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March, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता - वीणा भाटिया/मनोज कुमार झा

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आवहु सब मिल रोवहु भारत भाईहा! हा!! भारत दुर्दशा देखि ना जाई।ये पंक्तियां आधुनिक हिंदी के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘भारत दुर्दशा’ की हैं। भारतीय नवजागरण और खासकर हिंदी नवजागरण के अग्रदूत के रूप में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पहली बार अंग्रेजी राज पर कठोर प्रहार किया था। इसके साथ ही, उन्होंने अंग्रेजों के सबसे बड़े सहयोगी सामंतों पर भी चोट की थी। भारतेंदु का समय भारतीय इतिहास में बहुत ही बड़े उथल-पुथल से भरा था। उनके जन्म के ठीक सात साल बाद अंग्रेजी शासन के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा जनविद्रोह हुआ था-1857 का ग़दर। इस ग़दर ने अंग्रेजों को भीतर से हिला दिया था और इसी के बाद अंग्रेज़ शासकों ने कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अख़्तियार की थी, जिसका विघटनकारी प्रभाव आज तक बना हुआ है। भारतेंदु ने विदेशी शासन के दुष्प्रभावों और गुलामी की पीड़ा को बहुत ही गहराई से महसूस किया था। देश में आम जन की हालत बहुत ही बुरी थी। बार-बार पड़ने वाले अकालों ने किसानों की हालत खराब कर दी थी। वहीं, अंग्रेजों ने ग़दर के बाद बड़े पैमाने पर दमन चक्र चलाया था। यह देश की अस्मिता को कुचलने का प्रयास था। एक तर…

लघुपत्रिकाएं पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं / चंद्रमौलि चंद्रकांत

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आज के समय में मुख्यधारा की पत्रिकाएं व अखबार कारपोरेट जगत व सम्राज्यवादी ताकतों के प्रभाव में समाहित हो रही है। इस वजह से देश के चौथे स्तंभ के प्रति पाठकों में संशय उत्पन्न होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में लघु पत्रिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैक्नोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे उतने ही बेहतर ढ़ंग से लघुपत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघुपत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को सुरक्षित रखा है।  लघुपत्रिकाएं पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। लघु पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, ये पत्रिकाएं मौलिक सृजन का मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो अथवा ग्लोबलाईजेशन का प्रश्न हो हमारी व्यावसायिक पत्रिकाएं सत्ता विमर्श को ही परोसती रही हैं। सत्ता विमर्श व उसके पिछलग्गूपन से इतर लघु पत्रिकाएं अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता, संघर्षशीलता व सकारात्मक सृजनशीलता की पक्षधर हैं। इन बातों के मद्देनज़र इतना स्पष्ट है कि लघु पत्रिकाओं की आवश्यकता हमारे यहां आज भी है, कल भी थी, भविष्य में भी…

पहाड़ी कोरवा की जिंदगी में नई सुबह / मनोज कुमार

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यह शायद पहला मौका होगा जब पहाड़ी कोरवा आदिवासियों के जीवन में इतनी सारी खुशी उनके हिस्से में आयी है. अब से पहले तक उपेक्षा और तकलीफ के सहारे उनकी जिंदगी बसर हो रही थी. जंगलों पर निर्भर रहने वाले ये पहाड़ी कोरवा की चिंता करती तो हर सरकार दिखती लेकिन कागज पर और यह पहली पहली बार हुआ है जब कागज नहीं, बात नहीं बल्कि सच में उनके हक में कुछ दिखाया है तो राज्य की रमन सरकार ने. राज्य सरकार ने इन आदिवासियों की जिंदगी बदलने के लिए शिक्षा से रोजगार और कोठी में अनाज से लेकर स्वच्छता तक का ध्यान रखा है. अब कोई आदिवासी खुले में शौच के लिए नहीं जाता है और न ही किसी आदिवासी को जंगल में खाने की तलाश करने की जरूरत है. आदिवासी बच्चियों के लिए शिक्षा का रास्ता खुल गया है तो युवा आदिवासियों को रोजगार मिलने लगा है.  बेहद ही गरीबी में पले बढ़े मंगल सिंह ने कभी सोचा भी नही था कि एक दिन वह खुद की मोटर साइकिल चलायेगा और तीर धनुष की जगह उसके हाथों में मोबाइल रहेगा। घर में कलर टीवी रखेगा और आराम से अपना जीवन बितायेगा। उसे तो लगता था कि बड़े होकर उसे भी हाथों में तीर कमान पकडक़र जंगल में चार,तेंदू तोडऩे, महुआ बीनने…

