भाग रहा है संन्यासी भी उसी गति से पीछे की ओर भाग रहा है. (बुद्ध ने अपनी अंतर्शक्ति के बल पर उसे एक विभ्रम में डाल दिया था.)

वह क्रोध से चिल्लाया-

“संन्यासी, तू कह रहा है कि तुझे मारकर मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूँ,

और मैं तुझे मारने चला तो तू पीछे भागता जा रहा है. “

बुद्ध बोले, “मैं कहाँ भाग रहा हूँ. मैंने तो वर्षों पहले भागना छोड़ दिया. मैं  अब पूर्णतः स्थिर हूँ. भाग तो तुम रहे हो. तुम अपने अंदर ढूँढ़ के देखो. तुम्हारा मन चौबीसों घड़ी भाग रहा है. भाग कर मुझे पकड़ो और मारो. हाँ, मुझे मारने के पूर्व तुम मेरा एक कार्य कर दो.“

          “ कहो.”

          “उस वृक्ष की एक पत्ती तोड़ो.”

अंगुलिमाल ने पास के वृक्ष की डाल से एक पत्ती तोड़ी और बुद्ध को देने के लिए हाथ बढ़ाया. बुद्ध ने कहा,

“इसे मुझे मत दो. इसे तुम पुनः उस डाल से उसी स्थान पर जोड़ दो जहाँ से उसे तोड़े हो.”

   “यह कैसे हो सकता है. जो पत्ती टूट गई उसे पुनः जोड़ा नहीं जा सकता.“

बुद्ध ने कहा-

“डाल से तुम पत्ती तोड़ सकते हो किंतु उस पत्ती को उस डाल के उसी स्थान पर तुम जोड़ नहीं सकते. तो सोचो, जिस जीवन को तुम पुनः दे नहीं सकते उसे तुम छीन कैसे सकते हो.”

बुद्ध द्वारा ये वाक्य ऐसे समस्वर में कहे गए थे कि इसकी चोट सीधे उसके हृदय पर पड़ी. उसकी हृत्तंत्री झंकृत हो उठी. यह झंकृति अंगुलिमाल के पोर-पोर, रंध्र-रंध्र को बेध गई. उनके उस मर्मस्पर्शी स्वर को सुन वह अंतर्विमुग्ध अवाक रह गया. ऐसी अनुभूति उसे इसके पहले कभी नहीं हुई थी. बुद्ध की बातें सुनकर उसके शरीर के अणु-अणु में न जाने क्या होने लगा कि उसके कठोर शरीर में मृदुता आने लगी, उसका तना-अकड़ा शरीर ढीला पड़ने लगा. उसके मुखमंडल पर स्पष्ट दिख रहे तनावों की बंकिम लकीरें शिथिल होने लगीं. बुद्ध को मारने को उठा हाथ उठा ही रह गया. ढीली होती उँगलियों से खाँड़ भूमि पर गिर गया. उसका शीश झुकने लगा. वह निढाल हो गया और अंततः उसका शीश बुद्ध के चरणों में झुक गया. कुछ ही भणों में वहाँ बहुत कुछ घट गया. जो अंगुलिमाल कभी खूंखारता का पर्याय होता था वह अब सरलता की मूरत लग रहा था. उसके भीतर घट चुकी अतींद्रिय अंतर्घटना ने उसमें बुद्ध का शिष्य बनने की लालसा भर दी. उसके मुँह से सहसा फूट पड़ा-

“भगवन, अंगुलिमाल आपके चरणों में है. आप मुझे अपनी शरण में ले लें, मुझे अपना शिष्य बना लें.”

और करुणावान तथागत ने उसे अपना शिष्य बना लिया.

उस समय प्रकृति भी मनोहर हो उठी थी. अंगुलिमाल की क्रूरता से वन के जिन पत्थरों, वृक्षों, वृक्षों की पत्तियों, फुनगियों और झाड़ियों में मृत्यु का ग्रास बने लोगों की अनवरत चीखों, चीत्कारों ने घुलकर उन्हें कठोर बना दिए थे उनमें अब मर्मर ध्वनि की अनुगूँज भरने लगी. धीरे धीरे मंद मंद हवाओं के स्फुरण से वन की हरीतिमा मनोमय हो रही थी.

जब उसकी माँ वहाँ पहुँची, अंगुलिमाल तथागत का शिष्यत्व ग्रहण कर चुका था.

-----शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

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गूगल ने मशहूर भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की 103वीं जयंती निराले अंदाज़ में मनाई। इस खास दिन को यादगार बनाने के लिए गूगल ने तीन महिलाओं की एक साधारण सी दिखने वाली तस्वीर को डूडल के रूप में पेश किया है। आज भी अमृता शेरगिल को भारत की श्रेष्ठतम महिला चित्रकार के रूप में देखा जाता है।

स्मरणीय है कि अमृता शेरगिल की गणना एक असाधारण प्रतिभाशाली कलाकार के रूप में की जाती है। पेरिस में लगने वाली ग्रैंड सेल में एक एसोसिएट के रूप में चुनी गईं वे न केवल एक युवा कलाकार थीं बल्कि एकमात्र एशियाई कलाकार भी थीं। उनके चित्र पाश्चात्य चित्रकला पद्धति की नायाब मिसालों की मानिंद हैं। मनोभावों की गहराई और रंगबोध की ऊंचाई उनके चित्रों में साथ-साथ महसूस जा सकती हैं। 

गौतलब है कि अमृता के भीतर के चित्रकार को उनकी माँ ने बहुत जल्द ताड़ लिया था। उन्होंने अमृता को भरपूर प्रोत्साहित किया। यही कारण है कि अमृता को दुनिया के कई महान चित्रकारों का मार्गदर्शन मिल सका। वे यूरोप में रहीं किन्तु भारत लौटने के बाद ही उनकी प्रतिभा को नई पहचान मिली। उन्होंने तय किया कि अपनी पैनी नज़र और अपने हुनर से वह भारतीय जीवन के विविध रंगों की उभारेंगी फिर क्या, उन्हें कामयाबी मिलती गई। यह अकस्मात् नहीं  है कि भारत सरकार में उनके चित्रों को 'राष्ट्रीय कला संग्रह' के रूप में मान्यता दी है। उनके अधिकतर चित्र नई दिल्ली की 'राष्ट्रीय आधुनिक कलादीर्घा' में रखे पूरी गरिमा के साथ गए हैं। 

बहरहाल हम बात कर रहे थे गूगल की। दिवसों, पर्वों और महत्वपूर्ण अवसरों को लोगों के दिलोदिमाग में उतारने के लाज़वाब जुनून के चलते एक बार फिर इस मशहूर सर्च इंजन ने कमाल कर दिया। गूगल ने अपने होमपेज पर चित्रकार अमृता शेरगिल का शानदार डूडल बनाया। सबसे खास बात तो यह है कि यह होमपेज सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में देखा जा सका। जैसा कि पहले ही कहा गया कि आज अमृता शेरगिल इस दुनिया में न होते हुए भी देश के बड़े संग्रहालयों में अपनी मौजूदगी जता रही हैं। 30 जनवरी 1913 को बुडापेस्ट (हंगरी) में जन्मीं अमृता के पिता उमराव सिंह शेरगिल सिख और मां मेरी एंटोनी गोट्समन हंगरी मूल की यहूदी थीं। 

अमृता के पिता संस्कृत-फारसी के विद्वान व नौकरशाह और माता एक मशहूर गायिका थीं। अमृता बचपन से ही कैनवास पर छोटे छोटे चित्र उकेरनी लगी थी। इसके बाद वह अपने माता पिता के साथ 1921 में शिमला आई लेकिन फिर वह मां के साथ इटली गई, लेकिन 1934 में फाइनली वह भारत लौटीं। इसके बाद यहां पर उनकी चित्रकारी का सफर काफी तेजी से चल पड़ा। 1935 शिमला फाइन आर्ट सोसायटी की तरफ़ से सम्मान, 1940 में बॉम्बे आर्ट सोसायटी की तरफ़ से पारितोषिक से नवाजी गईं। इसके अलावा उन्हें कई अहम अवार्ड मिले। 

28 वर्ष की उम्र में अचानक से बीमार होने के बाद इस दुनिया को अलविदा कहने वाली अमृता ने इस दुनिया को काफी खूबसूरत चित्रकारी दी। अमृता शेरगिल ने कैनवास पर भारत की एक बड़ी ही खूबसूरत तस्वीर को अपनी कला के बल पर उकेरा। भारतीय ग्रामीण महिलाओं को चित्रित करने के साथ भारतीय नारी की वास्तविक स्थिति को उकेरना उनकी चित्रकारी की एक मिसाल है। हंगरी में जन्म लेने के बावजूद यह सचमुच बड़ी बात है कि उनकी चित्रकारी में भारतीय संस्कृति और उसकी आत्मा साफ झलक मिलती है। 

वैश्विक सर्च इंजन गूगल डूडल के जरिए भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की 103वीं जयंती मनाने का मौका वास्तव में उम्दा है। याद रहे कि  उनकी कला की विरासत को 'बंगाल पुनर्जागरण' के दौरान हुई उपलब्धियों के समकक्ष रखा जाता है। इतना ही नहीं, उन्हें भारत का सबसे महंगा महिला चित्रकार भी माना जाता है। 20वीं सदी की इस प्रतिभावान चित्रकार को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने सन् 1976 और 1979 में भारत के नौ सर्वश्रेष्ठ कलाकारों की फेहरिस्त  में शामिल किया था।

अमृता बचपन से ही कैनवास पर छोटे छोटे चित्र उकेरनी लगी थी। लाहौर में रहते हुए अमृता शेरगिल ने 5 दिसंबर 1941 को दुनिया को अलविदा कह दिया था, लेकिन अपनी चित्रकला की अनंत छवियों के साथ वे आज भी कला रसिक हृदयों की मल्लिका बनी हुई हैं। 

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राजनांदगांव

मो.9301054300

 

भारत का अगला क्रांतिकारी चरण तकनीकी के वेश मे पदार्पण करेगा - ललित याज्ञिक

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 अंतर्राष्ट्रीय आईटी विशेषज्ञ ललित याज्ञिक से हरिहर झा की बातचीत

ठीक ही कहा है, भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। उसे दूर करने के उपाय ढूंढने में लग जाना चाहिये। लेकिन क्या इस क्षेत्र में तकनीकी कुछ मदद कर सकती है? इतिहास साक्षी है छोटे-मोटे तकनीकी-नवीनीकरण का श्रेय भले व्यापार-विश्लेषण को जाता है पर शत-प्रतिशत नवीनीकरण में सफलता तब मिली

ठीक है जब हालात से चिढ़ी हुई जनता को तकनीकी विशेषज्ञों की टीम का सहारा मिला हो। तो तकनीकी क्षेत्र के दुरूह प्रश्नों के जवाब के लिये हम श्री ललित याज्ञिक से रूबरू होते हैं जो उभरती तकनीकी को उपयोग में लाने के विशेषज्ञ हैं। ललित आईटी के क्षेत्र में व्यवसायिक समस्याओं के सलाहकार हैं। आईबीएम की ‘स्मार्टर प्लेनेट सोल्यूशन्स’ टीम जो भारत, आस्ट्रेलिया और पूर्वी यूरोप आदि देशों में विकास के व्यवसाय से संबंध रखती हैं, उसमें कार्यकारी शिल्पकार हैं तथा आईबीएम एकेडमी ऑफ़ टेक्नोलोजी में तकनीकी नेतृत्व की टीम के सदस्य हैं और दक्षिण पूर्वी एशिया के राष्ट्रीय संघ (ॠच्कॠग़्) में तकनीकी विशेषज्ञों की काउन्सिल के चेयरमेन हैं।

एक शिक्षक-पुत्र होने के नाते आपने ज्ञान अर्जित किया और बाँटा। सरकारी विभागों में याने बेहरीन, भारत और सिंगापुर के विभागों में, औद्योगिक प्रतिष्ठानों में और विश्वविद्यालयों में। सीखने के जुनून में आपने इन देशों में अनेक बार यात्रा की। क्योंकि जैसा कि ऊपर लिखा है इन क्षेत्रों में श्री याज्ञिक अत्याधुनिक तकनीकी में आईटी व्यापार की समस्या-विश्लेषण के लिये कार्यकारी शिल्पकार हैं, आईबीएम के विकास बाजार में। और अब 40 हजार सदस्यों से बनी आईबीएम एशिया पेसिफिक आईटी के विशेषज्ञों की टीम का नेतृत्व कर रहे हैं

1976 में कम्प्यूटर का क्षेत्र भारत में नया-नया था तब बिट्स पिलानी से कम्प्यूटर विज्ञान में परास्नातक डिग्री प्राप्त की और बेहरीन की सरकार ने अपने विभागों के कार्य को स्वतः याने कम्प्यूटर चालित करने व ई-शासन की स्थापना के लिये इन्हें सलाहकार नियुक्त किया। शैक्षणिक संस्थाओं से कोई नाता तो न था पर सीखने और बाँटने की रुचि ही थी जो आपको वहाँ के एकमेव विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम निर्धारण के लिये ले आई तथा आप ‘बेहरीन कम्प्य़ूटर सोसाइटी’ के संस्थापक सदस्य बने। यही धुन थी कि परास्नातक की दूसरी डिग्री उदयपुर से लेने के 30 साल बाद ङग्क्ष्च्र् से तीसरी परस्नातक डिग्री प्राप्त की।

1985 में आपको आईबीएम आस्ट्रेलिया द्वारा सिस्टम इंजीनियर नियुक्त किया गया, नई तकनीकी को मूर्तरूप देने के लिये। यहाँ भी मोनाश विश्वविद्यालय ने आपको अतिथि- व्याख्याता के रूप में आमन्त्रित किया। तत्पश्चात सिंगापुर की सरकार ने सिंगलैब द्वारा, जो कि एक संयुक्त उद्यम है, आपको तकनीकी परामर्श में सक्षम करने के लिये बुलाया। आपका कार्य सिंगापुर, भारत, चीन व आस्ट्रेलिया से योग्य व्यक्तियों का चयन कर तकनीकी में नवीनीकरण की सुविधा प्रदान करवाना था।

