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हिंदी में हाइकु – हाइकु 2002 / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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हिंदी में हाइकु-लेखन इधर काफी मात्रा में हुआ है. इसमें बहुत-कुछ निरर्थक और कविता विहीन भी है. पर इसका यह अर्थ नहीं है कि हिंदी हाइकु का सम्पूर्ण लेखन ही खारिज कर दिया जाए. हिंदी की हाइकु रचनाओं में नए प्रयोग, नए विषय और नई शैलियां भी विकसित हुई हैं. उदाहरण के लिए हाइकु मूल रूप से एक अतुकांत कविता है, किंतु हिंदी में अधिकतर हाइकु तुकांत हैं. कभी यह तुक प्रथम और द्वितीय पंक्ति में होती है तो कभी द्वितीय और त्रितीय में. कभी-कभी प्रथम और त्रितीय पंक्ति को तुकांत किया जाता है. इसी प्रकार हाइकु के मान्य विषय प्रकृति–चित्रण और दार्शनिक-सोच हैं. हिंदी में भी प्रकृति-चित्रण हुआ है और हाइकु रचनाओं में दार्शनिक विचारों को भी अभिव्यक्ति मिली है. अनेक हाइकु निश्चित ही विचारोत्तेजक हैं. यदि जापानी हाइकु ज़ेन दर्शन को उद्घाटित करते हैं तो हिंदी में वेदांत, बौद्ध और यहां तक कि जैन-दर्शन को भी अभिव्यक्त्ति मिली है. इंदौर से प्रकाशित होने वाले ‘तीर्थंकर’ में जैन-सूक्तियां (श्रमण हाइकु) धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुए हैं. पर हिंदी हाइकुकार मुलतः अपने सामाजिक परिवेश और उसकी विडम्बनाओं से निकट से जुड़ा हुआ ह…

व्यंग्य / एक सरकारी पर्यावरण प्रेम / अशोक गौतम

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ऑफिस के कुटेशन के नए नवेले कूलर ने जब दूसरे दिन ही गर्मी के आगे आत्मसमर्पण कर सूरज से अधिक आग उगलनी शुरू की तो उन्हें एकाएक याद आया कि पर्यावरण सच्ची को संकट में है। इसकी रक्षा होनी चाहिए। हर हाल में होनी चाहिए। दिमाग में इधर आइडिया कौंधा उधर उसको व्यवहारिक रूप देने के लिए एक और फाइल ने मुंह सुरसा सा खोला। साहब होने ही ऐसे चाहिएं। काम के बहाने खाने के एक्शन लेने में कोई कोताही नहीं। जनता के कामों में कोताही हो तो होती रहे। लंबी सांस ले साहब ने बड़े बाबू को बुलाया और उनके कुर्सी पर बैठने से पहले ही आदेश दिया,' सुनिए पुजारी जी! हम कल पर्यावरण दिवस मनना चाहते हैं। कमेटियां तुरंत बनाई जाएं।' ' पर सर! इस साल का पर्यावरण दिवस तो मनाया जा चुका है। उसके लिए जो बजट आया था उसका यूसी तक पर्यावरण मंत्रालय को भेजा जा चुका है। अब तो इसे मनाने के लिए हमारे पास बजट नहीं है, ऐसे में....,' कह उन्होंने अपने हाथ में लिए पेन को कुतरना शुरू किया तो साहब ने पचास साल के को ऐसे समझाते कहा जैसे वे अपने छोटे बच्चों को कभी समझाया करते थे ,' अरे पुजारी बाबू! इतने साल हो गए तुम्हें सरकारी नौकरी …