रचना और रचनाकार (१५) - सुभाष दशोत्तर की कविताओं में मृत्यु-बोध / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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रचना और रचनाकार (१५) सुभाष दशोत्तर की कविताओं में मृत्यु-बोध डा. सुरेन्द्र वर्मा सुभाष दशोत्तर मध्य-प्रदेश का एक उदीयमान हिंदी कवि था जो एक स्कूटर दुर्घटना में असमय ही मृत्यु का शिकार हो गया. उसके लिए शाम और रात का प्रश्न / पैदा ही नहीं हुआरोज़ सुबह उसे / एक-एक क़तरा /आल्पिन से / गिराती रहती थीऔर वह / दोपह्रर को / मर गया (पैवस्त यातना, पृ.7)सुभाष ने मानों मौत को अपनी ज़िंदगी में ही देख लिया था. यही कारण है कि उसके एक मात्र संग्रह, पैवस्त यातना (आरक्त प्रकाशन, उज्जैन, 1976), की अधिकांश कविताएं इसी मृत्यु-बोध को सर्वाधिक रेखांकित करती प्रतीत होती हैं. कवि कहता है – आकाश कब / इद्र धनुष के रंगों को लील जएगा / हमें इसका भान नहीं होताक्योंकि मौत का कोई / मनोविज्ञान नहीं होता (पृ.38)आदमी का क़तरा-क़तरा मरना और फिर मानों मौत का अचानक घटित हो जाना- सुभाष दशोत्तर ने मृत्यु सम्बंधी इन दोनो ही तथ्यों को अलग-अलग पकड़ा था और उसकी ये दोनो ही अनुभूतियां विरोधाभासी होते हुए भी वैध अनुभूतियां थीं जो मृत्यु की द्वैधवृत्ति का सही वर्णन करती हैं. मृत्यु सम्बंधी चिंतन भारतीय विचारकों का सदैव ही एक प्रिय विषय र…

निजीकरण के दौर में सरकारी स्कूल / जावेद अनीस

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सरकारी स्कूल हमारे देश के सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद हैं, ये देश के सबसे वंचित व हाशिये पर पंहुचा दिए गये समुदायों की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. देश की शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण और इसे मुनाफा आधारित बना डालने का मंसूबा पाले लोगों के रास्ते में भी सरकारी स्कूल सबसे बड़ी रूकावट हैं. तमाम हमलों और विफल बना दिए जाने की साजिशों के बीच इनका वजूद कायम है और आज भी जो लोग सामान शिक्षा व्यवस्था का सपना पाले हुए हैं उनके लिए यह उम्मीद बनाये रखने का काम कर रहे हैं. नब्बे के दशक में उदारीकरण आने के बाद से सार्वजनिक सेवाओं पर बहुत ही सुनोयोजित तरीके से हमले हो रहे हैं और उन्हें नाकारा,चुका हुआ व अनुउपयोगी साबित करने हर कोशिश की जा रही है. एक तरह से सार्वजनिक सेवाओं का उपयोग करने वालों को पिछड़ा और सब्सिडी धारी गरीब के तौर पर पेश किया जा रहा है. उच्च मध्यवर्ग और यहाँ तक कि मध्यवर्ग भी अब सार्वजनिक सेवाओं के इस्तेमाल में बेइज्जती सा महसूस करने लगे हैं उनको लगता है इससे उनका क्लास स्टेटस कम हो जाएगा. इसकी वजह से सरकारी सेवाओं पर भरोसा लगातार कम हो रहा है. कायदे से तो इसे लेकर…