1985 में आपको आईबीएम आस्ट्रेलिया द्वारा सिस्टम इंजीनियर नियुक्त किया गया, नई तकनीकी को मूर्तरूप देने के लिये। यहाँ भी मोनाश विश्वविद्यालय ने आपको अतिथि- व्याख्याता के रूप में आमन्त्रित किया। तत्पश्चात सिंगापुर की सरकार ने सिंगलैब द्वारा, जो कि एक संयुक्त उद्यम है, आपको तकनीकी परामर्श में सक्षम करने के लिये बुलाया। आपका कार्य सिंगापुर, भारत, चीन व आस्ट्रेलिया से योग्य व्यक्तियों का चयन कर तकनीकी में नवीनीकरण की सुविधा प्रदान करवाना था।

दृष्टि में इन दोनों क्षेत्रों में अगले 5 से 10 साल में भारत का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। क्योंकि भारत ने एक स्थायी वैश्विक आईटी समाधान प्रदाता के रूप में स्वयं को साबित किया है। कम लागत पर विशाल प्रतिभा-पूल उपलब्ध हो जाना दुनिया की सभी कंपनियों के लिये आकर्षण ही नहीं बल्कि एक आवश्यकता है, आज के लागत- प्रभावी बाजार के समाधान के लिए। स्पष्ट शब्दों में कहें तो लागत की बचत और क्ष्क्च्र् (सूचना और संचार प्रौद्योगिकी) की समस्या- समाधान पर केन्द्रित आज के विश्व में कोई भी कंपनी भारत को शामिल किये बिना अपना गुजारा नहीं चला सकती। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि विधिवत मॉडल द्वारा भारत को शामिल न करने की कोशिश भी की गई किन्तु भारत के पास जो अँगरेज़ी बोलने वाली आईटी प्रतिभा का क्रांतिक समूह है उसकी कोई देश लगभग रूप में भी बराबरी नहीं कर सकता। किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि भारत को सफलता की गारंटी मिली हुई है। कंपनियों, शैक्षिक संस्थानों तथा केन्द्र और राज्य की सरकारों को अपने वैश्विक ग्राहकों (विशेषतया अन्यत्र चले जाने वाले जोख़िम-ग्राहकों) के लिये अपने मूल्य-सृजन की ड्राइव में सुधार करने के लिए निरंतर प्रयास करना आवश्यक है।

दूसरी श्रेणी में घरेलू याने भारत की कम्पनियां, सरकारें, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्र में आईटी अंगीकृत करने की तथा प्रगति की रफ्तार को पकड़ पाने में गति धीमी रही है। जो प्रतिभा भारत में सुलभ है उसकी तुलना में विकास बहुत ही कम हुआ है। यह हाल वैसा ही है कि गंगा आँगन में और घर के लोग प्यासे। इतना अवश्य कह सकते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब भारत के विकास बाजार में आ चुकी हैं जिससे आईटी कंपनियां भारत के बाजार को गंभीरता से ले रही हैं वर्ना तो वे ग्राहकों की खोज में केवल यूरोप और अमेरिका की तरफ टकटकी लगाये हुये थी।

इसका एक अच्छा परिणाम यह है कि जब इन कंपनियों ने एक बार भारत में बाजार के अवसर को पहचान लिया है तो आईटी के लिये प्रारूप के साथ मजबूत समाधान देना मुश्किल न होगा क्योंकि ललित याज्ञिक, 2015 में टेक्नो एन.जे.आर. प्रौद्योगिकी संस्थान, उदयपुर ऑस्ट्रेलियाई आईटी विशेषज्ञों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुये।

वो दुनिया के समक्ष बहुत बार ऐसा कर चुकी है अतः भारत में निश्चय ही आईटी-प्रसारण की उम्मीद रखी जा सकती है। पर आलोचकों का तर्क है कि भारत में व्यापार, सरकार और सामाजिक क्षेत्र में हर जगह याने सिस्टम की शुद्ध आवश्यकता में भी समझौतावादी ‘चलेगा’ वाली आदत गुड़ गोबर कर देगी। यह तो समय ही बतायेगा कि गुड़ गोबर किस प्रकार का होगा? लेकिन लगता है वह होगा एक शराबी की राह की तरह याने 5 कदम आगे फिर 4 कदम पीछे और इस तरह भी मंजिल मिल ही जायगी।

हरिहर : एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपने व्यापक अनुभव के आधार पर आप यह बतलायें कि चीन के तकनीकी नवीनीकरण या नवाचार की तुलना में भारत की क्या स्थिति है? भारत के पास प्रजातन्त्र और अँगरेज़ी भाषा, दो अस्त्र होते हुये भी क्या आपको लगता है कि लोकतंत्र भारत की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहा है?

ललित याज्ञिक : भारत में प्रौद्योगिकी-नवीनीकरण परंपरागत रूप से आईटी सेवाओं के वितरण और मुख्यतया अनुप्रयोगों के प्रबंधन और नए विकास में किया गया है और जैसा कि हम जानते हैं कि बहुत सी शोध और विकास की लैब और बहुराष्ट्रीय कंपनियां किस तरह प्रतिभावान और योग्य भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियरों से लाभान्वित हुई हैं पर अब वे ही वैज्ञानिक और इंजीनियर लम्बे समय तक अमेरिका में रहने के बाद भारत वापस लौट रहे हैं। इसके मुकाबले में चीन ने विश्व के और स्थानीय बाजार के लिए हार्डवेयर उत्पादों का नवीनीकरण किया है। सॉफ्टवेयर उत्पादों की पहुँच उसके अपने स्थानीय बाजार तक सीमित है । इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत और चीन प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहे क्योंकि वे अलग-अलग बाजार में काम कर रहे हैं। वास्तव में भारत की बहुत सी आईटी सेवा की कंपनियां चीन में इसलिये खुल रही हैं कि चीन की प्रतिभा का लाभ उठाया जाये और चीन का बाजार भी खटखटाया जाय। इसी प्रकार चीन की कंपनियों ने त्वरित और लागत-प्रभावी विकास के लिये भारत में सॉफ्टवेयर लैब खोले हैं। यहाँ तक केवल वर्तमान स्थिति का बयान है लेकिन भविष्य का परिदृश्य अलग हो सकता है। भारत के लिये अँगरेज़ी एक बहुत बड़े लाभ के खाते में चल रही है और लोकतन्त्र ने भी आईटी उद्योग पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डाला। हालाँकि भारत-सरकार ने आईटी उद्योग में अगर कोई व्यवधान नहीं डाले तो वह कोई मददगार के रूप में भी आगे नहीं आई।

चीन की सरकार के पास प्रजातन्त्र की वोट-प्रणाली का अभाव होने से दीर्घकालिक दृष्टि रखने की और निवेश करने की क्षमता है जो भारत की अब तक आईटी सेवाओं में लगभग एकाधिकार की स्थिति के लिये चुनौती बन सकती है। भारत के आगे निकल जाने के कारण चीन ने अब तक क्या- क्या खोया है यही सोचकर चीन त्वरित गति से निवेश कर रहा है लेकिन अब तक उसे केवल थोड़ी-बहुत सफलता मिली है। इसके लिये अँगरेज़ी को एक कारण बताया जा सकता है। मेरे विचार से आईटी सेक्टर में वैश्विक मान्यता मिलने के क्षेत्र में भारत इतना आगे है कि चीन के लिये उसे पकड़ पाना बहुत मुश्किल है। फिर भी चीन को कम आँकने की भूल नहीं करना चाहिये क्योंकि अगर चीन इस उद्देश्य के पीछे पड़ जाता है तो उसके लिये कुछ भी करना पड़े; एक लम्बी अवधि में वह वहाँ पहुँचकर ही दम लेता है।

हरिहर : भारत में आम रिवाज बन चुकी भ्रष्टाचार की संस्कृति तकनीकी-नवीनीकरण से किस तरह का नाता जोड़ेगी?

ललित याज्ञिक : आपने बिल्कुल ठीक कहा। भारत में भ्रष्टाचार की एक संस्कृति है। इसे बदलने के प्रयास के रूप में यदि तकनीकी-नवीनीकरण का सहारा लिया जाय तो भ्रष्टाचार को कम करने के लिए और यहां तक कि भ्रष्टाचार को खत्म करने की इसमें क्षमता है। और इसके उदाहरण भी मौजूद हैं जैसे रेलवे आरक्षण में कम्यूटर द्वारा स्वचालन, जिसने इस क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का लगभग सफाया कर दिया है।

हरिहर : बड़े और संस्थागत भ्रष्टाचार के मामलों में जैसे कि 2जी घोटाले में अथवा खनन के मामले में या अदालत के मामलों में तकनीकी-नवाचार किस तरह मदद कर सकते हैं?

ललित याज्ञिक : तकनीकी-नवाचार मदद कर सकते हैं, निश्चित रूप से ऐसा हो सकता है अगर सोच के सिस्टम याने संज्ञानात्मक कंप्यूटिंग (जिसमें कंप्यूटर मानव-मस्तिष्क की तरह व्यवहार करता है क्योंकि उसने पास सीखने की तथा ‘सूचना’ और ‘ज्ञान’ के भंडार के साथ तर्क-प्रक्रिया और कंप्यूटींग शक्ति उपलब्ध है।) की शक्ति से नए युग में प्रवेश किया जाय जहाँ पर उपरोक्त सभी मामलों में भ्रष्टाचार समाप्त करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, एक कंप्यूटर आधारित प्रणाली में ऐसा नियोजित किया जा सकता है कि ने भी आईटी उद्योग पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डाला। हालाँकि भारत-सरकार ने आईटी उद्योग में अगर कोई व्यवधान नहीं डाले तो वह कोई मददगार के रूप में भी आगे नहीं आई।

चीन की सरकार के पास प्रजातन्त्र की वोट-प्रणाली का अभाव होने से दीर्घकालिक दृष्टि रखने की और निवेश करने की क्षमता है जो भारत की अब तक आईटी सेवाओं में लगभग एकाधिकार की स्थिति के लिये चुनौती बन सकती है। भारत के आगे निकल जाने के कारण चीन ने अब तक क्या- क्या खोया है यही सोचकर चीन त्वरित गति से निवेश कर रहा है लेकिन अब तक उसे केवल थोड़ी-बहुत सफलता मिली है। इसके लिये अँगरेज़ी को एक कारण बताया जा सकता है। मेरे विचार से आईटी सेक्टर में वैश्विक मान्यता मिलने के क्षेत्र में भारत इतना आगे है कि चीन के लिये उसे पकड़ पाना बहुत मुश्किल है। फिर भी चीन को कम आँकने की भूल नहीं करना चाहिये क्योंकि अगर चीन इस उद्देश्य के पीछे पड़ जाता है तो उसके लिये कुछ भी करना पड़े; एक लम्बी अवधि में वह वहाँ पहुँचकर ही दम लेता है।

हरिहर : भारत में आम रिवाज बन चुकी भ्रष्टाचार की संस्कृति तकनीकी-नवीनीकरण से किस तरह का नाता जोड़ेगी?

ललित याज्ञिक : आपने बिल्कुल ठीक कहा। भारत में भ्रष्टाचार की एक संस्कृति है। इसे बदलने के प्रयास के रूप में यदि तकनीकी-नवीनीकरण का सहारा लिया जाय तो भ्रष्टाचार को कम करने के लिए और यहां तक कि भ्रष्टाचार को खत्म करने की इसमें क्षमता है। और इसके उदाहरण भी मौजूद हैं जैसे रेलवे आरक्षण में कम्यूटर द्वारा स्वचालन, जिसने इस क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का लगभग सफाया कर दिया है।

हरिहर : बड़े और संस्थागत भ्रष्टाचार के मामलों में जैसे कि 2जी घोटाले में अथवा खनन के मामले में या अदालत के मामलों में तकनीकी-नवाचार किस तरह मदद कर सकते हैं?

ललित याज्ञिक : तकनीकी-नवाचार मदद कर सकते हैं, निश्चित रूप से ऐसा हो सकता है अगर सोच के सिस्टम याने संज्ञानात्मक कंप्यूटिंग (जिसमें कंप्यूटर मानव-मस्तिष्क की तरह व्यवहार करता है क्योंकि उसने पास सीखने की तथा ‘सूचना’ और ‘ज्ञान’ के भंडार के साथ तर्क-प्रक्रिया और कंप्यूटींग शक्ति उपलब्ध है।) की शक्ति से नए युग में प्रवेश किया जाय जहाँ पर उपरोक्त सभी मामलों में भ्रष्टाचार समाप्त करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, एक कंप्यूटर आधारित प्रणाली में ऐसा नियोजित किया जा सकता है कि स्थायी और लागत-प्रभावी होते हैं। मैं यह नहीं कहता कि अधिक पुलिस की मांग में खराबी है किन्तु इस बारे में कह नहीं सकता कि भ्रष्टाचार के दृष्टिकोण से यह हल आर्थिक रूप से व्यावहारिक और स्थायी समाधान है या नहीं? लोगों को प्रौद्योगिकी-समाधान की शक्ति को पहचानने की आवश्यकता है और यह सौभाग्य की बात है कि वैश्विक प्रदाता के रूप में भारत में यह समाधान मितव्ययी आर्थिक बजट में भी उपलब्ध है। हमारे पास जो बहुतायत में उपलब्ध है उसका उपयोग कब करेंगे? और वह है प्रौद्योगिकी की प्रतिभा। हमार पास लाखों ऐसे कुशल पेशेवर तथा छात्र मौजूद हैं जो आसानी से इस तरह के समाधान तैयार करने में सक्षम हैं।

हरिहर : युवा ऑस्ट्रेलिया और विशेषकर ऑस्ट्रेलियाई आईसीटी (सूचना और संचार प्रौद्योगिकी) कॅरिअर में रुचि रखने वाले भारतीयों का भविष्य आप किस रूप में देखते हैं? मुख्यतया आईटी का काम जो भारत में आउटसोर्स किया जा रहा है उसके संदर्भ में आप क्या कहना चाहते हैं?

