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अंगुलिमाल / कहानी / शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

पूर्व प्रसंग  समय लगभग ईस्वी पूर्व 500. ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध लोगों तक अपनी देशना पहुँचाने के लिए गाँव गाँव भ्रमण करते थे. भ्रमण करते हुए एक बार वह कोशल महाजनपद की राजधानी सावत्थी (श्रावस्ती) के एक गाँव में थे. वहाँ वह अपने शिष्यों के बीच अपनी देशना देते थे. आस-पास के गाँव के लोग भी उनकी देशना सुनने आते थे. धर्म-देशना के समय तथागत को अनुभव हुआ कि गाँव के लोग कुछ सहमे-से लग रहे हैं. कोई भी पुरवासी खुले मन से इस देशना में नहीं आ रहा. जो आ रहे हैं उनका भी ध्यान देशना को सुनते समय उनकी ओर न होकर अन्य ओर विचलित होता रहता है जैसे कि उनके मन में उनकी ओर किसी हानि पहुँचाने वाले तत्व के आ जाने का भय लगा हो. उन्होंने इस भासित होने वाले तथ्य से अपने शिष्यों को आगाह किया. क्योंकि वे भिक्षाटन के लिए गाँवों में जाते रहते है. उन्होंने स्वयं भी पुरवासियों की मनस्थिति को जानने की चेष्टा की. उन्हें ज्ञात हुआ कि इस अंचल के पुरवासियों के मन पर किसी अंगुलिमाल नाम के डाकू का आतंक छाया हुआ है. वह दुर्दांत है. वह जंगल से होकर जानेवाले पथिकों और व्यापारियों की हत्या कर उनके दाएँ हाथ की एक-एक उँगली क…

अमृता शेरगिल : फूलों के रंगों पर खुशबू के हस्ताक्षर की मिसाल ! / आलेख / डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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गूगल ने मशहूर भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की 103वीं जयंती निराले अंदाज़ में मनाई। इस खास दिन को यादगार बनाने के लिए गूगल ने तीन महिलाओं की एक साधारण सी दिखने वाली तस्वीर को डूडल के रूप में पेश किया है। आज भी अमृता शेरगिल को भारत की श्रेष्ठतम महिला चित्रकार के रूप में देखा जाता है। स्मरणीय है कि अमृता शेरगिल की गणना एक असाधारण प्रतिभाशाली कलाकार के रूप में की जाती है। पेरिस में लगने वाली ग्रैंड सेल में एक एसोसिएट के रूप में चुनी गईं वे न केवल एक युवा कलाकार थीं बल्कि एकमात्र एशियाई कलाकार भी थीं। उनके चित्र पाश्चात्य चित्रकला पद्धति की नायाब मिसालों की मानिंद हैं। मनोभावों की गहराई और रंगबोध की ऊंचाई उनके चित्रों में साथ-साथ महसूस जा सकती हैं।  गौतलब है कि अमृता के भीतर के चित्रकार को उनकी माँ ने बहुत जल्द ताड़ लिया था। उन्होंने अमृता को भरपूर प्रोत्साहित किया। यही कारण है कि अमृता को दुनिया के कई महान चित्रकारों का मार्गदर्शन मिल सका। वे यूरोप में रहीं किन्तु भारत लौटने के बाद ही उनकी प्रतिभा को नई पहचान मिली। उन्होंने तय किया कि अपनी पैनी नज़र और अपने हुनर से वह भारतीय जीवन के विविध रं…