घड़ी की टिकटिक / गोवर्धन यादव

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रफ़्तार घडी की. समय कभी किसी के लिए नहीं रुकता. वह चलता रहता है निरन्तर. हालांकि मानव ने प्रागैतिहासिक युग से ही उसकी नाक में नकेल डालने की कोशिशें शुरु कर दी थी. दिन-रात की अजीब गुत्थी जब उसके मस्तिस्क में प्रश्न लेकर खड़ी हुई तो उसने सूर्य-चंद्रमा और तारों से दोस्ती की. समय की यात्रा को नापने के लिए उसने अकल दौड़ाई, साथ ही मौसम, महिनों और वर्षों को पढ़ने की कोशिश की. पहले सूर्य की परछाई से दिनों को दो भागों में बांट कर समय को पढ़ने की पहल की. फ़िर 3500 ईसा पूर्व दिन को दोपहर व शाम से नापा जाने लगा. इसमें सूर्यचक्र घड़ियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 100 से 500 ईसवीं तक पानी की घड़ियों का विकास हुआ, जो कुछ हद तक समय को ठीक –ठीक पढ़ने में सक्षम थीं. 1088 ईसवीं में “क्लाक टावर” घड़ियां देखी गईं, जो पानी की घड़ी और मशीनरी का मिला जुला रुप थी, पर अभी भी समय को सही-सही पढना बाकी था. जैसे-जैसे विकास होता गया मनुष्य भी मौसम, साल ,महीने, दिन, और समय के एक-एक पल को अलग करता गया. समय को नियंत्रित करने की इसी चाहत ने घड़ी के आविष्कार को जन्म दिया. 16 वीं शताब्दी से पहले घड़ियों को एक से दूसरी जगह ले जाना स…

कृष्णा मुंशी / मधुरिमा प्रसाद

१५ - कृष्णा मुंशी कुछ ऐसे भी सत्य होते हैं जो सीधी नज़रों से देखने पर तो व्यंग्यात्मक लगते हैं ज़माने को हंसी का मसाला देते हुए दिखलायी पड़ते हैं लेकिन उस मज़ाकिया तस्वीर के पीछे छिपा हुआ उनका दर्द वही देख पाता है जो संवेदनशील हो कर उसकी तलहटी तक झांकने का प्रयास करता है। सड़क पर घूमती उस विक्षिप्त काया को देख कर ऐसा ही कहने का मन होता था जिसे बच्चे तो बच्चे बड़े भी छेड़ने से बाज़ नहीं आते थे। बहुत पहले की बात है एक नामी-गिरामी एडवोकेट थे श्री राजनारायण पण्डे। मुवक्किलों के मसीहा कहे जाते थे वे अपने ज़माने में। मुक़दमा तो ईमानदारी से लड़ते ही थे साथ ही मुवक्किलों की हर तरह से मदद भी करते थे। शहर से बाहर के जो केस आते, उनके रहने खाने की व्यवस्था भी अपने स्तर से वे स्वयं करवाया करते थे अपने ही निवास पर, जिसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क भी नहीं लिया जाता था। कभी-कभी तो किसी मुवक्किल के पास पैसे न होने पर फीस भी छोड़ देते थे। ईमानदारी की कमाई से भगवान ने उन्हें भरपूर सम्पदा दे रखी थी। हर दृष्टिकोण से सम्पन्न थे वक़ील साहब। वो कहावत है न ---बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभानल्लाह।  वकील साहब का एक मुं…