ललित याज्ञिक : पहले तो मैं कहना चाहूँगा कि अभी आईसीटी प्रारंभिक अवस्था में है, इस क्षेत्र में अभी काफी विकास बाकी है। यह ऑस्ट्रेलिया सहित सभी देशों के लिए एक वैश्विक अवसर है। इसमें युवा ऑस्ट्रेलियाई हो या कोई भी हो आईसीटी में सफलता के लिये नवाचार या नवीनीकरण बहुत महत्वपूर्ण है; चाहे वह तकनीकी का केन्द्र भाग हो या फिर सामाजिक और व्यवसाय के क्षेत्र में अनुप्रयोग हो या आईसीटी सेवा वितरण के अर्थशास्त्र का क्षेत्र हो। इसमें टीम के विभिन्न सदस्य दुनिया के किस भाग में रहते हैं यह एक गौण बात है। किसी भी प्रयोजन के लिये टीम के विभिन्न सदस्य तीव्रता से बदले जा सकते हैं याने किसी भी देश से लिये जा सकते हैं। यह बात भारतीय पृष्ठभूमि के ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए विशेष रूप से लागू होती है ।

ऑस्ट्रेलिया के भारतवंशियों के लिये यह एक विशेष अवसर है कि वे भारत के विशाल प्रतिभा-पूल के साथ जुड़कर ऑस्ट्रेलियाई संस्थानों में उच्च मूल्य प्रदान करने वाली टीम के रूप में आगे आ सकते हैं। यह कार्य सामान्यतया सांस्कृतिक बारीकियों के कारण मुश्किल होता है। उद्यमों के लिए भी बड़े अच्छे अवसर हैं कि भारतीय ऑस्ट्रेलियाई संयुक्त टीमों के रूप में आगे आकर वैश्विक ग्राहकों के लिए वे अद्वितीय रूप से, मूल्य सृजन कर सकते हैं।

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हरिहर झा

7 अक्तूबर 1946 को बांसवाड़ा (राजस्थान) में जन्म। सरिता व विभिन्न वेब-पत्रिकाओं में हिन्दी व अँगरेजी कवितायें प्रकाशित। ऑस्ट्रेलिया के बारे में आलेख व यहाँ के भारतवंशियों से साक्षात्कार के लिये कम्यूनिटी सर्विस एवार्ड (2013)। इसके अलावा परिकल्पना हिन्दी भूषण सम्मान (2013)। सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया में निवास।

सम्पर्क : hariharjha2007@gmail.com

(साभार - गर्भनाल पत्रिका जनवरी 2016)

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होरी जो बिसू की सबसे छोटी बेटी है जो कि बिल्कुल ही भोली-भाली अज्ञान एवं अशिक्षित है पिता बिसू जो काफी गरीब है दिनभर मेहनत करने पर दो वक़्त की रोटी मिलती है इन की तीन बेटियां है उसमें से होरी भी एक है । वहीं मां त्रिशला ज्यादातर घरेलू कामों में ही व्यस्त रहती है । होरी का जब जन्म होता है तो घर वालों में काफी खुशी रहती है तब उनकी दादी भी बहुत खुशी व्यक्त करते हैं परंतु कुछ समय पश्चात इनका निधन हो जाता है । होरी एकदम कुरूप थी इस वजह से आस पड़ोस वाले इसका मजाक उड़ाते रहते हैं तथा उपेक्षा करते है जैसे - जैसे होरी बड़ी होती है वैसे वैसे उपेक्षाओं का कहर बरसता रहता है । होरी जब 5 साल की हो जाती है तो नजदीकी शाला में दाखिला करा दिया जाता है इसी बीच शक्ल से कुरूप होने के कारण पड़ोसी तो उपेक्षा करते ही है लेकिन अब शाला के दूसरे बच्चे भी उसका मजाक उड़ाते हैं तंग करते , उपेक्षा भी होती रहती है इसी कारण मात्र 17 दिनों के भीतर होरी विद्यालयी शिक्षा को त्याग देती है मां बाप के कहने पर भी वह शाला नहीं जाना चाहती है दूसरी बेटियां भी अशिक्षित ही होती है इस कारण खेतों में काम पर लग जाते हैं बाप बिसू और मां त्रिशला भी इनके साथ काम करते रहते हैं ।

    ऐसे करते - करते होरी 12 वर्षों की हो जाती है तब दूसरी बहिनों की शादी कर दी जाती है और वे अपने ससुराल चली जाती है कुछ समय पश्चात होरी का भी बाल विवाह कर दिया जाता है तब वह मात्र 15 सालों की होती है और उसका पति शम्भू नामक जो की विकलांग , एकदम अशिक्षित एवं भोला होता है लेकिन होरी के ससुराल में सास - ससुर , जेठ - जेठानी सब चतुर होते है । होरी की शादी के बाद बिसू और त्रिशला एकदम अकेले पड़ जाते हैं , भगवान ने उनकी गोद में कोई पुत्र नहीं दिया था ।

  होरी का पति शम्भू जो कि विकलांग होता है इस वजह से वह काम करने में असमर्थ है जबकि दूसरे भाई जो उनसे बड़े है तथा पढ़े लिखे भी इस कारण दोनों भाई शम्भू पर गुस्साए हुए ही रहते है , जरा सी भी कद्र नहीं करते है ।

   होरी की शादी होती है तब ये बाल अवस्था में ही होती है इस कारण रसोई का ज्यादा कुछ नहीं जानती है और फिर यहीं से ससुराल वालों की अपेक्षाओं का आतंक शुरू हो जाता है । और फिर छोटी जिठानी होरी को गर्म आवाज में कहती है कि ''तुम्हें रोटी तो पकानी आती ही होगी तो फिर काहे को मुंह फाड़-फाड़कर घूर रही है देख लिया है तेरा चेहरा राक्षस से भी बत्तर है और फटाफट रोटियां बनाओ यहां दूसरे कामों की भी कोई कमी नहीं है ,, यह होरी का पहला दिन था जो कि किसी दूसरी जगह पर बिताया । और फिर होरी कंपकंपाती हुई बोली जी.... ,जी....
मुझे रोटियां करनी नहीं आती है पर दूसरा काम कर लेती हूँ । और इसी सन्दर्भ में जिठानी कहती है "क्या बोली तो यह रोटिया तेरी मां पकाएगी अगर तुझे रोटियां भी नहीं बनानी आती है तो इतने सालों से क्या सीखा अपनी मां से ।,,  होरी को अपनी मां के बारे में कोई गलत बोले वह सहन नहीं कर पाती थी इस कारण होरी भी वापस जवाब देती है और कहती " जी आप ऐसे कैसे किसी को बोल सकती है ,, अरे ! मां ने रोटियां तो बनाना सिखाया नहीं और मुंह लगाना सिखा दिया चल फिर यह बर्तन धो दे ,, ।
   होरी को इतना सब करने पर रोना आ जाता है क्योंकि कभी डांट उनको किसी ने नहीं मारी थी इसी बीच रोते - रोते वह बर्तन धो रही थी और उसका पति जो कि से उससे 8 साल बड़ा था बैठा - बैठा सब देख रहा था इस कारण है वो भी भावुक हो जाता है और मन को कोसता है कि यह सब मेरी वजह से ही हो रहा है इसी बीच बड़ी जिठानी भी कहीं से टपक पड़ती है ये उन सबसे अलग थी उनके मन में दूसरों के मुकाबले में रहमियत वाली थी और बोलती है कि बड़ी  ''रोना बंद करो और कुछ नहीं यह सब तो ऐसे ही है ,, ।

   घर वाले भी सभी अपना - अपना काम करने लगते हैं शम्भू के बड़े भाई जो कि इस परिवार का सबसे बड़ा बेटा है वह पंचायत में सर्विस करता है बाकि सास - ससुर तथा ननद खेतों में निराई - गुड़ाई कर रहे थे जबकि सभी बहुएं घर पर काम निपटा रही थी शम्भू अचानक से फिसल जाता है तभी होरी उसको संभाल लेती है और फिर से छोटी जिठानी के दर्शन हो जाते हैं और फिर बोलती है ....
वाह ! वाह ! क्या प्रेम है ?

   समय अपनी गति से चलता रहता है और होरी अब 25 वर्षों की हो जाती है इस वजह से वह काम भी सीख जाती है लेकिन उपेक्षाओं ने पीछा अब भी नहीं छोड़ा था क्योंकि शादी करके इतने साल हो गए फिर भी गोद खाली की खाली थी इस कारण सास बोलती है कि "लगता है भगवान भी तुझसे तंग आ गये है ,,। जब अपने मायके जाने की बात करती है तो सास हमेशा यह कहकर टाल देती है कि " वहां क्या करेगी जाके इधर काम कर बहुत काम है ,,  और फिर होरी चुपचाप काम पर लग जाती है । होरी के गांव का नाम विरहनगर था एक बार भीषण तूफान आया आधे ग्राम वासियों को अपनी शरण में ले गया था इस में होरी के पिता बिसू भी थे अर्थात बिसू की मौत हो चुकी थी , इतना होने पर भी होरी को पता नहीं था इसका कारण भी उसकी सास ही थी उसको पता था लेकिन बताना नहीं चाहती थीं क्योंकि वो सोचती कि जब उसे पता चलेगा तो वह रोएगी जो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है ।

   कुछ दिनों बाद शम्भू बीमार पड़ गया सभी ने न चाहते हुए भी उनकी सेवा की , लेकिन भगवान ने होरी के जीवन में एक अलग मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया क्योंकि शम्भू की मृत्यु हो जाती है तब ससुराल में होरी के साथ सिर्फ उपेक्षाएं ही होती है ।

   सास - ससुर एवं छोटी जिठानी दिनभर होरी को गालियां देती रहती है यहां तक कि कभी-कभी मारपीट भी हो जाती थी होरी को अब 3 साल हो गए थे मायके गये हुए इधर मायके में मां त्रिशला सोच रही थी कि होरी तो अपने पिता की मौत के बाद मिलने तक नहीं आई जबकी इसकी दूसरी बहनें तो आई थी । साथ ही त्रिशला को शंका भी हो रही थी कि शायद उसे पता ही नहीं चला हो ! होरी को मजबूर कर दिया गया था कि वह अपने मां - बाप को कुछ भी नहीं बताएगी कि उनके साथ क्या होता है इस वजह से त्रिशला को कुछ भी पता नहीं था कि होरी के साथ ससुराल वाले कैसा सलूक करते हैं । अब होरी की स्थिति नाजुक बन रही थी क्योंकि समय पर न तो खाना मिल रहा था और न ही पानी , दिन भर काम ही काम करना पड़ता था । इधर ससुर भी भोजन के सन्दर्भ में हमेशा गाली - गलौच कर देता है इसको जरा सी भी शर्म नहीं है कि होरी उसकी बहू है ।

   होरी जब ससुराल आई थी तब से 3 साल बाद छोटी जिठानी ने लड़की को जन्म दिया था जो अब सात - आठ वर्षों की हो चुकी थी , इसके लक्षण भी जैसे मां - बाप के है वैसे इसके भी । इसको तैयार होरी ही करती थी इस कारण होरी रेखा के बाल इत्यादि संवारती थी इस बीच में होरी को कई बार गालियां भी सुननी पड़ती थी तथा जिठानी की बेटी ने तो एक अलग नाम भी दे रखा था "काली चाची" ।

   होरी पर खूब अत्याचार होते रहते हैं कभी भोजन के मामले में तो कभी दूसरे कामों में । ऐसे ही कुछ दिनों के पश्चात सास , छोटी जिठानी मिलकर होरी के साथ मारपीट करते है एवं जो थोड़े बहुत जेवरात थे वह भी लूट लिए जाते है बाद में चोरी का आरोप लगाकर घर से धक्का मार देते है । इस सन्दर्भ में आसपास के लोग भी इकट्ठा हो जाते हैं कि आखिर क्या हुआ है । तभी होरी की सास बोलती है '' कि यह घर से पैसे चुरा रही थी कामकाज तो कुछ करती है नहीं और पैसे चाहिए ,, इस कारण पूरे गांव में हल्ला हो जाता है और होरी को घर से निकाल देते हैं अब हालत ऐसी हो रही थी कि एक कदम भी न चल सके आँखों से अश्रुधारा हो रही थी और फिर मन में सोचा कि एकबार और गुहार करती हूँ , लेकिन अंदर आने ही नहीं दिया।

   होरी का गांव जो कि पन्द्रह किलोमीटर दूर है वह अकेले ही पैदल चल पड़ती है एकदम भूखी - प्यासी होरी थोड़ी देर बाद अपना आपा खो देती है और वही पर गिर जाती है अर्थात अचेत हो जाती है तभी एक बूढ़ा अपने घर ले जाता है ।  होरी एक बार फिर से संकट में फंस जाती है क्योंकि वृद्ध के आगे - पीछे कोई संबंधि नहीं है इस कारण जैसे ही वह अपने घर ले जाता है तो सभी ग्रामवासी तिरछी नजरों से देखते हैं और थोड़ी ही देर बाद गांव में हंगामा मच जाता है । ग्रामवासी मानते हैं कि बूढ़ा कुछ गंदी नीयत से लाया है तभी थोड़ी देर बाद होरी को होश आ जाता है और जब वह देखती है तो किसी दूसरे गांव में मिलती है ।

   खुद की इज्जत को बनाए रखने के लिए बूढ़ा होरी को भोजन करा कर अपने घर से विदा कर देता है इधर ससुराल में रोना - विलाप करना शुरू हो जाता है क्योंकि छोटा जेठ एक दुर्घटना में मारा जाता है जिसकी छानबीन पुलिस करती है ऐसे करते - करते होरी अपने घर पहुंच जाती है , जब वह अपनी मां से मिलती है तो खूब रोने लगती है तथा अपने ऊपर हुए कष्टों को सुनाती है और अपनी मां से बोलती है कि "आप तो शम्भू के निधन पर मिलने भी नहीं आई , आप को चिट्ठी भी भेजी थी ,, त्रिशला भी इसी स्थिति में रोती हुई बोलती है कि "हमें तो कोई चिट्ठी नहीं मिली और तुम भी अपने बाबा की मौत पर मिलने नहीं आई यह बाद सुनते ही होरी खूब रुदन करती है ।

   सब दुखों को देखते हुए होरी भी अपनी मां के साथ काम बंटाने लगती है घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था इस कारण भूख से तड़प रही थी ऐसे करते - करते दिन गुजरते है फिर महीने और होते - होते ढ़ाई साल । बाद में त्रिशला होरी का पुनर्विवाह करा देती है लेकिन होरी को तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता है लेकिन कुछ ही दिनों बाद होरी के दूसरे पति को पुलिस गिरफ्तार कर देती है जब होरी को पता चलता है कि उनका पति एक चोर है तब वह ससुराल से भाग कर अपनी मां के पास आ जाती है इसी तरह होरी की परीक्षाओं का अंत नहीं होता है यह बात सुनकर मां त्रिशला को दिल का दौरा पड़ जाता है । और अब होरी सिर्फ एक अर्थात अकेली ।

लेखक परिचय:-
नाम - राजू सुथार 'स्वतंत्र'
गांव - ठाडिया
ज़िला - जोधपुर
तहसील - बालेसर
राज्य - राजस्थान
पिनकोड -342314
कार्य - लेखक वर्तमान में बीए प्रथम वर्ष का स्वयंपाठी विद्यार्थी है साथ ही विभिन्न समाचार पत्रों के लिए स्वतंत्र रूप से ख़बरें लिख रहे है । इनके अलावा हिन्दी विकिपीडिया पर पुनरीक्षक भी है ।

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                अभी कुछ दिनों पहले मेरा मित्र गिरगिट दौड़ा-दौड़ा आया और हाँफते हुए बोला कि आज एक नागा पदमसिड़ी  देखा है.वह अपनी फ़िल्म के लिए न्यूड हुआ था.उसने उसके नंगे होने के साथ कई हीरोइनों के पोस्टरों को भी देखा .वे भी इसी पुनीत कर्म के लिए जगजाहिर हुई थीं.यह तो गर्व से सीना ताने अंगप्रदर्शन कर रहा था.पता नहीं किस ज़माने का बाज़ा लिए खड़ा था.मेरे साथ ही मेरा  दोस्त भी ठेके से पीके निकला तो सामने एक पोस्टर को देखके नशे में बोला,"इस  पोस्टर को फाड़के रख देने का मन होता है."मैंने तो ऐसे पोस्टरों में कई-कई बार ऐसी महिलाएँ भी देखी थीं लेकिन वे शर्मसार थीं.