भारत का अगला क्रांतिकारी चरण तकनीकी के वेश मे पदार्पण करेगा - ललित याज्ञिक

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भारत का अगला क्रांतिकारी चरण तकनीकी के वेश मे पदार्पण करेगा - ललित याज्ञिक अंतर्राष्ट्रीय आईटी विशेषज्ञ ललित याज्ञिक से हरिहर झा की बातचीतठीक ही कहा है, भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। उसे दूर करने के उपाय ढूंढने में लग जाना चाहिये। लेकिन क्या इस क्षेत्र में तकनीकी कुछ मदद कर सकती है? इतिहास साक्षी है छोटे-मोटे तकनीकी-नवीनीकरण का श्रेय भले व्यापार-विश्लेषण को जाता है पर शत-प्रतिशत नवीनीकरण में सफलता तब मिली ठीक है जब हालात से चिढ़ी हुई जनता को तकनीकी विशेषज्ञों की टीम का सहारा मिला हो। तो तकनीकी क्षेत्र के दुरूह प्रश्नों के जवाब के लिये हम श्री ललित याज्ञिक से रूबरू होते हैं जो उभरती तकनीकी को उपयोग में लाने के विशेषज्ञ हैं। ललित आईटी के क्षेत्र में व्यवसायिक समस्याओं के सलाहकार हैं। आईबीएम की ‘स्मार्टर प्लेनेट सोल्यूशन्स’ टीम जो भारत, आस्ट्रेलिया और पूर्वी यूरोप आदि देशों में विकास के व्यवसाय से संबंध रखती हैं, उसमें कार्यकारी शिल्पकार हैं तथा आईबीएम एकेडमी ऑफ़ टेक्नोलोजी में तकनीकी नेतृत्व की टीम के सदस्य हैं और दक्षिण पूर्वी एशिया के राष्ट्रीय संघ (ॠच्कॠग़्) में तकनीक…

होरी / कहानी / राजू सुथार 'स्वतंत्र'

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होरी जो बिसू की सबसे छोटी बेटी है जो कि बिल्कुल ही भोली-भाली अज्ञान एवं अशिक्षित है पिता बिसू जो काफी गरीब है दिनभर मेहनत करने पर दो वक़्त की रोटी मिलती है इन की तीन बेटियां है उसमें से होरी भी एक है । वहीं मां त्रिशला ज्यादातर घरेलू कामों में ही व्यस्त रहती है । होरी का जब जन्म होता है तो घर वालों में काफी खुशी रहती है तब उनकी दादी भी बहुत खुशी व्यक्त करते हैं परंतु कुछ समय पश्चात इनका निधन हो जाता है । होरी एकदम कुरूप थी इस वजह से आस पड़ोस वाले इसका मजाक उड़ाते रहते हैं तथा उपेक्षा करते है जैसे - जैसे होरी बड़ी होती है वैसे वैसे उपेक्षाओं का कहर बरसता रहता है । होरी जब 5 साल की हो जाती है तो नजदीकी शाला में दाखिला करा दिया जाता है इसी बीच शक्ल से कुरूप होने के कारण पड़ोसी तो उपेक्षा करते ही है लेकिन अब शाला के दूसरे बच्चे भी उसका मजाक उड़ाते हैं तंग करते , उपेक्षा भी होती रहती है इसी कारण मात्र 17 दिनों के भीतर होरी विद्यालयी शिक्षा को त्याग देती है मां बाप के कहने पर भी वह शाला नहीं जाना चाहती है दूसरी बेटियां भी अशिक्षित ही होती है इस कारण खेतों में काम पर लग जाते हैं बाप बिसू और म…

स्खलित नैतिकता के झंडाबरदार / व्यंग्य / डॉ.गुणशेखर

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अभी कुछ दिनों पहले मेरा मित्र गिरगिट दौड़ा-दौड़ा आया और हाँफते हुए बोला कि आज एक नागा पदमसिड़ी  देखा है.वह अपनी फ़िल्म के लिए न्यूड हुआ था.उसने उसके नंगे होने के साथ कई हीरोइनों के पोस्टरों को भी देखा .वे भी इसी पुनीत कर्म के लिए जगजाहिर हुई थीं.यह तो गर्व से सीना ताने अंगप्रदर्शन कर रहा था.पता नहीं किस ज़माने का बाज़ा लिए खड़ा था.मेरे साथ ही मेरा  दोस्त भी ठेके से पीके निकला तो सामने एक पोस्टर को देखके नशे में बोला,"इस  पोस्टर को फाड़के रख देने का मन होता है."मैंने तो ऐसे पोस्टरों में कई-कई बार ऐसी महिलाएँ भी देखी थीं लेकिन वे शर्मसार थीं.               अगर जनता के जूतों का डर न होता तो ये हीरो कबका बाजा-बूजा फेंकफांक के भांगड़ा करने लग जाता.मन  तो यह भी हुआ कि तान के ऐसी लात दूँ कि बाज़ा ही बज जाए साला । घूमते-घूमते हम काफी दूर निकाल गए थे। थोड़ी देर बाद गिरगिट का मन बदला और वह हमारी ओर मुखातिब होके बोला," हो न हो पागल हो गया हो."हमने हामी भरके बात को घुमाना चाहा। लेकिन उसी समय एक मूर्ति सामने उभरी। वो कोई और नहीं हमारे इलाके के  एक झलरिया बाबा थे.वे…