प्रेमचंद युग में खींच ले जाती कहानियाँ –सिन्धी कहानियाँ

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१९-१२-२०१४ की शाम रशियन कल्चरल सेंटर दिल्ली में सुश्री उर्मिल के कार्यक्रम में देवी नागरानी जी से भेंट हुई थी । उस दिन आपने उपरोक्त पुस्तक मुझे भेंट की थी । उपरोक्त पुस्तक में सिंधी से अनूदित कहानियों को पढ़कर लगता ही नहीं कि हम अनुवादित कहानियों को पढ़ रहे हैं। किसी अन्य भाषा की कहानी या कविता को किसी दूसरी भाषा में विशेष कर हिंदी में अनुवाद करना एक दुरूह कार्य है । यों तो अनेक लेखक अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हैं लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या किया गया अनुवाद मूल का भाव , बिम्ब ,कथ्य और प्रभाव और प्रवाह समेट पाया है ? लेकिन आपके द्वारा इन सिंधी कहानियों को हिंदी भाषियों को उपलब्ध कराना एक अति प्रशंसनीय कार्य है । कहानियाँ भी ऐसी जो हमें खींच ले जाती हैं प्रेमचंद युग में, कुछ कहानियों का ज़िक्र मैं करना चाहूँगा :-देवी नागरानी
यों तो सिंधी कहानियों का इतिहास काफ़ी पुराना है लेकिन देवी नागरानी ने मौजूदा दौर के नामवर कहानीकारों की ही कहानियाँ अनुवाद के लिये चुनी हैं । पुस्तक की सबसे पहली कहानी " ज़िंदादिली” जिसके मूल लेखक शेख़ अयाज़ हैं, का अनुवाद पढ़ते समय लगता ही नहीं कि हम कोई…

गीता दुबे का कहानी संग्रह - एक फ्रेंड रिक्वेस्ट का लोकार्पण

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मन को स्पर्श करती कथाएँ मंगलवार शाम बिष्टुपुर स्थित सेंटर फॉर एक्सीलेंस में गीता दुबे की पहली कहानी संग्रह 'एक फ्रेंड रिक्वेस्ट' का लोकार्पण मुख्य अतिथि  शहर के वरिष्ठ साहित्यकार डा. सी.भास्कर राव और विशिष्ट अतिथि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित  श्रीमती ताला टुडू ने किया. डा. भास्कर राव ने कहा कि गीता दुबे की कहानियाँ भले ही छोटीं हैं लेकिन वे मन को स्पर्श करतीं हैं. उन्होंने बताया कि कहानी संग्रह की सभी 21 कहानियां डाउन टू अर्थ हैं और समाज के विभिन्न पहलुओं को सामने लाती हैं. उन्होंने इस कहानी संग्रह की एक कहानी 'दूसरी प्लेट क्यूँ' का पाठ कर इसके भावनात्मक पक्ष को सामने रखा. साहित्यकार संध्या सिन्हा ने पुस्तक की समीक्षा की और कहानियों के सैद्धांतिक पक्ष को उजागर किया. उन्होंने बताया कि इन कहानियों में नारी विमर्श के साथ बुजुर्ग लोगों की भावनाओं का भी ध्यान रखा गया है. लेखिका गीता दुबे ने कहा कि सोशल मीडिया ने हमारे जीवन पर काफी असर डाला है, आज की पीढ़ी अपने जीवन में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं चाहती. दो पीढ़ियों के अंतर की टकराहटों को उनकी कहानियां आवाज देती हैं. …

किसी काम के नहीं चिल्लाने-झल्लाने वाले - डॉ. दीपक आचार्य

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पूरी दुनिया के तमाम आदमियों को दो भागों में बांटा जा सकता है। एक वे हैं जो वाकई तल्लीनता से काम करते हैं और चुपचाप अपने कामों में लगे रहते हैं। इनसे किसी को कोई शिकायत नहीं होती।
दूसरे वे हैं जो कोई काम-धाम नहीं करते मगर चिल्लाने और झल्लाने में ही माहिर हैं। ये लोग जिन बाड़ों और परिसरों में होते हैं वहां अपनी मौजूदगी और प्रभाव दिखाने के लिए चिल्लाते रहते हैं। इनका भ्रम होता है कि ऐसा करने से दूसरे लोग दबकर रहते हैं और उनके या उनके कुकर्मों के खिलाफ कोई टिप्पणी करने से भय खाते हैं और इस आदर्श स्थिति का फायदा उठाकर वे अपनी मनमानियां करते रहते हैं। इन लोगों की जिन्दगी और चिल्लाहट दोनों पर्याय और पूरक हो जाते हैं।
ऐसा नहीं कि ये अपने चरागाहों, बाड़ों और गलियारों में ही चिल्लाने के हुनर का पूरी बेशर्मी के साथ खुला प्रदर्शन करते हों, बल्कि इन लोगों के कारण से इनके घर भी सब्जी मण्डी, बस स्टैण्ड या काईन हाउस से कम नहीं लगते। और तो और इनके घर वाले और आस-पड़ोस के लोग तथा मित्र भी इनसे परेशान रहते हैं। केवल इनके जैसे चिल्लपों सम्प्रदाय के लोग ही प्रसन्न रहते हैं जो कि इन्हीं की तरह चिल्ला-चिल्ला कर…