              अगर जनता के जूतों का डर न होता तो ये हीरो कबका बाजा-बूजा फेंकफांक के भांगड़ा करने लग जाता.मन  तो यह भी हुआ कि तान के ऐसी लात दूँ कि बाज़ा ही बज जाए साला । घूमते-घूमते हम काफी दूर निकाल गए थे। थोड़ी देर बाद गिरगिट का मन बदला और वह हमारी ओर मुखातिब होके बोला," हो न हो पागल हो गया हो."हमने हामी भरके बात को घुमाना चाहा। लेकिन उसी समय एक मूर्ति सामने उभरी। वो कोई और नहीं हमारे इलाके के  एक झलरिया बाबा थे.वे पागल हो गए तो उन्हें भी कपड़ों का होश नहीं रहता था.साधु मण्डली में वे परम हंस थे और जनता में अवतार.लोग उनसे मार खाने जाने लगे.लोग बाबा के सामने जाते और तरह-तरह की हरकतें करते.बाबा जब तक गुस्सा न हो जाते तबतक लोग यही करते रहते.उन्हें गुस्सा आता तो इतने जोर का आता कि  जो कुछ भी सामने दिखता वही उठा के मार देते .एक बार एक तहसीलदार को उन्होंने दौड़ा के थप्पड़ क्या मारा हलके से वापस जाते ही उन्हें एस डी एम का प्रोमोशन मिल गया.इसके बाद से तो उनके यहाँ मार खाने वालों का मेला ही लगा रहता था, जिसके लग जाए वह भाग्यशाली जिसके न लगे अभागा.

              यही हाल इस नंगे अभिनेता का है.एक बड़ा उद्योगपति  जो किसी मजबूरी के नगे -भूखे को चवन्नी न दे , इसे करोड़ों थमाए बैठा है.अब यह नंगा बाँटेगा तो क्या होगा ?संस्कृति की दुहाई देने वाले इतनी ज़ल्दी नंगे होते नहीं देखे.इसने इज्ज़त की धुल दी.सोचा होगा ,नंगा नाचे फाटे क्या?हमारी  सरकार भी इस पर कम फ़िदा नहीं रही है.बुलाके सम्मानित कर डाला. माना इस नंगे को हया-शर्म नहीं है सरकार को तो होनी ही चाहिए थी .उसको चाहिए था  कि जब इसको सम्मान  दे ही दिया था  तो एक जोड़ी कपड़े भी दे देती.

              निराशाराम के भक्तों का देश भी यही है यह .मेरे  शब्दों  को लेकर उनमें से बहुतों की भावनाएँ आहत हो सकती हैं.इसके बावज़ूद मुझे इसको  बहुत सारी और विशेष शब्दावली भेंट मे देने का मन कर रहा है.इस नंगई से इसकी कलई खुल गई है.कितने ज़ोरों से बहे थे स्त्री जाति के लिए इसके घड़ियाली आँसू.एक-एक एपीसोड से करोड़ों कमाने वाले इस नंगे ने किस तरह से करुणा बेची.इसका अनुमान अब तो कतई कठिन नहीं है.समाज के नंगे सच को सामने लाने का दावा.नंगों को नंगा करने का दावा करते-करते खुद ही नंगा हो गया.अब तो ऐसा लगता है जैसे इसके सारे दावे गुब्बारे से एक साथ फिस्स से  हवा निकल जाने के बाद शांत हो गए हों.आखिर कितना कमा लेगा इस नंगई-लुच्चई से?इसको पता नहीं कि इसने कितना खोया है.उन बच्चों का विश्वास जो इसे अपने लिए मुसीबत से निकालने वाला  फ़रिश्ता मानने लगे थे.वे स्त्रियाँ जो अपनों से छली गई थीं और जिन्हें इसमें कृष्ण का स्वरूप दिखने लगा था.क्या अब वे इस कंस में आगे भी कृष्ण को ढूँढ़ पाएँगी शायद कदापि नहीं.

              ये कुकुरमुत्ते नायक और स्खलित नैतिकता के झंडाबरदार कहीं हमीं को डुबोने तो नहीं ले जा रहे हैं.यही तो नीरो हैं जो आग लगे रोम को उसके भाग्य भरोसे  छोड़ बांसुरी बजाते जा रहे रहे हैं और हम इनके पीछे-पीछे चूहों -से फुदकते हुए पता नहीं शान से समुद्र मे डूबने चले जा रहे हैं.बदायूँ,लखनऊ और कर्नाटक कहीं की घटना से इसका दिल नहीं पसीजा .कितनी नकली है इसकी करुणा.अगर तथागत देख रहे होंगे तो किसी न किसी रूप या अवतार में इसे नसीहत ज़रूर देंगे कि करुणा का यह व्यापार कदापि उचित नहीं.जब लखनऊ की बलात्कृता युवती की निर्वस्त्र लाश को कपड़ों की ज़रूरत थी तब यह खुद नंगा खड़ा पता नहीं किसका प्रतिनिधित्त्व कर रहा था और क्यों ?

            समाज की समझदारी इसी में है कि वह ऐसी स्खलित नैतिकता के झंडाबरदारों को नसीहत दे.इसकी नंगई -लुच्चई का बहिष्कार करे.यह कुछ ज़्यादा हो गया .पुरुष तो ज़रूर जाएँगे.उन्हें भी तो कहीं न कहीं सीना तान के यही मर्दानगी दिखानी है.वे न करें न सही कम से कम स्त्रियों को तो इसके इस चरित्र  का बहिष्कार करना ही चाहिए.सुना है कुछ महिलाएँ आगे आई हैं.उन्होंने पोस्टर हटवाए हैं.औरों को भी आगे आना चाहिए.

           गिरगिट बता रहा था,"उस नंगू का पोस्टर  भी किसी विदेशी पोस्टर की नक़ल है.जिस पोस्टर की नक़ल है वहाँ जननांग किसी वाद्ययंत्र से ढका गया गया है तो यहाँ पुराने ज़माने के लोहालाटी भारी-भरकम रेडुआ से .ठौर-कुठौर लग जाता तो सेप्टिक हो जाती।अरे सितार लगा लेता।वीणा यमृदंग लगा लेता। हाल में थू-थू होते देख हीरो का बयान आया है कि वह बाद में इसका रहस्य प्रकट करेगा.जब नंगा हो गया तो रहस्य बचा ही क्या ?इस दुहरे चरित्र के नायक से समाज क्या सीखे ?इसने पहले नसीहतें दीं फिर नंगा हुआ .बलात्कारी पहले नंगे होते हैं फिर नसीहतों से भरा प्रवचन दे सकते हैं.निराशाराम यही तो करता था.वह  और यह दोनों आखिर एक ही राशि के तो  हैं.इनके नंगेपन में भी बहुत सूक्ष्म अंतर के अलावा कोई विशेष विभेद नहीं है.

             इसे नंगा होने में मज़ा आता है उसे नंगा करने में आता था.वासना के लिए दोनों नंगे हुए.एक को पैसे की वासना है तो दूसरे को काम की.पहले कितनी सत्य,अहिंसा और  करुणा की बातें की । जब दुकान चल निकली तो अब तो 'नंगमेव  फलते 'पर उतर आया। कहने वाले कहते हैं उस करुणा भरे वातावरण  में आंसुओं के गिराने के लिए भी हर एपीसोड के ढाई करोड़ लेता था.पता नहीं किस सत्य की बात कर रहा था ये .हमाम में हर कोई नंगा होता है लेकिन रेलवे ट्रैक या सड़क पर नहीं.सड़क पर तो बालक या पागल ही नंगा विचर सकता है.बच्चा तो ये है नहीं .पागल ही हो सकता है।  पैसे के पीछे पागल.

                   एक इंसान को आखिर कितना पैसा चाहिए!किसके लिए और कब तक ?क्या पागल हो जाने लिए या पागल हो जाने तक!

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कर्म क्षेत्र के मामले में दो प्रकार के लोग हैं। एक वे जो चुपचाप अपने काम से काम करते रहते हैं और अपने कर्मयोग को आकार देते हुए आत्म मुग्ध व आत्मतोष के साथ जीवन जीते है।

न उपहारों की अपेक्षा रखते हैं, मुद्रा के लोभी या लालची। इन लोगों को अपने किए हुए कामों के लिए किसी से धन्यवाद तक की अपेक्षा या और कोई आशा नहीं होती।

ये ही वे लोग है जो असली कर्मयोगी हैं और इन्हीं के भरोसे हमारी सभी व्यवस्थाएं पूरी गंभीरता व शालीनता के साथ पूरी हो रही हैं।

दूसरी किस्म में दो-तीन प्रकार के लोग होते हैं। इनमें से आधे लोग अपने हर किए काम के लिए भी प्रतिफल चाहते हैं और उन कामों का श्रेय भी ले उड़ना चाहते हैं जिन कामों में इनका किंचित मात्र भी योगदान नहीं रहता।

इनकी आधी से अधिक प्रजाति उन लोगों की है जो अपने मामूली से मामूली कामों के लिए भी हर दिन ताकत लगाकर रोना रोते रहते हैं।

ये लोग कोई सा काम प्रसन्नतापूर्वक नहीं कर सकते। इनका यह रोना दिन उगने से लेकर रात तक यों ही चलता रहता है। अपना रोना रोने के लिए ये लोग न कोई संजीदा लक्ष्य समूह देखते हैं, न पात्र देखते।

जहाँ कहीं ये जाएंगे वहां किसी न किसी बात का रोना शुरू कर देंगे। इन्हें यह भान भी नहीं होता है कि उन लोगों के सामने रोना रोने का कोई अर्थ नहीं है जिनका उनके जीवन, विषय अथवा स्वभाव व कर्म से कोई सरोकार नहीं।

बहुत से लोग हैं जो कि समझदार हैं और चतुर भी। ये लोग जानबूझकर रोना रोने को अपनी आदत बना चुके हैं क्योंकि इन लोगों को अच्छी तरह पता है कि जो रोएगा वही लोगों की सहानुभूति पाने में सफल होगा। और इस मानवीय सहानुभूति का वे सारी जिंदगी लाभ पाते रहते हैं।

इन लोगों को अच्छी तरह पता है कि रोना रोने से ही सारे काम होने लगे तो फिर जीवन की दूसरी झंझटों में क्यों घुसें।

आजकल बहुत जगह लोगों ने रो-रोकर सहानुभूति पाने को हथियार बना रखा है और इस हथियार का उपयोग वे हमेशा करते रहते हैं। समझदार लोग इन रोने वालों को भले ही गलत समझते रहें मगर रोते रहने वाले लोग अक्सर फायदे में रहते हैं क्योंकि ये लोग रो-रोकर आगे बढ़ने में इतने माहिर होते हैं कि पूरे बहरूपिया अभिनय के जरिये सामने वालों को जबर्दस्त तरीके से भ्रमित कर डालते हैं।

ये अपने किसी भी प्रतिद्वन्द्वी के विरूद किसी के भी कान फूँकने पीछे नहीं रहते। ?

