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February 2016
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प्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता हैं. इसे आम बजट इसीलिये कहाँ जाता हैं क्योंकि ये आम के सीजन के पहले आता है. बजट पेश करने के पीछे आय-व्यय का वार्षिक लेखा -जोखा रखना तो गौण कारण हैं इसके पीछे (सुविधानुसार चाहे तो आगे भी मान सकते हैं)मुख्य कारण ये हैं की बजट पेश करने से जनता में संदेश जाता हैं की सरकारे केवल "ऐश और केश" ही नहीं कर रहीं हैं बल्कि कुछ "पेश" भी कर रही हैं। हमारे देश में अभी तक केवल "घाटे का बजट" ही पेश किया जाता रहा हैं वो इसीलिए क्योंकि हम भारतीयो की तरह हमारी सरकारे भी अंधविश्वासी होती है, वो नहीं चाहती की नफे या फायदे का बजट पेश करके देश के शत्रुओं/प्रतिद्वंदियों को हमारी अर्थव्यवस्था को नज़र लगाने का मौका मिले।

देश के सत्तारूढ़ दलो का शुरु से मानना रहा हैं की भले 5 साल पूरे होने के बाद सरकार किसी से नज़र मिलाने के काबिल रहे या ना रहे लेकिन किसी को भी देश और इसकी इकोनॉमी पर नज़र लगाने का मौका नहीं मिलना चाहिए। एक पूर्व वित्तमंत्री ने तो नज़र ना लगे इसके लिए आरबीआई की बिल्डिंग पर "नज़रबट्टू" के रूप में काली हांड़ी लटकाने का भी प्रस्ताव दिया था लेकिन कहीं विपक्ष,सरकार पर देश के "कालेकरण" का आरोप ना लगा दे इसीलिए उनका ये प्रस्ताव प्रधानमंत्री ने ताव खाकर नामंजूर कर दिया था । उल्लेखनीय हैं की नज़र लगने के मुद्दे पर ज़्यादातर समय सत्ता में रहने वाले दल का मानना हैं की इतने सालो में हमने देश की हालत ऐसी कर दी हैं की अब देश को नज़र लगने का खतरा नहीं हैं बल्कि
अब तो दूसरे देश चाहे तो नज़र से बचने के लिए हमारे देश के नक़्शे का प्रयोग "नज़रबट्टू" के रूप में कर सकते हैं।

हर साल संसद के बाहर मीडियाकर्मियों को "ब्रीफ" करने के बाद वित्तमंत्री जी "ब्रीफकेस" की चारदीवारी से बजट को संसद की "चारदीवारी" में लाते हैं और फिर बजट की हर योजना को "ब्रीफ" में समझाते हैं। बजट पर सत्तापक्ष और विपक्ष की प्रतिक्रियाए भी बजट की तरह बजट पेश करने से पूर्व तैयार कर ली जाती हैं ताकि बजट भाषण समाप्त होने के तुरंत बाद "थोक के भाव" में "खुदरा मूल्य" वाली प्रतिक्रियाए दी जा सके और बजट पेश करने के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों आराम से सो सके और वित्तमंत्री को बजट पेश करने में कोई व्यवधान ना आये।

अक्सर ये देखा गया हैं की बजट भाषण पढ़ते हुए वित्तमंत्री जी घबराहट में इतना पानी पी जाते हैं जितना वो अपने बजट में प्रस्तावित "पानी बचाओ योजना" से बचाने वाले थे. कुछ वित्तमंत्री तो अपने भाषण को सरकार की तरह बोझिल होने से बचाने के लिए कविता और शेरो -शायरी का सहारा लेते हैं। कई लोगो को तो बजट भाषण में केवल कविता/ शेरो -शायरी ही समझ में आती हैं और वो इसके लिए मन ही मन वित्तमंत्री को धन्यवाद भी देते हैं क्योंकि कविता/ शेरो -शायरी के कारण ही वो पूरा भाषण समझ ना आने की शर्मिंदगी से बच सके।

बजट भाषण समाप्त होने के बाद आम आदमी को ये चिंता रहती हैं की उसे आयकर में कितनी छूट मिली और उत्पाद शुल्क /सेवा कर में बदलाव के कारण कौनसी वस्तुएं मंहगी या सस्ती हुई हैं जबकी बजट भाषण सुनकर बाहर निकले सांसदों को ये चिंता सताती हैं की उनकी "रटी-रटाई" प्रतिक्रिया सुनने के बाद मीडियावाले कहीं उनसे बजट भाषण के "कंटेंट" पर कोई सवाल ना पूछले।

बजट आने के कुछ दिन पहले से ही न्यूज़ चैनल्स अपने स्टूडियो में आर्थिक विशेषज्ञो को बुलाकर , उनसे तरह तरह के सवाल पूछकर और डिबेट करवाकर बजट के लिए माहौल बनाना शुरू कर देते हैं. कुछ विशेषज्ञों को सुनकर और देखकर तो ऐसा लगता है की उनके विशेषज्ञ होने की वैलिडिटी प्रोग्राम पर आने वाले कामर्शियल ब्रेक तक ही होती हैं और कामर्शियल ब्रेक के दौरान उन्हें छोटा रिचार्ज करके अगले कामर्शियल ब्रेक तक फिर विशेषज्ञ बनाया जाता हैं। ऐसे विशेषज्ञ "ऑफ द रिकॉर्ड" बातचीत में कहते हैं की इसमें कुछ भी गलत नहीं हैं क्योंकि उनको आर्थिक मामलो की उतनी ही जानकारी होती हैं जितनी की उनसे सवाल पूछने वाले न्यूज़ एंकर्स को पत्रकारिता की। इसलिए हिसाब "फिट्टूश" हो जाता हैं,मतलब बराबर हो जाता हैं।

बजट पर आम जनमानस की प्रतिक्रियाए भी देखने लायक होती हैं (सुनने लायक नहीं).जिन लोगो को मोहल्ले का बनिया 100 ग्राम शक्कर भी उधार नहीं देता वो भी सरकार को वर्ल्डबैंक से उधार लेकर अधूरी परियोजनाएं पूरी करने की सलाह देते हैं ,सब्ज़ी के साथ मुफ्त का धनिया और कढीपत्ता लेने के लिए सब्जीवाले से झगड़ने वाले लोग बजट में नए प्रोजेक्ट्स के लिए सब्सिडी दिए जाने पर सरकार की यह कहकर आलोचना करते हैं की इससे सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ पड़ेगा, जिन लोगो का कहना घर पर उनके बीवी बच्चे भी नहीं मानते हैं वो लोग भी बजट में अपनी माँगे पूरी ना होने पर सरकार को अगले चुनाव में देख लेने की धमकी देते हैं। जो व्यस्त लोग सड़क और चौराहो पर,सड़कछाप मीडिया को बजट पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे पाते वो अपनी ए.सी. कार में "आईफोन सिक्स -एस" से ट्वीट और पोस्ट करके बताते हैं की बजट गरीब और किसान विरोधी हैं और इससे आम आदमी पर महंगाई की मार पड़ेगी।

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मजमा लगाना और मजमा लगाकर बैठना, तमाशा बनना और तमाशा बनाना-दिखाना आदमी की फितरत में शुमार हो चला है।

हमारे यहां गली-कूंचों से लेकर महानगरों तक सर्कलों, रास्तों, चौराहों, तिराहों, डेरों, पाटों और सहज उपलब्ध सभी स्थानों पर बुद्धिजीवियों, अति-बुद्धिजीवियों, महा-बुद्धिजीवियों, चिन्तकों और विचारकों की विभिन्न श्रेणियां विद्यमान हैं जिनका एकसूत्री एजेण्डा जिन्दगी  भर चर्चाओं में रमे रहना ही है और ये चर्चाएं ही हैं जिनकी बदौलत ये लोग जैसे-तैसे जिन्दा हैं और ऊर्जावान बने हुए हैं।

वरना इन अमूल्य धरोहरों का साक्षात हम कभी नहीं कर पाते। एक ओर इस जमात का बहुत बड़ा योगदान देश के विचारकों में है वहीं दूसरी ओर एक किस्म और है जो हमेशा किसी न किसी महान इंसान के इर्द-गिर्द हमेशा बनी रहती है। 

जैसा आदमी का कद, उतनी अधिक भीड़ आस-पास बनी रहती है। यह भीड़ ही है जो आदमी के मूल्य से लेकर औकात तय करती है और आदमी के वजूद से लेकर प्रतिष्ठा को तय करती है तथा जब-जब भी शक्ति परीक्षण के मौके आते हैं यह भीड़ नियंता के रूप में आगे ही आगे रहकर निर्णयों को अपने हिसाब से परिवर्तित करवाने की तमाम क्षमताओं से युक्त होती है।

यह स्थिति सभी स्थानों पर समान रूप से देखी जा सकती है। हर बड़े और महान इंसान के लिए इनका होना नितान्त जरूरी है और ऎसा न हो तो कोई भी इंसान अपने आपको बड़ा नहीं मान सकता।

हर इंसान के साथ उसी की वैचारिक भावभूमि वाली भीड़ हमेशा छाया की तरह विद्यमान रहती है।  इस मामले में दो प्रकार की भीड़ से हमारा वतन गौरवान्वित है। एक स्थिर है जबकि दूसरी चलायमान। इन दोनों ही प्रकार की भीड़ का समाज और देश के लिए योगदान के बारे में मूल्यांकन  किया जाए तो निराशा ही हाथ लगती है।

एक तीसरी प्रकार की भीड़ और है जिसे मौके-बेमौके इस्तेमाल किया जाता है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि हमारा न कोई जीवन लक्ष्य है, न दिशा और दशा। या तो खुद भेड़ों की तरह घूमते रहेंगे अथवा भेड़ों की तरह कोई भी हमें चला सकता है, कहीं भी ले जा सकता है।

हमें खुद को नहीं पता कि हमारी रेवड़ें किधर जा रही हैं, और क्यों जा रही हैं। इस भीड़ का काम आगे-पीछे घूमना, सुनना-सुनाना और हमेशा अपने आपको सक्रिय दिखाना ही रह गया है।

महान लोगों की भारी संख्या के बावजूद इस बात पर अब तक आत्मचिन्तन नहीं हो पाया है कि क्यों न इस भीड़ का उपयोग समाज, क्षेत्र और देश के किसी न किसी रचनात्मक काम के लिए किया जाए। कितना अच्छा हो कि जहां यह भीड़ दिखे, उसके लायक कोई न कोई काम तत्काल सुपुर्द कर दिया जाए ताकि इन लोगों का भी उपयोग समाज और देश के लिए हो सके। यही वास्तविक उपयोग होगा।

इससे इन लोगों की रचनात्मक क्षमता बढ़ेगी, मेहनत करने का जज्बा पैदा होगा और इन्हें भी आत्म संतोष होगा कि वे देश या समाज के किसी न किसी काम आ रहे हैं। इन लोगों में  अपार ऊर्जा और विराट सामथ्र्य है लेकिन हम लोग इनका कोई उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।

इस वजह से ये लोग भी हमसे खफा भी रहते हैं। कितना अच्छा हो कि अब से इस भीड़ का उपयोग समाज के नवनिर्माण, क्षेत्र के विकास और देश के किसी काम में लिया जाए। 

इन दिनों कई कार्यक्रम चल रहे हैं जिनमें सामूहिक श्रमदान की जरूरत  आंकी गई है। क्यों न इन लोगों का सहयोग लिया। इससे सभी लोगों को लाभ पहुंचेगा और देश के विकास को नई गति भी प्राप्त होगी।

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-डॉ. दीपक आचार्य

94133063077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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पूरा संसार लेन-देन पर टिका हुआ है। यों कहा जाए कि सृष्टि में जन्म का आधार ही पूर्वजन्म के हिसाब-किताब का परिणाम है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

संसार चक्र में जो फंसा हुआ है उसके लिए लेना-देना जीवन भर का ऎसा क्रम बना हुआ है कि उससे कोई बच नहीं सकता। राजा और रंक-फकीर, सभी को एक-दूसरों से काम पड़ता ही पड़ता है। इसके बिना इनका जीवन औचित्य खो बैठता है।

अकेले कुछ कर पाने का साहस या तो सर्वशक्तिमान ईश्वर में है अथवा सिद्धों और परमहंसों में। इनके सिवा दुनिया का कोई सा जीव अकेला अपने दम-खम पर कुछ नहीं कर सकता।

दुनिया की इस मायावी भीड़ में हर प्रकार के इंसानों का जमघट है।  सबकी अपनी-अपनी इच्छाएं, तृष्णाएं और आशा-आकांक्षाएं  हैं।  इन सभी में किसी न किसी अंश में भिक्षावृत्ति या छीना-झपटी के भाव विद्यमान हैं जो उनके पूरे जीवन व्यवहार में समय-समय पर परिलक्षित होते रहते हैं।

लोग अपने पास सब कुछ होने के बावजूद यह इच्छा रखते हैं कि उन्हें हर दिन कहीं न कहीं से कुछ न प्राप्त होता रहे। कुछ के लिए यह प्राप्त द्रव्य या और कुछ जो भी हो, काम का हो सकता है, और बहुत से लोगों के लिए केवल दिखावे का।

बहुत से लोग आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद यह अपेक्षा रखते हैं कि उनकी जरूरत की सामग्री कहीं से उपहार में प्राप्त हो जाए या कोई ऎसा मौका आ जाए जहां से इसे हथिया कर अपने कब्जे में ले सकें। इस किस्म के लोग भी खूब मिल जाया करते हैं जो कि जहां जाएंगे वहां इसी लक्ष्य को सामने रखते हैं कि कुछ कुछ पाए बगैर जाना उनकी फितरत का अपमान है।

जहां हम दे पाने की स्थिति में महसूस करते हैं वहां अपने स्तर पर मूल्यांकन करें और उन्हीं को दें जो वाकई जरूरतमन्द हैं, जिन्हें नितान्त आवश्यकता है और इसकी पूर्ति के  बिना इनके सामान्य जीवन निर्वाह में बाधा आने की संभावना है।

केवल दूसरों के भोग-विलासी जीवन को तृप्त  करने के लिए कुछ न दें। उन्हीं को दें जिन्हें इसकी अनिवार्य आवश्यकता है। बहुत बड़ी संख्या में लोगों की मनोवृत्ति यह हो गई है कि वे औरों से कुछ न कुछ मांगते रहते हैं और इस याचना को पूर्ण करने के लिए ये अपने आपको विनम्रता और प्रशस्तिगाता से भी ऊपर के दर्जे पर प्रतिष्ठित कर दिया करते हैं, सामने वालों को मिथ्या प्रशंसा से भरमाते रहते हैं और इस तरह लोगों को अपने मोह पाश में बांध कर अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त कर लिया करते हैं।

बहुत सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें कोई सी वस्तु किसी के पास कहीं भी दिख जाए, वे इसे पाने के लिए ललचा उठेंगे और पूरी बेशर्मी का परिचय देते हुए इसे मांग ही लेंगे, भले ही उनके लिए ये सामग्री किसी भी उपयोग की हो ही नहीं।

जो मांगता है उसकी उपेक्षा करें लेकिन जरूरतमन्दों की कभी अवहेलना न करें, उन्हें अपनी ओर से पहल करते हुए दें। अपनी बुद्धि और विवेक से सोचे तथा जिसे पात्र समझें उसी को उसकी जरूरत की वस्तु, राशि या और कुछ जो भी देने की स्थिति में हों, प्रदान करें, यही समाज की सच्ची सेवा है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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आखिर थम ही गए पहिए

लगातार एक सौ ग्यारह वर्षों तक अहिर्निश सेवाएँ देती रहने वाली छोटी रेल के पहिए आखिर 30 नवम्बर 2015 को इतिहास का हिस्सा बन ही गई. छिन्दवाड़ा से नैनपुर एवं छिन्दवाड़ा से नागपुर रूट पर चलने वाली दस जोड़ी ट्रेन के पहिए थम गए. नैनपुर से आखरी नेरोगेज ट्रेन दोपहर 2.40 बजे रवाना होकर रात्रि 8.15 बजे छिन्दवाड़ा पहुँची, वहीं छिन्दवाड़ा से नैनपुर के लिए आखिरी ट्रेन शाम 5.10 बजे रवाना हुई. छिन्दवाड़ा से नागपुर के लिए आखरी ट्रेन 5.25 बजे रवाना हुई. नागपुर से चलने वाली ट्रेन का सफ़र छिन्दवाड़ा में ही समाप्त हो गया. शाम 5.25 बजे छिन्दवाड़ा से आखरी नेरोगेज ट्रेन रवाना हुई और इस तरह गरीबों के लिए वरदान मानी जाने वाली नेरोगेज ट्रेन इतिहास का एक अमिट हिस्सा बन गई.

ऊँचे-ऊँचे हरे भरे पहाड़ों की बीच घुमावदार पटरियों पर छुकछुक करती नैरोगेज ट्रेन स्मृतियों का हिस्सा बन गई. आजादी से पहले और आजादी के बाद के एक सौ ग्यारह साल में नैरोगेज ट्रेन ने कई उतार-चढ़ाव देखे. नैनपुर से नागपुर तक जिले की पांच पीढ़ियों को अपनी गोद में लेकर सफ़र कराने वाली छॊटी ट्रेन के पहिए 30 नवम्बर को थम ही गए. रेल लाइन के किनारे बसे गांवों के लोग और छॊटी ट्रेन में स्फ़र करने वाली यात्री शायद ही इस ट्रेन को भुला पाएंगे.

नेरोगेज लाइन बंद होने के साथ भविष्य में तेज रफ़्तार की बड़ी लाइन ट्रेनों से जुड़ने को लेकर यात्रियों में एक तरफ़ खुशी तो है,लेकिन एक सदी से ज्यादा के सफ़र के इतिहास में बदलने का दुख भी है. अब जिलेवासी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कि मेगा ब्लाक लगाने के बाद गेज कन्वर्जन का कार्य तीव्र गति से हो सकेगा जिससे नागपुर, जबलपुर व मंडला से छिंन्दवाड़ा जल्द से जल्द बड़ी लाइन से जुड़ सकेगे.

बिदाई के वक्त पिता जानता है कि बेटी का आना-जाना तो बना रहेगा ,लेकिन यह छॊटी ट्रेन फ़िर लौटकर नहीं आएगी, यह जानकर लोगों की आँखें भर आयी थीं. सोमवार की शाम जैसे ही नैनपुर एवं नागपुर की ट्रेने अपने अन्तिम सफ़र पर निकालीं, उसे बिदा देने के लिए और अपनी यात्रा को यादगार-यात्रा बनाने के लिए लगभग दो हजार यात्रियों ने अपनी सीटॆं आरक्षित कर साथ रवाना हुए थे. उस दिन ट्रेनों को किसी दुल्हन की तरह सजाया-संवारा गया था. देशभक्ति गीतों की प्रस्तुति पर लोग झूम-झूम कर नाच उठे थे. फ़ूल बरसाकर उसे बिदाई दे रहे थे. इस दिन जमकर आतिशबाजी भी की गई थी. विस्मयकारी दृष्य तो उस समय आ उपस्थित हुआ जब ट्रेन की रवानगी के समय भारी भीड़ के चलते उसे बार-बार रोकना पड़ा. जैसे ही वह कुकड़ीखापा पहुँची, ग्रामीणॊं ने उसकी आरती उतारी. नागपुर और छिन्दवाड़ा से चली ट्रेनों का उमरानाला में क्रासिंग हुआ, लोगों ने उनका स्वागत किया. सौंसर से लगभग 1600 यात्रियों ने सफ़र किया. चौरई से सिहोरा स्टेशन तक कई जगह लोगों ने एवं रेलवे के अमले ने ट्रेन को बिदा दी.

नैनपुर रूट पर रवाना होने वाली आखरी नेरोगेज ट्रेन क्रमांक 58855, जिसका लोको पायलट श्री बालाजी बापू, सहायक ड्रायवर श्री पी.के.यादव एवं गार्ड श्री दौलत जुम्मन थे. वहीं नागपुर रूट पर रवाना हुई नेरोगेज ट्रेन क्रमांक 58836 को लोको पायलट श्री वकील खान एवं असिस्टेंट पायलट श्री यू.आर.पांडॆ चला रहे थे. इसके गार्ड श्री डी.डी.मेश्राम थे. इससे पहले दोपहर में नैनपुर की ओर रवाना हुई नेरोगेज ट्रेन के लोको पायलट श्री भवानी पटेल एवं लोको पायलट श्री अभिषेक पैसाडेली थे.

