संदेश

February, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

(ब)जट : यमला पगला दीवाना / अमित शर्मा

चित्र
प्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता हैं. इसे आम बजट इसीलिये कहाँ जाता हैं क्योंकि ये आम के सीजन के पहले आता है. बजट पेश करने के पीछे आय-व्यय का वार्षिक लेखा -जोखा रखना तो गौण कारण हैं इसके पीछे (सुविधानुसार चाहे तो आगे भी मान सकते हैं)मुख्य कारण ये हैं की बजट पेश करने से जनता में संदेश जाता हैं की सरकारे केवल "ऐश और केश" ही नहीं कर रहीं हैं बल्कि कुछ "पेश" भी कर रही हैं। हमारे देश में अभी तक केवल "घाटे का बजट" ही पेश किया जाता रहा हैं वो इसीलिए क्योंकि हम भारतीयो की तरह हमारी सरकारे भी अंधविश्वासी होती है, वो नहीं चाहती की नफे या फायदे का बजट पेश करके देश के शत्रुओं/प्रतिद्वंदियों को हमारी अर्थव्यवस्था को नज़र लगाने का मौका मिले। देश के सत्तारूढ़ दलो का शुरु से मानना रहा हैं की भले 5 साल पूरे होने के बाद सरकार किसी से नज़र मिलाने के काबिल रहे या ना रहे लेकिन किसी को भी देश और इसकी इकोनॉमी पर नज़र लगाने का मौका नहीं मिलना चाहिए। एक पूर्व वित्तमंत्री ने तो नज़र ना लगे इसके लिए आरबीआई की बिल्डिंग पर "नज़रबट्टू" के रूप में काली हांड़ी लटकाने का भी प्रस…

उपयोगी बनाएं इस भीड़ को / डॉ. दीपक आचार्य

चित्र
मजमा लगाना और मजमा लगाकर बैठना, तमाशा बनना और तमाशा बनाना-दिखाना आदमी की फितरत में शुमार हो चला है। हमारे यहां गली-कूंचों से लेकर महानगरों तक सर्कलों, रास्तों, चौराहों, तिराहों, डेरों, पाटों और सहज उपलब्ध सभी स्थानों पर बुद्धिजीवियों, अति-बुद्धिजीवियों, महा-बुद्धिजीवियों, चिन्तकों और विचारकों की विभिन्न श्रेणियां विद्यमान हैं जिनका एकसूत्री एजेण्डा जिन्दगी  भर चर्चाओं में रमे रहना ही है और ये चर्चाएं ही हैं जिनकी बदौलत ये लोग जैसे-तैसे जिन्दा हैं और ऊर्जावान बने हुए हैं। वरना इन अमूल्य धरोहरों का साक्षात हम कभी नहीं कर पाते। एक ओर इस जमात का बहुत बड़ा योगदान देश के विचारकों में है वहीं दूसरी ओर एक किस्म और है जो हमेशा किसी न किसी महान इंसान के इर्द-गिर्द हमेशा बनी रहती है।  जैसा आदमी का कद, उतनी अधिक भीड़ आस-पास बनी रहती है। यह भीड़ ही है जो आदमी के मूल्य से लेकर औकात तय करती है और आदमी के वजूद से लेकर प्रतिष्ठा को तय करती है तथा जब-जब भी शक्ति परीक्षण के मौके आते हैं यह भीड़ नियंता के रूप में आगे ही आगे रहकर निर्णयों को अपने हिसाब से परिवर्तित करवाने की तमाम क्षमताओं से युक्त होती है।�…

मंगतों को नहीं जरूरतमन्दों को दें / डॉ. दीपक आचार्य

चित्र
पूरा संसार लेन-देन पर टिका हुआ है। यों कहा जाए कि सृष्टि में जन्म का आधार ही पूर्वजन्म के हिसाब-किताब का परिणाम है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संसार चक्र में जो फंसा हुआ है उसके लिए लेना-देना जीवन भर का ऎसा क्रम बना हुआ है कि उससे कोई बच नहीं सकता। राजा और रंक-फकीर, सभी को एक-दूसरों से काम पड़ता ही पड़ता है। इसके बिना इनका जीवन औचित्य खो बैठता है। अकेले कुछ कर पाने का साहस या तो सर्वशक्तिमान ईश्वर में है अथवा सिद्धों और परमहंसों में। इनके सिवा दुनिया का कोई सा जीव अकेला अपने दम-खम पर कुछ नहीं कर सकता। दुनिया की इस मायावी भीड़ में हर प्रकार के इंसानों का जमघट है।  सबकी अपनी-अपनी इच्छाएं, तृष्णाएं और आशा-आकांक्षाएं  हैं।  इन सभी में किसी न किसी अंश में भिक्षावृत्ति या छीना-झपटी के भाव विद्यमान हैं जो उनके पूरे जीवन व्यवहार में समय-समय पर परिलक्षित होते रहते हैं। लोग अपने पास सब कुछ होने के बावजूद यह इच्छा रखते हैं कि उन्हें हर दिन कहीं न कहीं से कुछ न प्राप्त होता रहे। कुछ के लिए यह प्राप्त द्रव्य या और कुछ जो भी हो, काम का हो सकता है, और बहुत से लोगों के लिए केवल दिखावे का। बहुत से …