फिर आजकल वे लोग रहे ही नहीं कि बातों की सत्यता जानने का प्रयास करें, नीर-क्षीर विवेक को महत्व दें तथा सच्चाई व सच्चे लोगों का साथ दें, बुरों की खूब सुनें मगर न्याय व सत्य को सर्वोपरि समझ कर सटीक निर्णय करें।

इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जो लोग काम तो खूब करते हैं मगर सब कुछ चुपचाप। ये लोग न अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं न अपनी बारे में कुछ कहने की पहल करते हैं।

इस स्थिति में इतना तो तय है कि भिखारियों की तरह याचना करने वाले और रोते रहने वाले औरों की सहानुभूति पाकर भले ही अपने जीवन में सफलता पा लें मगर ये लोग कभी प्रसन्नता का आनन्द नहीं पा सकते।

इनके साथ में रहने वाले लोग वर्तमान में भी रोते रहते हैं और भविष्य में भी। क्योंकि इन रोने वालों के करम ही ऐसे होते हैं कि इनके जाने के बाद भी इनके खोटे करमों की बुरी व तीखी प्रतिक्रिया हमेषा बनी रहती है।

जो रो रहे हैं, उन्हे रोने दें, उनकी जिंदगी ही रोने का दूसरा नाम है। खुद प्रसन्न रहें और औरों को भी प्रसन्न रखने की कोषिष करे। जिनके जीवन में प्रसन्नता आ जाती है कि उन्हें सब कुछ स्वाभाविक रूप से प्राप्त होने लगता है।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

वर्ष 2004 में 'हंसाक्षर ट्रस्ट' द्वारा कहानी विधा पर 'प्रेमचन्द कथा-सम्मान' के लिए वरिष्ठ कथाकार कमलेश्वर के सौजन्य से अखिल भारतीय स्तर पर एक कहानी प्रतियोगिता के आयोजन की घोषणा की गई थी। निःसंदेह, काफी संख्या में प्रविष्टियाँ आई होंगी और अच्छी कहानियाँ भी आई होंगी क्योंकि पुरस्कार राशि 51,000/- रुपए थी । इससे सर्वकालिक कथा-सम्राट प्रेमचन्द के चहेतों को अपार प्रसन्नता हुई थी। चूँकि यह प्रतियोगिता मुंशी प्रेमचन्द की स्मृति में घोषित की गई थी, इसलिए ज़्यादातर कथाकारों ने प्रेमचन्दीय ढर्रे पर, उनकी भाषा-शैली, उनके अनुरूप विषय और कथानक के अनुसार कहानियाँ लिखकर भेजी होंगी ताकि प्रेमचन्दीय परंपरा को तरोताज़ा बनाया जा सके। बहरहाल, आयोजकों को तत्काल अपनी गलती महसूस हुई कि यदि प्रेमचन्द्रीय परंपरा के अनुरूप किसी कहानी को सम्मानित किया जाता है तो उक्त परंपरा के पुनः लोकप्रिय होने की संभावना प्रबल हो जाएगी और ऐसी स्थिति में उनके द्वारा थोपे जा रहे कहानी सिद्धांतों को मात भी खानी पड़ सकती है। किंतु, प्रतिभागियों और प्रेमचन्द के प्रशंसकों को निराशा इस बात से हुई की उस प्रतियोगिता को यह कहते हुए ख़ारिज़ कर दिया गया था कि प्राप्त प्रविष्टियों में ऐसी कोई कहानी नहीं थी जो मुंशी प्रेमचन्द्र द्वारा कहानी-लेखन में छोड़े गए रिक्त स्थान को भर सके अर्थात प्रतियोगिता के लिए उन विषयों पर कहानियाँ नहीं मिलीं जिन प्रेमचन्द ने कहानियाँ नहीं लिखीं। आश्चर्य यह सोचकर होता है कि उक्त प्रतियोगिता की घोषणा करते समय इस शर्त का साफ-साफ उल्लेख क्यों नहीं किया गया था कि प्रेमचन्द ने जो रिक्त स्थान छोड़ रखे हैं, यह प्रतियोगिता उन्हीं की भरपाई के लिए आयोजित की जा रही है। चुनांचे, इस घटना ने एक अनसुलझाया सवाल खड़ा कर दिया कि आख़िर, वे कौन-से विषय हैं जिन पर प्रेमचन्द ने कहानियाँ नहीं लिखी और आयोजकों ने उन विषयों का उल्लेख क्यों नहीं किया? विषयों का उल्लेख किया जाना तो अत्यंत आवश्यक था क्योंकि इसके बिना तो किसी प्रतियोगिता की सार्थकता ही समाप्त हो जाती है। कोई बात नहीं, प्रतियोगिता को ख़ारिज़ करते समय ही उन विषयों का उल्लेख कर दिया जाता! पर, ऐसा नहीं किया गया और यह बात उन सभी हिंदी-प्रेमियों को और ख़ास तौर से उन्हें जो प्रेमचन्दीय साहित्य के गहन अनुशीलक-विश्लेषक रहे हैं, चुभ गई। ऐसा करके उन्होंने यह सोचने पर विवश कर दिया कि आख़िरकार, वे किन विषयों की ओर इशारा कर रहे हैं जिन पर प्रेमचन्द ने कहानियाँ नहीं लिखीं। आज स्त्री विमर्श और दलित आंदोलन को मुखर करने के लिए कुछ दिग्गज साहित्यकारों के बैनर के नीचे अनेक संपादक इन दोनों पक्षों पर विशेषांक निकालने पर तुले हुए हैं कि स्त्रियों की समस्याओं पर महिला लेखिकाएँ और दलितों के शोषण पर दलित लेखक ही अच्छी रचनाएं लिख सकते हैं। लिहाजा, स्त्रियों और दलितों की समस्याओं पर प्रेमचन्द ने इतने व्यापक रूप से लिखा है कि भावी लेखकों की पीढ़ियाँ प्रेरित होकर इन पक्षों पर बहुतायत से लिख रहे हैं। प्रेमचन्द की सर्वयुगीन प्रासंगिकता पर अंगुली उठाने से पहले यह अच्छी तरह सोच-समळा लेना चाहिए था कि जिस विचारधारा को उन्होंने हमारे राष्ट्रीय समाज में प्रवाहित किया है, वह आने वाली कई सदियों तक लेखकों को प्रेरित-अनुप्राणित करता रहेगा। वर्ष 2002 में 'प्रेमचन्द की परंपरा और अमरकांत' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में वरिष्ठ कथाकार अमरकांत ने कहा था, "कथा साहित्य के सारे विवाद के बावज़ूद प्रेमचन्द न सिर्फ़ खड़े हैं बल्कि लोकप्रिय भी हैं। संवेदना के स्तर पर उन्होंने जिन मूल्यों को अभिव्यक्त किया, वे आज भी प्रासंगिक हैं और इसलिए प्रेमचन्द आज हमारे अत्यंत निकट हैं।" (हंस, अक्तूबर, 2002, पृ.81) दरअसल, प्रेमचन्द की प्रासंगिकता कभी ख़त्म नहीं होगी क्योंकि जब कोई शोषक वर्ग किसी निर्धन, निर्बल और उपेक्षित व्यक्ति का शोषण करेगा, प्रेमचन्द वहाँ खड़े नज़र आएंगे। न शोषक वर्ग समाप्त होगा, न प्रेमचन्द धूमिल पड़ेंगे।

लिहाजा, उक्त प्रतियोगिता के संदिग्ध उद्देश्य पर चिंता किया जाना लाज़मी है। क्योंकि बात प्रतिभागियों को निराश करने की नहीं है; बल्कि, इससे प्रेमचन्द्र के प्रशंसकों के दिल को ठेस पहुंची थी। बेशक! इस कृत्य में उन साहित्यिक ठेकेदारों का हाथ अवश्य रहा होगा जो येन-केन-प्रकारेण प्रेमचन्द्रीय साहित्य पर उंगलियाँ उठाते रहे हैं और उनकी कथा-परंपरा को समाप्त करने का ढिंढोरा पीटते हुए कहानी-विधा के लिए बेहद घातक--नई परंपराओं, नए 'वाद', विचारधारा और नए कथा-युग का सूत्रपात करना चाहते हैं जबकि ठोस तथ्य यह है कि मौज़ूदा कहानीकार कितना भी प्रयोगधर्मी हो, वह अनजाने में ही प्रेमचन्द्रीय कथा-परंपरा से जुड़ जाता है क्योंकि प्रेमचन्दीय कथा-परंपरा सर्वजनीन, सर्वकालिक और सार्वत्रिक आधार पर सर्व-सम्मत और सर्वसमर्थित है और इससे पृथक होने का अर्थ है मूल कथात्मकता की भावना की अनदेखी करना। प्रेमचन्द द्वारा कहानियों के लिए प्रयुक्त 'थीम' जहाँ उनके समकालीन समाज की यथावत प्रतिकृति थी, वहीं इसमें भावी जगत का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब भी साफ नज़र आता है। जो समस्याएं उन्होंने उद्घाटित की, उनकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है क्योंकि मौज़ूदा कहानीकार उन्हीं की थीम पर कहानियाँ लिख रहा है; हाँ, उसकी प्रस्तुति का अंदाज़ अलग हो सकता है, कथानक बुनने की शैली ज़ुदा हो सकती है, देशकाल के निरूपण के संबंध में वह उतना दूरदर्शी और सार्वभौमिक नहीं हो सकता है... किंतु, वह प्रेमचन्द द्वारा स्थापित परंपराओं का अनजाने में ही उसी प्रकार कर्ज़दार हो जाता है जिस प्रकार मौज़ूदा नई कविता के रचनाकार निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय और धूमिल की प्रच्छाया से मुक्त नहीं हो पाते। विसंगतियों में सामंजस्य स्थापित करने, संप्रदायों और जातियों में तालमेल बैठाने, गाँव से शहर की दूरियाँ मिटाने, जनरेशन-गैप समाप्त करने, पहले-पहल दलित चेतना को मुखर करने, स्त्रियों की सामाजिक स्थिति पर चिंता जताने, दार्शनिक आधार पर जीव जगत की महत्ता को विशद रूप से रेखांकित करने और सामाजिक जीवन को वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा सत्यापित तथ्यों के आधार पर उन्नत सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने जैसी बातों में प्रेमचन्द सदैव हमारे मार्गदर्शक बने रहेंगे। यह तथ्य भी निर्विवाद है कि जीव जगत में सामाजिक दलन पर चिंता करते हुए वह मनुष्य ही नहीं, जानवरों और पशुओं के दलन पर भी अत्यंत भावुक हो उठते हैं और उनकी पीड़ाओं के संप्रेषण में सभी लेखकों और कवियों को बहुत पीछे छोड़ जाते हैं।

यद्यपि प्रेमचन्द स्वघोषित रूप से साम्यवादी सिद्धांतों के पोषक और उन्नायक रहे हैं तथापि इसका आशय यह नहीं लगाना चाहिए कि उन्होंने कृषकों, मज़दूरों और दलितों को ही शोषित वर्ग में शामिल किया है। इसके अलावा, उनका दलित चिंतन कही अधिक व्यापक और साधारणीकृत (generalised) और सर्वजनीन (universal) है। सामाजिक समतलीकरण के भावी दौर में जब सभी जातियाँ विलुप्त हो जाएंगी, लोगों में भेदभाव का आधार आर्थिक ही होगा और इस आर्थिक वैषम्य को प्रेमचन्द ने जितने व्यापक रूप से उजागर किया है, उतना किसी कहानीकार द्वारा अपने पूरे जीवनकाल में किया जाना दुष्कर लगता है। अस्तु, अधिकतर जातिविहीन समाज की अभिकल्पना करते हुए प्रथमतः वे मानते हैं कि समाज में ऐसे वर्गों की संख्या अधिक है, जो आर्थिक आधार पर दलित हैं, उपेक्षित हैं। उनके साहित्य में धनाढ्य वर्ग ही उच्च वर्ग के रूप में प्रभुत्त्व हासिल करता है तथा गरीब और विपन्न लोगों का दलन और शोषण करते हुए सामाजिक और राजनीतिक रूप से अभिभावी होता है। आज सत्तासीनों में उनका ही बहुमत बढ़ता जा रहा है जो विगत में महाजनी प्रथा और सामंती संस्कृति के उन्नायक थे तथा समाज में उनकी संख्या 3-4 फीसदी होते हुए भी समाज में उपलब्ध कुल सुविधाओं का लगभग 95% का उपभोग करते थे। बहरहाल, प्रेमचन्द, जातीय आधार पर दलितों के प्रति चिंता जताने के साथ-साथ, युवा और अर्थक्षम सदस्यों द्वारा मध्यम और उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों में स्त्रियों और वृद्धों के प्रति उपेक्षात्मक और शोषणात्मक रवैया अपनाए जाने पर बड़े व्यग्र नज़र आते हैं। बेशक जनरेशन गैप के कारण वृद्धों के लिए उत्पन्न कष्टकर अमानवीय स्थितियों का उल्लेख (बूढ़ी काकी) करने में भी वे बाजी मार जाते हैं। यह थीम मौज़ूदा कथाकारों में भी पूरी अभिव्यंजकता से विद्यमान है। जिन किसानों के प्रति वे आत्मीय और सहिष्णु रहे हैं, उनकी समस्याएं आज और भी विकट रूप से असमाधेय हो गई हैं। उनमें हाल ही में आत्महत्यात्मक प्रवृत्तियों का विकराल रूप लेना अनियंत्रणीय होता जा रहा है क्योंकि मौज़ूदा राजनीतिक व्यवस्था भी निरंतर उनके हितों की उपेक्षा करती जा रही है। प्रेमचंदीय काल में जो शोषक वर्ग, उच्च सामाजिक वर्ग से संबद्ध थे, वे आज राजनीतिक बल-प्रतिष्ठा प्राप्त कर उनका शोषण करने के लिए और अधिक पैने होते जा रहे हैं। निःसंदेह, तत्कालीन जमींदार, सेठ और महाजन न केवल किसानों और मजदूरों को ही अपने शोषण-चक्र का ग्रास बनाते थे अपितु निर्धन परिवारों में केंद्रीकृत आर्थिक ढाँचे के चलते जिस पर उन्हीं की पकड़ रहती थी, स्त्रियों, वृद्धों, बीमारों और बच्चों को भी इस कुचक्र का शिकार बनाते थे। प्रेमचन्दीय साहित्य में इस पूरे विषय पर समग्रतावादी रूप से चर्चा की गई है। बेशक! यह थीम वर्तमान कहानीकारों के लिए कोई नया नहीं है। हाँ, जहाँ प्रेमचन्द की कहानियों में शोषक और शोषित के बीच समझौतावादी नज़रिया अपनाया गया है, वहीं वर्तमान कहानीकारों और विशेषतया दलित कहानीकारों की कहानियों में शोषकों के प्रति शोषितों का विद्रोहात्मक स्वर अत्यंत प्रबल है। वे उनसे सामंजस्य स्थापित करने की बात सोच तक नहीं सकते। मौज़ूदा कहानीकार उस आदर्शवाद को अस्वीकार कर रहे हैं जिसमें शोषक वर्ग अंततोगत्वा पर्याप्त रूप से विनम्र होकर शोषितों के साथ तालमेल बैठाते हुए उसे उन समस्त सामाजिक सुविधाओं का हक़दार मानने लगता है, जिनका उपभोग वह स्वयं करता रहा है।