आखरी दिन छिन्दवाड़ा रेल्वे स्टेशन से नेरोगेज की यात्रा के लिए 2070 टिकटॆं बिकीं. 4325 यात्रियों के लिए टिकटॆं जारी की गई. वहीं टिकटॊं की बिक्री से रेल्वे को 109311 रुपयों की आय हुई. रोजाना की तुलना में सोमवार को चार गुना टिकटॊं की बिक्री हुई. अधिकांश यात्रियों ने छिन्दवाड़ा से शिकारपुर, लिंगा, उमरिया ईसरा, चौरई जैसे आसपास के स्टेशनों की यात्रा के लिए टिकिट लिए. यात्रियों की बड़ी संख्या के कारण लिंगा स्टेशन में रिकटॊं की कमी पड़ गई. श्री ओपी डागा नेरोगेज ट्रेन का आखरी टिकट लेने नागपुर से छिन्दवाड़ा आए थे. उन्हें टिकट क्रमांक 513939971 जारी किया गया थ

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कुछ ऐतिहासिक झलकियाँ

· गवर्मेंट आफ़ इण्डिया ने वर्ष 1897-98 में बंगाल नागपुर रेल्वे के अंतर्गत गोंदिया से नैनपुर होते हुए जबलपुर रेल लाइन का सर्वे कराया. इसमें ब्रांच लाइन के तरह छिन्दवाड़ा एवं नागपुर तक विस्तार का प्रावधान था. इसकी विस्तृत रिपोर्ट 1898-99 एवं 1899-1900 में तैयार कराई गई थी.

· 23 जनवरी 1902 को गोंदिया-जबलपुर लाइन एवं नैनपुर-छिन्दवाड़ा तथा नैनपुर-मंडला लाइन का कांट्रेक्ट साइन हुआ. निर्माण कार्य भी वर्ष 1902 में ही प्रारंभ हो गया. वर्ष 1904 में नैनपुर- छिन्दवाड़ा रेल लाइन को यातायात के लिए खोल दिया गया. जिले में पहली ट्रेन 27 जुलाई 1904 को सिवनी से चौरई तक चली. सितंबर 1904 में इसे छिन्दवाड़ा तक बढ़ा दिया गया. छिन्दवाड़ा से पेंचवेली कोलफ़ील्ड तक रेल लाइन बिछाने का कार्य 1906-07 में पूरा हुआ. सन 1906-1907 में छिन्दवाड़ा से परासिया तक रेल पटरी बिछाई गई. छिन्दवाड़ा से नागपुर रेल लाइन का काम 1911 में पूरा हुआ. इस रुट पर पर प्रारंभिक तौर पर लोधीखेड़ा और सौंसर तक ट्रेने चलीं.वर्ष 1913 में नागपुर से छिन्दवाड़ा तक ट्रेन दौड़ने लगीं.

· वर्ष 1898-99 और 1899-1900 में तैयार सर्वे रिपोर्ट में 252.67 मील नैरोगेज रेललाइन के निर्माण पर 81.33 लाख रुपए लागत का अनुमान लगाया गया था. इसमें गोंदिया से जबलपुर की बीच 143.43 मील की मेन लाइन के साथ ही ब्रांचलाइन नागपुर-मंडला 21.75 मील, नैनपुर-सिवनी 47.13. सिवनी-छिन्दवाड़ा 40.36 मील शामिल थे.

· छोटी लाइन के ट्रेन के उबाऊ सफ़र को आरामदेह बनाने के लिए रेल्वे ने छिन्दवाड़ा से नैनपुर तक फ़ास्ट ट्रेन चलाने का निर्णय लिया. वर्ष 2005 तक रेल चलाई गई. इसकी स्पीड अधिकतम 50 किमी प्रति घंटा थी. यह ट्रेन रात 10 बजे छिन्दवाड़ा से निकलकर रात 1 बजे नैनपुर पहुँचती थी. इसक एकमात्र स्टापेज सिवनी में होता था.

· छिन्दवाड़ा से नैनपुर तक चलने वाली ट्रेन एक बार हादसे का शिकार हुई. लूट के इरादे से कुछ असामाजिक तत्त्वों ने कान्हीवाड़ा और पलारी के मध्य लोहे का एक खंबा गाड़ दिया था. 50 किमी.की रफ़्तार से दौड़ रहा इंजन लोहे के खंबे से ऎसा टकराया कि इंजन की दिशा ही बदल गई. इंजन पलट गया लेकिन इस हादसे में किसी को चोट नहीं आयी. केवल इंजन के ड्रायवर श्री उमाशंकर चौरसिया और साथी कर्मचारी को गंभीर चोटॆं आयी थी.

· जून 2002 में मानसून की दस्तक के साथ मौसम में जबरदस्त बदलाव आया. तेज हवाओं के साथ बारिश से कई पेड़ धराशायी हो गए. मकानों की छतें उड़ गईं. इसी बीच दोपहर में नैनपुर से छिन्दवाड़ा आ रही ट्रेन गंगाटोला स्टेशन के पास तूफ़ान में फ़ंस गई. बोगी में सवार लोगों हे हवा से बचने के लिए खिड़की के दरवाजे बंद कर दिए. हवा का कुछ ऎसा दवाब पड़ा कि डिब्बे हिल उठे और उसके पहिए पटरी से उतर गए. इंजन के ड्रायवर और सहकर्मी जहां बैठते हैं, उस स्थान की छत उखड़ गई.

· वर्ष 1958 में डकैतों ने एक ट्रेन को लूटने की धमकी दी थी. इस धमकी से शहर के एक बड़े वर्ग में दहशत फ़ैल गई लेकिन डकैत अपने मंसूबों को अंजाम नही दे पाए. शहर के नागरिक स्व. हरनारायण जायसवाल की बेटी विमलादेवी का रिश्ता कलकत्ता में तय हुआ था. बारात नागपुर होते हुए छिन्दवाड़ा आने वाली थी. इसके लिए ट्रेन बुक कराई गई थी. संभ्रांत परिवार की बारात में भरपूर नगद राशि और सोने के जेवरात होने की सूचना डकैतों तक पहुंच गई. डकैतों ने ट्रेन लूटने की धमकी भी दे दी. लेकिन डकैतों का मंसूबा विफ़ल हो गया. 26 अप्रैल 1958 को यह बारात नेरोगेज से नहीं बल्कि ब्राडगेज लाइन से नागपुर आमला होते हुए परासिया पहुंची. यहां से सभी बाराती जो एक सैकड़ा थे, कारों में सवार होकर छिन्दवाड़ा पहुंचे थे.

· वर्ष 2005 में रेल मंडल ने नागपुर से जबलपुर के बीच टूरिस्ट ट्रेन का प्रयोग किया था. यह ट्रेन सप्ताह के एक बार चलाई जाती थी. ट्रेन के पांच फ़ेरे हुए. पहले और दूसरे फ़ेरे में यात्रियों की संख्या उत्साहजनक रही लेकिन अंतिम तीन फ़ेरों में ट्रेन में बेहद कम यात्री सवार हुए थे. इस तरह टूरिस्ट ट्रेन का यह प्रयोग सफ़ल नहीं हो सका.

· टूरिस्ट ट्रेन में यात्रियों को गर्मी से राहत दिलाने के लिए एअर कंडीशनर के बजाए खिड़कियों पर छॊटॆ कूलर लगाने का प्रयोग किया गया जो असफ़ल रहा. इन यात्रियों को कुकड़खापा, छिन्दवाड़ा में आदिवासी संग्रहालय, कान्हा पार्क और जबलपुर में भेड़ाघाट के अलावा अन्य ऎतिहासिक स्थान दिखाए गए.

· जब नागपुर से पहला कोयला इंजन ट्रायल पर छिन्दवाड़ा के लिए निकला. विशालकाय इंजन को देखकर कई गांव के लोग भाग खड़े हुए.

· सिल्लेवानी की पहाड़ी पर इंजान को धक्का देकर चढ़ाना पड़ा था.

· छिन्दवाड़ा से नागपुर तक चलने वाली पैसेन्जर ट्रेन के ड्रायवर तंसरा रेल्वे क्रासिंग के बाद से एक्सीलेटर का उपयोग किए बिना ट्रेन चलाते थे.

· देवी तक पहाड़ी ढलान के कारण बोगियों को खींचने के लिए इंजान की ताकत का उपयोग नहीं किया जाता था. रामाकोना से उमरानाला की दूरी 37 किमी है. उमरानाला समुद्र सतह से 640 मीटर की ऊँचाई पर है तो वहीं रामाकोना 355 मीता फा आई. य़ाआणॆऎ 37 किलो मीटर के सफ़र में यात्री समुद्र तल से 285 मीटर ऊँचाई पर पहुँच जाते हैं.

· अंग्रेजी हुकूमत के दौरान नागपुर से नैनपुर रेल्वे लाइन पर 36 स्टेशन तय किए गए. स्टेशन पर प्लेटफ़ार्म के दोनो ओर लगभग द्दो मीटर लबे और एक मीटर चौड़ॆ सीमेंट के बोर्ड पर स्टेशनों के नाम लिखे गए. अंग्रेजी से हिन्दी रुपांतरण करने में गांव का नाम बदल गया. अंग्रेजी हुकूमत की यह त्रुटि आजादी के बाद भी सुधर नहीं पायी. पर्यटन केंद्र से विकसित कुकड़ीखापा रेल्वे स्टेशन के बोर्ड में आज भी कुक्ड़ाखापा लिखा है तो वहीं भिमालगोंदी के बोर्ड पर भीमालगोंदी लिखा है. ऎसी अनेक गलतियां नागपुर से नैनपुर तक कई स्थानों पर देखी जा सकती है.

· तकनीकी दुनिया में जहां लोग 240 किमी प्रति घंटॆ से अधिक की रफ़तार से चलने वाली बुलेट ट्रेन का सफ़र कर रहे हैं, वहीं सतपुड़ा अंचल के लोग 9 किलो मीटर से 40 किमी प्रति घंटॆ की रफ़्तार वाली छुकछुक ट्रेन का आनंद लेते रहे. कई स्थानों पर लोग अपने घर के पास से गुजरने वाली ट्रेन में दौड़कर चढ़ जाते थे.. नागपुर से नैनपुर का 287 किमी का सफ़र 13 घंटॆ 35 मिनट में तय होता था. सालों पुरानी रेल लाइन पर सुरक्षा की दृष्टि से इंजन की अधिकतम स्पीड 40 किमी. प्रति घंटॆ तक की गई थी. इस स्पीड के लांघते ही इंजन का सायरन अपने आप बज उठता था. सायरन बजते ही ड्रायवर ब्रेक के सहारे इसकी स्पीड कंट्रोल कर लेते थे.

· जिले का सबसे पुराना रेल्वे स्टेशन काराबोह अब वीरान हो चुका है. वर्ष 1904 में सिवनी जिले से यहां तक ट्रेन का संचालन शुरु हुआ था. यहां रेल्वे ने वर्ष 1908 में हाथ से खींचने वाला सिग्नल लगाया था. 107 साल बीत जाने के बाद भी यह सिग्नल काम कर रहा है. देश का सबसे पुराना हस्तचलित सिग्नल यहां देखा जा सकता है.

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103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा(म.प्र.) 480-001 गोवर्धन यादव. 94243-56400

  लेखक परिचय

डॉ. हिदायत प्रेम

जन्म : 24 मार्च 1946, घोटका, ज़िला- सिन्ध में। 1973 में सिन्ध यूनिवर्सिटी, जामशोरो में सिन्धी में एम.ए.। 1989 में लंदन से लसानियत में डिप्लोमा और 1995 में सिंध यूनिवर्सिटी, जामशोरों से पीएच.डी. हासिल की। इस वक्त सिंध यूनिवर्सिटी में सिंधी पढ़ाते हैं। उन्होंने अनेक कहानियाँ और शोधपरक लेख लिखे हैं। पता : सी-25, सिन्ध यूनिवर्सिटी कॉलोनी, जामशोरो।

अमर जलील

जन्म : 8 नवंबर, 1936 में हुआ। जिनका बचपन रोहड़ी व कराची में गुज़रा। नवाबशाह से बी.ए. करने के पश्चात् कराची यूनिवर्सिटी से एम. ए. की। वे रेडियो पाकिस्तान पर रिसर्च ऑफीसर भी रहे। 1954 में ‘इंदिरा’

नाम की कहानी लिखी, जो बहुचर्चित रही। उनके कहानी संग्रह हैं- ‘दिल की दुनिया’ और ‘तीसरा वजूद’ व नावल ‘आख़िर गूँगी बोल पड़ी’ प्रकाशित हैं। कुछ सिन्धी फ़िल्मों की कहानियाँ रेडियो और टेलिविज़न के लिए लिखी हैं। सिन्धी और अंग्रेज़ी में कई पत्रिकाओं में कॉलम लिखते रहे हैं। अब वे अलामा इक़बाल ओपन यूनिवर्सिटी, इस्लामाबाद से रिटायर हुए हैं। वे इस समय कराची में रहते हैं।

रशीदा हिजाब

जन्म : अक्टूबर 21, 1942 शिकारपुर , सिन्ध (पाकिस्तान) में। एम. एससी. एवं पीएच. डी. सिन्ध यूनीवर्सिटी, जाम शोरे से हासिल की। अमेरिका की त्नजहमते न्दपअमतेपजल से च्वेज क्वबजवतंजम हासिल की। लेक्चरार के तौर पर ‘बोर्ड ऑफ इंटरमीडिएट एंड सेकेंडरी एजूकेशन’ हैदराबाद में अध्यक्षा हैं। बाल साहित्य, लेख, आलेख और लगभग 100 कहानियाँ पत्रिकाओं में छपी हैं। 1962 में बेहतरीन कहानी के लिये महराण अवार्ड और अनेक अकाडेमिक अवार्ड हासिल हैं। निवास : हैदराबाद सिन्ध।

तारिक़ आलम अबरो

जन्म 10 अप्रैल 1958 में कम्बर में लारकाणे में हुआ। 1962 में सिन्धी यूनीवर्सिटी से सिन्धी में एम.ए. की। उनका पहला कहानी संग्रह ‘रात शांत और सोचें’ और उनका नॉवल, ‘रह गए वो मंजर’ 1984 में प्रकाशित। इस नावल पर इंस्टीट्यूट ऑफ सिन्धीयोलॉजी की तरफ़ से उन्हें बेहतरीन अदब के अवार्ड से निवाज़ा गया। 1998 में उनका कहानी संग्रह ‘पहचान की तलाश’ प्रकाशित हुआ। इस वक़्त वह सिन्ध यूनीवर्सिटी कॉलोनी जामशोरो में रहते हैं।

सहर इमदाद

सहर इमदाद का असली नाम सहर बलोच है। पर इमदाद हसीनी के साथ शादी के बाद उसका नाम यही रहा।

जन्म : 20 जुलाई 1951, हैदराबाद में हुआ। एम.ए. सिन्धी में की है। रेडियो पर उनकी कहानियाँ, मज़मून, मक़ाले और कॉलम प्रकाशित होते रहे हैं। इस वक्त वह सिन्ध यूनीवर्सिटी, जामशोरो में सिन्धी की प्रोफेसर हैं। पता- बी-1, सिन्ध यूनिवर्सिटी कॉलोनी में रह रही हैं।

तनवीर जोनेजो

जन्म : 1952 में, ज़िला दादू में। उनकी तालीम भी वहीं हुई। 1974 में सिंध यूनिवर्सिटी जामशोरों से एम.ए. (ैवबपवसवहल) करके वहीं पर लैक्चरर के रूप में कार्यरत हुई। इस समय वे वहाँ की अध्यक्षा  हैं।

सातवें दशक में उन्होंने लिखना शुरू किया। उनका प्रकाशित कहानी-संग्रह है- ‘अध्त में कड़वापन’। अनेक शोध लेख और मज़मून किताबों में छप चुके हैं।

वह इस वक़्त सिन्ध यूनिवर्सिटी एम्पलाइज़ को-ओपरेटिव सासाइटी, जामशेरों में रहती हैं।

लेखक परिचय :: 127

नूर अलहदा शाह

जन्म : 24 जुलाई 1957 में हैदराबाद में जन्मी। शुरुआती तालीम लाहौर, इंटरमीडिएट लाहौर और फिर हैदराबाद से बी.ए. की डिग्री हासिल की। उनके प्रकाशित कहानी संग्रह हैं- ‘जलावतन’, ‘करबला’ और ‘रण में संज जो इतिहासु’। उनकी शाइरी का संग्रह- ‘कैदियाणी की आँखें और चाँद" नाम से प्रकाशित हुआ है।

1982 से टी.वी. के लिए नाटक लिखे। उनका पहला ड्रामा सिन्धी में ‘खिलौना’ के नाम से मशहूर हुआ। कहानियों और ड्रामा निगारी के लिये अनगिनत अवार्ड मिल चुके हैं।

लियाक़त रिज़वी

जन्म : 1 मई 1963 नोशहरो फेरोज़ में। वहीं से मैट्रिक करने के पश्चात् सिन्ध यूनिवर्सिटी जामशोरो से एम. ए. करने के बाद इस वक़्त वे केडिट कॉलेज में लाइब्रेरियन हैं। अनेक कहानियाँ, मकाले व मज़मून लिखे। उनकी कहानी ‘जनम शहर में विछोह ना पल’ के लिये पहला इनाम मिला। 1994 में उन्हें ‘बादाम ख़ातून’ कहानी अवार्ड दिया गया। इस वक़्त वे पी-25 केडिट कॉलेज, पेटारो में रहते हैं।

अब्दुल रहमान सियाल

हैदराबाद ज़िले में रहते हैं। सरकारी आफिसर के रूप में कार्यरत हैं।

एक अच्छे कहानीकार के रूप में भी काफी मान्यता मिली है। कुछ संग्रहों में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं।

कृष्ण खटवाणी

जन्म : वरुणशाह, सिन्ध (पाकिस्तान)। उपन्यास - 6, कहानी संग्रह- 9, कविता संग्रह- 2, नाटक- 1, अन्य 4 पुस्तके प्रकाशित। किसी भी ख़ास विचारधारा एवं लेबल से मुक्त। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा सामी पुरस्कार (1981) और गौरव पुरस्कार (2006), भारतीय भाषा परिषद्, कलकत्ता द्वारा (1991) तथा ‘याद हिक प्यार जी’ उपन्यास पर साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित (2005)। रा.सि. बो. वि. परिषद् द्वारा साहित्यकार सम्मान (2005)

पोपटी हीरानंदाणी (18 सितम्बर 1924 - 2005) जन्म : हैदराबाद सिन्ध (पाकिस्तान)। उनके साहित्य का विस्तार क्षितिज को छूता है। उनके चार कहानी संग्रह हैं- रंगीन ज़माने की गमगीन कहानियाँ (1953), पुकार (1953), कली गुलाब की, सागर शराब का (1967), मैंने तुमसे प्यार किया (1975) और ख़िज़ां का दौर पूरा हुआ (1976)। उपन्यास हैं- मंजू (1950), हसरतों का तरबत (1961) और सैलाब ज़िन्दगी का (1980)। अन्य आलोचना, लेख, शोधकार्य प्रकाशित। साहित्य अकादमी मुंबई द्वारा 1982 में सम्मानित। उनकी आत्मकथा ‘मुहिजे हयातीअ जा सोना रूपा वर्क’ पर महाराष्ट्र सरकार गौरव पुरस्कार, राष्ट्रीय सिन्धी बोली परिषद दिल्ली और कई पुरस्कारों से सम्मानित।

मुश्ताक़ अहमद शोरो

जन्म 10 मई 1952, जिला ठट्ठो में। 1973 में यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और 1977 में पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री हासिल की। हैदराबाद सिंध से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘आखाणी’ के संपादक रहे। ज़िंदगी की शुरूआत रेडियो पत्रकार के रूप में की। अब वे विश्वविद्यालय में परामर्शदाता के रूप में कार्यरत हैं। उनके कहानी संग्रह- ‘थके जज़्बों की मौत’ (1975), ‘टूटे-फूटे-उजड़ते अक्स’ (2003) में प्रकाशित हुए हैं। पता : 166 ए, सिंध