आखिर थम ही गए पहिए - नैनपुर नैरो गेज ट्रेन की अंतिम यात्रा / गोवर्धन यादव

चित्र
आखिर थम ही गए पहिएलगातार एक सौ ग्यारह वर्षों तक अहिर्निश सेवाएँ देती रहने वाली छोटी रेल के पहिए आखिर 30 नवम्बर 2015 को इतिहास का हिस्सा बन ही गई. छिन्दवाड़ा से नैनपुर एवं छिन्दवाड़ा से नागपुर रूट पर चलने वाली दस जोड़ी ट्रेन के पहिए थम गए. नैनपुर से आखरी नेरोगेज ट्रेन दोपहर 2.40 बजे रवाना होकर रात्रि 8.15 बजे छिन्दवाड़ा पहुँची, वहीं छिन्दवाड़ा से नैनपुर के लिए आखिरी ट्रेन शाम 5.10 बजे रवाना हुई. छिन्दवाड़ा से नागपुर के लिए आखरी ट्रेन 5.25 बजे रवाना हुई. नागपुर से चलने वाली ट्रेन का सफ़र छिन्दवाड़ा में ही समाप्त हो गया. शाम 5.25 बजे छिन्दवाड़ा से आखरी नेरोगेज ट्रेन रवाना हुई और इस तरह गरीबों के लिए वरदान मानी जाने वाली नेरोगेज ट्रेन इतिहास का एक अमिट हिस्सा बन गई. ऊँचे-ऊँचे हरे भरे पहाड़ों की बीच घुमावदार पटरियों पर छुकछुक करती नैरोगेज ट्रेन स्मृतियों का हिस्सा बन गई. आजादी से पहले और आजादी के बाद के एक सौ ग्यारह साल में नैरोगेज ट्रेन ने कई उतार-चढ़ाव देखे. नैनपुर से नागपुर तक जिले की पांच पीढ़ियों को अपनी गोद में लेकर सफ़र कराने वाली छॊटी ट्रेन के पहिए 30 नवम्बर को थम ही गए. रेल लाइन के किनारे बसे …

ईबुक - सरहदों की कहानियाँ - 12 / लेखक परिचय / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

चित्र
लेखक परिचयडॉ. हिदायत प्रेमजन्म : 24 मार्च 1946, घोटका, ज़िला- सिन्ध में। 1973 में सिन्ध यूनिवर्सिटी, जामशोरो में सिन्धी में एम.ए.। 1989 में लंदन से लसानियत में डिप्लोमा और 1995 में सिंध यूनिवर्सिटी, जामशोरों से पीएच.डी. हासिल की। इस वक्त सिंध यूनिवर्सिटी में सिंधी पढ़ाते हैं। उन्होंने अनेक कहानियाँ और शोधपरक लेख लिखे हैं। पता : सी-25, सिन्ध यूनिवर्सिटी कॉलोनी, जामशोरो। अमर जलीलजन्म : 8 नवंबर, 1936 में हुआ। जिनका बचपन रोहड़ी व कराची में गुज़रा। नवाबशाह से बी.ए. करने के पश्चात् कराची यूनिवर्सिटी से एम. ए. की। वे रेडियो पाकिस्तान पर रिसर्च ऑफीसर भी रहे। 1954 में ‘इंदिरा’ नाम की कहानी लिखी, जो बहुचर्चित रही। उनके कहानी संग्रह हैं- ‘दिल की दुनिया’ और ‘तीसरा वजूद’ व नावल ‘आख़िर गूँगी बोल पड़ी’ प्रकाशित हैं। कुछ सिन्धी फ़िल्मों की कहानियाँ रेडियो और टेलिविज़न के लिए लिखी हैं। सिन्धी और अंग्रेज़ी में कई पत्रिकाओं में कॉलम लिखते रहे हैं। अब वे अलामा इक़बाल ओपन यूनिवर्सिटी, इस्लामाबाद से रिटायर हुए हैं। वे इस समय कराची में रहते हैं। रशीदा हिजाबजन्म : अक्टूबर 21, 1942 शिकारपुर , सिन्ध (पाकिस्तान) में। …