संतुलन रखें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में - डॉ. दीपक आचार्य

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पुरुषार्थ चतुष्टय मनुष्य के जीवन का मूलाधार है और इसी के अनुरूप पूरी जीवन यात्रा चलती है। पुराने जमाने में इंसान की औसत आयु सौ वर्ष मान कर उसी के अनुरूप जीवन को आयु के अनुरूप चार भागों में 25-25 वर्ष के लिए विभक्त किया गया था। इसी के अनुरूप आश्रमों का निर्धारण था। ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम। इसी प्रकार पुरुषार्थ चतुष्टय भी मानव जीवन की मर्यादापूर्ण परिधियों का अहम अंग रहा है। हर व्यक्ति का जीवन यदि इन चार स्तंभों पर केन्दि्रत और अनुशासित रहे तो कोई कारण नहीं कि हम जीवन के सभी लक्ष्यों में सफलता हासिल न कर पाएं। यही पुरुषार्थ चतुष्टय यानि की धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जीवन को ऊँचाइयां देने का आधार है। इन आधारशिलाओं पर दृढ़ रहकर कर्म किया जाए तो इंसान के लिए वह सब कुछ प्राप्य हो सकता है जो कि इच्छित होता है। आश्रमों के अनुरूप जीवनयापन कर पाना आज के जमाने में कठिन कार्य है लेकिन पुरुषार्थ चतुष्टय को अपनाया जाए तो कई समस्याओं, विपदाओं, तनावों और सम सामयिक अवरोधों से दूर रहा जा सकता है। आम आदमी की तमाम समस्याओं और तनावों, मानसिक एवं शारीरिक बीमारियों का …

सम्मान नहीं, दण्ड दें - डॉ. दीपक आचार्य

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सामाजिक परिवर्तन और समग्र राष्ट्रीय उत्थान के लिए पुरस्कार, सम्मान और अभिनंदन अपनी जगह हैं और इनसे उन लोगों को प्रोत्साहन प्राप्त होता है जो कि सच्चे मन से अपने कर्म के प्रति वफादार होकर समर्पित कार्य करते हैं, समाज और देश के लिए जीने का माद्दा रखकर निष्काम कर्म करते हैं। इन लोगों को सम्मानित करने से सामाजिक महापरिवर्तन को सुखद एवं उपलब्धि-मूलक बनाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए सर्वोपरि अनिवार्य शर्त यह है कि जिसे पुरस्कृत और सम्मानित किया जा रहा है वह पात्रता की तमाम कसौटियों पर खरा उतरा हुआ हो, और जिसे सम्मानित करने के बाद समाज और श्रेष्ठीजनों से साधुवाद और आभार प्राप्त हो। जहाँ कहीं ऎसा होता है वहाँ सम्मान, अभिनंदन और पुरस्कार अपना बेहतरीन प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन वर्तमान दौर में ऎसा सभी जगह हो ही, यह संभव नहीं लगता। कुछ लोग सभी जगह ऎसे होते हैं जो केवल पुरस्कारों और सम्मानों की प्राप्ति की दौड़ में रमे रहते हैं। इन लोगों की कर्म की बुनियाद से कहीं अधिक मजबूत होती है स्टंट और मैनेज करने की नींव। बहुत से लोग ऎसे दिख जाएंगे जिनके बारे में कहा जाता है कि ये कई-कई बार पुरस्कृत और सम्मान…