यूनिवर्सिटी, जामशोरो की कॉलोनी में आवास।

शरजील

जन्म 13 दिसंबर 1938, नवाबशाह जिले में। हैदराबाद में आर्ट टीचर के तौर पर स्थापित रहे। अब वे सेवा न्ठित हुए हैं। 1970 में उन्होंने लिखना शुरू किया। उनका कहानी संग्रह ‘पल पत्ते झड़ने के बाद!’ और नज़्मों का संग्रह ‘छोलियूं’ प्रकाशित हुए हैं।

उनकी एक और पहचान चित्रकार के रूप में भी है। उन्होंने चित्रकार के रूप में अनेक पुस्तकों के कवर ढष्ठ और स्केच भी बनाए हैं। इस समय वे हैदराबाद ज़िला काउंसिल के फ्लैट नम्बर बी-2-1 में रह रहे हैं।

इमदाद हुसैनी

उनका असली नाम इमदाद अली शाह है। जन्म : 10 मार्च 1941, टंडो- मुहम्मद जान ज़िले, हैदराबाद में हुआ। शुरूवात में पढ़ाई गाँव में ली, बाद में गवर्नमेंट नूर मुहम्मद हाई स्कूल हैदराबाद में की, उसके बाद सिंध यूनीवर्सिटी से एम.ए. की डिग्री हासिल की। इमदाद हुसैनी का पहला शायरी-संग्रह ‘इमदाद है रोल’ 1976 में प्रकाशित हुआ। शायरी के साथ-साथ ‘सांवल’ के नाम से बहुत सारी कहानियाँ, निबंध और कॉलम लिखे। इसके अलावा उन्होंने रेडियो के लिए ड्रामा, गीतों भरी कहानियाँ और टी.वी. सीरियल भी लिखे। मिर्ज़ा गलीच बेग के नॉवल ‘ज़ीनत’ का उर्दू तर्जुमां भी प्रकाशित है। इस समय वे ठ-1 सिन्ध यूनिवर्सिटी कॉलोनी, जामशोरो में रहते हैं।

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देवी नागरानी

जन्म : 11 मई, 1941, कराची (तब भारत)

पति का नाम : भोजराज नागरानी, माँ का नाम : हरी लालवानी,

पिता का नाम : किशिनचंद लालवानी।

शिक्षा : स्नातक। अर्ली चाइल्ड व गणित में डिप्लोमा, न्यूजर्सी से।

मातृभाषा : सिंधी।

सम्प्रति : शिक्षिका, न्यू जर्सी, यू.एस.ए (अब रिटायर्ड)।

भाषाज्ञान : हिन्दी, सिन्धी, गुरमुखी, उर्दू, तेलुगू, मराठी, अँग्रेज़ी।

प्रकाशित कृतियाँ : 1. ग़म में भीगी ख़ुशी (सिन्धी ग़ज़ल-संग्रह 2004), 2. चरागे-दिल (हिन्दी ग़ज़ल-संग्रह, 2007), 3. उडुर-पखिअरा (सिन्धी-भजनावली, 2007), 4. आस की शम्अ (सिन्धी ग़ज़ल-संग्रह 2008), 5. दिल से दिल तक (हिन्दी ग़ज़ल-संग्रह, 2008) 6. सिंध जी आँऊ आई आह्याँ (सिंधी-काव्य संग्रह, कराची से, 2009) 7. द जर्नी (अंग्रेज़ी काव्य-संग्रह 2009), 8. लौ दर्दे-दिल की (हिन्दी ग़ज़ल-संग्रह, 2010), 9. भजन-महिमा (हिन्दी, 2011), 10. ग़ज़ल (सिन्धी ग़ज़ल-संग्रह, 2012), 11. और मैं बड़ी हो गयी (सिन्धी से हिन्दी में अनूदित कहानी संग्रह, 2012), 12. बारिश की दुआ (हिन्दी से अरबी सिन्धी में अनूदित कहानियाँ, 2012) 13. अपनी धरती (हिन्दी से अरबी सिन्धी में अनूदित कहानियाँ, 2013), 14. माई-बाप और कहानियाँ (सिन्धी से हिन्दी में अनूदित कहानी संग्रह, पद चतवहतमे), 15. सरहदों की कहानियाँ (सिन्धी से हिन्दी में अनूदित कहानी-संग्रह), 16. भाषाई सौंदर्य की पगडंडियाँ (सिन्धी से हिन्दी में अनूदित काव्य-पद, प्रेस में), 17. गुलाब की ख़ुशबू (सिन्धी से हिन्दी में अनूदित कहानी-संग्रह (प्रेस में) 18. यह ज़हर कोई तो पिएगा (सिन्धी से हिन्दी में अनूदित कहानी-संग्रह, प्रेस में) भारत तथा यू.एस. की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं (न्यूयार्क, ओसलो) द्वारा निमंत्रित एवं सम्मानित।

अनुवाद कार्य : सिन्धी भाषा की कहानियों का अनुवाद हिन्दी में और अन्य भाषाओं की रचनाओं का सिन्धी में अनुवाद। हिन्दी रचनाकारों की लघुकथाएँ व काव्य रचनाएँ सिन्धी देवनागरी में अनुवाद। रूमी, खलील जिब्रान व रवीन्द्रनाथ टैगोर की काव्य रचनाएँ अंग्रेज़ी से सिन्धी और हिन्दी में परस्पर अनूदित।

सम्मान : अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, न्यूयार्क में, विद्या धाम संस्था, न्यूयार्क, शिक्षायतन संस्था न्यूयार्क की ओर से ‘काव्य रतन’ व ‘काव्य मणि’ सम्मान। खन्यू जर्सी, मेयर के हाथों City Hall mein 'Proclamation Award'  रायपुर में अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन में सृजन-श्री सम्मान, मुम्बई में काव्योत्सव, श्रुति संवाद साहित्य कला अकादमी, महाराष्ट्र हिंदी अकादमी, राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद की ओर से वर्ष 2009 में पुरस्कृत एवं सम्मानित हिंदी प्रचार सभा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में काव्य पाठ के उपरांत, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादेमी के कार्याध्यक्ष श्री नंदकिशोर नौटियाल एवं सभा की मानिंद निर्देशक डॉ. सुशीला गुप्ता के कर कमल से संस्था के नामी पदक व सुमन द्वारा सन्मानित 17 अप्रेल, 2008 काव्योत्सव सम्मान, 2008 Bal Vikas Kendra Charitable Trust, Nerul द्वारा आयोजित गोष्ठी में संयोजक श्री अरविंद राही, अध्यक्ष श्री ब्रिगेडियर धर्मप्रकाश, श्री धनराज चौधरी, उपाध्यक्ष श्री पारस नाथ पांडे, अध्यक्ष श्रीमती साधना मिश्रा के हाथों से शाल, श्रीफल-पुष्प व सभा के काव्योत्सव पदक से सम्मानित, 27 अप्रेल 2008 खश्रुति संवाद साहित्य कला अकादमी द्वारा हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित अखिल भारतीय सर्व-भाषा साहित्य सम्मेलन में भागीदारी के लिये सिंधी भाषा के लिये सरंक्षक व निर्देशक श्री अरविंद राही, श्री राजीव सारस्वत एवं श्री अनन्त श्रीमाली द्वारा सम्मान चिन्ह, श्रीफल, शाल, सुमन, 2008 खमहाराष्ट्र हिंदी अकादमी के आयोजित सर्व ‘भारतीय भाषा सम्मेलन’ स्मारक सम्मान- साहित्य के योगदान व मुशायरे में शिरकत के लिए अकादमी की ओर से सम्मानित 3-5 अक्टूबर 2008 ख राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद -सिन्धी पुस्तक ‘उडुर पखीयरा’ के लिए पुरस्कार, 2009 ख जोधपुर में ‘ख़ुशदिलान-ए-जोधपुर’ के रजत जयंती समारोह एवं कवि सम्मेलन के अवसर पर स्ध्ति सभा भवन में आयोजक श्री अनिल अनवर द्वारा स्ध्ति चिन्ह, शाल सुमन से सम्मानित, 22 अगस्त, 2010 ख जयपुर में ख़ुशदिलान-ए-जोधपुर के रजत जयंती समारोह में सम्मानित 22 अगस्त, 2010 खभारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के मंच पर स्थानीय मेयर थूर स्ताइन विंगेर और भारतीय दूतावास के सचिव बी.के. श्रीराम जी एवं इस संस्था के अध्यक्ष सुरेशचंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ जी के हाथों हिंदी साहित्य सेवा के लिए ओस्लो में सम्मानित, 17 मई 2011 तुलसी साहित्य सम्मान- 2011, मध्य प्रदेश तुलसी साहित्य अकादेमी द्वारा, भोपाल ‘जीवन ज्योति पुरस्कार’, जीवन ज्योति संस्था की ओर से, भारत के 63 गणतंत्र दिवस पर मुंबई में, 26 जनवरी 2012 विशेष सम्मान, संस्कृति संगम संस्था-कल्याण 13 अक्टूबर 2012 ‘अखिल भारतीय सिन्धी समाज’ का गोवा में 22वां राष्ट्रीय सम्मेलन में श्री लछमनदास केसवानी की हाजिरी में, मुख्य अतिथि युधिष्टर लाल जी हाथों विशिष्ट सम्मान सिन्धी- 24-26, फरवरी 2012 अखिल भारत सिंधी भाषा एवं साहित्य प्रचार सभा की ओर से लखनऊ में टेकचंद मस्त व बिनीता नागपाल द्वारा आयोजित 90 नेशनल सेमिनार स्त्री शक्ति पर, जिसमें शिरकत के लिए सखी साईं मोहनलाल साईं के हाथों सम्मानित, सिन्धी-15,16,17 मार्च 2012 भारतीय भाषा संस्कृति संस्थान, गुजरात विद्यापीठ अहमदाबाद के निर्देशक श्री के.के.भास्करन, प्रोफेसर निसार अंसारी, एवं डॉ. अंजना संधीर के हाथों- सुत माला, सुमन, शाल से सम्मानित, 18 जून, 2012 खसाहित्य अकादेमी तथा रवीन्द्र भवन के संगठित तत्वावधान में शुक्रवार 2012, रवींद्र भवन मडगांव, गोवा में सर्वभाषी ‘अस्मिता’ कार्यक्रम में सिन्धी काव्य पाठ में भागीदारी, 9 नवम्बर 2012 ख तमिलनाडू हिन्दी अकादमी एवं धर्ममूर्ति राव बहादुर कलवल कणन चेट्टि हिन्दू कॉलेज, चेन्नई के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विश्व हिन्दी दिवस एवं अकादमी के वर्षोत्सव में भागीदारी, अकादमी के अध्यक्ष डॉ.बालशौरी रेड्डी के हाथों ‘साहित्य सेतु सम्मान, 10 जनवरी 2013 खसंस्कार सारथी ट्रस्ट के तत्वावधान में ‘अक्षर शिल्पी सम्मान’ एवं लोकार्पण ‘और मैं बड़ी हो गई’ गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली 12 मार्च, 2013 खदिल्ली साहित्य अकादेमी द्वारा गणतन्त्र दिवस और सिन्धी के वरिष्ठ शायर हरी दिलगीर की याद में संयोजित संस्कृत व साहित्यिक काव्यगोष्ठी में भागीदारी, 20 जनवरी, 2013 ख‘सैयद अमीर अली मीर पुरस्कार- 2013, मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, मंत्री संचालक श्री कैलाशनाथ पंत की हाजिरी में माननीय राज्यपाल श्री रामनरेश यादव के हाथों ‘चरागे-दिल’ के लिए, 2, अक्टूबर 2013

मेरी बात : कलम तो मात्र इक ज़रिया है, अपने अंदर की भावनाओं को मन की गहराइयों से सतह पर लाने का। इसे मैं रब की देन मानती हूँ, शायद इसलिये जब हमारे पास कोई नहीं होता है तो यह सहारा लिखने का एक साथी बनकर रहनुमाँ बन जाता है। लिखने का प्रयास शुरुवाती दौर मेरी मातृभाषा सिन्धी में हुआ। दो ग़ज़ल संग्रह सिन्धी में प्रकाशित, कई आलेख, और समीक्षाएं लिखीं, फिर कदम ख़ुद-ब-ख़ुद राष्ट्रभाषा की ओर मुड़ गए, शायद विदेश (न्यू जर्सी) में रहते हुए साहित्य की धारा हिन्दी में प्रवाहित हुई और देश की जड़ों से जुड़ी यादें काव्य-रूप में कलम के प्रयासों से काग़ज़ पर उतरने लगीं। प्रवास में हिन्दी अकादेमी द्वारा कई संग्रह निकले जिनमें शामिल रही। प्रवासी परिवेश पर आधारित लेख, कहानियाँ और समीक्षात्मक आलेख लिखना एक प्र्वृत्ति बन गयी। ग़ज़ल विधा मेरी प्रिय सहेली है, बस एक शेर में अपने मनोभाव को अभिव्यक्त करने का साधन और माध्यम। शिक्षिका होने का सही मतलब अब समझ पा रही हूँ, सिखाते हुए सीखने की संभावना का खुला आकाश सामने होता है, ज़िंदगी हर दिन एक नया बाब मेरे सामने खोलती है, चाहे-अनचाहे जिसे पढ़ना और जीना होता है, यही ज़िंदगी है, एक हक़ीक़त, एक ख़्वाब!!

यह ज़िंदगी लगी है हक़ीक़त, कभी तो ख़्वाब

वह सामने मेरे खुली, जैसे कोई किताब

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ईबुक - सरहदों की कहानियाँ / / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

 

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(समाप्त)

(टीप - इस संकलन कुछ कहानियाँ  पुनर्प्रकाशित नहीं की गई हैं  - जैसे कि रिश्ता, गोश्त का टुकड़ा, गुनाह का अंत, एक मरा हुआ इंसान, जिंदगी और टेबल टाक - क्योंकि वे- प्राची दिसम्बर 2015 के अंक में  पूर्व प्रकाशित हैं जिसे आप यहीं रचनाकार के पृष्ठों पर जनवरी 2016 के अंक में पढ़ सकते हैं.)

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स्नेह का सावन

इमदाद हुसैनी

शॉन ने कुर्सी की पीठ पर लेटे, एड़ियों पर घेर देकर, कुर्सी को पिछली टाँगों पर खड़ा किया और फिर दीवार से टिकाने के लिए कुर्सी को पीछे की ओर धक्का दिया। संतुलन क़ायम न रहा और झटका खाकर कुर्सी ने उसे मेज़ पर ला पटका, जहाँ वह कुछ पल तो टेबल पर बाँहों को मुँह में दबाये ही पड़ा रहा।

‘दीवार पीछे तो नहीं हट गई है?’ उसने सोचा। कुहनी में जलन महसूस हुई तो कराहते हुए बाँह की ओर देखा। कुहनी में खरोंचें आई थीं और उनसे ख़ून निकलकर वहीं जम गया था। उस जगह मरहम लगाया, फूँक मारी, कमीज़ की बाँह नीचे की, फिर टेबल पर बाँहों के बीच मुँह रख दिया।

"हैलो!" शॉन के कानों में जलतरंग सी झनकार हुई। उसने गर्दन ऊपर उठाई। सामने लालन खड़ी थी। बरसाती वेशभूषा में, कंधों पर गरजते बादल लिए, लबों पर लाली लगाए। वह तो लालन के चेहरे पर टिकी आँखें ही उठा नहीं पा रहा था।

"देख तो ऐसे रहे हो जैसे पहली बार देख रहे हो।" लालन की मुस्कान ने गालों पर पड़े कपोलभंग को और गहरा कर दिया।

"पहली बार नहीं, आख़िरी बार!" वह भी मुस्कराया। एक रूठी हुई मुस्कान के साथ लालन को बैठने के लिए कहकर वह बाहर निकल गया। बाहर कमीज़ की बाँह से आँखें पोंछकर भीतर लौट आया।

"बाहर चलते हैं।" और वे बाहर निकलकर कार में आकर बैठे। कार स्टार्ट हुई और हैदराबाद के रास्तों पर दौड़ने लगी।

"कितनी पास हो और कितनी दूर हो।" शॉन ने जैसे अपने आप से बात की। लालन ने अपना हाथ उसके हाथ पर धर दिया। लालन, जो उसकी सब कुछ थी, और जैसे कुछ भी न थी! वह जो उसकी आदि और अंत थी, वह उससे आख़िरी बार मिल रही थी। वह हर रोज़ मिला करती थी- क्लास में- कॉरीडोर में- सीनेट हॉल में- सम्मेलनों में- मुशायरों में- जश्ने रूह रिहाण में- जलसों में- जुलूसों में- सिन्धू पर- हर जगह...! उससे मिलना तो मुहाल, आज के बाद तो वह उसे कभी देख भी न पाएगा। वह भीतर तक भीग गया था। बाहर बूँदें बरसने लगीं और विंड स्क्रीन पर जमा होकर रेला बनकर बरसने लगीं। फिर बड़ी बूँदें बरसने लगीं।

शॉन ने वाइपर चलाये, हेड लाइट जला दी और लालन उनकी रोशनी में बूँदों की झिलमिलाहट देखने लगी।

"हमारे आँसू भी बादल रो रहा है।" शॉन ने ठहाका मारा जो ख़ुद उसे ही सिसकियों का आभास देता रहा। लालन ने उसके हाथ को होंठों तक लाया और उसे याद दिलाया- "आज हम रोने की कोई भी बात नहीं करेंगे।" शॉन ने ठंडी साँस ली और लालन के हाथ को हलके से दबाते हुए कार को जामशोरो की ओर मोड़ दिया।

‘लालन’ - सिर्फ शॉन ही इस नाम से उसे बुलाया करता था। लालन ने पहले ही उसे बता दिया था कि उनका साथ सिर्फ़ परीक्षाओं तक ही है। फिर जोगी किसी का रिश्तेदार नहीं! परीक्षाओं के बाद वह फिर से जिलों में जा बसेगी। नाते और शिक्षा के संबंध पर उनकी कई बार बात हुई थी, जीवन साथ बिताने की बात हुई पर....!

"नहीं, तमाम उम्र का साथ नहीं।" लालन ने कहा था।

"इस में शिक्षित होने की बात है भी, नहीं भी है।" सुनकर वह पल दो पल चुप रही।

"देखो शॉन, मैं एक ऐसे परिवार से आई हूँ, जिसमें लड़कियों की पढ़ाई पर प्रतिबंध है। ज़्यादा से ज़्यादा उन्हें क़ुरान की तालीम दी जाती है।"

"फिर क़ुरान उनकी झोली में डालकर, बख़्शाया जाता है!" शॉन ने कहा।

"मैं खानदान की पहली लड़की हूँ।" लालन ने सुना अनसुना करते हुए कहा, "जो यूनिवर्सिटी तक पहुँची हूँ। और मैं.... मैं उस डगर की आख़िरी लड़की बनना नहीं चाहती। उसके पीछे ख़ानदान की और भी लड़कियाँ हैं, जो तालीम की अलग-अलग दुश्वारियों का सामना कर रही थीं। उन्हें भी यूनिवर्सिटी तक पहुँचाना है।" लालन ने अपने पिता को विश्वास दिलाया था कि वह उनके साथ कभी भी, कोई भी विश्वासघात नहीं करेगी।

"और प्यार के साथ विश्वासघात!" शॉन ने जैसे सिसकियों को लफ़्ज़ों में उँडेला था।

"ये लफ़्ज़ तुम्हारे मुँह से अच्छे नहीं लगते।" लालन ने उसके कंधे पर गर्दन टिकाते हुए कहा। "मैं तो तुम्हारे साथ बिताए दो सालों में पूरी ज़िंदगी गुज़ार चुकी।" लालन के इस तरह के सहज-सरल व्यहवार पर शॉन को अचरज होता था।

कार जामशोरो के पुल पर पहुँची तो लालन ने अपने पर्स से सिक्कों की मुट्ठी भरकर, कार की खिड़की का शीशा नीचे करते हुए झनझनाते सिक्के सिंधू की तरंगित लहरों की ओर फेंके। कार पुल पार करके अलमंज़र की ओर मुड़ गई। वे कार से उतरकर अलमंज़र पर जाकर बैठे। वहाँ की हवा लालन के बालों से शरारत कर रही थी। बरसाती बौछारें और सिंधू का शोर आपस में घुल-मिल से गए थे। लालन उठकर रेलिंग के पास जा खड़ी हुई, सिंधू की तरफ़ उसका चेहरा था। शॉन भी उसके पास में आकार खड़ा हुआ। दोनों बारिश में भीगने लगे।

"लालन!"

"हूँ...."