ईबुक - सरहदों की कहानियाँ - 11 / स्नेह का सावन - इमदाद हुसैनी/ अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

चित्र
स्नेह का सावनइमदाद हुसैनीशॉन ने कुर्सी की पीठ पर लेटे, एड़ियों पर घेर देकर, कुर्सी को पिछली टाँगों पर खड़ा किया और फिर दीवार से टिकाने के लिए कुर्सी को पीछे की ओर धक्का दिया। संतुलन क़ायम न रहा और झटका खाकर कुर्सी ने उसे मेज़ पर ला पटका, जहाँ वह कुछ पल तो टेबल पर बाँहों को मुँह में दबाये ही पड़ा रहा। ‘दीवार पीछे तो नहीं हट गई है?’ उसने सोचा। कुहनी में जलन महसूस हुई तो कराहते हुए बाँह की ओर देखा। कुहनी में खरोंचें आई थीं और उनसे ख़ून निकलकर वहीं जम गया था। उस जगह मरहम लगाया, फूँक मारी, कमीज़ की बाँह नीचे की, फिर टेबल पर बाँहों के बीच मुँह रख दिया। "हैलो!" शॉन के कानों में जलतरंग सी झनकार हुई। उसने गर्दन ऊपर उठाई। सामने लालन खड़ी थी। बरसाती वेशभूषा में, कंधों पर गरजते बादल लिए, लबों पर लाली लगाए। वह तो लालन के चेहरे पर टिकी आँखें ही उठा नहीं पा रहा था। "देख तो ऐसे रहे हो जैसे पहली बार देख रहे हो।" लालन की मुस्कान ने गालों पर पड़े कपोलभंग को और गहरा कर दिया। "पहली बार नहीं, आख़िरी बार!" वह भी मुस्कराया। एक रूठी हुई मुस्कान के साथ लालन को बैठने के लिए कहकर वह बाहर …

ईबुक - सरहदों की कहानियाँ - 10 / बीमार आकांक्षाओं की खोज - मुश्ताक़ अहमद शोरो/ अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

चित्र
बीमार आकांक्षाओं की खोजमुश्ताक़ अहमद शोरोक्या ये सब जिल्लते, यंत्रणाएँ, अपमान, मानसिक यातनाएँ, अनाड़ीपन, महत्वहीनता के नगण्य भाव मेरे हिस्से में आने वाले थे? दोष भी किसे दें, मेरी ऐसी दयनीय दशा के लिए! वैसे तो मैं अपनी छोटी-छोटी ख्वाहिशों, उम्मीदों, नाकामियों, निराशाओं और नाउम्मीदों में ज़िन्दा था, जीता रहा ऐसे ही, पर यह अहसास? शायद मेरे चेहरे की तरह, मेरी रूह, मेरे वजूद और सोच में भी सिलवटें पड़ गई हैं या शायद मैं ग़लत मौक़े, ग़लत वक़्त और ग़लत जगह पर पैदा हुआ हूँ या मौजूद हूँ। पर यह कोई ख़ास नई या हैरान करने वाली बात तो नहीं है। मैं जो कुछ भी सोचता हूँ, वह कह नहीं सकता। ये तो शुरू से ही था। और उसके सवालों के जवाब, उन की सोच विचार और राय पर जवाब, और उन जवाबों की दलीलें बाद में ही दिमाग़ में आती हैं। "ऐसे जवाब देता तो यह दलील देता।" सामने बात करते तो जैसे साँप सूँघ जाता है। होश गुम हो जाते हैं। कुछ भी समझ में नहीं आता कि क्या कहूँ, कौन सा जवाब दूँ? मेरे लिये लोगों का धिक्कार, नफ़रत, नज़रअंदाज़ी और अहमियत न देने का कारण तो मान लें, मेरा अनाड़ीपन और पागलपन ही हो। पर मेरे साथ ऐसा क्यों है?…

ईबुक - सरहदों की कहानियाँ -9 / मज़बूत टाँका हुआ बटन - पोपटी हीरानंदाणी / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