रचना और रचनाकार (१४) - अमृता भारती का रचना संसार / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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प्रसिद्ध संवृतशास्त्री, एडमंड हुस्सर्ल, की यह मान्यता है कि हमारी चेतना अनिवार्यतः विषयोन्मुख होती है. लेकिन जिनकी ओर वह अभिप्रेरित है, वे वस्तुएं ज़रूरी नहीं देश-काल में स्थित वस्तुएं ही हों. सच तो यह है कि ये वस्तुएं हमारी चेतना का विषय हो भी नहीं सकतीं. इनका स्वभाव चेतना के ठीक विपरीत है. हम उन्हें चेतना का विषय केवल इसलिए मानते हैं कि हम अपनी इंद्रियानुभव वाली पूर्वमान्यता से स्वतंत्र नहीं हो पाते. इस पूर्वमान्यता के अनुसार जो भी है वह देश-काल में स्थित है और हमारे इंद्रियानुभव द्वारा हमें प्राप्त है. यदि हम अपनी इस पूर्वमान्यता से स्वतंत्र होकर वस्तुओं को देखें तो पाएंगे कि वस्तुएं नहीं बल्कि वस्तुओं का सारतत्व, उनका अपना आंतरिक स्वभाव, उनकी वह विशेषता जो उन्हें वैसा बनाती है कि जैसी वे हैं - चेतना का विषय होता है. इनका स्वभाव चेतना के स्वभाव से –आत्मा से- अलग नहीं है. हमारी चेतना इन्हीं सार-तत्वों का –संवृतियों का- घर है. शायद इसीलिए हाइडागर ने एक बार कहा था, ‘स्रोत ही गंतव्य’ है. अमृता भारती भी ठीक संवृतशास्त्रियों की तरह ही मनुष्य को, समाज और दुनिया को और सम्बंधों को, वहीं देख…

जरूरी हैं धर्मशालाएँ - डॉ. दीपक आचार्य

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किसी जमाने में लोग कम हुआ करते थे और दानी-मानी लोगों की संख्या भी कोई कम नहीं थी। वे लोग गांवों-शहरों और कस्बों में धर्मशालाएं बनवाते थे जो आम लोगों के लिए काम आती थी। यह काम सेवा-परोपकार को साकार करने के साथ ही पीढ़ियों तक पुण्य भी देता था। निष्काम सेवा भावना से किया गया यह परोपकार इतना कालजयी होता था कि दशकों से लेकर सदियों तक ये धर्मशालाएं उनके संस्थापकों व निर्माणकर्ताओं के नाम से मशहूर रहती थीं और इनके प्रति आम लोगों में भी अच्छा भाव हुआ करता था। कम से कम खर्च में ठहरने और कहीं-कहीं खाने-पीने की सुविधाओं की उपलब्धता से जनजीवन को कई मायनों में राहत और बहुविध सुकून का अहसास होता था। वास्तव में यही धर्म का वह साकार स्वरूप है जो कि अक्षयकीर्ति और श्रेय दिलाता है वहीं पीढ़ियों तक याद रखा जाता है। आज भी कई जगह दानी-मानियों के नाम से बड़ी-बड़ी धर्मशालाओं का संचालन हो रहा है जिनसे आमजन को सुकून मिल रहा है। जनसंख्या विस्फोट और प्रवृत्तियों के व्यापक विस्तार के आधुनिक दौर में आम इंसान के लिए धर्मशालाओं की संख्या में बढ़ोतरी समय की आवश्यकता थी लेकिन हमारी स्वार्थी और संकीर्ण मनोवृृत्ति ने सेवा-…

उदास है नदी / कविताएँ / गोवर्धन यादव

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(१) सूख कर कांटा हो गई नदी, पता नहीं, किस दुख की मारी है बेचारी ? न कुछ कहती है, न कुछ बताती है. एक वाचाल नदी का - इस तरह मौन हो जाने का - भला, क्या अर्थ हो सकता है? (२) नदी क्या सूखी सूख गए झरने सूखने लगे झाड़-झंखाड़ उजाड़ हो गए पहाड़ बेमौत मरने लगे जलचर पंछियों ने छॊड़ दिए बसेरे क्या कोई इस तरह अपनों को छॊड़ जाता है?. (३) उदास नदी उदासी भरे गीत गाती है अब कोई नहीं होता संगतकार उसके साथ घरघूले बनाते बच्चे भी नहीं आते अब उसके पास चिलचिलाती धूप में जलती रेत उसकी उदासी और बढ़ा देती है (४) सिर धुनती है नदी अपना क्यों छॊड़ आयी बाबुल का घर न आयी होती तो अच्छा था व्यर्थ ही न बहाना पड़ता उसे शहरों की तमाम गन्दगी जली-अधजली लाशें मरे हुए ढोर-डंगर (५) नदी- उस दिन और उदास हो गई थी जिस दिन एक स्त्री अपने बच्चों सहित कूद पड़ी थी उसमें और चाहकर भी वह उन्हें बचा नहीं पायी थी. (६) नदी- इस बात को लेकर भी बहुत उदास थी कि उसके भीतर रहने वाली मछली उसका पानी नहीं पीती कितनी अजीब बात है क्या यह अच्छी बात है? (७) घर छॊड़कर फ़िर कभी न लौटने की टीस कितनी भयानक होती है कितनी पीड़ा पहुंचाती है इस पीड़ा को नदी के अलावा कौन भ…