"जब जीवन में तुम ही न रहोगी, तो फिर मेरे पास जीने का कौन सा सबब होगा?"

लालन की हँसी जलतरंग की तरह गूँजी।

"यह तुम्हारी कहानी ‘मरुस्थल में चीख़ हुई’ का संवाद है न?"

"पर यह मेरे सवाल का जवाब तो नहीं।"

"जीने के लिए सबब हो यह ज़रूरी तो नहीं, ज़िन्दगी तो हमपर थोपी गई है और यह हमें हर हाल में दम गुज़र करनी है, पर...." लालन रेलिंग के पास से हटकर टेबल पर आकर बैठी। शॉन कुछ देर वहीं खड़ा रहा, निचला होंठ दाँतों के बीच दबाकर, वह लालन की ओर चला आया। वह चाय पी रही थी। शॉन ने भी चाय की चुसकियाँ लीं और फिर दोनों ने अपनी प्यालियाँ बदलीं।

"पर.... क्या?"

 

"पर...यह कि तुम्हारे पास जीने का सबब मौजूद है।"

"कौन सा?"

"लिखना....!"

"लिखना!" शॉन के होंठों पर निर्जीव मुस्कान तड़पने लगी। दिल में आया कि वह लालन को सुना दे कि अभी कल रात ही उसके पिता ने उसके नॉवल ‘जो डगर पर मरते’ का पहला अध्याय फाड़कर डस्टबिन में फेंक दिया था। शॉन ने अपने दायें हाथ की ओर देखा और फिर खुले हुए हाथ को मुट्ठी में बंद कर लिया। पिता चाहता था कि शॉन कारोबार में उसका हाथ बंटाए। पर शॉन कारोबारी आदमी न था, और वह यह बात अपने पिता को नहीं समझा पाया था।

लालन ने वॉच में देखा।

"क्या वक़्त ठहर नहीं सकता?" शॉन ने पूछा।

लालन के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी।

"वॉच ठहर सकती है, पर वक़्त नहीं।"

शॉन ने बिल का भुगतान किया, और दोनों नीचे उतरकर कार में जा बैठे। कार शुरू होकर रास्तों पर भागती रही। लालन हेड लाइट की रोशनी में बूँदों की झिलमिलाहट देखने लगी। हैदराबाद पहुँचे तो बारिश बंद हो चुकी थी।

"बस, यहीं.... !" लालन ने कहा और शॉन ने कार रोक दी। लालन ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया, उसे होंठों तक लाकर चूमा और आँखों पर रखा, फिर चूमा और बिना कुछ कहे कार का दरवाज़ा खोलकर उतर गई और शॉन उसे जाते हुए देखता रहा, जब तक वह नज़रों से ओझल न हुई।

 

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Devi Nangrani

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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बीमार आकांक्षाओं की खोज

मुश्ताक़ अहमद शोरो

क्या ये सब जिल्लते, यंत्रणाएँ, अपमान, मानसिक यातनाएँ, अनाड़ीपन, महत्वहीनता के नगण्य भाव मेरे हिस्से में आने वाले थे? दोष भी किसे दें, मेरी ऐसी दयनीय दशा के लिए! वैसे तो मैं अपनी छोटी-छोटी ख्वाहिशों, उम्मीदों, नाकामियों, निराशाओं और नाउम्मीदों में ज़िन्दा था, जीता रहा ऐसे ही, पर यह अहसास? शायद मेरे चेहरे की तरह, मेरी रूह, मेरे वजूद और सोच में भी सिलवटें पड़ गई हैं या शायद मैं ग़लत मौक़े, ग़लत वक़्त और ग़लत जगह पर पैदा हुआ हूँ या मौजूद हूँ।

पर यह कोई ख़ास नई या हैरान करने वाली बात तो नहीं है। मैं जो कुछ भी सोचता हूँ, वह कह नहीं सकता। ये तो शुरू से ही था। और उसके सवालों के जवाब, उन की सोच विचार और राय पर जवाब, और उन जवाबों की दलीलें बाद में ही दिमाग़ में आती हैं। "ऐसे जवाब देता तो यह दलील देता।" सामने बात करते तो जैसे साँप सूँघ जाता है। होश गुम हो जाते हैं। कुछ भी समझ में नहीं आता कि क्या कहूँ, कौन सा जवाब दूँ?

मेरे लिये लोगों का धिक्कार, नफ़रत, नज़रअंदाज़ी और अहमियत न देने का कारण तो मान लें, मेरा अनाड़ीपन और पागलपन ही हो। पर मेरे साथ ऐसा क्यों है? कोई कितनी भी बेइज़्ज़ती करे, ज़लील करे, ठिठोली करे, ताने मारे, पर बदले में देने के लिये मेरा पास कुछ भी नहीं। पहले तो मन ही मन में उस आदमी को अपने हाथों ज़लील ओर अपमानित करने की फिल्म बार बार चलाता था, पर अब ज़िन्दगी के उस पायदान पर कौन बैठकर लेखा-जोखा करे। बचा ही क्या है अब, हिसाब किताब के लिये! शोलों की प्रतीक्षा की पीड़ा, संताप व यातना जो मौत की सज़ा क़रार क़ैदी अपनी जिऩ्दगी की आख़िरी रात महसूस करता है, इसे इस क़ैदी से ज़्यादा और कौन कैसे जान, समझ, महसूस कर सकता है?

मैं जो अपने वजूद के पहले दिन से अंधेरों में भटकता, खिसकता, ठोकरें खाता साफ़-शफ़ाक़, उजली रोशनी और उजाले की खोज करता रहा, मिला क्या? अंधकूप, प्रकाशरहित काली रातें मुक़दर बनती रहीं। मुक़दर, तक़दीर, भाग्य पता नहीं क्या है!

पर सच में अजीब दस्तूर है कि एक जैसी ही परिस्थितियों में, एक जैसे अवसर पाने पर भी कोई जीत जाता है, कोई हार बैठता है। कोई बच जाता है तो कोई ज़िन्दगी से हाथ धो बैठता है। एक ही बस के हादसे में कोई मर जाता है तो किसी को खरोंच भी नहीं आती। और मैं जिस किसी काम में हाथ डालता हूँ तो बस गड़बड़ पैदा करने का सबब बन जाता हूँ। सीधा-सरल काम तो मुझसे कभी हुआ ही नहीं है। मेरा वजूद ही एक ‘क्रिमिनल जोक’ है।

क्रिमिनल!.... क्राइम.... क्या है क्राइम? क्रिमिनल अपराधी बनना आदमी का अपना चुनाव तो नहीं। इन्सान तो बिलकुल ख़ाली और कोरा है। उसके पास देने के लिये अपना कुछ भी नहीं है। वह तो सिर्फ़ समाज को वही लौटाकर देता है, जो समाज उसे देता है। और यही समाज! इस समाज के पास तो क्रिमिनल अपराधी, अशक्त मरीज़ या पागल पैदा करने के सिवा है भी क्या? यह रचना एक बड़ा कारख़ाना है, गुनहगार और दुर्बल मरीज़ पैदा करने का। अपनी पैदाइश के लिये सज़ाएं भी समाज ख़ुद ही तय कर बैठा है।

ज़िन्दगी मैं नहीं गुज़ार रहा, ज़िंदगी ही मुझे धीरे-धीरे जी रही है। कभी न कम होने वाली यातनाओं में, ना उम्मीदों और मायूसियों के कभी न ख़त्म होने वाले सिलसिले में। ज़िन्दगी के हाथों मैंने हर क़दम पर, हर मोड़ पर मार खाई है और मेरे हिस्से में अपने ही ज़ख्मों को चाटने के सिवा आया ही क्या है?

आगे क्या होगा? भले कुछ भी हो पर बेहतरी की उम्मीद बेवकूफ़ी है। कभी-कभी धोखे और नखलिस्तान भी बेहतर होते हैं। कुछ वक़्त के लिये आदमी में जीने की तमन्ना तो पैदा हो जाती है। जब वह ज़िंदगी में आई तो मैं समझ बैठा, कि कुछ भी हो वह मेरे लिये किसी घने दरख़्त की छाँव है। मैंने सोचा, उस पेड़ के तने के सहारे उसके सांवली घटाओं जैसे बालों में मुँह छुपाकर, बाक़ी की बची ज़िन्दगी गुज़ार लूँगा- कुछ भी सोचे बिना उन दुखों, उन यातनाओं, उन बेग़ैरत व्यवहारों और ज़िल्लतों को बाजू रखकर। पर वह छायादार था, टिक न पाया।

ख़्वाहिशों और आशाओं की भीड़ में रौंदते, कुचलते हुए भी, उस भीड़ से अलग रह पाना कितना कठिन है, अपने बदसूरत पाजीपन और मामूली वजूद को भुलाकर। चाहा मैंने भी था कि कोई हो जो टूटकर मुझे चाहे, किसी और के नाम से जुड़ी हुई न हो। सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे लिये हो और उसकी आँखों में सिर्फ़ मैं ही समाया रहूँ। उसकी आँखें भी उसकी तरह कुँवारी हों, और मैंने अपने सपनों को उसके रूप में वास्तविक रूप धारण करते हुए पाया।

उसने कहा-

"उसका पहला प्यार कोई था, जो उसे छोड़कर चला गया। इसीलिए वह अपने आप में खोई रहती है। वैसे भी औरत को प्यार से ज़्यादा सामाजिक शिनाख़्त की ज़रूरत होती है। वह तो सिर्फ़ शादी के चक्कर में है। उसका दिल, सोचें, ख़्याल बंटे हुए हैं। वह टुकड़ों टुकड़ों में जीती है। लफ़्ज़ न थे, बम के धमाके थे। मेरे पाँवों तले से ज़मीन खिसक गई और मैं ख़ुद को ज़मीन और आसमान के बीच में लटका हुआ महसूस करने लगा। ये सदमें भाग्य हैं। दुख फिर भी हुआ, पीड़ा और तकलीफ़ का कारण तो इतना महत्वपूर्ण भी नहीं था, फिर भी जाने क्यों? पता नहीं मैंने अवकाश क्यों लिया- सुकून पाने से ज़्यादा यातना और मानसिक संताप यूँ घेर लेते हैं, जैसे मधुमक्खी के छत्ते में हस्तक्षेप करने से मधुमक्खियाँ घेर लें। दोष उसका नहीं था, हस्तक्षेप मैंने ही किया था।

उसने कहा- "एक बात कहूँ?"

मैं चुप!

मेरी किसी प्रतिक्रिया के बिना उसने कहा- "शादी औरत के लिये बीमा-पालिसी है, जिसका प्रीमियम वह सेक्स की सूरत में अदा करती है।"

मैंने ही कहा था उस बात के भद्देपन को बहलाने के लिये- "नहीं, ऐसा बात भी नहीं है, औरत का बच्चों में भी तो मोह होता है, वह भी तो असामान्य है....!"

अब और कुछ तो याद नहीं, बस इसी तरह कुछ बकता रहा यह साबित करने के लिये कि सब कुछ नार्मल है। कुछ भी अचानक और सदमे जैसा नहीं है, सब ठीक है, ऐसा ही जैसा था।

चौराहे पर मेरा खड़ा होना स्वाभाविक है, जब मंज़िल का अता पता न हो। मेरा पीड़ादायक सफ़र तो जन्म से शुरू हुआ है, मरने पर ख़त्म होगा। मौत भी जाने कैसे और किस हालत में आएगी। वह भी दर्दनाक ही होगी.

... शायद, नहीं.... निश्चित ही भयानक होगी।

सज़ाएँ तो काट रहा हूँ। ‘सेसफस’ को सज़ा दी गई थी कि वह भारी पत्थर कंधे पर उठाकर पहाड़ की चोटी पर चढ़े और जब वहाँ पहुँचे तो पत्थर हाथ से छूटकर फिर पहाड़ की तलहटी पर आ जाये और वह उस निष्फल कार्य पर हर वक़्त अफ़सोस करता रहे- बेमक़सद परिश्रम की सज़ा, सेसफस की तरह मुझे भी न जीतने का संताप एवं बिना किसी मंज़िल के सफ़र करने की सज़ा मिली हुई है। मेरी रूह की दर्दनाक चीखें गूँगे बहरे कानों तक नहीं पहुँच सकतीं, सब बेकार है।

यह रात की उन अनेक अद्वितीय रातों में से है, जिसमें रातों की नींद उड़ जाती है और उसकी जगह अनिद्रा ले लेती है। अक्सर ऐसा होता है, नींद भी रूठे हुए महबूब की तरह होती है, ज़िद्दी, कठोर, मिन्नतें न मानने वाली। जागरण आँखों में यूँ बस जाता है जैसे खाली वीरान और उजड़ी जगहों पर भूत-प्रेत अपना निवास कर बैठते है। अब होगा यूँ कि सूरज निकलने के बाद ऊँघता सा, बेहाल होकर बेहोशी की हालत में आज का सारा दिन और कल भी बेकार चला जाएगा। कोई काम-धाम करने की कोई सुध-बुध न रहेगी। यह ऐसा ही होता रहा है। पर करने के लिये ऐसा कुछ है भी तो नहीं!

अब इस ज़िन्दगी के लिये बैठकर क्यों सोचा जाए, कौन सा आराम और सुकून मिला है और फिर ज़िन्दगी कौन से निर्बाध ढंग से गुज़री है।

यह जीवन तो क्या-क्यों के सवालों में ही बीत गया। शराब क्यों पीते हो?

गंदी वेश्याओं के पास क्यों जाते हो? ऐसे क्यों हो? वैसे क्यों हो तुम? पर कभी किसी ने यह नहीं पूछा कि तुम ज़िंदा किसलिए हो? मर क्यों नहीं जाते?

कोई भी मेरे अंदर झाँककर मुझमें छुपा हुआ, डरा हुआ मासूम बच्चा न देख पाया है, न पहचान पाया है! मेरे सख़्त चेहरे और व्यवहार के पीछे छुपे हुए कमज़ोर दुर्बल शख़्स को तो वह भी नहीं देख पाई। हमेशा मुझे पत्थर दिल ही कहती रही। ज़िंदगी के ज़ख़्मों की ख़लिश को उसने महसूस नहीं किया, जो मुझसे जुड़ी थी।

उसने कहा- "तुम्हारे रवैये में भी निराशा है, तुम हमेशा निगेटिव सोचते हो। ‘पोज़िटिव’ रवैया तो तुम्हारे पास में भी नहीं गुज़रता।"

मैंने कब कहा और सोचा है कि जीवन का फ़क़त एक ही पहलू है। मैं तो सिर्फ़ उस ज़िन्दगी की बात कर रहा हूँ जो मेरे हिस्से में आई। वर्ना सुबह की उज्जवल किरणों में जीने की आशा किसे नहीं होती। हर इन्सान

ख़ुशी चाहता है और दुख से छुटकारों की चाह रखता है। पर क्या यह मुमकिन है? इन्सान के नियंत्रण में है? सब कुछ ऐसा ही है?

अब लगता है ज़िन्दगी का समस्त लेखा-जोखा हो चुका है। एक तरफ़ा ही सही, इस जीवन में नफ़े-नुक़सान की तकरार में बैठ कर कौन रोए? लावारिस सवालों का जवाब हासिल होने वाला नहीं, ऐसे जैसे धिक्कारे हुए अहसास दिवालिये और कंगाल मुहब्बत के बदले में नहीं मिलते हैं। मैं चाहे कुछ भी कर लूँ पर यह तय है और यही मेरी अलिखित सज़ा है, जिसमें मेरा सारा वजूद एक ऐसी लगन और परिश्रम में लगा हुआ है,

जिसमें से कुछ हासिल होना नहीं है। कोई भी नतीजा निकलने वाला नहीं। फ्रांस के क़ौमी दिवस पर फ्रेंच एम्बेसी के राजदूत को निवास स्थान के एक चौड़े विशाल लॉन पर मिली एक दावत में, मैं व्हिस्की का एक पेग हाथ में लिये लॉन के एक ख़ाली कोने में सबसे अलग बैठा हुआ था, तो वह मेरी ओर बढ़कर आई, न जाने क्या सोचकर या शायद किसी ग़लतफ़हमी की तरह। इससे पहले तो ऐसा कभी हुआ न था।

"हेलो, कुछ अपने बारे में भी तो बताओ?"

वह कुछ आश्चर्य में थी।

"मैं.... बस एक आम आदमी हूँ- ऊँ....हाँ, ख़ूबियों की गणना में ख़ामियाँ शायद मुझमें बहुत हैं! शायद इसीलिये अपने बारे में कुछ ठीक से कहा नहीं जाता। अपने बारे में निर्णय सही नहीं होता। जीवन में नाकामियाँ बहुत हैं,

कामयाबिया नहीं के बराबर। उपलब्धियों की तुलना में विफलताएँ ही विफलताएँ हैं। मेरे साथ ऐसी कोई भी बात जुड़ी हुई नहीं है, जो मुझे औरों से अलग पहचान दे। ज़िंदगी में कोई भी उपलब्धि नहीं। बस यूँ समझ लो कि इस धरती पर छः अरबों की आबादी में मैं भी एक हूँ, ऐसे ही आम! और तो कुछ महत्वपूर्ण नहीं सुनाने जैसा।

"तुम तो शर्मीले हो और अपने आप में खोए हुए हो!"

"मुझे मालूम नहीं पर मैं डर से बावस्ता हूँ।"  चौबीस घंटे ही डर में जीता हूँ, कुछ अनजाना सा डर, अंधेरे का डर और...."

"कभी इस बात पर ग़ौर किया है कि तुम्हारी समस्या क्या है? तुम ऐसे क्यों हो, निराश-मायूस?"

"सोचा तो कई बार है पर मालूम नहीं.... मुझे लगता है कि मेरे जीवन में कुछ न्यूनता है और अपनेपन का अभाव मैं सदा महसूस करता रहा हूँ।  इसके सिवा मुझे पता नहीं, कुछ और भी हो! मेरी समझ के बाहर है।"

"सच क्या है?

"सच वो है जिसकी हमेशा तलाश रही है, पर कभी मिला नहीं है। किसी को भी नहीं, गौतम बुद्ध को भी नहीं...!"

वह कुछ देर चुप मेरे मुँह को तकती रही और फिर बिना कुछ कहे, अपनी पहचान दिए बिना, आहिस्ता आहिस्ता चलती हुई भीड़ का हिस्सा बन गई और मैं वहीं अकेला ही बैठा रहा।

अकेला तो सारी उम्र रहा हूँ। किसी को अपना बनाना भी तो मुझे नहीं आया है। ता-उम्र अकेले रहते रहते अब हालत ऐसी हुई है कि कोई अपने आप मेरी तरफ बढ़ने की कोशिश करता भी है तो मैं खुद दूर भाग जाता हूँ। शायद डर से, शायद बेयक़ीनी में, या शायद बेऐतबारी में। पर मुझमें कुछ ऐसा है भी नहीं कि कोई मेरे साथ सारी उम्र बिता सके। मूढ़ और अनाड़ी तो हूँ ही।

अब शायद वक़्त भी नहीं है मेरे पास रिश्ते-नाते जोड़ने का, और न ही साहस। शायद वक़्त और साहस दोनों मेरे पास नहीं। शायद....!

अब तो लगता है ज़िन्दगी से लड़ने के लिये मेरे पास कोई हथियार ही नहीं बचा है।

 

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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मज़बूत टाँका हुआ बटन

पोपटी हीरानंदाणी

मेरी भाग्यवान देखी है? हक़ीक़त में जैसे मिलिटरी का एक किरदार। उस दिन कहा था, "मुझे तुम्हारी यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगती।"

मैंने कहा था- "मेरी कोई भी बात तुम्हें अच्छी लगी है क्या?"

तब कहती है- "तुम हो ही उल्टे तो फिर मैं क्या करूँ?"

अब मैं हो गया उल्टा और वह हुई सुल्टी। खट-पट भी तो इतनी है

कि बस बात ही मत पूछो। ज़बान जैसे तेज़ धार वाली तलवार। मुझ जैसे छः फुट वाले को उसकी तीन इंची ज़बान लिटा देती है। दोस्त कहता है,

"जिस घर में मधुर वार्तालाप करने वाली औरत न हो उसे जंगल में बस जाना चाहिए।" सच, भला जंगल इस मेरे घर से किसी भी हाल में बदतर न होगा?