चित्र
मज़बूत टाँका हुआ बटनपोपटी हीरानंदाणीमेरी भाग्यवान देखी है? हक़ीक़त में जैसे मिलिटरी का एक किरदार। उस दिन कहा था, "मुझे तुम्हारी यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगती।" मैंने कहा था- "मेरी कोई भी बात तुम्हें अच्छी लगी है क्या?" तब कहती है- "तुम हो ही उल्टे तो फिर मैं क्या करूँ?" अब मैं हो गया उल्टा और वह हुई सुल्टी। खट-पट भी तो इतनी है कि बस बात ही मत पूछो। ज़बान जैसे तेज़ धार वाली तलवार। मुझ जैसे छः फुट वाले को उसकी तीन इंची ज़बान लिटा देती है। दोस्त कहता है, "जिस घर में मधुर वार्तालाप करने वाली औरत न हो उसे जंगल में बस जाना चाहिए।" सच, भला जंगल इस मेरे घर से किसी भी हाल में बदतर न होगा? बराबर आग वन में भी लगती है। पर जब लगती है तो सब कुछ भस्म कर देती है न? यहाँ तो हरदम आग लगती रहती है। किसी न किसी कोने में आग के शोले उठते ही रहते हैं। इससे तो अगर घर छोड़कर निकल.... पर मैं निकलूँ तो क्यों निकलूँ? घर मेरा और मैं ही निकलूँ? क्यों न उसको ही निकाल दूँ? निकाल दूँ....? अपने बच्चों की माँ को निकाल दूँ? बच्चों का क्या होगा? घर का क्या होगा? लोग क्या कहेंगे? लोग!…

ईबुक - सरहदों की कहानियाँ -8 / चौराहे से उत्तर की ओर अब्दुल रहमान सियाल / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

चित्र
चौराहे से उत्तर की ओरअब्दुल रहमान सियालसुबह का वक़्त है, बस से उतरकर रोज़ की तरह चार कमरों तक महदूद उस कॉलेज की बिल्डिंग की ओर रुख़ किया और हर रोज़ की तरह जल्दी- जल्दी सीढ़ियाँ फलांगते हुए क्लास रूम में पहुँचकर किताब कॉपियों को सीट पर फेंकते हुए बरांडे में आकर खड़ा हो गया। यहाँ वहाँ नज़र फिराई, देखा अभी तक कॉलेज का दरबान भी नहीं आया था। रोज़ की तरह सामने ‘कोर्ट व्यू’ बिल्डिंग पर लगे अंग्रेज़ी पोर्स्टस को चाह के साथ देखने लगा, कि उनमें कौन से नये पोस्टरों का इज़ाफ़ा हुआ है। जिस्म को उभारते पोस्टर शायद परीक्षा लेने के लिये लगाये गये हैं। पोस्टरों के पीछे कोर्ट के बाहर झोपड़ियों के नीचे मुनीमों की टेबल व कुर्सियाँ ऊपर से देखीं जो रोज़ की तरह उलट कर रखी गई थीं। यह सब देखने के बाद नीचे उतर आया। कॉलेज की बिल्डिंग का चक्कर लगाया पर कोई भी ऐसा आदमी नहीं पहुँचा था जिस के साथ बैठकर पल भर भी वक़्त गुज़ारा जा सके। कभी कभी कोई मुझसा सीधा-सादा कोई स्टूडैंट आ जाता तो फिर अच्छी कचहरी हो जाती थी और काफ़ी समय भी गुज़र जाता था। पर आज कोई भी स्टूडैंट नहीं आया था। बस मैं अकेला ही था। पर अकेला बोर हो रहा हूँ क्या करूँ? कह…

ईबुक - सरहदों की कहानियाँ -7 / दुनिया एक स्टेज है - नूर अलहदा शाह/ अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

चित्र
दुनिया एक स्टेज हैनूर अलहदा शाहउस महफ़िल में सिर्फ़ मुझे ही नाचने के लिये बुलाया गया था। रात के पहले पहर में जब भीड़ इकट्ठा हुई थी और सभी मदिरा पीकर बेसुध हो चुके थे, तब मैंने पायल की छम-छम से धीरे-धीरे पाँव उठाने शुरू किये। स्वर्गीय कजल बाई को जन्नत नसीब हो, हमेशा कहती थी कि पहले तमाशाइयों को प्याले भर भर के पिलाओ, जब नशे में चूर हो जाएँ, बाद में नाचो- सिर्फ़ नोट ही नहीं, पर ख़ुद को भी तुम पर कुर्बान कर देंगे। पायल की छम-छम के साथ साजिन्दों ने भी साज़ छेड़ने शुरू किये और ज़मीन मेरे पैरों के तले ज़ोर-ज़ोर से घूमने लगी। उसी फिरते मंजर में ही जैसे बिजली की तरह मेरी आँखों के सामने से वह गुज़रकर गुम हो गया। परदे में मुँह डालकर बैठा, उसका सारा शरीर पटसन में लिपटा हुआ। मुझे लगा वह बेसुध तो है पर उसने मदिरा नहीं पी है। एक वही है जो जाग रहा है, बाक़ी सब खुली हुई लाल आँखों के भीतर मरे पड़े हैं और उन के खुले हुए मुँह में फ़क़त कौवे काँ काँ कर रहे हैं। कि नाच नर्तकी! नाच-नाच-नाच नर्तकी! नाच- नाच!!! नोट, शिकार हुए परिंदों की तरह हवा में एक चक्कर लगाकर वापस आकर ज़मीन पर गिरते और ज़मीन और भी तेज़ी से मेरे पैरों तले…