मौज़ूदा कहानियों में राजनीतिक कुचक्रों से उत्पन्न समाज में अराजक दशाओं का विश्लेषण और विवेचन प्रमुखता से किया जा रहा है तथा कहानीकार परोक्षतः प्रत्यक्षतः राजनीति का मार्गदर्शक बनने की भूमिका निभाना चाह रहा है। प्रेमचंदीय साहित्य में भी साहित्य को मार्गदर्शक और गाइड बताया गया है जैसाकि प्रेमचंद स्वयं स्वीकारते हैं, "साहित्य, राजनीति के पीछे चलने वाली चीज नहीं है, उसके आगे-आगे चलने वाली एडवांस गार्ड है। वह उस विद्रोह का नाम है जो मनुष्य के हृदय में अन्याय, अनीति और कुरुचि से उत्पन्न होता है।" साहित्य की इस भूमिका से कौन साहित्यकार अवगत नहीं है? तभी तो वह सामाजिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलावों के साथ-साथ राजनीतिक हथकंडों को आड़े हाथ लेने से बाज नहीं आता है। अपनी कहानी 'आहुति' (1930) में, प्रेमचन्द कहानी की नायिका रूपमणि की ज़ुबान से कहलवाते हैं, "साहित्य, देशभक्त और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है" और उक्त सच्चाई यह है कि राजनीतिक व्यवस्था को लोककल्याणकारी होना चाहिए जो नहीं है। इसका सैद्धांतिक परीक्षण प्रेमचन्द कर रहे थे जबकि राजनीति के मुखर व्यावहारिक स्वरूप को आज के कथाकार भोग रहे हैं। चूंकि राजनीति जनहितकारी नहीं है, इसलिए दोनों यानी प्रेमचन्द और वर्तमान लेखकगण राजनीतिक कुचक्रों की बखिया उधेड़ना अपना पुनीत कर्त्तव्य मानते हैं। किंतु, ख़ेद इस बात का है कि जहां प्रेमचन्दीय साहित्य में उच्चवर्ग आख़िरकार सहृदय हो जाता रहा है, यह राजनीतिक व्यवस्था न तो उनके समय में, न ही इस समय जनकल्याणकारी और सहृदय है। यद्यपि वे भिन्न होते हुए भी काफी हद तक गाँधीवादी सिद्धांतों में विश्वास रखते थे, तथापि वे उन सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से न अपनाए जाने पर चिंतित रहे हैं। किंतु, उन्हें इस बात पर पूरा यक़ीन था कि एक-न-एक दिन, जनता की शक्ति इस कुटिल राजनीति को अपने अनुकूल बना देगी। उनका कहना है, "हमारा स्वराज केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त कराना नहीं है, बल्कि सामाजिक जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है" और आज़ाद हिंदुस्तान का वह जुआ, जिसके बारे में प्रेमचन्द केवल कल्पना की थी, आज हमारे कुटिल राजनेताओं द्वारा खेला जा रहा है।

सांप्रदायिक सद्भाव के लिए उर्वर जमीन तैयार कर, उस पर सहिष्णुता, सामंजस्य और सहयोग की खेती करने की कोशिश ग़ुलाम हिंदुस्तान से लेकर आज तक बड़े नैष्ठिक रूप से, लेकिन विफलतापूर्वक की गई है। विफलता का यह दौर प्रेमचन्द के काफी पहले से शुरू होकर मौजूदा कथाकारों को लांघता हुआ असीम भविष्य तक चलता रहेगा। लेकिन, सांप्रदायिक सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश भी बरकार रहेगी। प्रेमचन्द ने 'कर्मभूमि' में आज़ादी की लड़ाई में मुस्लिमों के उल्लेखनीय योगदान को रेखांकित करते हुए सांप्रदायिक सौहार्द का जो बढ़िया मिसाल दिया है, उसका अक्स आज के कहानीकारों में भी कमोवेश मिलता है। किंतु, सांप्रदायिक सौहार्द एक ऐसी फसल है जिसे राजनीतिक कुचेष्टाओं की सर्द हवा ने बार-बार पाला मारकर नष्ट कर दिया। आज ख़ूंख़ार सांप्रदायिक दुराव के साथ-साथ जातीय भेदभाव भी अपने अनोखे रूप में घटित होता नज़र आ रहा है। एक ओर धार्मिक संकीर्णता से उत्पन्न अस्मिता की लड़ाई के लिए आतंकवाद का ख़ौफ़नाक़ चेहरा है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय जनसुविधाओं में, जिनमें राजनेताओं का दाँत गड़ा हुआ है, हिस्सेदारी के लिए सभी वर्गों के बीच छीना-झपटी का बौख़लाने वाला दृश्य है। जहाँ तक जनसुविधाओं में हिस्सेदारी का संबंध है, प्रेमचन्द सन 1927 से ही दलित चेतना की भभक को भाँपकर चौकन्ना हो गए थे जबकि डा0 अंबेडकर ने दलितों के हित में एक आंदोलन का विगुलनाद किया था। उस विगुलनाद की प्रतिध्वनि अछूतों के मंदिर में प्रवेश के मसले पर 'कर्मभूमि' में सुनाई देती है। तदनन्तर, उन्होंने 'ठाकुर का कुआं' और 'दूध का दाम' जैसी कहानियों में दलितों के प्रति किए जा रहे भेदभाव पर गंभीर चर्चा की।

बेशक! प्रेमचन्द जी ने ऐसा कोई रिक्त स्थान नहीं छोड़ा जिसे आसानी से भरा जा सके। सिर्फ़, 'गोदान' को ही अनुशीलन और शोध की परिधि में रखा जाए तो यह इकलौता उपन्यास ही सर्वकालिक समस्याओं के आईने के रूप में मानवीय जीवन को बहुआयामी रूप से बिंबित करता है। इसलिए, प्रेमचन्द जी के संबंध में यह कहना बेहद नामुनासिब होगा कि उनके द्वारा छोड़े गए रिक्त स्थानों को भरने के लिए कथाकारों को आगे आना चाहिए या ऐसे कथाकारों की ज़रूरत है।

(समाप्त)

डा. मनोज मोक्षेंद्र,

सी-66, 'विद्या विहार',

नई पंचवटी, जी.टी. रोड,

ग़ाज़ियाबाद, उ0प्र0,

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जीवन-चरित

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र {वर्ष 2014 (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके पूर्व 'डॉ. मनोज श्रीवास्तव' के नाम से लिखता रहा हूँ।}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

पिता: श्री एल.पी. श्रीवास्तव,

माता: (स्वर्गीया) श्रीमती विद्या श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल--जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ' नील्स प्लेज: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इन्कलाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6. 7-एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह--प्रतिलिपि कॉम), 2014; अदमहा (नाटकों का संग्रह--ऑनलाइन गाथा, 2014); 8--मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 9.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), शीघ्र प्रकाश्य

--अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

--Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

--इन्टरनेट पर 'कविता कोश' में कविताओं और 'गद्य कोश' में कहानियों का प्रकाशन

--महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट 'हिंदी समय' में रचनाओं का संकलन

--सम्मान--'भगवतप्रसाद कथा सम्मान--2002' (प्रथम स्थान); 'रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान--2012'; ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार 'बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक' घोषित; 'गगन स्वर' संस्था द्वारा 'ऋतुराज सम्मान-2014' राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक द्वारा 'साहित्य-भूषण सम्मान'; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान (मानद उपाधि)

"नूतन प्रतिबिंब", राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

लोकप्रिय पत्रिका "वी-विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमिक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, अम्स्टेल-गंगा, शब्दव्यंजना, अनहदकृति, ब्लिट्ज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में कम से कम 2500 से अधिक बार प्रकाशित

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मोबाइल नं० 09910360249, 07827473040, 08802866625

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भारत में आरक्षण की शुरुआत प्रमुख कारण वंचित समाज को प्रतिनिधित्व देना था। प्राचीन काल  से दलित एवं शोषित वर्ग को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने के प्रयास  से आरक्षण की शुरुआत हुई ,लेकिन आज ये बहुत बड़े विवाद का विषय बन कर हमारे  समाज को बाँट रहा है। जिन्हे  आज आरक्षण मिल रहा है उन्हें ही आरक्षण के सही अर्थ नहीं मालूम,लोग सिर्फ सरकारी संस्थानों एवं सरकारी नौकरियों में स्थान पाने को ही आरक्षण समझते हैं। 

                आरक्षण प्रतिनिधित्व के लिए हैं न कि नौकरी पाने के लिए, गरीबी दूर करने की योजना के अंतर्गत जो लाभ वंचित समूहों को दिए जाते है। लोग उन्हें आरक्षण मान कर अधिकार समझते है। आरक्षण किसी चिन्हित वंचित वर्ग को मुख्य धारा  में लाने  का साधन है,ताकि तंत्र में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के सहारे वह राष्ट्र के निर्माण में सहयोग प्रदान कर सके,ना कि नौकरी व रोजगार देकर कुछ व्यक्तियों का भला किया जा  सके। 

             संविधान के निर्माताओं का मानना था की जाति व्यवस्था के कारण  अनुसूचित जाति  एवं अनसूचित जन जाति ऐतिहासिक रूप से दलित रहे हैं उन्हें भारतीय समाज में समान अवसर नहीं दिया गया इसलिए राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी कम हैं। अतः भारतीय संसद में अनुसूचित जाति  एवं अनसूचित जन जाति के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण नीति का विस्तार किया गया। कम  प्रतिनिधित्व वाले समूहों की पहचान के लिए जाति ही सबसे कारगर मापदंड माना गया तभी से जाति गत आरक्षण की शुरुआत हुए हालाँकि कम  प्रतिनिधित्व वाले समूहों की पहचान के लिएअन्य मापदंड भी रखे गए जैसे लिंग ,अधिवास के राज्य ,ग्रामीण जनता आदि। भारत में प्राचीन कल से ही दलित की पहचान का मुख्य आधार अस्यपृश्यता है। किन्तु इस अस्यपृश्यता की अवधारणा का अभ्यास पूरे देश में एक सा नहीं था। भारत के दक्षिणी भाग में अस्यपृश्यता की अवधारणा अधिक प्रचिलित थी इस  कारण दलित वर्गों की पहचान कोई आसान काम नहीं था।    

   इसलिए समस्त प्रकार का  प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए अनुसूचित जाति  को 15 % व अनसूचित जन जाति को 7. 5 % के आरक्षण का प्रावधान रखा गया जिसकी अवधि 5 वर्ष रखी गयी एवं समीक्षा के उपरांत उसे बढ़ाने का प्रावधान भी रखा गया। 

   जातियों की सूचीकरण के  कार्य का लम्बा इतिहास है ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान सन  1806 से शुरू किया गया था इसमें देश की सामाजिक एवं आर्थिक रूप से विपन्न जातियों को शामिल किया जाने लगा था। 

1882 में हंटर आयोग की नियुक्ति हुई जिसमे महात्मा ज्योतिराव फुले ने निशुल्क अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग की थी।

1942 में बी.आर. अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों के उन्नयन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महा संघ की स्थापना कर दलितों के लिए आरक्षण के रूप में  प्रतिनिधित्व की मांग की थी।

1947 से 1950 तक संविधान सभा में बहस हुई एवं 10 साल तक राजनैतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए  अनुसूचित जाति  एवं अनसूचित जन जाति के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किये गए एवं हर दस साल बाद संविधान में संशोधन कर इन्हे बढ़ा दिया गया। 

   1990 में तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारशें लागू  कर आरक्षण विरोधी आंदोलन के शोलों को भड़का दिया। 

1991  में नरसिम्हा राव सरकार ने अगड़ी जाती के कमजोर लोगों को 10 % आरक्षण शुरू किया। 

2008 में सर्वोच्च न्यायालय ने "क्रीमी लेयर "को आरक्षणनीति के दायरे से बहार रखने का फैसला लिया।

     साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने सभी प्रकार के आरक्षण को 50 % तक सीमित कर दिया क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय का मानना  था की इस से अधिक आरक्षण  में समान अधिगम सुरक्षा का उल्लंघन होता है।

दरअसल संविधान की नीति एवं आरक्षण का प्रावधान तो सही था लेकिन समय के साथ ये नीति राजनीति बन गई। आरक्षण का उपयोग राजनैतिक मकसदों के लिए किया जाने लगा। आरक्षण पर वोट बैंक की राजनीति हावी हो गयी ,समाज को बाँट कर राजनैतिक लाभ लेने का माध्यम आरक्षण बन चुका है। आरक्षण की सुविधा को लोग अधिकार मान बैठे हैं। एवं दलित गावों में बैठा अभी भी प्रतिनिधित्व को तरस रहा है।दूसरी और मलाईदार फायदा उठा कर अपनी पीढ़ियाँ सँवार रहे हैं। 

आरक्षण के समर्थन में तर्क ------

आरक्षण समर्थकों का तर्क है की पिछले हज़ारों सालों की असमानता सिर्फ कुछ वर्षों की आरक्षण नीति से नहीं बदलने वाली है। आरक्षण कम प्रतिनिधित्व वाली जाति समूहों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का एकमात्र साधन है।  आरक्षण वास्तव में वंचित समूहों एवं हाँसिए  पर पड़े लोंगो के सफल जीवन जीने में मददगार है। प्रतिनिधित्व या आरक्षण से ग्रामीण क्षेत्रों के दलित समाज देश की मुख्य धारा में जुड़ सकेंगे एवं आरक्षण के द्वारा प्रतिष्ठित हो कर समाज में ऊँचा  स्थान मिलेगा जो उन्हें पिछले हज़ारों वर्षों से नहीं मिला। आरक्षण से जातिगत भेदभाव ख़त्म हो सकेगा।

आरक्षण के विरोध में तर्क ------

आरक्षण विरोधियों के अनुसार आरक्षण संकीर्ण राजनैतिक उद्देश्य की प्राप्ति का साधन है। आरक्षण प्रतिभाशालियों का दमन करता है व  उद्देश्य की गुणवत्ता को कम करता है। अगड़ी जाति के गरीब पिछड़ी जाति के अमीरों से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पीछे हैं। वास्तव में परंपरागत रूप से ब्राह्मण सबसे गरीब व पिछड़ी जाति है। हज़ारों वर्षो से भिक्षा यापन करके अपनी जिंदगी जीते है।  आरक्षण की नीति से प्रतिभा पलायन में वृद्धि हुई  है। प्रायवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई  प्रावधान नहीं है ,इस कारण सरकारी संस्थान गुणवत्ता में पीछे रह जाते हैं।