हिंदी में हाइकु (२) : स्वरूप और सम्भावनाएं / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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जापानी काव्य की एक विधा है- हाइकु. यह शायद संसार में लघुतम कविता का रूप है. प्रसिद्ध जापानी हाइकुकार यशुदा ने इसे ‘एक श्वासी कविता’ कहा है. हाइकु में कोई एक भाव या विचार या अनुभूति अभिव्यक्ति पाती है. अतः इसे मुक्तक काव्य की श्रेणी में रखा जा सकता है. हाइकु एक त्रिपदी है. तीन पंक्तियों की भावोन्मेशित कविता है. लेकिन हर तीन पंक्ति की ककिता को हाइकु नहीं कहा जा सकता. इन तीन पंक्तियों का भी एक अनुशासन है. इनमें से प्रथम पंक्ति 5 द्वितीय 7 और त्रितीय भी प्रथम की तरह 5 अक्षरों की होती है. हिंदी हाइकु ने अब इस अनुशासन को लगभग स्वीकार कर लिया है. यह अनुशासन जापानी हाइकु रचनाओं के कलेवर से सर्वाधिक मेल खाता हुआ भी है, इस विधान में एक ध्वनि-तरंग सी उठती है जो हाइकु को एक प्रकार की लय से समृद्ध करती है. बेशक हाइकु अतुकांत होता है, लेकिन उसमें जो एक लय होती है वह हाइकु को एक अतिरिक्त सौंदर्य प्रदान करती है. हाइकु में कृत्रिमता नहीं होती, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि वह सपट-बयानी से ग्रस्त है. एक अच्छे हाइकु में जो कहा गया है उससे अधिक अनकहा रह जाता है. सतही तौर पर हाइकु का जो कथ्य है प्रायः अप…

ईबुक - साहित्यिक पत्रिका संवेदन

स्तरीय साहित्यिक पत्रिका संवेदन का  अंक पढ़ें नीचे दिए गए विंडो पर. पुस्तक प्रकट होने में थोड़ा समय लगेगा, अतः कृपया धैर्य बनाए रखें और इंतजार करें. आर्काइव.ऑर्ग पर आप इसका पीडीएफ डाउनलोड लिंक लेकर उसे डाउनलोड कर भी पढ़ सकते हैं.

काव्य संग्रह / सौरभ / श्रीप्रकाश

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सौरभश्रीप्रकाशकाव्य संग्रहप्रकाशक / लेखक की अनुमति के बिना इस पुस्तक को या इसके अंश को संक्षिप्त, परिवर्धित कर प्रकाशित करना या फ़िल्म आदि बनाना कानूनी अपराध है । प्रकाशक :अंजुमन प्रकाशन९४२, आर्य कन्या चौराहामुठ्ठीगंज, इलाहाबाद - २११००३उत्तर प्रदेश, भारतपुरोवाककविता कवि की मानसी सृष्टि है जिसके माध्यम से कवि अपनी व्यापक सोच एवं कल्पनाशक्ति के सहारे ऐसा रचना संसार सृजित करता है जो जनमानस को लोकोत्तर आनंद की अनुभूति कराती है । इतना ही नहीं इसके अनुशीलन से व्यक्ति की वैचारिक एवं चारित्रिक शक्ति को उत्कर्ष भी प्राप्त होता है फलस्वरूप समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना होती है साथ ही समरसता, सदाचार, सद्भावना, त्याग एवं परोपकार को बल मिलता है । समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की विद्रूपताओं, विसंगतियों, असमानताओं एवं देश एवं समाज को हानि पहुँचाने वाली अनेक प्रकार की परिस्थितिजन्य समस्याओं के प्रति प्रबल विरोध भी कवि के इस रचना संसार में दृष्टिगोचर होता है । काव्य सृजन की शक्ति ईश्वर प्रदत्त होती है यह मात्र उसी व्यक्ति को प्राप्त होती है जिसपर माँ वीणापाणि की असीम अनुकम्पा होती है कविवर श्रीप्रक…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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