जो रोना रोता है, सहानुभूति पा लेता है / आलेख / डॉ. दीपक आचार्य

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कर्म क्षेत्र के मामले में दो प्रकार के लोग हैं। एक वे जो चुपचाप अपने काम से काम करते रहते हैं और अपने कर्मयोग को आकार देते हुए आत्म मुग्ध व आत्मतोष के साथ जीवन जीते है।न उपहारों की अपेक्षा रखते हैं, मुद्रा के लोभी या लालची। इन लोगों को अपने किए हुए कामों के लिए किसी से धन्यवाद तक की अपेक्षा या और कोई आशा नहीं होती।ये ही वे लोग है जो असली कर्मयोगी हैं और इन्हीं के भरोसे हमारी सभी व्यवस्थाएं पूरी गंभीरता व शालीनता के साथ पूरी हो रही हैं।दूसरी किस्म में दो-तीन प्रकार के लोग होते हैं। इनमें से आधे लोग अपने हर किए काम के लिए भी प्रतिफल चाहते हैं और उन कामों का श्रेय भी ले उड़ना चाहते हैं जिन कामों में इनका किंचित मात्र भी योगदान नहीं रहता।इनकी आधी से अधिक प्रजाति उन लोगों की है जो अपने मामूली से मामूली कामों के लिए भी हर दिन ताकत लगाकर रोना रोते रहते हैं।ये लोग कोई सा काम प्रसन्नतापूर्वक नहीं कर सकते। इनका यह रोना दिन उगने से लेकर रात तक यों ही चलता रहता है। अपना रोना रोने के लिए ये लोग न कोई संजीदा लक्ष्य समूह देखते हैं, न पात्र देखते।जहाँ कहीं ये जाएंगे वहां किसी न किसी बात का रोना शुरू क…

प्रेमचन्दीय थीम पर पाद टिप्पण / आलेख / डॅा0 मनोज मोक्षेंद्र

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वर्ष 2004 में 'हंसाक्षरट्रस्ट' द्वारा कहानी विधा पर 'प्रेमचन्दकथा-सम्मान' के लिए वरिष्ठ कथाकार कमलेश्वर के सौजन्य से अखिल भारतीय स्तर पर एक कहानी प्रतियोगिता के आयोजन की घोषणा की गई थी। निःसंदेह, काफी संख्या में प्रविष्टियाँ आई होंगी और अच्छी कहानियाँ भी आई होंगी क्योंकि पुरस्कार राशि 51,000/- रुपए थी । इससे सर्वकालिक कथा-सम्राट प्रेमचन्द के चहेतों को अपार प्रसन्नता हुई थी। चूँकि यह प्रतियोगिता मुंशी प्रेमचन्द की स्मृति में घोषित की गई थी, इसलिए ज़्यादातर कथाकारों ने प्रेमचन्दीय ढर्रे पर, उनकी भाषा-शैली, उनके अनुरूप विषय और कथानक के अनुसार कहानियाँ लिखकर भेजी होंगी ताकि प्रेमचन्दीय परंपरा को तरोताज़ा बनाया जा सके। बहरहाल, आयोजकों को तत्काल अपनी गलती महसूस हुई कि यदि प्रेमचन्द्रीय परंपरा के अनुरूप किसी कहानी को सम्मानित किया जाता है तो उक्त परंपरा के पुनः लोकप्रिय होने की संभावना प्रबल हो जाएगी और ऐसी स्थिति में उनके द्वारा थोपे जा रहे कहानी सिद्धांतों को मात भी खानी पड़ सकती है। किंतु, प्रतिभागियों और प्रेमचन्द के प्रशंसकों को निराशा इस बात से हुई की उस प्रतियोगिता को यह …