         भारतीय समाज में ऊँच  नीच के मायने जाति आधारित हैं लेकिन अन्य कारकों को भी नजर अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। आरक्षण का निर्णय उद्देश्य के आधार पर होना चाहिए। जिस दलित समूह या वंचित समूह को प्रतिनिधित्व देना है  अंतिम सदस्य तक इस सुविधा का लाभ पहुंचना  चाहिए,जो नहीं पहुंच रहा  है। एक उच्च अधिकारी ,विधायक, मंत्री जो  वंचित जाति से हैं क्या उनकी पीढ़ियों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए ? या जो वह लाभ गावों में बैठे सबसे दलित गरीब जो उसी वंचित समूह से है उसे मिलना चाहिए ये एक यक्ष प्रश्न  है।  सरकार को प्राथमिक शिक्षा पर यथोचित  महत्व देना चाहिए एवं आरक्षण को समाप्त करने के लिए कोई दीर्घकालिक योज़ना सभी पक्षों की सहमति से तैयार करना  चाहिए। जिन वर्गों  को आरक्षण  से बाहर रखा हैं उन वर्गों की भावनाओं को ध्यान  में रख कर उनके गरीब एवं प्रतिभा शाली  समूहों के लिए कोई कारगर नीति बनाना चाहिए ताकि उन्हें ये न लगे की उनके अधिकारों को छीन कर किसी और को दिया जा रहा है। वरना हरियाणा में जाटों ,राजस्थान में गुर्जरों एवं गुजरात में पाटीदारों के आंदोलनों की तर्ज पर देश के कई भागों में ये आक्रोश सरकार एवं देश के लिए नुकसान दायक हो सकता है। 

जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए एवं सामाजिक असमानता को मिटाने के लिए समग्र राष्ट्रीय चेतना को सामने रख कर सद्भाव पूर्ण माहोल तैयार करना चाहिए। 

      दलित एवं शोषित हर वर्ग हर जाति में हैं अगर हम राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ती एवं व्यक्तिगत हितों को त्याग कर  सभी जातियों के गरीब एवं शोषितों  के उत्थान के लिए उनको राष्ट्र की मुख्य धारा में जोड़ने के लिए संकल्पित हो जावें तो शायद  ये सामाजिक टकराव ,वैमनश्यता  दूर कर एक समता मूलक समाज की स्थापना कर सकते हैं।

   सुशील कुमार शर्मा

       ( वरिष्ठ अध्यापक)

अभी 31वीं दिसम्बर की रात लगभग सम्पूर्ण वैश्विक समुदाय पुराने साल के विदाई और नये साल के शुभारंभ के उत्सव मनाने हेतु प्रतीक्षारत और बिलकुल आतुर थे. रात 12 बजे के बाद जनवरी माह के आगाज के साथ नव वर्ष का आगमन हुआ और सम्पूर्ण विश्व आतिशबाजी के साथ ख़ुशी से झूमे, गाये, नाचे और आनंद सागर में गोते लगाये. प्रतीक्षारत लोगों में शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी खूब हुये. त्यौहारों का देश कहे जाने वाले भारतवर्ष भी इससे अछूता नहीं थे.

निःसंदेह वैश्विक समुदाय इस उत्सव के जमकर लुत्फ़ उठाये.  वास्तव में उत्सव होते ही हैं आनंद प्राप्ति के लिये और शास्त्रोक्त वचन हैं कि मनुष्य मात्र की उत्पत्ति आनंद से हुई है. इसलिए मानव मात्र के सहज स्वभाव आनंद प्राप्ति के स्त्रोत की खोज हैं और उस हेतु हमारा प्रयत्न निरंतर जारी रहता है. मनुष्य मात्र को आनंद की भूख है,सुख पाने हेतु बेचैनी है इसके लिये सभी अपने सामर्थ्यानुसार अनेक कार्य और जी तोड़ मेहनत करते हैं. वे अपने व्यापार और कार्यक्षेत्र का विस्तार करते हैं,ताकि अधिकाधिक आनंद और सुख प्राप्ति हेतु ज्यादा से ज्यादा भौतिक साधन उपलब्ध हो.

इसी कड़ी में वह सामाजिक व्यवस्था अथवा सरकार  सफल मानी जाती है जो अपने नीति और तंत्र से इस उद्यम में जनता-जनार्दन के निमित्त अधिकाधिक सहायता प्रदान करे. इस तरह स्पष्ट है कि जगत में जो कुछ भी कृत्य होते हैं वह उसके कृत्यकर्ता के अपने स्वभावानुसार अथवा स्व-चरित्रानुसार स्वयं आनंद के अनुभव प्राप्ति हेतु होते हैं. किंतु अल्प कालीन या क्षणिक सुख देने वाले वे सब भौतिक साधन क्या उस क्षण भी कुछ सुख दे सकते हैं जब आनंद या उत्सव मनाने के अवसर ही प्राप्त न हों,अर्थात आस पास के माहौल में अशांति हो?क्या होगा जब नजर के सामने अप्रीतिकर नजारे उपस्थित हों या बुरे खबर प्राप्त हों अथवा सामने कोई दयनीय स्थिति में ही हो. पता नहीं कितने दिनों तक वह दृश्य मन को अशांत करता रहे.  भौतिक सुख के साधन प्राप्य होने के बावजूद वैसे खबर मन को पीड़ा देती रहे. शायद जुबान से निकलने वाली सम्वेदना के प्रत्येक शब्द भी मन के उस पीड़ा को पूर्णतया बाहर उढ़ेल न सके.

किंतु नव वर्ष के आगमन के अगले ही दिन भारत में पठानकोट वायुसेना ठिकाना पर आतंकी हमला हुआ. भारतीय सुरक्षा व्यवस्था ने आतंकरोधी कार्यवाही में छह आतंकियों को मार गिराया किंतु मुठभेड़ करते हुये सात बहादुर जवान वीरगति को प्राप्त हुये और बाइस घायल बताये गये. इसके बाद भी जम्मू कश्मीर में आतंकी हमले हुये. भारत के जम्मू कश्मीर और एक लम्बे समय तक पंजाब प्रांत अर्थात भारतवर्ष आतंकवाद के शिकार रहे हैं,शायद इससे विश्व समुदाय भली भांति अवगत हैं. अभी पठानकोट आतंकी हमले में वीरगति प्राप्त जवान के परिजन और पूरे देश सन्तप्त हैं,किंतु दुःख के इस घड़ी में भी शहीद के परिजन अथवा सम्पूर्ण देश उचित उपाय और समुचित कार्यवाही की बातें करता है, न कि भावावेश में प्रतिशोध चाहते हैं. भारतीय संस्कृति और संस्कार स्पष्ट कहते हैं कि मानवीय धर्म अर्थात मानवीय गुण के संरक्षक नियम के संरक्षण हेतु शास्त्रों की और सुव्यवस्था रक्षण हेतु शस्त्रों का धारण करना नीति-सम्मत और उचित हैं. जबकि भारत युवाओं के देश हैं और मजबूत इरादों से धनी हैं तथा सामर्थ्यवान भी हैं,किंतु भारतीय संस्कृति में प्रतिशोध के लिए कभी जगह नहीं रहे और विश्व समुदाय के लिये भारत की यही सांस्कृतिक देन एक अमूल्य उपहार है. इस बात की पुष्टि वर्तमान में फेसबुक पर भिन्न-भिन्न लोगों के पोस्ट से होते हैं.

कुछ दिन पहले वैसी ही प्रतिक्रिया फेसबुक पर सम्वेदना व्यक्त करते कुछ टिप्पणियों में दिखीं जब पेरिस पर आतंकी हमला में अपने पत्नी को खो दिये एक फ्रांसीसी युवक जिसके नाम अब स्मरण नहीं,के पोस्ट फेसबुक पर वायरल हुये.  उस पोस्ट में अंकित बातें और टिप्पणियाँ मुझे पूरी तरह याद नहीं किंतु उस गमगीन युवक ने फेसबुक के माध्यम से अपने सात्विक विचार में दहशतगर्दों से कुछ सवालात करते हुये लिखा कि वह अपनी बच्ची के साथ अपनी पत्नी को ख्यालात में जिन्दा रखते हुये नये सिरे से जिंदगी शुरू कर रहे हैं और खुश है. वह उस आतंकी हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों के बारे में कुछ जानना तक नहीं चाहते. पता नहीं उस पोस्ट के संदेश किसी आतंकी तक पहुंचा भी या नहीं,और उसके कुछ फायदे हुये या नहीं?किंतु उपरोक्त तथ्य का समुचित जवाब पठानकोट आतंकी हमले के रूप में विश्व समुदाय के समक्ष है.

किंतु अति विचारणीय बात यह है कि पठानकोट आतंकी हमले से जुड़े खबर में यह भी एक अहम तथ्य सामने आया है कि एक आतंकी का अपने माँ से बातचीत हुई. उसने माँ से बताया कि वह सुसाइड मिशन पर है. माँ ने कहा कि बेटा पहले कुछ खा लेना. इससे स्पष्ट होता है की आतंकी और उनके परिवार के सदस्यों को यह पता था कि वह कौन सा और कैसे कृत्य कर रहे हैं एवं कैसे मिशन पर हैं. सभी राष्ट्र अथवा देश के बाह्यसुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा हेतू सुरक्षा व्यवस्था में अपनी सेना और पुलिस होते हैं और जरूरत पर बहुत से जवान राष्ट्र हित में मोर्चे पर जाते हैं,परंतु कोई जवान अनजाने में भी यह कदापि नहीं सोचते कि वह सुसाइड मिशन पर है. सही और गलत काम में फर्क  समझने में यह तथ्य काफी अहम और विचारणीय हैं.

फिर जानते हुये भी लोग कुकृत्य क्यों करते हैं? क्या केवल मजहब के लिए,लोभवश या गरीबी की वजह से? नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है. कोई मजहब करूणा रहित और मानवता के विरुद्ध नहीं हो सकते और जो मानवता के विरुद्ध कुछ कहे वह मजहब कदापि हो नहीं सकता. परिवार और समाज के सामने किसी एक का लोभ और मनमानी कदापि नहीं ठहरता. वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व और कृत्य उसके परिवार और मुख्यतः उसके समाज के दर्पण हैं और एक समाज वहाँ के अधिसंख्य लोग के व्यक्तित्व के दर्पण हैं. इसी तरह एक देश वहाँ के समाजिक और वैचारिक स्थिति और संस्कृति के मुखौटा मात्र हैं. फिर गरीब मेहनतकश हो सकते हैं,धैर्यवान हो सकते हैं,यद्यपि वह छोटी-मोटी गलतियां कभी कर सकते हैं,किंतु गलत राह पर नहीं चल सकते. यदि वैसा होता तब विश्व में कुछ धनवान को छोड़ कर बाकी के लोग सीमांत कृषक,छोटे व्यवसायी,नौकरी पेशा या मजदूर ही क्यों होते?इस तथ्य से वे सभी वाकिफ हैं,उपरोक्त माँ-बेटे के बातचीत के बारीकी से विश्लेषण करने पर यह भी स्पष्ट है कि उन्हें भी इस बात के इल्म हैं.

फिर वैसे कुकृत्य में संलिप्त होने के क्या वजह हो सकते हैं? यदि गम्भीरता से विचारा जाय तो प्रत्येक विघटनकारी और अनैतिक कर्म वहाँ के समाज के नैतिक पतन के परिचायक हैं.  उस समाज के लोग अपने निजी स्वार्थ सिद्धि हेतु प्रकृति और संपूर्ण सृष्टि में सह-अस्तित्व के सिद्धांतबोध से रहित,मानवीय धर्म के पालन और अपने सामाजिक तथा व्यक्तिगत कर्तव्य एवं  जिम्मेवारी के निर्वहन के प्रति लापरवाह हो सकते हैं.  उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं रहता कि सच्चे आनंद की प्राप्ति भौतिक साधनों में नहीं अपितु अपने सभी कर्तव्य और जिम्मेवारी के निर्वहन ही से प्राप्त हो सकते हैं. एक एककर छोटी छोटी अनैतिक बातें ही नजर अंदाज करने पर उनके समाज में वह अनैतिकता स्थाई हो जाते हैं,फिर उस समाज में विषम स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं. उस विषम स्थिति से लोगों में धीरे-धीरे जागरूकता का अभाव और नैतिकता का पूर्ण पतन होने लगता है,अशिक्षा,असंतोष और मनमानी बढ़ने लगता है. सीरिया को इसके जीवंत उदाहरण के रूप में लिये जा सकते हैं. फिर कोई स्वार्थी समाज के किसी व्यक्ति को अपने स्वार्थ साधने हेतु गलत रास्ते पर ले जाने के प्रयत्न करता है तब समूचा समाज ही मूक दर्शक बने रह जाते हैं.

उपरोक्त बातें समझने के लिए एक छोटा सा उदाहरण ही पर्याप्त होगा. जब उक्त फ्रांसीसी युवक का फेसबुक पर ऊपरवर्णित मर्माहत कर देने वाला पोस्ट दिखा तब उसमें बहुत सारे लाइक और हजारों समवेदनायुक्त टिप्पणियाँ थे. आतंकी हमले में पत्नी को खो देने के घटना ने उस युवक के हृदय पर निःसन्देह कुठाराघात किया, उससे बाहर आकर अपने धैर्य और विचार को एकत्र करना फिर प्रतिशोध की भावना को दूर रखते हुये पोस्ट करना निश्चय ही एक बहुत बड़ी बात है. यह किस तरह सम्भव हुआ? वैसा सिर्फ परोपकार के भावना ही से संभव हो सकता है कि संसार के कोई अन्य व्यक्ति आगे वैसे आतंकी घटनाओं के शिकार या पीड़ित ना बन जाये,ना कि सम्वेदना के चंद शब्दों के लिये. उनके दुःख किसी भी तरह चंद शब्दों से कम नहीं हो सकते,अपितु उनके जख्म पर मरहम अवश्य लगाये जा सकते है,किंतु वह भी उनके सार्थक उद्देश्य के पूर्ति के रूप में.