बराबर आग वन में भी लगती है। पर जब लगती है तो सब कुछ भस्म कर देती है न? यहाँ तो हरदम आग लगती रहती है। किसी न किसी कोने में आग के शोले उठते ही रहते हैं। इससे तो अगर घर छोड़कर निकल.... पर मैं निकलूँ तो क्यों निकलूँ? घर मेरा और मैं ही निकलूँ? क्यों न उसको ही निकाल दूँ? निकाल दूँ....? अपने बच्चों की माँ को निकाल दूँ? बच्चों का क्या होगा? घर का क्या होगा? लोग क्या कहेंगे? लोग!

लोगों को मारो गोली। ये ही तो थे जो कहते फिरते थे- "शादी क्यों नहीं करते?"

"मूमल का मुखड़ा कब दिखाओगे?"

"भगवती के शादी ब्याह के गीत कब गूँजेंगे?"

ये लो, मूमल ले आया, अब इस भाग्यवान सुराही के मुँह से जो यह ज़़हर उगलता रहता है, वह मेरे सिवा दूसरा कौन निगलता है?

 

मैं भी अजीब आदमी हूँ। इस तोती ने अपनी चोंच से कोंचते-कोंचते मेरे पंखों को इतना सपाट और चिकना बना दिया है कि मेरे पास सालों के

साल उसके साथ पिंजरे में रहने के सिवा और कोई रास्ता ही नहीं बचा है। पर सोचता हूँ कि मैं उससे इतना क्यों डरता हूँ? औरत से डर रहा हूँ। ऑफ़िस में तो मैं कड़कती आवाज़ में बात करता हूँ। वह ज़रीन कपाड़िया मुझसे कितना कतराती है? ड्राफ्ट लिखते वक़्त उसके हाथ काँपते हैं। सब चपरासी मुझसे डरते रहते हैं। मैं भी कहता हूँ भले ही डरते रहें.... इस ऑफ़िस में मेरा प्रभुत्व बना रहे.... वैसे घर में तो वह मुझे धमकाती रहती है। सच तो यह है कि उँगली से उठाती है और उँगली से बिठाती है। मेरे आत्मविश्वास को कुचलकर रख दिया है। बच्चे कुछ पूछते हैं तो कहता हूँ- "जाकर माँ से पूछो।" उस दिन फत्तू ने जब कोर्स के बारे में पूछा, तब भी माँ से पूछने के लिये कहा तो कितना चकित हुआ? कह दिया- "डैडी! ममी को कॉलेज अध्ययन के बारे में क्या पता?"

मैं भी क्या करूँ? कभी कुछ कहता ही नहीं हूँ कि मिलिट्री का क़ायदा लागू हो जाता है। फ़ारसी के जानकार सच कहते हैं कि शादी की पहली रात ही बिल्ली मारनी चाहिए नहीं तो फिर बीवी सर पर नाच करने लगती है।

तौबा.... तौबा... ज़बान की कैंची इतनी तेज़ चलाती है कि मेरा वजूद ही टुकड़ों टुकड़ों में कटकर दर्जी के चिथड़ों की तरह हो जाता है। इससे तो शादी न करता!

पर भाई, शादी करने का तो मेरा भी दिल था। मैं समझा, औरत क्या होगी खांड की डली होगी। उसके नरगिसी चेहरे पर महकती शबनम होगी जिससे हर वक़्त आस-पास सुगंध आती रहेगी। वह बात करेगी तो गीत झड़ने लगेंगे और मैं सुध-बुध भुलाकर उस मधुरता में मदहोश हो जाऊँगा। मुझे क्या पता कि यह बला मेरे पल्ले पड़ जाएगी।

भला शादी की तो हर वक़्त उसे कहते रहते- "मेरी चाशिनी.... मेरी रोशनी.... मेरी बुलबुल..... मेरी सोहनी....." बिलकुल मुरीद बनकर उसके पीछे क्यों फिरता रहा?

सच.... उस वक़्त मुझे कितनी अच्छी लगती थी। पलकें झुकाकर तिरछी नज़र से मेरी ओर देखती थी तो मेरे सारे शरीर में विद्युत प्रवाहित होती थी। उसका दुपट्टा कंधों से खिसककर नीचे सरक आता था तो मेरी तमन्नाएँ ऊपर उभर आतीं.... उसका हाथ पकड़ता था तो वह शरमाकर कहती थी.... ‘छोड़ो ना, क्या कर रहे हो?’ बस.... मेरे दिल की उमंगों की तरंगें एक दूसरे के ऊपर लहराती बलखाती रहतीं.... एक अनोखी ख़ुशी की झाग मेरे दिल के किनारे चले आया करती। गर्म और तेज़ अरमानों की चमक मेरे मन पर फैल जाती थी।

पर अमा यार, जब मैं जवान था जवानी के रंगों के सामने इन्द्रधनुष के रंग भी पछाड़ खा जाते। जोबन की उस अवस्था में कड़वी मिठास और मीठी कड़वाहट, मिलना और तड़पाती ख़ुशी और बिछड़ने में सोज़ भरा सुख, न जाने क्या क्या महसूस किया है!

तो क्या अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ? अभी तो सिर्फ़ चालीस पार किये हैं। परदेस में चालीस के बाद ही जवानी की ऋतु शुरू होती है। पर दोष भी तो मेरा ही है, तब इतनी खुशामद न करता तो आज इतना सिर घूमा हुआ न होता।

पर अब भी वक़्त है, अगर डंडा उठेगा तो भला होगा... च....च...

क्या कह रहे हो? क्या करोगे आख़िर? क्या मारोगे उसे? बस इसी शराफ़त ने तो मार डाला है। अगर मुझ-सा कोई मर्द सामने होता तो उसके दाँत तोड़ देता, पर इस औरत जात के सामने....

पता नहीं ये औरतें ऐसी क्यों बनी हैं आख़िर? क्यों एक औरत में दो औरतें समाई हैं.... एक कोमल, दूसरी कठोर। एक फूल जैसी, दूसरी लोहे जैसी.... एक शीतल अग्नि और दूसरी जलता पानी.... ओह! दो विपरीत चीज़ें मिलेंगी तो ऐसा ही होगा।

हे मेरे भगवान! बड़ी समालोचना वाली नज़र होती है उनकी। उस दिन कह रही थी कि "चलो बांद्रा, मेरी मासी के पास।"

"अरे, मैं तुम्हारी मासी के पास चलकर क्या करूँगा?"

भला दो औरतें मिलती हैं तों बातें करती हैं फ़क़त अचार और पापड़ के बारे में, तक़रीरें करती हैं, भाजियों की मंहगाई पर और बहस करती हैं अनजाने लोगों की मंगनी और शादी की बातों पर।

मैंने कहा- "मैं बैठकर मैगज़िन पढ़ता हूँ।" तो मुँह फुलाकर बैठ गई

है। हैफ़ है हमारी मर्दानगी पर और शर्मिंदगी होती है हमारे मर्द होने पर। बस, अगर औरत ने दो आँसू टपका दिये तो हमने अपनी दाढ़ी दे दी उनके

हाथ में....!

कल बेचारा विश्नू आया था। छुटपन का दोस्त है, सहचर सखा। खाना खाकर निकल पड़े और जाकर अंधेरी में होतू के पास पहुँचे। पर अगर निकल गए तो क्या हुआ?

पर घर पहुँचे तो रात को दिन बनाकर रख दिया। बात का बतंगड़ हो गया। शादी की तो नल-दमयंती की तरह एक ही चादर में लिपटे से रहते। बस कहती है- "उस मुर्दार विश्नू से क्यों नहीं शादी कर ली?"

वह सुन्दर मेरी मासी का बेटा है। है पूरा घुमक्कड़, सचमुच पक्का बंडलबाज, पर कुछ भी कहो वह मन बहला जाता है। अगर थोड़ी व्हिस्की पीता है तो क्या हुआ? बोतल अगर पीता हूँ तो उसके मैक़े से तो नहीं ले आता?

पर सुंदर का कहना तो उसे अच्छा ही नहीं लगता। अरे, अगर मेरी पत्नी है तो क्या हुआ? तुम्हारा पति हूँ तो क्या किसी का बिरादर, यार-दोस्त नहीं हुआ क्या? माँ और बहन को तो सहती ही नहीं, चाहे वे कितनी भी इससे अच्छी लय ताल में व्यवहार करें। यह बस उनकी कमियों और कमज़ोरियों की ओर ही नज़र धरेगी। उसका पति होने के नाते क्या सिर्फ़ उसकी ही जागीर बन गया? ख़ुद भले ही हज़ारों खर्च करके साड़ियाँ ले ले, पर मजाल है कि बहन के लिये कभी भूले से भी सौ डेढ़ की कोई चीज़ ख़रीदे। मेरी माँ को भी अगर कुछ देती है तो लेखा जोखा सुनाकर, दाम को दस गुना बढ़ाकर, फिर भी जैसे उस पर बहुत मेहरबानी करते हुए। पैसे मेरे और मेहरबानी उसकी। छाुल्म है! बैल की तरह पसीना बहाकर पैसे हम कमाएँ और वे उस कमाई के पैसे की मुफ़्त में मालकिन बनती हैं। अजीब माजरा है। सिर्फ़ मालकिन बनें तो ग़नीमत, पर मेरे समस्त हस्ती के हक़ वास्ते जैसे उसे सौंपे हुए हैं। मेरे समय पर और मेरे पैसे पर, मेरे आने पर और मेरे जाने पर, मेरे उठने बैठने और बातचीत पर भी उसका हक़ है। वह लीला है न? मोती की पत्नी, उसका तौर-तरीक़ा, चाल-ढाल कितना मधुर व मनमोहक है। बातचीत भी मेरी गोपी की तरह नहीं है। बात करती है, तो लगता है जैसे सुबह की हवा सैर को निकली हो। दो घड़ी जाकर उसके घर बैठो तो लगता है घुटन भरे कमरे से निकल कर किसी नीम के पेड़ की छाँव तले बैठा हूँ। कभी तो उसकी काट खाने वाली बातों से भागकर उनके पास जा बैठता था तो ऐसे लगता था जैसे अष्टमी की रात चाँद और तारों के नीचे किसी की मधुर बाँसुरी सुन रहा हूँ। पर उसे मेरी ख़ुशी क्यों रास आती? सच में परेशान कर दिया है। अभी चप्पल पहन कर दरवाज़े की तरफ़ जाऊँ तो सवालों से हमला शुरू कर देती है- "कहाँ जा रहे हो? मोती के घर में क्या मिलता है? इससे बेहतर है घर में बैठकर आराम करो।"

दिल कहता था कि कह दूँ- "मेरी हर बात में हस्तक्षेप क्यों करती हो? आराम जाने और मैं जानूँ, तुम क्यों बीच में परेशान होती हो?"

वह घूरती इस तरह थी जैसे ज़हर भरा तीर फेंक रही हो। आख़िर तो मैं भी आदमी हूँ कोई कीड़ा-मकोड़ा नहीं? अरे उस ईश्वर ने भी एक कहानी लिखी थी- ‘मरा हुआ मकोड़ा’। पर मैं वह मकोड़ा बनूँ? बेग़ैरत मर्द बनूँ?

यह तो होना ही नहीं है। गर्दन मरोड़ दूँगा.... मरोड़ कर फेंक दूँगा। पर भैये, ये है सच, बचपन में रिकार्ड प्लेयर पर सुना थाः

घोट चढ्हयो घोड़ीअ ते नास पितो बोड़े

सवा घड़ीअ वास्ते सजी उम्र थो लोड़े।

(मतलब : दूल्हा चढ़ा घोड़ी पे, सब कुछ दाँव पर लगाकर, सवा घड़ी के वास्ते उम्र भर भोगता है।)

बस खांड पर जमा कीड़े मकोड़े जैसी हालत है हम मर्दों की। अरे शायद धोबी बन गया हूँ। सोच रहा हूँ.... कुर्ता निकाल कर पहन लेता हूँ.

... मुश्किल से जाकर इतवार मिलता है.... आज लेट जाता हूँ....!

अरे पर इसका बटन तो टूट गया है.... कहता हूँ कि टाँक दे.... नहीं नहीं रहने दो बिचारी को.... भले आज़ादी का आनंद लेने दो.... नहीं तो ऐसा मजबूत टाँकेगी कि क्या कहूँ.... छेद से सुई पार करके चारों ओर धागा लपेटकर.

...सुई आर-पार.... धागा चारों ओर....

"अरे लेट क्यों गए हो? भाभी के पास चलना है। जल्द ही तैयार होकर आओ, नहीं तो कहोगे धूप में लेकर चली थी इसलिये सर में दर्द हो गया है...."

"आज छोड़ दो, तुम भाभी के पास होकर आओ। मैं बैठ जा...."

"नहीं....नहीं.... ऐसे कैसे होगा? सब के साथ थोड़े ही रिश्ता तोड़ दोगे.... उठो... कमीज़ पहनो...."

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चौराहे से उत्तर की ओर

अब्दुल रहमान सियाल

सुबह का वक़्त है, बस से उतरकर रोज़ की तरह चार कमरों तक महदूद उस कॉलेज की बिल्डिंग की ओर रुख़ किया और हर रोज़ की तरह जल्दी- जल्दी सीढ़ियाँ फलांगते हुए क्लास रूम में पहुँचकर किताब कॉपियों को सीट पर फेंकते हुए बरांडे में आकर खड़ा हो गया। यहाँ वहाँ नज़र फिराई, देखा अभी तक कॉलेज का दरबान भी नहीं आया था। रोज़ की तरह सामने ‘कोर्ट व्यू’ बिल्डिंग पर लगे अंग्रेज़ी पोर्स्टस को चाह के साथ देखने लगा, कि उनमें कौन से नये पोस्टरों का इज़ाफ़ा हुआ है। जिस्म को उभारते पोस्टर शायद परीक्षा लेने के लिये लगाये गये हैं। पोस्टरों के पीछे कोर्ट के बाहर झोपड़ियों के नीचे मुनीमों की टेबल व कुर्सियाँ ऊपर से देखीं जो रोज़ की तरह उलट कर रखी गई थीं। यह सब देखने के बाद नीचे उतर आया। कॉलेज की बिल्डिंग का चक्कर लगाया पर कोई भी ऐसा आदमी नहीं पहुँचा था जिस के साथ बैठकर पल भर भी वक़्त गुज़ारा जा सके। कभी कभी कोई मुझसा सीधा-सादा कोई स्टूडैंट आ जाता तो फिर अच्छी कचहरी हो जाती थी और काफ़ी समय भी गुज़र जाता था।

पर आज कोई भी स्टूडैंट नहीं आया था। बस मैं अकेला ही था। पर अकेला बोर हो रहा हूँ क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? अभी इन्हीं ख़यालों में गुम था कि अचानक घड़ियाल की घंटी बज उठी। नज़र उठाकर देखा तो साढ़े सात बजे थे। टाइम देखकर और भी ज़्यादा बोर होने लगा। कॉलेज शुरू होने में पूरा एक घंटा बाक़ी था। पहला पीरियड मिस जमाल का होता है। वैसे तो पहला पीरियड अटैंड करना किसी को भी याद नहीं होता था। अक्सर कई स्टूडैंट्स का मिस हो जाता था। पर जब से मिस रोज़ी जमाल हमारे कॉलेज में आई हैं, तब से स्टूडैंट्स क्लास शुरू होने के पहले आ जाते हैं। हर एक भली-भांति तैयार होकर आ जाता।

क्लास शुरू होने में पूरा एक घंटा बाक़ी था। मन में बहुत गुस्सा भर गया। जब कुछ और न कर सका तो मन ही मन में स्कूल बस के ड्राइवर को पहले तो कोसने लगा और फिर गालियाँ देने लगा, क्योंकि जो ठंडक गालियाँ देने से मिलती है, वह कोसने से नहीं मिलती। साला..... कहीं का। सुबह साढ़े पाँच बजे नींद से उठना पड़ता है, सिर्फ़ स्कूल बस तक पहुँचने के लिये। बेबस होकर स्कूल की सीढ़ी पर एक खंभे का सहारा लेकर बैठ गया। दस-पंद्रह मिनट गुज़र गए पर कोई भी दोस्त नहीं आया जिसके साथ बैठ कर वक्त गुज़ारने की ख़ातिर कोई इश्क की दास्तां की बात करूँ। दिल में ख़याल आया, किसको फ़ुर्सत है कि साढ़े सात बजे कॉलेज आए! शहर वालों के लिये तो जैसे सूरज अभी भी निकला ही नहीं है। आठ के पहले कौन आता है? जहाँ भी नज़र जाती हैं वहाँ वीराना दिखाई देता है, जैसे किसी राक्षस के डर से लोग घरों में छुपकर बैठे हों। स्कूल की सीढ़ी से उठकर बाहर की बड़ी गेट पर आकर खड़ा हो गया। हलका यातायात प्रवाहित हो रहा था।

रोज़ वक़्त गुज़ारने के लिये कहीं न कहीं राहों पर निकल पड़ता हूँ। आज भी फिरदोस सिनेमा से होता हुआ चौराहे पर आकर खड़ा हो गया। दिल में यही पीड़ा रही कि सुबह के समय शायद किसी अपने का दीदार हो जाए पर वहाँ भी यही लगा जैसे कोई राक्षस सुबह-सुबह वहाँ से होकर गया हो। एक मैं ही था जो इस वक़्त ऐसी बेकार बातें सोच रहा था। जाने क्यों आज बेचैनी हद से ज़्यादा बढ़ गई थी। आज भी क़दम अपने आप किसी ओर बढ़ने लगे। चौराहे से होकर सीधा ‘सीमाब ड्राई क्लीनर्स’ के सामने से फिरते हुए उत्तर में जाती गली की ओर बढ़ा।

ऐसे भी दिन थे जब मैं हर रोज़ उस गली में से गुज़रता था, पर आज बहुत दिनों के बाद उस गली में दाख़िल हुआ हूँ। गली में नज़र दौड़ाई, और कुछ तो नहीं, बस राह में कोई पत्थर पड़ा था। फुटबॉल का शौक़ीन हूँ, आदत से मजबूर होकर जूते से एक ज़ोरदार ठोकर लगाई। पत्थर उछलता हुआ दूर जा पहंचा। गर्दन उठा कर देखा तो वह सामने किसी दरवाज़े पर खड़ी लड़की के क़रीब जाकर गिरा था। बहुत शर्मसार हुआ। दिल में सोचा- ‘लड़की क्या सोचेगी... शायद यही सोचेगी कि पागल हूँ.... या यही कि मैं उसे छेड़ने के लिये कर रहा हूँ। सोचा.... कहीं अपने माता-पिता को बुलाकर मार न पिटवाए कि दिमाग़ से इश्क का धुआँ निकलता रहे। पीछे हटने की कोशिश की। दिल में आया कि दौड़कर वहाँ से भाग निकलूँ ताकि वह मुझे देख भी न पाए। पर जाने क्यों एक क़दम भी पीछे हटा न सका। सामने बैठी लड़की अपने ख़्यालों में गुम थी। सफ़ेद पोशाक और सर पर काले रंग की रजाई ओढ़ रखी थी। कालापन तो मायूसी की निशानी है या फिर प्यार में शिकस्त की, पर आजकल काला कपड़ा आमतौर पर फैशन की माँग रहा है, फिर चाहे क्यों न पहनने वाला ख़ुद भी कोयले सा काला हो। लड़की ने गर्दन उठाकर मेरी ओर देखा.... यह चेहरा तो सौंदर्य का प्रतीक लगा, जैसे जाना-पहचाना, जैसे देखा-भाला। उसने मुझे देखते ही शायद पहचान लिया और मैं घबराहट के मारे गर्दन ऊपर उठाकर बिल्डिंग पर लिखा ‘इंगलिश टीचिंग स्कूल’ का नाम पढ़ने लगा।

दूसरी बार निहारा। दिल का दर्द उमड़ने लगा। पुराने ज़ख़्म जैसे रिसने लगे। ख़ुद-ब-ख़ुद बिना किसी इरादे वहीं खड़े सोचता रहा कि आगे चला जाऊँ? बात करूँ या न करूँ? क्या करूँ क्या न करूँ? वह मेरी ओर देखकर मुस्करा दिया, शायद मेरा हालत पर। मैं अभी भी सोचों में गुम था। फिर यहाँ वहाँ देखा कि कोई देख तो नहीं रहा। पर कोई भी नहीं था। वह अपने स्कूल के दरवाज़े के पास सीढ़ी में बैठी है। अभी तक कोई भी बच्चा नहीं आया था। हिम्मत नहीं होती कि मैं उससे बात कर सकूँ। शांत खड़ा हूँ।

"आज कैसे सवेरे सवेरे राह भूल गए हो?" ख़ुद बात की पहल करके उसने मेरी मुश्किल आसान कर दी।

"बस! आज कोई दक्षिण की हवा खींच लाई है, नहीं तो आने का कोई इरादा नहीं था।" मैंने कहा।

"हवाएँ अगर किसी को अपने साथ ले आतीं तो फिर शायद मैं भी किसी तरफ खिंची चली जाती।" उसने कहा।

"हवाएँ हर इंसान को तो नहीं खींचतीं, वे सिर्फ़ कमज़ोरों को खींच कर ले जाती हैं।" मैंने कहा।

उसने घूरकर मेरी ओर देखा, कुछ मुस्करा दिया और फिर यहाँ वहाँ ऐसे देखा जैसे किसी को ढूँढ रही हो। आँखे जैसे किसी को देखने के लिये आतुर थीं।

"किसे ढूँढ रही हो?" मैंने पूछा।

"उस गुज़रे वक़्त को ढूँढ रही हूँ जब मैं और तुम...." उसने बात आधे में काटते हुए कहा और फिर मुझपर अपनी नज़रें गाढ़ दीं जैसे पूछ रही हो

- कहाँ थे? कैसे थे?