रचना और रचनाकार (१३)-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की रचना धर्मितानई कविता के समर्थ कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जो एक ओर अपनी निजी कोमल भावनाओं को अपनी कविताओं में अभिव्यंजित करते हैं वहीं दूसरी और आम जन की पीड़ा, आर्थिक विषमता से छटपटाते उनके दु:ख दर्द और अपने समय के यथार्थ को भी अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं. वस्तुत: वे एक ऐसे युग-चेता कवि के रूप में उभरे हैं जिनका भारत की स्वतंत्रता के उपरांत अन्य बुद्धिजीवियों की तरह भारत की सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था के प्रति पूरी तरह मोह भंग हो गया था. वे व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते थे और इसके लिए वे अपने काव्य में जनता का आह्वाहन करते रहे. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म १५ सितम्बर १९२७ को बस्ती (उ.प्र.) में हुआ था. उनकी आरंभिक शिक्षा बस्ती में ही हुई, किन्तु उन्हें उच्च शिक्षा वाराणसी और इलाहाबाद में मिली. उन्होंने अपनी आजीविका के लिए कई धंधे अपनाए. अध्यापिकी भी की और क्लर्की भी. आकाशवाणी में वे सहायक प्रोड्यूसर रहे. “दिनमान” के उपसंपादक रहे तो “पराग” के सम्पादक भी बने. “दिनमान” के स्तम्भ ”चरचे और चरखे” में उन्होंने मार्मिक लेखन किया. “…

जल प्रबंधन में युवाओं की भूमिका / डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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लोफिर आ गए सूरज के जलने और धरती के तपने के दिन। यानी गरमी की हुई दस्तक। फिर उठने लगे पानी के सवाल। यह एक तरह की नियति सी बन गई है कि हम पानी पर रोना तो जानते हैं पर पानी का होना हमें गवारा नहीं है !....खैर, दिन-प्रतिदिन विकट होते जा रहे जल संकट से परित्राण की पुकार सब तरफ सुनी जा सकती है। पानी पर बात करने तो सभी तैयार हैं, किन्तु पानी बचानेऔर उसका सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर सीधी भागीदारी की बात जब आती है तब लोग किनारा कर जाते हैं। सब जानते हैं कि जल जीवन का पर्याय है, पर उसी जल के जीवन के लिए सार्थक हस्तक्षेप से जी चुराने की आदत से बाज़ नहीं आते हैं। हम मानते हैं जरूर कि जल के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है,  हम जानते हैं कि जल हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल करते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि बेतरतीब इस्तेमाल का बेइन्तिहां हक़ हमें किसी ने नहीं दिया है। हम जल का दोहन करना तो जानते  है, किन्तु उसके संरक्षण में हमारी रूचि जवाब देने लगती है। हम यह भी जानते हैं कि कुछ घंटे या कुछ दिनों तक भूखे तो रहा जा सकता सकता है, पर पानी पिए बगैर कुछ दिनों के बाद जीना भी मुमकिन नहीं है…