आरक्षण ----वंदन या क्रंदन/ आलेख / सुशील कुमार शर्मा

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भारत में आरक्षण की शुरुआत प्रमुख कारण वंचित समाज को प्रतिनिधित्व देना था। प्राचीन काल  से दलित एवं शोषित वर्ग को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने के प्रयास  से आरक्षण की शुरुआत हुई ,लेकिन आज ये बहुत बड़े विवाद का विषय बन कर हमारे  समाज को बाँट रहा है। जिन्हे  आज आरक्षण मिल रहा है उन्हें ही आरक्षण के सही अर्थ नहीं मालूम,लोग सिर्फ सरकारी संस्थानों एवं सरकारी नौकरियों में स्थान पाने को ही आरक्षण समझते हैं।                  आरक्षण प्रतिनिधित्व के लिए हैं न कि नौकरी पाने के लिए, गरीबी दूर करने की योजना के अंतर्गत जो लाभ वंचित समूहों को दिए जाते है। लोग उन्हें आरक्षण मान कर अधिकार समझते है। आरक्षण किसी चिन्हित वंचित वर्ग को मुख्य धारा  में लाने  का साधन है,ताकि तंत्र में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के सहारे वह राष्ट्र के निर्माण में सहयोग प्रदान कर सके,ना कि नौकरी व रोजगार देकर कुछ व्यक्तियों का भला किया जा  सके।               संविधान के निर्माताओं का मानना था की जाति व्यवस्था के कारण  अनुसूचित जाति  एवं अनसूचित जन जाति ऐतिहासिक रूप से दलित रहे हैं उन्हें भारतीय समाज में समान अवसर नहीं दिया गया इसलि…

आनन्द प्राप्ति के सटीक उपाय / आलेख /प्रदीप कुमार साह

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अभी 31वीं दिसम्बर की रात लगभग सम्पूर्ण वैश्विक समुदाय पुराने साल के विदाई और नये साल के शुभारंभ के उत्सव मनाने हेतु प्रतीक्षारत और बिलकुल आतुर थे. रात 12 बजे के बाद जनवरी माह के आगाज के साथ नव वर्ष का आगमन हुआ और सम्पूर्ण विश्व आतिशबाजी के साथ ख़ुशी से झूमे, गाये, नाचे और आनंद सागर में गोते लगाये. प्रतीक्षारत लोगों में शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी खूब हुये. त्यौहारों का देश कहे जाने वाले भारतवर्ष भी इससे अछूता नहीं थे. निःसंदेह वैश्विक समुदाय इस उत्सव के जमकर लुत्फ़ उठाये.  वास्तव में उत्सव होते ही हैं आनंद प्राप्ति के लिये और शास्त्रोक्त वचन हैं कि मनुष्य मात्र की उत्पत्ति आनंद से हुई है. इसलिए मानव मात्र के सहज स्वभाव आनंद प्राप्ति के स्त्रोत की खोज हैं और उस हेतु हमारा प्रयत्न निरंतर जारी रहता है. मनुष्य मात्र को आनंद की भूख है,सुख पाने हेतु बेचैनी है इसके लिये सभी अपने सामर्थ्यानुसार अनेक कार्य और जी तोड़ मेहनत करते हैं. वे अपने व्यापार और कार्यक्षेत्र का विस्तार करते हैं,ताकि अधिकाधिक आनंद और सुख प्राप्ति हेतु ज्यादा से ज्यादा भौतिक साधन उपलब्ध हो. इसी कड़ी में वह सामाजिक व्यवस्था…

दादा माखनलाल चतुर्वेदी / आलेख / मनोज कुमार

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महात्मा गांधी -माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि पर विशेष  तारीख, तीस जनवरी -मनोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक तारीख, तीस जनवरी। साल भले ही अलग अलग हों किन्तु भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण तारीख है। इस दिन शांति एवं अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई थी और इसी तारीख पर दादा माखनलाल ने अंतिम सांस ली थी। गांधीजी और माखनलाल जी का हमारे बीच में नहीं रहना ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई शायद कभी न हो पाये। यह सुखकर है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में जो आदर्श स्थापित किया, भारत को एक नयी दृष्टि दी और देश के प्रति लोगों में जो ऊर्जा का संचार किया, वह उनकी उपस्थिति दर्ज कराती रहेगी।  भारत वर्ष हमेशा इस बात के लिए हमारे उन पुरखों का कर्जदार रहेगा जिन्होंने हमें पराधीनता से मुक्त कराया। समय-समय पर हम उन सबका स्मरण इसलिए करते हैं ताकि नयी पीढ़ी को इस बात का ज्ञान रहे कि हमारे पुरखों के पास अदम्य साहस था, दृष्टि थी और आत्मविश्वास। साथ में था देशभक्ति का एक ऐसा गुण जो हर भारतीय के लिए कल भी जरूरी था और आज भी है और जब तक यह धरती है, जरूरत बनी रहेगी। छोटी-छोटी बातों को लेकर, सम्प्र…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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