मेरे पास उसके किसी भी सवाल का जवाब नहीं था।

"क्या देख रही हो?" मैंने फिर पूछा।

"देख रही हूँ कि.... कितना बदलाव आया है उन आँखों में जो हमेशा ख़ुमार में डूबी रहती थीं और वह चेहरा जो हमेशा दुखों के बावजूद भी मुस्कराता रहता था, वह सब कुछ आज पता नहीं क्यों...." वह आगे कुछ भी न कह पाई। मैं शांत खड़ा रहा। कुछ कहना चाहता था, कुछ पूछना चाहता था, कुछ बीते हुए समय को दोहराना चाहता था। पर वे सभी बातें कहनी व्यर्थ थीं। किससे बात करता? उससे, जिसकी डगर मुझसे बिलकुल अलग थी। जिसकी मंज़िल मुझसे बहुत दूर थी।

"कितने दिनों के बाद मिले हो, फिर भी ख़ामोश!" उसने पूछा।

"बात करने के लिये कुछ बाक़ी बचा भी नहीं है।" मैंने कहा।

"जिन के पास बात करने के लिये कुछ नहीं बचता, उन्हें बीते हुए कल के कुछ पल और कुछ यादें ज़रूर तड़पाती हैं।" उसने कहा।

"जब तड़पने की कोई संभावना ही न हो तो माज़ी के वो पल, वो यादें कहाँ तड़पेंगी?" मैंने कहा।

"पता नहीं क्यों, वक़्त अपनी रफ़्तार के साथ-साथ इन्सान को भी बदल देता है।" उसने कहा।

"वक़्त अगर इन्सान को बदल देता तो फिर शायद आज कोई किसी को पहचान न पाता।" मैंने कहा।

वह ख़ामोश बैठी रही। पता नहीं क्यों उसने मुझसे वह सब कुछ फिर पूछना चाहा, जो गुज़र चुका था। पर मैं नहीं चाहता था कि माज़ी को फिर से याद किया जाय। हमारी राहें अलग थीं और उन राहों पर चलने वाले दूसरे थे। हमारे हाथों की कनिष्ठिकाएँ दूसरों के हाथों में थीं। शायद हम बूढ़े हो जाएंगे तब भी हमारी लगाम हमेशा औरों के हाथों में होगी। दूर तक नज़र फिराई, बच्चों ने स्कूल में आना शुरू कर दिया था। मैं उस के पास खड़ा रहा, उसकी तरह मैं भी ख़ामोश था। हमारे बीच में वहीं एक सी ख़ामोशी थी। दूर से शायद कोई और टीचर आ रही थी और मैं घबराकर बिना कुछ कहे आगे बढ़ा। पता नहीं क्यों वक़्त ने उसे समुद्र की

एक लहर की तरह किसी दूसरे किनारे पर फेंक दिया है। हमारे बीच में फ़ासला इतना बढ़ गया है कि मैं उस तक पहुँच नहीं पाया। उसे छोड़कर मैं आगे बढ़ा। सीमाब ड्राईक्लीनर की ओर से चौराहे के गिर्द घूमकर कॉलेज की ओर बढ़ा। कुछ पल पहले वही क़दम जल्दी जल्दी चौराहे की ओर बढ़े थे, पर अब वह चुस्ती बिल्कुल ख़त्म हो गई थी। ऐसे महसूस कर रहा हूँ जैसे सारी दुनिया का बोझा मेरे कंधों पर आकर लद गया हो। कॉलेज की बाहर वाली बड़ी गेट से अंदर दाखिल हुआ। इससे पहले सुबह जहाँ वीरानगी के सिवा कुछ भी नहीं था, अब वहीं चहल पहल लगी हुई थी। स्कूल और कॉलेज के स्टूडैंट अपनी अपनी कक्षाओं में जा चुके थे। मैं कॉलेज की सीढ़ी से चढ़ते हुए वरांडे में दाख़िल हुआ। पौने नौ बज चुके थे। मैं अपनी कक्षा के पिछले दरवाज़े से इजाज़त लिये बिना चुपचाप जाकर पिछली सीट पर बैठा। मिस जमाल उस वक़्त पढ़ा रही थी और मैं अपनी सोचों में गुम था। वे बातों में चालाक और चुस्त ज़रूर है पर पढ़ाने में इतनी होशियार नहीं। अंग्रेजी में मास्टर्ज़ की डिग्री है उसके पास। कॉलेज के सभी स्टूडैंट मिस रोज़ी जमाल का नाम लेकर आहें भरते हैं, पर मुझे वह बिल्कुल नहीं भाती.... शायद ग़ैर होने के नाते और अपने फैशन के तौर तरीक़े और नखरों के कारण। पूरे कॉलेज की तीन लेडी टीचर्स में से सिर्फ़ एक टीचर मेरी आदर्श हैं, क्योंकि वह हमेशा चुप रहती हैं, मेरी तरह, या शायद अपनी सी लगती है।

क्लास में मिस जमाल की आवाज़ संगीत की तरह फैल रही है और मेरी गर्दन ज़मीन की ओर झुकी हुई थी। किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था। क्लास में लेक्चर की तरफ़ कोई ध्यान ही न रहा। सीट पर ख़ुद को मवाली की तरह आज़ाद छोड़ दिया है। सोचों का सिलसिला जारी है। आज की मुलाक़ात अनोखी और अचानक हुई, बिलकुल सपनों की तरह मिस जमाल की आवाज़ ने अचानक सपनों से जगा दिया।

आज भी कल की तरह बस ने जल्दी लाकर छोड़ दिया है। सब कुछ रोज़ की तरह सामान्य है। मैं कॉलेज की इमारत से निकलकर चौराहे की ओर बढ़ता हूँ, कहीं-कहीं सोचों में खो जाता हूँ- मैं आज उससे मिलूँ या न मिलूँ?

सारी रात जागते उसी सोच में गुज़ारी है। कोई फ़ैसला नहीं कर पाया हूँ। चौराहे पर खड़ा हो जाता हूँ। एक दो क़दम आगे बढ़ता हूँ। हाँ, वह मेरा इंतज़ार करती होगी, मैं मन में सोचता हूँ। हाँ, मेरा इंतजार करती रहे। जब संजोग ही नहीं होना तो फिर क्यों किसी से मिला जाय। वह अलग, मैं अलग। फिर मिलना कैसा? मेरे मिलने से कहीं उसकी ज़िन्दगी ज़हर न बन जाए। मैं उसके लिये सोचता रहता हूँ। आज अपने आप ही उत्तर की तरफ जाने की बजाय दक्षिण की तरफ़ निकल आया हूँ। यहाँ कोई भी स्कूल नहीं, कोई भी लड़की नहीं। सिवा गैरेज के जहाँ लड़के और मिस्तरी हैं जो सुबह से आते ही ठक ठक करने लग गए हैं।

एक कार मेरे पास से गुज़रते हुए थोड़ा आगे जाकर गैरेज के पस रुक जाती है। ड्राइवर दरवाज़ा खोलकर मिस्त्री से बात करने लगता है। कार की पिछली सीट पर कोई सुंदर लड़की बैठी है। अपने आप से आँखें उठ जाती हैं। मैं आंखे रगड़ने लगता हूँ और ग़ौर से देखने की कोशिश करता हूँ। आँखों पर विश्वास नहीं होता, नज़र वहीं अटक जाती है। पुष्टि करना चाहता हूँ

वह बैठी है। तिरछे कोण से चेहरा नज़र आ रहा है। पता नहीं उसने भी मुझे देखा है या नहीं? उलटे पैर लौटता हूँ जैसे किसी ने बदन को डस लिया हो। दीर्घ श्वास की क्रिया जारी रहती है। लगता है उसने मुझे देखा नहीं है, वर्ना मुड़कर मेरी ओर ज़रूर देखती। पर वह कार किसकी हो सकती थी?

कार और अध्यापिका- परिकल्पना नहीं कर पाया। अब दृढ़ निश्चय कर लिया है कि उत्तर की तरफ़ चला जाऊँगा। बस यही दो भाग रह गए हैं। पर अगर वह उस तरफ़.... सोच कर चौंक उठता हूँ, शायद मैं उससे डर गया हूँ- मेरे लिये हर दिशा सीमित हो चुकी है। आज मैं ड्राइवर की बजाय ख़ुद को कोसने लगता हूँ- काश! मैं उत्तर की तरफ़ न गया होता। अपने आप से बतियाता हूँ।

मैं उससे बच नहीं सकता। ऐसा लगता है, मैं सारी उम्र उससे दूर भागता रहूँगा, पर वह किसी न किसी मोड़ पर ज़रूर आ पहुँचेगी। 

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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दुनिया एक स्टेज है

नूर अलहदा शाह

उस महफ़िल में सिर्फ़ मुझे ही नाचने के लिये बुलाया गया था। रात के पहले पहर में जब भीड़ इकट्ठा हुई थी और सभी मदिरा पीकर बेसुध हो चुके थे, तब मैंने पायल की छम-छम से धीरे-धीरे पाँव उठाने शुरू किये। स्वर्गीय कजल बाई को जन्नत नसीब हो, हमेशा कहती थी कि पहले तमाशाइयों को प्याले भर भर के पिलाओ, जब नशे में चूर हो जाएँ, बाद में नाचो- सिर्फ़ नोट ही नहीं, पर ख़ुद को भी तुम पर कुर्बान कर देंगे। पायल की छम-छम के साथ साजिन्दों ने भी साज़ छेड़ने शुरू किये और ज़मीन मेरे पैरों के तले ज़ोर-ज़ोर से घूमने लगी। उसी फिरते मंजर में ही जैसे बिजली की तरह मेरी आँखों के सामने से वह गुज़रकर गुम हो गया। परदे में मुँह डालकर बैठा,

उसका सारा शरीर पटसन में लिपटा हुआ। मुझे लगा वह बेसुध तो है पर उसने मदिरा नहीं पी है। एक वही है जो जाग रहा है, बाक़ी सब खुली हुई लाल आँखों के भीतर मरे पड़े हैं और उन के खुले हुए मुँह में फ़क़त कौवे काँ काँ कर रहे हैं। कि नाच नर्तकी! नाच-नाच-नाच नर्तकी! नाच- नाच!!! नोट, शिकार हुए परिंदों की तरह हवा में एक चक्कर लगाकर वापस आकर ज़मीन पर गिरते और ज़मीन और भी तेज़ी से मेरे पैरों तले घूमती थी। ज़मीन के उस तेज़ गोलाकार चक्कर में ही फ़क़त एक बार उसने धीरे-धीरे परदे में से मुँह निकालते हुए देखा और बस एक ही नज़र मुझपर यूँ डाली जैसे मैं कोई अयोग्य चीज़ हूँ!! और एक फूँक मारकर जैसे कीड़े को हवा में उड़ा दिया जाय, वैसी मुस्कराहट के साथ वापस परदे में मुँह डाल दिया। स्वर्गवासी कजल बाई कहती थी कि अगर ऐसा कोई तमाशाई, जिसकी नज़र में तेरी कोई हैसियत न हो, उसे फंसाकर छटपटाने पर मजबूर करके अधमरा करके फेंक दो। जैसे जैसे तड़पेगा और चिल्लाएगा, ज़माना उसका तमाशा देखकर पतंगों की तरह तुझपर मरेगा। उसका परदे में वापस मुँह डालने पर मैंने पायल का सुर और भी तीव्र किया और नाचते-नाचते ज़मीन के घेराव को और भी उसके क़रीब ले आई। उसके आगे गोलाकार में घूमती रही, पर न वह हैरान हुआ न चौंका न परदे में से मुँह को निकाला, न हिला, न डुला। बस रात शम्अ की तरह पिघलती रही और तमाशाई पतंगों की तरह ख़ाक़ होते रहे।

फ़जर की अज़ान के कुछ पहले महफ़िल बर्बाद शहर के मंजर में बदल गई, जिसे दुश्मन का लश्कर घोड़ों की एड़ियों तले कुचल गया हो और यहाँ वहाँ लाशों के ढेर दिखाई दे रहे हों। खाने के लिये सजाए पकवान वहीं बिखर गए, बिस्तर रजाइयाँ सोए हुए जिस्मों के नीचे से खिसक गईं।

शहर उजड़ा। वादक माल बटोरकर चलते बने, बस मैं थी और वह था। बीच कमरे में लाल ईरानी ग़लीचे पर बैठ कर मैंने पायल खोली। बस मुझसे दो क़दम दूर वह परदे में मुँह डाले बैठा था। मेरे हाथ पायल पर और आँखें उसपर गढ़ी थीं। बाहर मस्ज़िद में फ़जर की अज़ान शुरू थी और पूरी रात में उसने दूसरी बार परदे में से मुँह निकाला। उसने उठना चाहा तो मैंने बिजली की रफ़्तार से उठकर उसे बाँहों से जा पकड़ा।

"ठहरो!" मैंने कहा।

वह जैसे न चाहते हुए भी बैठ गया और चुपचाप मेरी ओर देखता रहा।

"मेरा नाच तुम्हें नहीं भाया?"

वह सिर्फ़ मुस्कराया।

"किस बात का ग़ुरूर है? मर्दानगी पर?" मैंने एक ठहाका लगाया और वह एक सलीकेदार मुस्कराहट होठों के बीच दबाए बैठा रहा।

"वह मर्द ही कैसा, जिस की आँख औरत को देखकर बेक़ाबू न हो?"

मैंने कहा- "पर अभागे, शर्मसार है तेरी मर्दानगी।" मैंने अपनी आँखों में धिक्कार

घोलकर उसकी ओर निहारा पर उसने न मौन तोड़ा, न मुस्कान।

"तन्हाई में मेरा नाच देखोगे?" मैंने पूछा- "भीड़ से तेरी शर्मसार मर्दानगी

घबराती है शायद। चलो भीड़ से दूर किसी तन्हा कोने में चलकर मेरी जवानी का जलवा देखो। तुम्हारी शर्मसार मर्दानगी मेरी जवानी का ताब झेल न पाएगी।

मजनू की तरह कपड़े फाड़कर, चिल्लाते हुए सुनसान वीराने बसाओगे। है कुछ दम? यहाँ कई आए और उनका वध हुआ। आओ, आज तुम ख़ुद को आज़माओ, मैं ख़ुद को आज़माती हूँ। वह नर्तकी कैसी जो दिलेरों को न लुभाए। स्वर्गीय कजल बाई जैसी तेज़ नज़र रखने वाली पारखी औरत भी कहा करती थी कि अपनी सत्तर वर्ष की उम्र में उसने मुझ जैसी नर्तकी नहीं देखी जिसकी नज़र का मारा न मर पाया, न जी पाया, बस तड़पता रहा और एक घूँट के

लिये तरसता रहा। कहा करती थी कि वह घूँट कभी मत पिलाना जिसे पीने से मरे हुए में जान जान पड़ जाय। चलो, चलकर देखो तो सही मेरा नाच, जिसे देखने के लिये बादशाह भी फ़क़ीर बन गए। नोटों के थाल भरकर लाने वाले लौटते वक़्त दया का कटोरा हाथ में लेकर मुझसे ही भीख माँगते रहे। पर मैं बादशाह को भीख देती हूँ, फ़क़ीर को नहीं। पर तुम पर निवाज़िश करने के लिये तैयार हूँ। आओ, आओ, तुम अपना इम्तिहान लो, मैं अपना इम्तिहान लूँ।"

उसके पटसन का सिरा झटके से अपनी ओर खींचा। उसने वह सिरा अपनी ओर खींच लिया। उसकी आवाज़ में इतना सुकून था जैसे दरिया की छाती पर नाद की प्रतिध्वनि गूँजती हो, दूर तक, सरल, विनीत व अकेली।

"सब बेकार है नर्तकी।" उसने आख़िर मौन तोड़ा- "बेकार, निरर्थक!

यह सारा गुमान है- यह यौवन, यह ९त्य, कुछ भी तुम्हारा नहीं है। जिसे तुम ९त्य कहती हो वह किसी बारीक सुई के सुराख से गुज़रते धागे का सृजन है, जिसका दूसरा सिरा किसी दूसरे के हाथ में है और तुम फ़क़त नचाई जा रही हो। उसके लिये न तो तुम्हारे नाच पर कोई मर मिटा है, बल्कि इसलिये कि ज़माने को गर्दिश में रखना है। शाह को फ़क़ीर बनाना है और फ़क़ीर को तख़्तनशीं करना है जिस की उंगलियों पर सबके धागे लिपटे हुए हैं,

उसकी बेफ़िक़्री तो देखो... सिर्फ़ अपनी उँगलियों की जुंबिश को देखता है,

नीचे पुतलियों का नाच नहीं। ये तुम्हारे चक्कर लगाते पैरों के नीचे विनाशी फाँसी के घाट का तख़्ता बिछा हुआ है, फिर यह नाच भी कैसा नाच है नर्तकी? जहाँ जहाँ पैर धरा, वहाँ वहाँ से ज़मीन खिसकती जाये। यह जिसे तुम यौवन कहती हो, पता भी है उसकी हक़ीक़त क्या है? कुछ भी नहीं!