पहचानें इन पागलों को - डॉ. दीपक आचार्य

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पागलों के बारे में कहा जाता है कि हर युग के अनुरूप पागलों का जन्म होता रहता है जो अपनी युगानुकूल अजीबोगरीब हरकतों के कारण उस युग में चर्चित रहते हैं।  पागलों की कुछ किस्में ऎसी होती हैं जो कि हर क्षेत्र में समान रूप से पायी जाती हैं और इस किस्म के पागलों की संख्या दूसरे सारे पागलों से अधिक हुआ करती है। वर्तमान युग में पागलों की एक उम्दा किस्म है जिसे हम लोग रोजाना देखते और भुगतते हैं। खासकर हर शहर में इन पागलों की आजकल भरमार है। और बड़ी बात यह कि ये सारे पागल अमीरों और अभिजात्यों की औलादें हैं।  शहरों में लोग अब चोर-उचक्कों, घोषित पागलों और मच्छरों से उतने परेशान नहीं हैं जितने इन पागलों से। दिन हो या रात, इन पागलों को लगता है जैसे कोई काम ही नहीं है।  बहुधा ये पागल समूहों में ही रहते हैं और सरे राह धींगामस्ती मचाते रहते हैं। पिछले कुछ समय से शहरों में बाइकर्स की जबर्दस्त धमाल मच रही है। कोई सा रास्ता हो बाइकर्स तेज रफ्तार में सरपट भागते रहते हैं जैसे कि कोई विश्वस्तर की बाईकर्स दौड़ हो रही हो और ये लाडसाहब बहुत बड़ा पुरस्कार जीतने ही जा रहे हों। इस तरह बाइक भगाते हुए जाते हैं जैसे यह …

रचना और रचनाकार (१२) / नए पथ और नई दिशा के अन्वेषी - धर्मवीर भारती / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1950 में बी.ए.(प्रथम-वर्ष) में दाख़िला लिया था. 1949 में धर्मवीर भारती का उपन्यास “गुनाहों का देवता” प्रकाशित हो चुका था और उसकी गूंज इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उन दिनों स्पष्ट सुनी जा सकती थी. मेरा विषय हिंदी नहीं था. लेकिन “गुनाहों का देवता” की चर्चा ने मुझे इस उपन्यास को पढ़ने के लिए मानों बाध्य ही कर दिया था. ज़ाहिर है मैं उन दिनों किशोर वय की आख़िरी सीढियां पार कर रहा था. ऐसे में यह उपन्यास मेरे मन को छू गया. उसकी रूमानी भावुकता मेरे दिलो-दिमाग़ पर छा गई. धर्मवीर भारती से इस उपन्यास के ज़रिए मेरा प्रथम परिचय हुआ. इस उपन्यास ने भारती को एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था. लेकिन आज जब धर्मवीर भारती का ज़िक्र होता है तो उनकी छबि साप्ताहिक पत्रिका, “धर्मयुग” के सम्पादक के रूप में मानो उनके हर क़दम को पीछे ढकेलती हुई सी सामने आती है. एक समय ऐसा भी आया था जब धर्मवीर भारती और “धर्मयुग” एक दूसरे से इतने जुड़े हुए थे कि धर्मयुग धर्मवीर भारती हो गया था और स्वयं धर्मवीर भारती साक्षात धर्मयुग बन गए थे. मज़े की बात तो यह है कि धर्मवीर भारती “धर्मयुग” में इस…

यही है रहस्य सुख-दुःख का - डॉ. दीपक आचार्य

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सब लोग सुख चाहते हैं, दुःखी रहना कोई नहीं चाहता। लेकिन जो पूर्वजन्मार्जित पाप-पुण्य हैं वे दुःख और सुख के रूप में आते-जाते रहते हैं। नियति के इस चक्र से कोई नहीं बच सकता।  असल में न कोई सुख है, न कोई दुःख। यह मन की अवस्थाएं हैं जो किसी के लिए अनुकूल हुआ करती हैं और किसी के लिए प्रतिकूल।  मनुष्य इन्हें अनुभव करने की शैली में बदलाव ले आए तो उसे सुख में भी समत्व भाव के साथ आनंद का अहसास होगा और दुःख में भी कष्ट न होगा। अपने मन की दशा को आत्म नियंत्रित किया जाकर दुःखों के अस्तित्व के बावजूद इनका आनंद पाया जा सकता है। यह कला जो सीख जाता है वह सुख और दुःख से ऊपर उठकर आनंद भाव को प्राप्त कर लेता है। वस्तुतः भगवान की पूजा-उपासना और साधना, प्रार्थना आदि सब कुछ किसी सुख या दुःख को न्यूनाधिक नहीं करते, वे अपने परिमाण में उपस्थित रहते हैं लेकिन इनका अनुभव सभी लोग अलग-अलग प्रकार से करते हैं। कोई दुःखों को गहन और व्यापकता देता हुआ दुखी होता है, कोई इसे हल्के में लेता है। इसी प्रकार सुख की स्थिति है। अधिकांश लोग सुख की अवस्था में बौरा जाते हैं, जोश में होश खो बैठते हैं और इसे ही जीवन का सत्य मान कर…