किंतु उनके सार्थक उद्देश्य की पूर्ति कैसे हो ? मन में वैसे विचार आने पर स्वतः जिज्ञासा जगना स्वाभाविक है की आखिर संसार में आतंकी घटना होते ही क्यों है,आस पास के संदिग्ध कार्यकलाप क्यों सामाजिक व्यवस्था तंत्र की नजर में आते नहीं या उन्हें इसकी समझ नहीं. किसी समाज के एक व्यक्ति आतंकवादी विचारधारा से प्रभावित होते चले जाते हैं तब उस समाज के अन्य लोगों को इसका पता क्योंकर नहीं चलता. कुछ विद्वानों के किसी समस्या पर राय है कि किसी गाँव या देश अथवा विश्व की स्थिति क्यों नहीं सुधरती,क्योंकि वहाँ जनसामान्य में जागृति नहीं होती. वहां किसी समस्या के समाधान सोचने के सम्बंध में गरीब में हिम्मत नहीं, मध्यम वर्ग को फुर्सत नहीं और अमीरों को जरूरत नहीं हैं. ये बातें कुछ विषय पर अंशतः सत्य हो सकते हैं क्योंकि जो इच्छा हृदय से होते हैं अर्थात जिन बातों पर हमारा विश्वास और जाग्रति हो उसके पूर्ति हेतु हर मुश्किल से सामना हेतु तैयार रहते हैं और इतिहास गवाह हैं कि ऐसे में हर असंभव काम भी संभव हुये. फिर आनंद प्राप्ति हृदय से किसे अच्छे नहीं लगते? फिर आतंकवाद जैसे कुकृत्य में बढ़ोतरी के क्या वजह हो सकते हैं?

शायद इसके आग्रांकित कारण हो सकते हैं. यह कि आज एकल परिवार में भी लोग तनाव और अविश्वास में जी रहे हैं,बाप-बेटे और शौहर-बेगम के बीच तनाव हैं,व्यवसाय के तनाव तो अलग ही हैं. शायद स्वयं के इसी तनाव की वजह से उन्हें आसपास की संदिग्ध गतिविधि भी सामान्य सा अनुभव होते हों. अर्थात हर बात को हल्के में लेने की आदत बन गई हों,इस बात की पुष्टि हेतु उस फ्रांसीसी युवक के पोस्ट पर टिप्पणी में सम्वेदना व्यक्त करते हुये इस आशय की एक राय जोड़ा कि इस दुखद घटना से जनसामान्य,विशेषकर युवाओं को भी स्वयं सचेत होना चहिये की वे अपने बुजुर्गों और आदरणीय व्यक्ति के सदैव सम्मान करें और उन पर  बारम्बार अपमान या दोषारोपण करने की कोई  कुवृति हों तो उन्हें उसका त्याग करनी चाहिये. क्योंकि बुजर्गों का प्रत्येक बार का अपमान करना भी हरेक बार  उनके जीते जी मारने या हत्या करने के समान हैं. किंतु फेसबुक पर आजतक उस राय पर एक भी पसंद या नापसंद से सम्बंधित सूचनाएं प्राप्त नहीं हुई.

माना कि वह राय थोड़ा लीक से हटकर और उस पोस्ट के पूर्णतः अनुरूप नहीं थे,किंतु वह वर्तमान सामाजिक परिस्थिति के बिलकुल विपरीत तो  नहीं थे. क्या वैसा भी हो सकता है कि पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने वाले केवल अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और पहले से मौजूद टिप्पणियाँ नहीं पढ़ते? यदि वैसा है तब तो और भी गम्भीर स्थिति हैं. क्योंकि फेसबुक का उपयोग वही कर सकते हैं जो साक्षर अवश्य होंगे. यदि विश्व के साक्षर जन भी लापरवाह हो जाय फिर भले की आशा क्या हो सकती है? यदि पढ़कर नजरअंदाज की कोशिश हुई,तो इसके दो ही अर्थ हो सकते हैं. पहला यह कि हमारे समाज में वास्तव में वह समस्या हैं और जन सामान्य उस समस्या का होना स्वीकारना नहीं चाहते अर्थात शरमाते हैं. दूसरा यह कि वह समस्या विकट रूप में मौजूद हैं किंतु स्वार्थवश लोग उससे बाहर आना नहीं चाहते अर्थात अनैतिकता के शिकार हैं. यह दोनों ही स्थिति अत्यंत गम्भीर हैं.

वैसी स्थिति में यदि कोई सच्चे व्यक्ति अनैतिकता के विरोध में आवाज उठता है,तब अन्य उसे हल्के में लेते हैं अथवा उसके समर्थन से पहले अपने निजी स्वार्थ पूर्ति हेतु अपने-अपने तराजू में तौलने लगते हैं. सबसे बड़ी बात तो यह की समय रहते सही तथ्यों, बातों की जाँच-परख सच्चे लोग कर पाये अनैतिक कार्यों में लिप्त लोग उन तथ्यों के परख कर उसे दबाने के हर सम्भव उपाय कर चुके होते हैं. बल्कि इससे आगे बढ़कर तो वैसे लोग समाज से हमदर्दी जताने के स्वांग भी रच चुके होते हैं. जिसका सीधा अर्थ यह भी होता है की ईमानदारी के पक्षधर हमेशा जागृत नहीं रहते और अनैतिकता के सिपहसलार भय से ही सही पहले सक्रिय हो जाते हैं. इसीलिए आनंद प्राप्ति के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को निजी स्वार्थ के दायरे से बाहर आकर सत्य और सृजनात्मक कार्यों में न केवल भावनात्मक और वैचारिक सहयोग करना अपेक्षित है अपितु सदैव सतर्क भी रहने की जरूरत है. इन सब कार्यों में तभी वांछित सफलता मिल सकती है जब प्रत्येक सामाजिक व्यक्ति स्वचरित्र सुधार से प्रारम्भ करे. जुझारू होने के माद्दा स्वयं में विकसित करें और स्वयं आत्म चिंतन की ओर उन्मुख हों तथा सभी तरह से स्वयं में आत्मबल सशक्त करें.

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(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

महात्मा गांधी -माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि पर विशेष 

तारीख, तीस जनवरी

-मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक

तारीख, तीस जनवरी। साल भले ही अलग अलग हों किन्तु भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण तारीख है। इस दिन शांति एवं अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई थी और इसी तारीख पर दादा माखनलाल ने अंतिम सांस ली थी। गांधीजी और माखनलाल जी का हमारे बीच में नहीं रहना ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई शायद कभी न हो पाये। यह सुखकर है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में जो आदर्श स्थापित किया, भारत को एक नयी दृष्टि दी और देश के प्रति लोगों में जो ऊर्जा का संचार किया, वह उनकी उपस्थिति दर्ज कराती रहेगी। 

भारत वर्ष हमेशा इस बात के लिए हमारे उन पुरखों का कर्जदार रहेगा जिन्होंने हमें पराधीनता से मुक्त कराया। समय-समय पर हम उन सबका स्मरण इसलिए करते हैं ताकि नयी पीढ़ी को इस बात का ज्ञान रहे कि हमारे पुरखों के पास अदम्य साहस था, दृष्टि थी और आत्मविश्वास। साथ में था देशभक्ति का एक ऐसा गुण जो हर भारतीय के लिए कल भी जरूरी था और आज भी है और जब तक यह धरती है, जरूरत बनी रहेगी। छोटी-छोटी बातों को लेकर, सम्प्रदाय और सीमा को लेकर जो बहस और अनबन बनी रहती हैं, वह शायद भारत की प्रकृति नहीं है और हम सब भारत की प्रकृति के प्रतिकूल आचरण कर रहे हैं। इन्हीं सब बातों को एक नई दृष्टि से देखने और समझने के लिए अपने पुरखों का स्मरण करना जरूरी हो जाता है।

यूं तो भारत 15 अगस्त 1947 को ही अंग्रेजी राज्य से मुक्त हो गया था लेकिन सच तो यह है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी हम मानसिक दासता के शिकार हैं। हमारी मन की खिड़कियों को हम खोल नहीं पाये हैं। आज भी हमारा व्यवहार और सोच का जो ढंग है, वह 16वीं, 17वीं शताब्दी के समय से भी ज्यादा सकीर्ण दिखता है। कहने के लिए हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के पहरूये हैं लेकिन हम जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, वह हमारी लोकतांत्रिक परम्पराओं को आघात पहुंचाते हुए दिखता है। महात्मा गांधी का सत्याग्रह का सीधा अर्थ था सत्य के प्रति आग्रह लेकिन हम इस सत्याग्रह से दूर हो चुके हैं। सत्य के प्रति हमारा आग्रह का कोई भाव बचा ही नहीं बल्कि असत्य के प्रति हमारा अनुराग बढ़ा है। हमारा यही विचार और यही व्यवहार नवागत पीढ़ी को हस्तांतरित हो रहा है जिसमें खुलेपन की जगह उच्चश्रृंखलता का भाव दिखता है। इसका उदाहरण कुछ साल पहले तब देखने को मिला जब पहली बार एक छोटी बच्ची ने सूचना के अधिकार के जरिए सवाल पूछा था कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा किस कानून के तहत दिया गया? यह सवाल चौंकाने वाला नहीं बल्कि पूरे देश को शर्मसार करने वाला था। आजादी का मतलब उच्चश्रृंखलता नहीं और आज हमारे देश में आजादी का अर्थ यही लगाया जा रहा है। 

यह समय कठिन होता जा रहा है। संचार के साधनों में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ विचार प्रवाहमान हुए हैं लेकिन ज्यादतर समय अनियंत्रित होकर। अखबारों से आरंभ हुई पत्रकारिता रेडियो और इसके बाद टेलीविजन से होते हुए संचार के नए साधनों तक पहुंची जिसे सोशल मीडिया पुकारा गया। पत्रकारिता नेपथ्य में पहुंच गई और मीडिया ने पूरा कब्जा कर लिया। गांधीजी ने स्वाधीनता आंदोलन के लिए पत्रकारिता को माध्यम बनाया था और अन्य दिग्गजों के साथ  मध्यप्रदेश माटीकुल के सुपुत्र पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने भी कर्मवीर के माध्यम से समाज को जागृत किया। दादा के नाम सुविख्यात माखनलाल की अनेक अमर कालजयी कविताएं हैं जो आज भी मन को उत्साहित करती हैं।

बापू और दादा माखनलाल देशभक्त होने के साथ कलम के सिपाही भी थे। अपनी इस कला का उन्होंने पराधीन भारत को जागृत करने के लिए भरपूर उपयोग किया। इन दोनों महानुभावों की पत्रकारिता पर नजर डाली जाए तो हम पाएंगे कि सीमित संसाधनों में की गई उनकी पत्रकारिता के समक्ष हम अपनी अंगुली भर उपस्थिति दर्ज कराने में नाकामयाब हैं। उनके विचार और उनकी दृष्टि उच्च और व्यापक थी, संकीर्णता रत्तीभर नहीं थी और लेखन में रंज का कोई स्थान नहीं था। देश के बैरियों के लिए उनकी कलम आग उगलती थी लेकिन शब्दों पर संयम और नियंत्रण था। वे रौ में बहकर नहीं लिखते थे बल्कि जोश में लिखते थे। 

तारीख, 30 जनवरी के बहाने जब हम इनका स्मरण कर रहे हैं तो इस बहाने आज की पत्रकारिता पर दो बातें कर लेना गैर-जरूरी नहीं होगा। एक तो यह कि जब हम आज बात कर रहे हैं तब पत्रकारिता शब्द विलोपित हो चुका है और मीडिया की चर्चा कर रहे हैं। दुर्भाग्य की बात है कि जैसे-जैसे मीडिया का विस्तार हो रहा है, हम संसाधनों में तो धनी और सम्पन्न हो रहे हैं किन्तु विचारों की दृष्टि से कुछ कमजोर। इससे भी आगे हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों ने वर्षों पत्रकारिता को जिया और समाज में पत्रकारिता के कारण अपना स्थान बनाया, वे भी पत्रकारिता में आयी गिरावट या क्षरण का रोना रोते दिखते हैं। जिनके कंधों पर समाज की जवाबदारी हो और वही रोता-बिसूरता दिखे तो समाज किससे अपेक्षा खत्म नहीं हो जाएगी? जिस देश में महात्मा की पत्रकारिता अंग्रेजों को देश छोडऩे के लिए मजबूर कर देती है, उस देश में पत्रकारिता के लिए विलाप कोई अच्छी बात नहीं है। मेरी व्यक्तिगत समझ कहती है कि पत्रकारिता से हम हैं तो हमें अपना घर खुद ठीक करने की पहल करनी होगी। पत्रकारिता की नयी पीढ़ी अगर पत्रकारिता की शर्तों पर खरी नहीं उतर रही है तो हमें प्रशिक्षण के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना होगा। आखिरकार जिस पत्रकारिता ने हमें सबकुछ दिया, उसे बनाये रखने के लिए कौन पहल करेगा? दादा माखनलाल लिखते हैं कि धनिकों के हाथों में न तो पत्र सुरक्षित रहता है और न पत्रकारिता। ऐसे में हम सबको तारीख 30 जनवरी को इस मायने में सार्थक बना देना चाहिए जब हम अभियान के तौर पर न सही, अपने अपने स्तर पर महात्मा, पराडक़र, विद्यार्थी, सप्रे, दादा माखनलाल आदि-इत्यादि के बनाये रास्ते पर चलने के लिए नयी पीढ़ी को प्रेरित करने का संकल्प लें। 

विलाप पत्रकारिता की शुचिता का कोई मार्ग नहीं है और न ही समाज और देश की बेहतरी इससे हो सकती है। पोल-खोल की पत्रकारिता के इतर सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता भारतीय समाज की आवश्यकता है। अरबों की जनसंख्या वाले देश में करोड़ों के पास साफ पीने का पानी नहीं, इलाज की सुविधा नहीं, शिक्षा के नाम पर केवल लीपापोती और ऐसी अनन्य समस्याओं से दो-चार होते इस देश को कोई दिशा दे सकता है तो वह पत्रकारिता है और पत्रकारिता स्वयं विलाप करे, यह उचित नहीं है।  पत्रकारिता नये दौर में है, उसके समक्ष नई जिम्मेदारियां हैं और वह आधुनिक संसाधनों से लैस है। ऐसे में हम सब मिलकर पत्रकारिता को वह स्वरूप दें जिसमें उसकी सामाजिक सरोकार, जवाबदारी और पत्रकारिता का धर्म निभ सके।

मोबा 9300469918 

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