सिर्फ़ हड्डियों पर मुट्ठी भर माँस। जब तक गिद्ध, चीलों का निवाला बनने के क़ाबिल है, आदमी को अपने होने का गुमान है। जैसे जैसे आदमी के माँस पर चीलें जमा होती हैं, वैसे वैसे आदमी अपनी ही सुगंध का, मतवालेपन का आनन्द लेता है। माँस सड़ जायेगा, ये सागर जैसे लोचन, ये गुलाब जैसे होंठ, ये छोलियों की तरह लहराती बाँहें, ये भंवर की तरह घूमते पाँव और ये ख़ुशबू देने वाला तन, कुछ भी नहीं है नर्तकी, फ़क़त माँस है, सिवा इसके

आदमी हड्डियों की एक मुट्ठी भर है, जिस पर उसके घायल मन का निशान भी नहीं मिलता। ये आँसू, मुस्कुराहट, पीड़ाएँ, नाज़ो-अदाएँ सब हवा की एक फूँक हैं। सदियों-दर-सदियों आदमी की गुमनाम हड्डियाँ खाक बनती रही हैं। कौन सी हड्डियाँ शाह की, कौन सी ख़ाक फ़क़ीर की, यह गुत्थी कोई भी सुलझा नहीं पाया। सिवाय उसके जिसकी उदारता तो देखो! ख़ाक से आदमी बनाकर ख़ाक में मिला देता है। तुम तो नर्तकी हो, अपने नाश्वंत यौवन पर मुस्कुराती हो, पर पीछे मुड़कर तो देखो- बल्ले, बल्ले.... दुनिया के घोड़ों के खुर के तले कुचले गए लश्कर, ख़ुदाई के दावेदार राजमहल, क़िले सब धराशायी हो गए। दुनिया ने थूक दिया या कितनों ने धन-सम्पत्ति की तरह हाथों में लेकर एक ही फूँक से उड़ा दी और नर्तकी कुछ के लिये तो यह ज़िंदगी फ़क़त एक बारीक पारदर्शी पर्दा- आशिक और माशूक के बीच में है। आशिकों ने तो एक ही झटके में दुनिया को रेशा रेशा कर दिया। तुम बताओ नर्तकी, जब तुम चक्कर लगाती हो, तब तुम्हें यह दुनिया क्या लगती है? मदिरा का प्याला? कभी सोचा है, जब नशा उतरेगा तो क्या होगा? मदिरा पीने के लिये नहीं होती नर्तकी! मदिरा गिरा देने के लिये होती है और फिर चखकर देखो, मदिरा को होठों तक लाकर गिरा देने का नशा बस इतना नशा चख लेना चाहिये, नहीं तो बाक़ी सब बेकार है, निष्फल है, ख़ाक है, फ़ना है।"

जितनी देर वह बात करता रहा, मुझे साँस लेना ही याद न रहा। मुझे लगा माँस मेरी हड्डियों से धीरे-धीरे सड़ गल रहा है और एक अजीब सी गंदी बू मेरे चारों तरफ़ फैल रही हो। ज़मीन मेरे पैरों तले खिसक रही है और हमारे सिवा कोई तीसरा है जो उसके और मेरे बीच में मुस्कुरा रहा है, उसके हाल पर भी और मेरे हाल पर भी। मेरा गला ख़ुश्क होने लगा और आँखों में उसके सिवाय सभी मंजर धुंधला से गए। जाने क्या हुआ और क्यों हुआ, मैंने जैसे अपना समस्त वजूद इकट्ठा करके अपने दोनों हाथों में समेट लिया, और उसके हाथ पकड़कर, उन पर अपने होंठ रख दिये थे। उसी क्षण मुझे लगा कि मेरे पैरों के नीचे से सारी ज़मीन खिसक चुकी है, और मैं फ़ना के समदंर में नीचे, और नीचे डूबती जा रही हूँ। घुमावदार तरीक़े से चक्कर काट रही थी उसके हाथ का सहारा भी उस समंदर में एक तिनके की तरह था, वह भी छूटता गया। मेरी हालत उस शराबी जैसी थी जिसे अपना नाम भी और घर का रास्ता भी याद न रहा हो। कैसे लड़खड़ाते घर पहुँचने की बजाय स्वर्गीय कजल बाई की क़ब्र पर पहुँची, याद नहीं? याद है तो सिर्फ़ यह कि सूर्य ढलकर साँझ बन चुका है। नीचे हर दिशा में जहाँ तक नज़र जाती है क़ब्रिस्तान का फैलाव था और ऊपर- बहुत ऊपर गिद्ध और चीलें चक्कर काट रही थीं। मेरा सर कजल बाई के सीने पर था और मैं निरंतर रो रही थी।

नर्तकी चुप हुई तो मैंने रो दिया, कहा- "काले पटसन में परदे में मुँह ढाँप कर बैठा वह शख्स मैं ही हूँ। अब सालों से पायल बाँधकर गली गली में नाचता हूँ और तुम्हें ढूँढता हूँ ज्ञान का पिटारा हाथ में लिये, दर-दर पर आवाज़ें देता हूँ कि कहीं कोई हाथ आ जाए जो तुम्हारे हाथ जैसा हो। जिस पल तुमने मेरे हाथों पर से होंठ उठा लिये, उसी पल से मैं दर-बदर हूँ। तुमसे पहले मैंने ज़िन्दगी के कई साल मुर्शिद के क़दमों में बैठ कर गुज़ार दिये वहीं पर दुनिया को तर्क करना और साँसों की विद्रोही घोड़ी को बारीक धागों से बाँधकर काबू करना- पर नहीं, नहीं आदमी की साँसें सुख चैन के लिये नहीं, आदमी के लिये पागल हैं। नर्तकी दुनिया त्याग भी दी जाय, पर आदमी आदमी को कैसे त्यागे! यह इंसान, जो फ़क़त हड्डी भर मुट्ठी पर चढ़ा हुआ माँस है, उसके छुहाव की जादूगरी तो देखो! ख़ाक आग का शोला बन जाय और आग के शोले से समंदर। आग का भी वह शोला, जो समंदर में भी न ठंडा हो सके न मन्द हो सके, और उसे तो देखो नर्तकी, आदमी के वजूद के धागे तो अपनी उँगलियों से बाँध लिये हैं, पर उसका मन बेलगाम छोड़ दिया है। बाख़ुदा, जब वजूद उसकी मर्ज़ी से घूमता है, और मन अपनी मनमानी करता है, उस पल आदमी जैसे अधमरा पंछी होता है। हाय हाय.

.... कैसे फड़फड़ाता है, कैसे तड़पता है, पर सब बेकार। उस दिन जब तुम मेरे हाथों पर से अपने होंठ उठाकर तेज़ हवा की तरह यहाँ से निकल गई

थी, उस दिन जहाँ तक मुझे याद आता है, पहली बार फ़जर की नमाज़ मेरा दुर्भाग्य बन गई और मैं वहाँ से अधमरे पंछी की तरह सीधे आकर अपने मुर्शिद के चरणों में गिरा था।

"मुझे आज़ाद करो, मुझे आज़ादी चाहिये।" मैंने कहा। मुर्शिद मुस्कराया जैसे किसी बालक की नामुमकिन ख़्वाहिश पर मुस्कराया हो।

कहा- "आज़ादी है कहाँ? यह सब जो तुम देख रहे हों, इन्सान की क़ैद में अलग-अलग दर्जे हैं। बस, क़ैदखाने की कोठी बदल जाती है, क़ैदी का तरीक़ा बदल जाता है पर आज़ादी तो कहीं भी नहीं है। पहले जहाँ क़ैद थे, वहाँ तुम्हारे साथ दूसरे कई क़ैदी थे इसलिये तुम ख़ामोश सब्र और सुकून से बैठे रहे, पर इश्क! इश्क तो अपने आप में क़ैद-तन्हाई है। बस ख़ुदा माफ़ करे, क़ैद-तन्हाई समझते हो? आदमी ख़ुद ही तमाशा भी है और अपनी हालत का तमाशाई भी। मंद धार वाले चाकू से ख़ुद का संहार करता है, फाँक-फाँक करता है, तड़पता है, फिर ख़ुद को समेटकर फिर संहार करता है तड़पने के लिये, फाँक फाँक होने के लिये, बुलाता है, आवाज़ देता है, चीख़ता है, पर क़ैद-तन्हाई जो है, इसलिये कोई उसकी आवाज़ और आह नहीं सुन सकता, सिवाय उसके जिसने उसके लिये क़ैद मुक़र्रर की है। फिर मुर्शिद ने अपने पाँवों को सम्पीड़ित करते हुए कहा- "जाओ, तुम्हारा क़ैदखाना बदल गया है, जाओ।"

वह दिन और यह दिन मैं मुर्शिद के पूर्वानुमान के अनुकूल क़ैद-तन्हाई में हूँ। आदमी को पकड़ पकड़ कर अपने घाव दिखाता हूँ। अपनी फाँकें पायल की तरह पैरों में बाँधकर खूब नाचता हूँ। तुम्हारा नाम पुकार पुकारकर बहुत शोर करता हूँ। पर सब निरर्थक! आदमी मेरे बाजू से यूँ गुज़र कर जाते हैं जैसे कि मुझे न देख सकते हैं न सुन सकते हैं। पर तुम मुझ पर दया करो नर्तकी, बस एक बार मेरे हाथों पर अपने होंठ रख दो। सिर्फ़ एक बार नर्तकी। बस एक बार।

नर्तकी चुप! काले पटसन में लिपटा परदे में मुँह लगाए बैठा रहा। फ़जर की अज़ान से बस कुछ पल पहले आहिस्ते, आहिस्ते परदे में से मुँह निकाला, उसके होठों पर सालों की तिश्नगी के निशान ठहर गए थे जैसे उसने मदिरा पीते पीते उंडेल दी हो।

आख़िर कहा- "यह भी बेकार है, यह भी विनाशी है, यह भी ख़ाक है। बस एक बात समझ में नहीं आती कि जब हर किसी का रुख़ वह अपनी ओर मोड़ना चाहता है तो फिर वह इतनी कोशिशें, बहाने, उलझन भरे घुमाव क्यों करता है? ख़ाक ही तो है, बस उस पर अपने पाँव धर दे पर पता ही नहीं पड़ता कि उसे ख़ुद के साथ आदमी का इश्क चाहिये या आप ख़ुद आदमी के इश्क में जकड़ा हुआ है!प्राहर फ़जर की अजान सुनाई पड़ रही है। नर्तकी ने साँस ली और किसी हारे हुए सिपाही की तरह उठते हुए कहा- "जैसे उसकी मर्ज़ी! फ़जर नमाज़ कज़ा (दुर्भाग्य) न बन जाए, मिलन की घड़ी बस घड़ी भर के लिये आती है, कहीं चूक न जाए। विछोह न आदमी से सहा जाता है न उससे।"

नर्तकी ने पाँव उठाए और स्टेज से उतर गई। उस शख़्स का किरदार भी पूरा होने को आया और वह स्टेज से उतर आया। और पर्दा गिर गया।

नया मंज़र शुरू होने तक।

 

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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सियासत, मीडिया और अजीब बू

तनवीर जोनेजो

कालीन सी दरी पर सफ़ेद चुनरी, जिस पर गुलाबी फूल गुंथे हुए थे, सर पर ओढ़े वह ख़ुदा के दर मिन्नत कर रही है, नाजुक निर्मल से हाथ उठाकर उस परम दयालू रब से कुछ माँग रही थी।

मुहब्बत की मंज़िल, हमसफ़री का साथ.... प्यार का चंदोवा : "ऐ मेरे पाक परवरदिगार.... वह जैसा भी है.... मुझे बहुत प्यारा है.

... उसके साथ का हर पल मेरे लिये जन्नत समान है.... आप मुझे उनसे दूर न करें.... ऐ मेरे करीम बादशाह तुम्हारे दर हर बंदा एक खुली किताब है। हर बंदे के भीतर के ख़यालों से आप परिचित हैं.... बंदे की मजबूरियों और कमज़ोरियों की सब जानकारी है तुम्हारे पास.... परवरदिगार मुझे लौटा दो वह अपनी तमाम नेकियों और सच्चाइयों से.... निर्दोषता और निर्मलता के साथ।"

उसके होंठ थरथरा रहे थे, आँखों में आंसुओं की लड़ी थी.... ख़यालों की उड़ान.... तेज़ी से बुलंदियों के साथ विगत काल की ओर जा रही है.

.. कुछ यादगार लम्हों के यादगार पल....!

उसका नाम बिलकिश है... और इस वक़्त जिसके लिये ख़ुदा के दर मिन्नत कर रही है वह उसका दोस्त, उसका सहपाठी सलीम है। दोनों बी. ए. के तीसरे साल के विद्यार्थी हैं। बिलकिश में कई गुण हैं..... बात करने की तमीज़ है और कुछ विनम्रता का भाव लिये हुए उसका व्यक्तित्व अपने ढंग का था। उसका परिवार भी इतना संकीर्ण विचारों वाला न था, एक मध्य वर्गीय कुटुंब है जिसमें एक तरफ़ दस्तूरों का रक्षण किया जाता तो दूसरी तरफ़ वक़्त की आवश्यकताओं की भी पूर्ति की जाती। उसकी माँ भी पढ़ी लिखी नौकरीशुदा औरत है। वह विख्यात अस्पताल में डॉक्टर थी और उसके पिता भी एक डॉक्टर थे।

हैदराबाद में सिंधियों की बस्ती कासिमाबाद में उनका चार सौ गज़ का एक शानदार बंगला था। ज़िंदगी ने उसके साथ बहुधा अच्छाइयाँ बख्शीं, बस!

अगर थोड़ी कुछ कमी थी तो उसके भीतर में पनपती हीन भावना का अहसास, या किसी हद तक माँ की नौकरी के सबब उनकी मुहब्बत पाने की कमी। पर उसकी यह कमी भी उसकी दादी ने पूरी कर दी थी। फिर भी कम पढ़ाई और कम सलाहियत के कारण उसकी अपनी ही बुनी हुई विचारधारा थी या नाटकों और फिल्मों से प्राप्त आत्मदया का भाव था, जो उसके ज़हन पर हावी था। इंटर साइंस में अपेक्षित अंक हासिल न करने के कारण यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया था।

सलीम उसका क्लास फेलो था, दादू के गर्वमेंट कॉलेज से इंटर करके यहाँ आया था। बिलकिश की तुलना में उसका परिवार मध्यवर्ग से वास्ता रखता था। उसका बाप एक प्राइमरी स्कूल में हेड मास्टर था। उसे सी. एस. ए. कराकर ‘डिप्यूटी कमिश्नर’ बनाने का ख़्वाब उसकी आँखों में था। सलीम की शख़्सियत पुरक़शिश थी.... कद्दावर.... सुन्दर सुकुमार जवान था। तबीयत में किसी हद तक परिपक्वता की कमी.... पढ़ने में कम चाह.... पर ख़्वाबों की उड़ान कमिश्नरी से भी ऊँची थी।

बिलकिश के साथ मुहब्बत की गाँठें कैसे बंधीं, इस का अहसास दोनों को नहीं हुआ। न पहली नज़र में प्यार हुआ था, और न ही सलीम ने बिलकिश को किसी गुंडे से बचाया था। आहिस्ते आहिस्ते बेख़बरी के आलम में दोनों एक दूसरे के नज़दीक आने लगे.... सलीम के लिये नोट्स तैयार करना, असाइन्मेंट बनाना.... बिलकिश के प्रिय काम थे.... पहले फ़ोन पर बातें होतीं, यूनिवर्सिटी के बारे में, फिर धीरे-धीरे भविष्य में साथ गुज़ारने के रेखा-चित्र शुरू होकर ‘हाला नाके’ के अयूब रेस्टॉरंट तक पहुँचे। सलीम अक्सर किसी अनजान ख़ौफ़ का शिकार नज़र आता था, "कहीं अपना ज़िक्र ‘प्रेमी जोड़ो’ में तो नहीं आ जाएगा? ऐसा ही सवाल एक दिन सलीम ने बिलकिश से किया था।

"नहीं सलीम, हमारी फैमिली काफ़ी आज़ाद ख़्याल की है.... और अम्मा तो तुम्हारी मेरी दोस्ती के बारे में जानती है।" बिलकिश ने उसे ढाढस बंधाया।

बिलकिश जो आत्मदया की परिस्थिति में गिरफ़्तार थी, सलीम के साथ उसके वजूद को आत्मविश्वास मिला था। उसी विश्वास के सहारे वह इस गोल गोल घूमती दुनिया में नाज़ के साथ इतराती थी, ख़ुद विश्वास के साथ चलती थी और उसे यह भी यक़ीन था कि सलीम उसका अपना है। सलीम और उसके बीच में कोई भी समाज की दीवार नहीं है। फिर उसे लगा कि सलीम के ध्यान का केन्द्र-बिंदु कोई और लड़की बनने लगी और सलीम उसके पीछे ‘पागलों’ की तरह दौड़ने लगा और वह लड़की सलीम का अल्हड़पन देखकर, उसे अपनी बाँहों में जकड़ती रही.... वह कोई और नहीं

‘सियासत’ थी।

"मैं प्रेशर ग्रुप का अध्यक्ष चुन लिया गया हूँ।" इंटरनेश्नल रिलेशन वाले अनुभाग के पास ऊपर जाती हुई सीढ़ियों पर सलीम ने उसे बताया था।

"सच!" बिलकिश की ख़ुशी की कोई हद न रही थी।

"हाँ.... अब मैं भी लीडर कहलाऊँगा.... मेरे बयान और तस्वीरें अख़बारों में आएँगी।"

"पर सलीम, तुम ध्येय के लिये लड़ना, स्टूडेंट्स की परेशानियों के

लिये संघर्ष करना और धरती के दुखों के ख़िलाफ़ जूझना।" बिलकिश ने लंबी साँस लेते हुए उससे कहा था- "सच सलीम, मेरा सर गर्व से बुलंद होगा, मेरे आत्मविश्वास में और भी इज़ाफ़ा होगा।"

"हाँ बिलकिश, मैं चाहता हूँ कि क़ौम के दुख समेट लूँ। स्टूडेंट्स सुकून से तालीम पाएँ। बसों में लटकते हुए नहीं आराम से बैठ कर आएँ जाएँ।

खुद छुट्टी लेने के ढंग में बदलाव के लिये संघर्ष करूँगा.... और हाँ....

बिलकिश तुम्हें पता है मैं सियासत में क्यों आया हूँ? इसलिये कि तुम्हारा सर गर्व से ऊँचा हो और वो आदर्श जो तुमने संजोए हैं उन को क़ामयाबी मिले...."

सलीम ने प्यार से बिलकिश का हाथ पकड़ा, पर मैडम को आते हुए देखकर हाथ छोड़ दिया। बिलकिश ने शरारती मुस्कान से उसकी ओर देखते हुए कहा- "बस, इतना सा दिल है। अभी तो लीडर बनने चले थे।"

"मूल्यों की रक्षा भी तो करनी है..." सलीम ने मुस्कराते हुए जवाब दिया।

 

और फिर सलीम के बयान अख़बारों में छपने लगे। तस्वीरें विभाग की दीवारों पर चिपकने लगीं। अब सलीम कोई आम स्टूडेंट नहीं, एक ख़ास स्टूडेंट था जिस पर हर एक इतराता था, सलाम करता था। सलीम में अल्हड़पन की मात्रा बढ़ने लगी।

"बिलकिश.... आज तुम्हारी सालगिरह है न...." सलीम के हाथ में एक गिफ़्ट पैक था।

"यह देखो... तुम्हारे लिये क्या लाया हूँ?"

"तुम्हारा लाया हुआ ख़ूबसूरत कार्ड भी मेरे लिये सोने से ज़्यादा मूल्यवान होता है।" बिलकिश गिफ़्ट पैक को देखकर कहने लगी।

"पर तुम देखो तो सही।" सलीम ने कहा।

"अरे यह.... यह तो सोने का ब्रेसलेट है।" बिलकिश ने हैरानी से सवाली निगाहें उसकी ओर उठाईं।

"हाँ.....!" सलीम मुस्कराता रहा।

"पर इतने पैसे तुम्हारे पास आए कहाँ से.... सात हज़ार से तो क़तई कम न होगा यह...." बिलकिश हैरान थी।

"पैसों को छोड़ो.... यह बताओ तुम्हें गिफ़्ट पसंद आया न?"

सलीम की आँखों में मुहब्बत का जोश था।

"है तो अच्छा पर...." कुछ चाहकर भी वह कुछ न कह पाई। सिमेस्टर की परीक्षाएँ नज़दीक थीं। बिलकिश पढ़ाई के साथ सलीम की असाइन्मेंट भी तैयार करने में व्यस्त रही।

"ख़ुदा करे जल्दी परीक्षाएँ हों।" हर स्टूडेंट की तरह बिलकिश भी ख़्वाहिशमंद थी। वक़्त पर परीक्षाएँ हों तो बेहतर, नहीं तो देर के कारण नौकरी पाने में भी स्टूडेंट पीछे रह जाते हैं। ‘कायदे आज़म यूनिवर्सिटी’ में इच्छुक विद्यार्थी दाख़िला पाने से वंचित रह जाते हैं.... कितनी स्कॉलरशिप रद्द होती हैं और उसके साथ-साथ माता-पिता पर भी आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। आम विद्यार्थी एक अनचाही परिस्थिति के शिकार हो जाते हैं।

"हैलो बिलकिश, क्या कर रही हो?" एक दिन सलीम ने फ़ोन पर पूछा।

 

"तुम्हारे लिये असाइन्मेंट तैयार कर रही हूँ.... इस बार तुमने पेपर्ज़ के लिये कितनी तैयारी की है?"

"तैयारी कैसी? पहले इम्तिहान तो हों!"

"क्यों? क्या तुम्हारी सियासत भी उन्हीं रास्तों पर चलने लगी है?"