आया लोकगीतों और जसगीतों का पर्व / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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चैत्र नवरात्रि पर विशेष हिंदी मास चैत सुदी एकम हिंदू धर्मावलंबियों को अनेक पर्वों से जोड़ देती है। इस तिथि से हिंदी नव संवत्सर का प्रारंभ होता है। आदिशक्ति मां अंबे के नवरात्रों का भी यह प्रथम दिवस होता है। एक ओर जहां हम धर्म कर्म से जुड़ते है, वहीं दूसरी ओर नया वर्ष हमें नई ऊर्जा और संचार प्रदान करने वाला होता है। देवी मंदिरों से लेकर घरों तक में ज्योत जवारों की स्थापना जीवन में नये प्रकाश का संचरण कर जाते है। मां के उपासकों द्वारा 9 दिन की कठिन साधना वाला यह पर्व लोकगीतों और गीतकारों के लिए नई रचना के रूप में साहित्य के विकास को भी पर लगाने वाला होता है। देवी जस गीतों को झूम कर गाने की विधा उन लोगों के लिए नई प्रेरणा लेकर आता है, जो इस गीत से अछूते हुए है। यदि धार्मिक भावनाओं को देखना और समझना हो तो नवरात्र पर्व से बढक़र कोई दूसरा पर्व नहीं। मां पर अपार श्रद्धा रखने वाले भक्तों की अलग-अलग तरह की भक्ति अन्य लोगों को भाव विभोर कर जाती है। वर्ष में दो बार क्वांर एवं चैत्र माह में आने वाले नवरात्रों में जसगीतों के माध्यम से देवी आराधना विशेष गायन शैली एवं वाद्य कला का बेजोड़ नमुना मानी …

प्राची - मार्च 2016 - काव्य जगत

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फॉसिल अविनाश ब्यौहार
बालाई आमदनी
से उन्होंने
सब कुछ
कर लिया
हासिल...!
आगामी समय
में हमें
देखने को
मिलेंगे ईमान
के फॉसिल....!
सम्पर्कः 86, रायल स्टेट कॉलोनी,
माढ़ोताल, कटंगी रोड, जबलपुर-482002
मोः 982679537200000000000000धर्मेन्द्र गुप्त ‘साहिल’ की गजलें
1
तेरा अहसास पत्थर हो गया है.
सुना है तू भी हिटलर हो गया है. लिखा हर ईंट पर है नाम जिसका,
वो कैसे घर से बेघर हो गया है.कहीं तो आग पानी हो गयी है,
कहीं तो फूल पत्थर हो गया है.भटकता था जो आवारा-सा कल तक,
समय का वो सिकन्दर हो गया है.दिये हैं आज को दुख-दर्द तो क्या,
हमारा कल तो बेहतर हो गया है.
2
क्या मिलें इस शहर में किसी से.
कोई मिलता नहीं सादगी से.इस सदी ने दिये जख्म इतने,
बदगुमां हूं मैं अगली सदी से.सीख पाये कहां कुछ अभी तक,
पेड़-बादल-हवा-चांदनी से.घर दिवाली में मेरा जला यूं,
डर-सा लगने लगा रोशनी से.कितने जीवन सुलगने लगे हैं,
जिन्दगी जब मिली जिन्दगी से.हम बयां कर न पायेंगे उसको,
जो मिला है हमें शायरी से.
सम्पर्कः के, 3/10ए, मां शीतला भवन, गायघाट, वाराणसी-221001
मोः  8935065229
00000000000000000000डॉ. अशोक गुलशन की काव्य रचनाएंहोली पर एक गीत
जबसे दूर हुए त…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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