ईबुक - सरहदों की कहानियाँ - 6/ सियासत, मीडिया और अजीब बू - तनवीर जोनेजो / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

चित्र
सियासत, मीडिया और अजीब बूतनवीर जोनेजोकालीन सी दरी पर सफ़ेद चुनरी, जिस पर गुलाबी फूल गुंथे हुए थे, सर पर ओढ़े वह ख़ुदा के दर मिन्नत कर रही है, नाजुक निर्मल से हाथ उठाकर उस परम दयालू रब से कुछ माँग रही थी। मुहब्बत की मंज़िल, हमसफ़री का साथ.... प्यार का चंदोवा : "ऐ मेरे पाक परवरदिगार.... वह जैसा भी है.... मुझे बहुत प्यारा है. ... उसके साथ का हर पल मेरे लिये जन्नत समान है.... आप मुझे उनसे दूर न करें.... ऐ मेरे करीम बादशाह तुम्हारे दर हर बंदा एक खुली किताब है। हर बंदे के भीतर के ख़यालों से आप परिचित हैं.... बंदे की मजबूरियों और कमज़ोरियों की सब जानकारी है तुम्हारे पास.... परवरदिगार मुझे लौटा दो वह अपनी तमाम नेकियों और सच्चाइयों से.... निर्दोषता और निर्मलता के साथ।" उसके होंठ थरथरा रहे थे, आँखों में आंसुओं की लड़ी थी.... ख़यालों की उड़ान.... तेज़ी से बुलंदियों के साथ विगत काल की ओर जा रही है. .. कुछ यादगार लम्हों के यादगार पल....! उसका नाम बिलकिश है... और इस वक़्त जिसके लिये ख़ुदा के दर मिन्नत कर रही है वह उसका दोस्त, उसका सहपाठी सलीम है। दोनों बी. ए. के तीसरे साल के विद्यार्थी हैं। बिलक…

ईबुक - सरहदों की कहानियाँ -5 / जलते अंगारे - सहर इमदाद / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

चित्र
जलते अंगारे
सहर इमदाद
रात शब बारात हुई। उसने शीरा और पूरी बनाई। ख़तिमा देकर आस- पड़ोस में बाँट दिया। आज उसने हर काम अकेले ही किया था, बिल्कुल ही मौन की चादर ओढ़कर बड़े ही धीरज से किया। उसकी यह चुप्पी, उसके अंदर की चुप्पी, मौन और सन्नाटे की प्रतिध्वनि थी और आज उसकी बड़ी बेटी उसकी आवाज़ का इंतज़ार करती रही थी। नीना अपनी माँ की इस आदत से बख़ूबी वाक़िफ़ थी- घर का काम करते चिल्लाकर आवाज़ देने की आदत। वह काम करते बार-बार किसी न किसी को बुलाती रहती थी, ख़ास करके नीना जब घर में रहती थी, तब वह नीना को ही बुलाती थी।
"नीना! मुझे बरनी में शक्कर तो भरकर दे।"
"नीना! दौड़कर आओ, मुझे थोड़े बादाम पिस्ते तो काटकर दो।"
"नीना, ओ नीना! बेटे यहाँ आओ- चाशनी तो चख कर बताओ।"
"नीना...."
"नीना.... नीना...."
और नीना आख़िर उन आवाज़ों से तंग आकर कहती थी, "बस अम्मा,
मैं और मेरा कम्प्यूटर दोनों आते हैं शक्कर टेस्ट करने के लिये।" और वह मुस्कराकर प्यार से कहती, "नीना, मज़ाक मत कर, पड़ोसी सुन लेंगे तो कल की अख़बार में मेरी शुगर से ग्रस्त होने की ख़बर मुख्य अख़बा…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.