"देखो न बिलकिश, स्टूडेंट्स की कितनी सारी समस्याएँ सामने हैं। उन परेशानियों से निजात पाने के लिये ज़रूरी है बॉइकॉट करवाया जाय क्योंकि उसी से व्यवस्था पर दबाव डाला जा सकता है।"

"पर सलीम, उसमें भी भुगतना तो स्टूडेंट को ही पड़ता है, व्यवस्था पर तो कोई असर नहीं पड़ता और उसी बॉइकॉट के कारण पुलिस वालों को भी यूनिवर्सिटी आना जाना होगा। ऐसा न करें सलीम, कुछ सोचें...." बिलकिश उसे समझाने की कोशिश करने लगी।

"बेहतर यही है कि तुम इस मामले में न उलझो।" सलीम ने फ़ोन रख दिया।

इस बार व्यवस्था ने परीक्षाओं के लिये सेना की मदद ली। परीक्षाएँ

बेहद आराम और सुकून से शुरू हुईं पर ख़ौफ़ का एक अनछुआ अहसास हर स्टूडेंट्स के दिल और दिमाग़ पर छाया रहा.... आज परीक्षाओं को शुरू हुए चार दिन हुए थे।

सुबह का वक़्त था और स्टूडेंट्स दस्तूर के अनुसार परिसर (कैम्पस) में मौजूद हुए, पर आज टीचर्स की बसें अभी तक नहीं पहुँची थीं.... नौ. .... दस.... अचानक एक ख़बर बवंडर की तरह परिसर में आ पहुँची।

"टीचर्स की बस पर पटाखे फेंके गए हैं.... चार टीचर्स ज़ख्मी हालत में अस्पताल पहुँचाए गए हैं।"

"यह किसने किया?"

अलग अलग आवाज़ें..... अलग-अलग विचार सुनने में आए।

"प्रेशर ग्रुप वालों का काम है।’ प्रतिध्वनि बिलकिश के कानों तक पहुँची।

"सलीम.... यह तुमने किया?" बिलकिश के लहज़े में बेयक़ीनी के

साथ दुख का भी अहसास था और ज़हनी तौर पर सलीम के मुँह से ‘नहीं’ सुनने की ख़्वाहिश भी।

"नहीं बिलकिश.... व्यवस्था ने यह ख़ुद करवाया है।" सलीम ने हँसते हुए जवाब दिया।

"प्लीज़ सलीम, ऐसा मत करो.... मेरे ख़्वाब, मेरी तमन्नाएँ.... कहीं घायल न हो जायें!"

"पगली, तुम्हारे ख़्वाबों को हक़ीक़ी स्वरूप देने के लिये तो यह सब कर रहा हूँ। महलों में रहने वाली, चांदी के चम्मच से खाने वाली को झोपड़ी में तो नहीं रखूँगा?"

"मुफ़लिसी कोई दोष नहीं, कोई तिरस्कार नहीं और मेरे माता-पिता की कोई माँग भी नहीं है...." बिलकिश ने उसे समझाते हुए कहा।

"प्लीज़ सलीम, इस बार सुकून से परीक्षाएँ चलने दो।"

"तुम्हें पता है, इस बार हमारी योजना क्या है?"

"कौन सी?"

"हॉस्टल पर हमला करेंगे।"

"आखिर परीक्षाओं से आप लोगों को इतनी नाराजगी क्यों?" बिलकिश ने शक़ी अंदाज़ में उससे पूछा।

"परीक्षाओं से हमारा क्या लेना देना.... पता है हम ये सब क्यों कर रहे हैं?"

"क्यों....?"

"हमें आज्ञा मिली है कि वहाँ हॉस्टल ख़त्म किये जायें, और हम वही कर रहे हैं.... हमें व्यवस्था में भय पैदा करना है। तुम्हें तो पता है कि हॉस्टल ताक़त के स्त्रोत होते हैं। हमारे ख़िलाफ़ उठती ललकार की आवाज़ है... कोई भी समस्या हो.... यहाँ पर जलाई गई लौ, रोशनी ज्वाला बनकर घर-घर, बस्ती-बस्ती पहुँच जाती है। हमें यह आदेश मिला है और वह हमें स्वीकार है...." सलीम नशे में सच कहता रहा और बिलकिश का चेहरा तमतमाता रहा, गुस्से से, नफ़रत से.... या शायद बेबसी से। वह तेज़ी से निकल जाती है.... सलीम वहीं बैठा है।

रेखांकित किया हुआ दस्तूर.... परीक्षाएँ शुरू..... हॉस्टलों पर हमले.... सलीम दो बार गिरफ़्तार.... बिलकिश की माँ नसीम अख़बार लेकर बिलकिश के सामने खड़ी है.... बिलकिश की गर्दन झुकी हुई है। रात के पहर वह दरी पर बैठी ख़ुदा के दर मिन्नत कर रही है- "रब करे सलीम सही राह पर आ जाए। क़ौम का हमदर्द बने, उसके ख़्वाबों की तामीर हो।"

"पर मेरा भी तो अहम् है। मैं तुम्हें ऐसे कैसे घर लेकर जाऊँगा?" सलीम का जवाब था।

और फिर.... अख़बार में ख़बर छपी कि प्रेशर ग्रुप के अध्यक्ष को गिरफ़्तार किया गया।

बिलकिश की माँ ने अख़बार बिलकिश को दिखाई, "बेटे, हमने तुम्हें आज़ादी दी है, अपने लिये जीवन-साथी चुनने का अख़्तियार भी तुम्हें है.

... पर तुम्हें मार्गदर्शन करने का अख़्तियार हमें भी है। हमारी ख़्वाहिश है कि तुम जो भी फ़ैसला करो, सोच समझ कर करो।"

बिलकिश ख़ामोश थी। जिस माँ-बाप ने उसकी झोली में हमेशा मुहब्बतों की सौग़ात डाली, उन्हें दुख देने का उसे अख़्तियार न था। जल्दी ही सलीम की आज़ादी की ख़बर भी मिली। सलीम गाँव गया हुआ था।

"बिलकिश.... मैं आज़ाद हो गया हूँ.... ज़मानत पर रिहा हुआ हूँ..

.. जल्द ही हैदराबाद आऊँगा।" सलीम ने दादू (शहर का नाम) से फोन किया था।

"सलीम, मेहरबानी करके इस रास्ते पर मत चलो...." बिलकिश ने अनुरोध किया।

"तुम तो पागल हो, एकदम डरपोक... अगर यही हाल रहा तो तुम मेरे साथ कैसे चल पाओगी?" सलीम हँसने लगा।

 

दोबारा सिमेस्टर की परीक्षाएँ शुरू होने वाली हैं। सलीम की गतिविधियाँ कुछ गोपनीय हैं.... कभी बिलकिश से मुलाक़ात होती तो कभी कई दिन ग़ायब रहता।

"सलीम, आख़िर तुम्हें क्या हो गया है....?" व्यायामशाला की सीढ़ियों पर बैठी बिलकिश सलीम से कुछ पूछ रही है। बिलकिश उसमें आए हुए बदलाव को बख़ूबी महसूस कर रही है.... आवाज़ में लड़खड़ाहट... लहज़े में असामान्यता....और कुछ अजीब बू!!

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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जलते अंगारे
सहर इमदाद
रात शब बारात हुई। उसने शीरा और पूरी बनाई। ख़तिमा देकर आस- पड़ोस में बाँट दिया। आज उसने हर काम अकेले ही किया था, बिल्कुल ही मौन की चादर ओढ़कर बड़े ही धीरज से किया। उसकी यह चुप्पी, उसके अंदर की चुप्पी, मौन और सन्नाटे की प्रतिध्वनि थी और आज उसकी बड़ी बेटी उसकी आवाज़ का इंतज़ार करती रही थी। नीना अपनी माँ की इस आदत से बख़ूबी वाक़िफ़ थी- घर का काम करते चिल्लाकर आवाज़ देने की आदत। वह काम करते बार-बार किसी न किसी को बुलाती रहती थी, ख़ास करके नीना जब घर में रहती थी, तब वह नीना को ही बुलाती थी।
"नीना! मुझे बरनी में शक्कर तो भरकर दे।"
"नीना! दौड़कर आओ, मुझे थोड़े बादाम पिस्ते तो काटकर दो।"
"नीना, ओ नीना! बेटे यहाँ आओ- चाशनी तो चख कर बताओ।"
"नीना...."
"नीना.... नीना...."
और नीना आख़िर उन आवाज़ों से तंग आकर कहती थी, "बस अम्मा,
मैं और मेरा कम्प्यूटर दोनों आते हैं शक्कर टेस्ट करने के लिये।" और वह मुस्कराकर प्यार से कहती, "नीना, मज़ाक मत कर, पड़ोसी सुन लेंगे तो कल की अख़बार में मेरी शुगर से ग्रस्त होने की ख़बर मुख्य अख़बारों में लग जायेगी और कल सारे पड़ोसी मेरा हाल जानने के लिये नुस्ख़ों के साथ आकर घर में जमा हो जायेंगे।"
पड़ोसियों को इकट्ठा करना तो दूर की बात, उसने तो अपने बच्चों को भी आज रसोईघर में इकट्ठा नहीं किया। उसने चुपचाप अकेले ही सब काम निपटाया, बिना किसी को आवाज़ दिये, बल्कि उसे महसूस हुआ था कि आज काम कुछ ज़्यादा जल्दी, ज़्यादा अच्छे ढंग से हो गए हैं। उसकी काम वाली ने तो बस आख़िर में आकर फक़त पड़ोसियों में प्रसाद बाँटने का काम आसान किया। बाई, जो दरअसल ख़ुद अपनी ईद लेने आई थी, उसके साथ भी उसने ज़्यादा खींचतान नहीं की, बस ले देकर उसे रवाना कर दिया। उसने बाहर बाहर बेहद ‘कूल लुक’ दी, पर उसके अन्दर में अंगार भभक रहे थे। उसने उन अंगारों की तपिश अपने पति और बच्चों तक नहीं जाने दी इसलिये अपने ऊपर बर्फ़ की तहें चढ़ाती रही वह। परत-दर-परत चढ़ी बर्फ़ की पहाड़ी के नीचे अपने भीतर तक ज्वालामुखी को छुपाए चल रही थी। बिल्कुल ‘कूल’ नज़र आने वाली वह आस पड़ोस में बाँटकर चौकीदार और बाई को ईद देकर फ़ारिग हुई। उसने अपने घर वालों के लिये शीरा ‘हॉट पॉट’ में डाला, सफ़ेद नैपकिन से ढकी हुई प्लेट में पूरियाँ सजाईं। एक प्लेट में बेसन के हलवे के टुकड़े रखे। सच्चे घी में लसुन का बघार देकर आलू की सब्ज़ी और हरे मसाले का रायता उसने उठाकर डाइनिंग टेबल पर रखे, और प्लेटें भी लाकर रख दीं। घर के एक एक सदस्य को उसने ख़ुद जाकर बुलाया।
उसका ससुर अपने कमरे में नमाज़ पढ़ रहा था, इसलिये वह नीना और मीना के कमरे की ओर चली गई। नीना कम्प्यूटर पर कोई गेम खेलने में तन्मय थी और छोटी गोल-मटोल मीना की आँखों तक लटक रहे कट बालों के बीच में से गेम देख रही थी। माँ ने उनके कमरे में आकर प्यार से नीना की पीठ थपथपाते कहा- प्ज पे जपउम जव बसवेम लवनत बवउचनजमतण् (यह कम्प्यूटर बंद करने का समय है।)
उसने छोटी मीना के चेहरे से बाल हटाए, झुककर उसे चूमा और टेबल पर रखे सुंदर रंगारंगी रबर बैंड से उसकी दो छोटी सी ‘पोनी टेल’ बनाईं। कमरे के कुशन ठीक किये, चादर खींची, बाहर निकलते, उसने एक बार फिर दोनों को खाने के लिये आने के लिये ज़ोर दिया।
"नीना मीना, तुम दोनों बस पाँच मिनट में डाइनिंग टेबल पर आओ।प्रेटा सारंग, पिता की कराची से लाकर दी हुई फैंडर की तारों का सेट खोलकर बैठा था और गिटार की तारों को फ़िट करने के काम में व्यस्त था।
वह फ्लोर कुशन पर उसके बाजू में बैठ गई।
"सारंग, क्या सभी तारें बदल रहे हो?"
"हाँ माँ, सभी नई तारें लगाई हैं, पुरानी संभाल कर रखूँगा किसी भी वक़्त कोई तार टूट गई तो काम आ जाएगी।"
"बस बेटा- अब यह बाद में बैठकर करना, पहले आओ तो सब मिलकर खाना खाएँ।"
"बस माँ, यह आखिरी म् तार सेट करके आता हूँ।"
"बस बेटा, पाँच मिनटों में टेबल पर आओ, और दादा साईं को भी ले आना।"
वह अपने बेडरूम में जाती है, दरवाज़े के पास रखे सोफ़ा पर उसका पति अपनी डायरी में कुछ हिसाब किताब करने में व्यस्त है। वह उसके कंधों के पास छूकर गुज़रते हुए कहती है- "डार्लिंग, खाना तैयार है- चलो।"
वह चुनरी उतारकर पलंग के किनारे रखती है और श्रृंगार मेज़ के आड़े खड़े होकर ब्रश से अपने बाल संवारती है। अपने जिस्म का एक एक अंग ध्यान से देखते हुए बाथरूम में चली जाती है, हाथ मुँह धोकर, फ्रेश होकर बाहर आती है, आईने के सामने खड़े होकर, पाउडर हाथ में छिड़ककर दोनों हाथों से रगड़कर गर्दन पर लगा कर और फिर वही हाथ अपने चेहरे पर घुमाती है, ज़रा सी वैज़िलीन उँगली पर लेकर लबों पर लगाती है, हैंडलोशन हाथों में लेकर, दोनों हाथों को खुशबू से रगड़ती है, पलंग से चुनरी लेकर सीने पर फैला लेती है तो उसकी नज़र पति की ओर जाती है जो डायरी बंद करके उसे गहरी नज़रों से घूर रहा है। वह दरवाज़े की ओर बढ़ती है
और सोचती है कि जब वह उसके क़रीब से गुज़रेगी तो वह ज़रूर कोई मस्ती करेगा। वह हवा के झोंके की तरह उसके पास से गुज़रती है, तो उसी पल वह उठकर खड़ा होता है और उसे बाँहों से पकड़ झटके से अपनी ओर खींचता है और आगोश में भरते हुए कहता है- "अच्छी लग रही हो।"
वे दोनों बेडरूम के दरवाज़े के बाहर आकर एक दूसरे के हाथ से आहिस्ते से अपना अपना हाथ अलग करते, उँगलियों के पोरों तक एक दूसरे को छूते, हाथ अलग करते हैं- और एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कराते, डाइनिंग टेबल पर एक दूसरे के आमने-सामने बैठते हैं। पति बच्चों के नाम ले लेकर पुकारता है- "नीना, मीना, सारंग आओ।" सारंग आया तो उसे दादा को लाने के लिये भेजा।
सब खाना ले लेते हैं। वह अपनी प्लेट में अपनी पसंद का बेसन का हलवा लेती है तो अचानक उसे सुबह वाली वार्ता याद हो आई और उसका सारा जिस्म जैसे ठंडा होता गया। वह उस बात को भूलने की कोशिश करती है और टेबल पर सभी के साथ बात करने में बिज़ी हो जाती है। बच्चों के स्कूल की बातें, सारंग की गिटार की ध्वनि और सुरों की बातें, दादा की आज की ख़ास ख़बरों की बाबत टिप्पणियाँ और ऐसी कई बातें पूरे परिवार में एक दूसरे की छोटी-छोटी ख़ुशियों में मिलकर बाँटीं। इस तरह वह दिन एक ख़ूबसूरत पारिवारिक समारोह बन गया।
टेबल से सभी उठते हैं तो नीना और सारंग बर्तन उठाने में उसकी मदद करते हैं। नीना टेबल साफ़ करके बर्तन माँजने में लग जाती है। तब तक सारंग अपनी ख़र्ची में से खरीदे पटाखे, लड़ियाँ, बम, बिच्छू, साँप, अनार सब लेकर आता है। दादा, बाप और बेटा, छोटी मीना समेत आंगन में जाकर पटाखे जलाते हैं, बम फोड़ते हैं, लड़ी जलाते हैं। नीना भी काम से फ़ारिग होकर उनकी ख़ुशी में शामिल हो जाती है। पटाखों की आवाज़ और धमाके उसके ज़हन को एक बार फिर डावांडोल करते हैं। उसके भीतर का ज्वालामुखी विस्फोटित होना चाहता है। वह उनसे बचना और भागना चाहती है। एक जगह नमाज़ बिछाकर, इबादत की रात का हक़ अदा करने के लिये नफिलु पढ़ते, बाहर बमों के विस्फोट.... उसके भीतर जैसे एक तेज़ाब सा असर पैदा कर रहे थे। उसका बॉस अमानुषता के आवरण में निरंतर उसकी ओर बढ़ रहा है। अपने बचाव में वह हाथ आई लाठी से उसपर नाकाम वार करती है। वह गिरकर फिर उठता है, हर वार को बर्दाश्त करके उसको और भी ज़्यादा जोश और वेग से बढ़ता है।
वह हमेशा उसे उकसाने वाले वाक्यांश कहता रहता था, "आपका पति बहुत भाग्यवान है, जो उन्हें तुम जैसी पत्नी मिली है।" या मुझे तुम्हारे पति से जलन होती है। कभी उसे घूरता, कभी घिनौनी हरकतें करता, पर वह हमेशा उन बातों को नज़र अंदाज़ करती रही, सुना अनसुना करती रही, देखा अनदेखा करती रही। पर आज, आज तो वह कमीना सब लक्ष्मण रेखाएँ पार कर गया। उसे अपने ऑफिस में एक खास विषय पर विचार-विमर्श करने के लिए बुलाया था। बातचीत ख़त्म करके, चाय की आख़िरी घूँट भरकर, वह जैसे उठी, वह अचानक फुर्ती से उठा और उसे बाँहों में जकड़ने की कोशिश की- "आइ अम डाइंग टू स्लीप विथ् यू हनी।"
और इसने अपने समस्त बल से अपनी बाँह छुड़ाकर बिजली की रफ़्तार से एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके गाल पर दे मारा और तेज़ी से दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल आई।
वह अपनी सीट पर पहंँची तो पूरी तरह से हाँफ रही थी। उसे लगा कि उसकी रगों में ख़ून की जगह गर्म लावा बह रहा है। गुस्से में उसके हाथों की मुट्ठियाँ भिंचती रहीं और उसने अपनी दोनों मुट्ठियाँ ज़ोर से टेबल पर दे मारीं और उन पर अपना माथा टेक दिया। कुछ देर बाद उसने सर ऊपर उठाया, थर्मस से ठंडा पानी गिलास में भरा और घूँट भरकर पी गई। जिस्म का तनाव कम करने के लिये उसने बदन को ढीला छोड़ा.... फिर एक ग्लास पानी और पिया। ड्राअर खोलकर उसने कुछ कागज़ निकाले- पेन लिया और अपना सेक्शन बदलने के लिये एक दरख़्वास्त लिखी। बीच बीच में वह ठंडा पानी पीती रही। एक और पन्ने पर उसने ‘शॉर्ट लीव’ के लिये नोट लिखा और बेल बजाई। चपरासी आया तो उसे वो लिखे कागज़ दिये। उसने अपना शोल्डर बैग और लंच बाक्स उठाया और ऑफ़िस के बाहर निकल आई।
इतनी बड़े, रौशन और वातानुकूलित ऑफ़िस में आज उसे घोर अंधेरा, घुटन और व्यथा का अहसास हुआ था। उस पल उसके मन में सिवाय नफ़रत के कुछ भी न था। नफ़रत और क्रोध की उस आग की यातना ने उसे बेजान कर रखा था। वह तमाम दिन जलती, सुलगती रही, लम्हा लम्हा जीती और मरती रही थी। सारा दिन उस तपिश जो झेलते झेलते उसका अंग अंग चूर हो चुका था।
वह शाम को उठी तो यह सोचकर उठी कि वह उस वारदात के बारे में नहीं सोचेगी। उसने स्नान घर में क़दम रखा, शावर से बहते पानी की ठंडे फुहारे जैसी धार उसके तन और मन पर से थकावट की हर परत उतार चुकी थी। वह साफ़ आईने की तरह दीप्तिमान लगने लगी। फिर उसने धीरज के साथ घर के सारे काम ठहराव की गति से पूरे किये। उसमें जितनी देर खड़े होने की शक्ति थी वह नफ़िलु पढ़ती रही। पूरा होने के बाद उसने आँखें मूँदकर सलामती के लिये हाथ दुआ के लिये उठाए। बाहर आंगन में ख़ामोशी थी। उनके कमरे से किसी पुरानी क्लासिक मूवी के डायलॉग रोशनी की लकीर के साथ बाहर तक आ रहे थे। समस्त वायुमंडल में गिटार की तान की झनकार थी। 
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ईबुक - सरहदों की कहानियाँ / / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी


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