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व्यंग्य-राग (१०) फीतों के रंग / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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(पूर्वाभास में प्रकाशित – २७.३.१६) फीतों के रंग जूतों के हिसाब से बदलते रहते हैं. काले जूतों में काला फीता ही फबता है. ब्राउन जूते में ब्राउन फीता ही डाला जाता है. किरमिच के स्पोर्ट्स जूते प्राय: सफ़ेद और पीले रंग के होते हैं, उनमें, ज़ाहिर है क्रमश: सफ़ेद और पीले फीते पड़ते हैं. किस्सा कोताह, जिस रंग का जूता उसी रंग का फीता. असल बात मैचिंग की है. जूते और फीते की यह मैचिंग साड़ी के फ़ाल की तरह कठिन तो नहीं होती, लेकिन उसी की तरह ज़रूरी तो होती ही है. दफ्तर के लिए मैं तैयार हो रहा था. जैसे ही जूता कसने लगा की फीता टूट गया. मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ कि मुझमें इतनी ताकत कहाँ से आ गई कि वह जूते के फीते जैसी मज़बूत चीज़ तोड़ दे. ऐसा होना तो नहीं चाहिए. अत: मैंने अनुमान लगाया कि हो न हो इस्तेमाल से फीता ही कमजोर पड़ गया होगा. मुझे दफ्तर जाना था सो इस मुद्दे पर सोच विचार ज्यादह नहीं कर सकता था. तात्कालिक समस्या यह थी कि दूसरा काला फीता कहाँ से आए कि उसे डाल कर जूता पहन लिया जाए. मरता क्या न करता, फटे-पुराने ब्राउन जूतों में से ब्राउन रंग का एक फीता निकाला गया और उसी को काले जूते में पिरो कर काम चलाया गया. द…

हमसे तो पशु अच्छे हैं - डॉ. दीपक आचार्य

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9413306077 www.drdeepakacharya.comहम इंसान हैं या पशु, हममें इंसान के कौनसे गुण हैं और पशुओं से हमारी कितनी समानता है?  कभी फुरसत पाकर इस बात पर थोड़ी गंभीरता के साथ हम चिन्तन कर लें और इंसानों की तुलना पशुओं से करने लगें तो पता चलेगा कि आजकल के इंसानों की तुलना में पशु लाख गुना अच्छे हैं। हम जिस दैनिक जीवनचर्या, परंपराओं, आदर्शों और सिद्धान्तों की बात करते हैं उन मामलों में पशु इंसानों से कहीं अधिक श्रेष्ठ दिखते और अनुभवित होते हैं। दैनंदिन जीवन की ही बात कर लें तो पशुओं का रोजाना का पूरी तरह क्रम निर्धारित बना हुआ है। पशुओं में न बेवक्त खान-पान है, न अनावश्यक जागरण, और न ही हमारी तरह वे वृत्तियां जो हमें भोग-विलास और आरामतलबी की ओर प्रवृत्त करने लगी हैं। पशुओं का शयन और जागरण निर्धारित है। बेवक्त वे न बोलते हैं न भ्रमण करते हैं। उनके अपने कोई गुट नहीं हैं, न ऎसे संगठन हैं जहां अहो रूप -अहो ध्वनि का माहौल हो। खान-पान के मामले में भी पशु हमसे लाख दर्जा अच्छे हैं। शहर की आबोहवा और इंसानों की झूठन खा-खा कर आवारा हो गए जानवरों की बात हम नहीं कर रहे हैं बल्कि उन पशुओं की बात कर रहे हैं जो…

अंतहीन / कहानी / अपर्णा शर्मा

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आनंद वर्मा बॉस के साथ कुछ जरूरी बातों में उलझे थे। तभी उनके मोबाइल की घंटी बजी। जेब से मोबाइल निकाल कर बगैर नम्बर देखे ही स्विच ऑफ कर दिया। दो घंटे बाद दफ्तर से निकल कर मोबाइल देखा तो उनके दोस्त विजय की तीन मिस्ट कॉल थी। वो अभी फोन मिलाते कि विजय ने फिर फोन किया- “हैलो, आनंद, भाई, इतना स्विच ऑफ क्यों रखते हो? मैं पिछले दो घंटे से बराबर ट्राई कर रहा हूँ।” “हाँ बोलो क्या बात है?” “आज शाम का क्या कार्यक्रम है ?” “कुछ विशेष नहीं।” “ठीक है तब आज रात का खाना तुम लोग हमारे साथ लोगे। ऋतु बहुत दिनों से कह रही है।” “नहीं भाई शान्ति कहीं जाना नहीं चाहती। मैं कोई वादा नहीं कर सकता।” “भाभीजी से मैं खुद बात कर लूंगा। तुम बस समय से घर पहुँच जाओ।” “ठीक है।” आनंद ने मोबाइल जेब में रख लिया। तभी बस आई और वह उसमें सवार हो गया। खिड़की के पास वाली सीट ले बैठ गया और बस के अंदर के माहौल से निर्लिप्त हो बाहर देखने लगा। बस ने शीघ्र ही रफ्तार पकड़ ली और आनंद के विचारों ने भी। ठीक एक साल पहले का घर का खुशहाल माहौल उसकी नजरों में घूम गया। हँसते खेलते बच्चे और सदा गुनगुनाती मुस्कुराती बीवी। उसे सब याद आने लगा। परन्त…

हथियार की तरह हो रहा तारीफ का इस्तेमाल - डॉ. दीपक आचार्य

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9413306077 www.drdeepakacharya.comवो जमाना चला गया जब किसी को नेस्तनाबूद करना हो तो अस्त्र-शस्त्र जरूरी हुआ करते थे। अब पूरी दुनिया नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ आदमी का मानसिक कवच इतना अधिक कोमल और मक्खनिया हो गया है कि मामूली आघात तक को सहन कर पाने की स्थिति में नहीं है। इसके कई सारे कारण भी हैं।  आदमी कम समय में पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर लेना चाहता है, जितना अधिक हो सके अपने नाम करवा लेना चाहता है और चाहता है कि वह रातों रात बहुत बड़ा बादशाह या वैभवशाली बन जाए, चाहे इसके लिए उसे किसी भी तरह का शोर्ट कट या अवैध मार्ग क्यों न अपनाना पड़े। और यही कारण है कि नाजायज रास्तों से सब कुछ पा जाने की दौड़ में आगे बढ़ने की जद्दोजहद में आदमी आत्मविश्वासहीन हो गया है, आत्मा की मौलिक ताकत खो चुका है। और इस सबका असर ये हो रहा है कि उसके संकल्पों और सिद्धान्तों का ह्रास होता जा रहा है। यही कारण है कि आदमी छोटी सी अनचाही पर व्यथित हो जाता है, आपा खो बैठता है और वैसी हरकतें करने लगता है जो आदमी को शोभा नहीं देती। आदमी की इस कमजोर मनःस्थिति के कारण उसके उन्मूलन और विनाश के लिए अब किसी हथि…

जड़ों से कटती पत्रकारिता की भाषा - वीणा भाटिया

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एक समय था जब लोग कहते थे कि भाषा सीखनी हो तो अखबार पढ़ो। लेकिन आज एकाध अपवाद को छोड़ दें तो अधिकांश अखबारों में जो भाषा इस्तेमाल में लाई जा रही है, वह पूरी तरह जड़ों से कटी हुई है। अखबारों से भाषा सीखना आज संभव नहीं रह गया है। अखबारों की भाषा लगातार विकृत होती चली जा रही है। ऐसा लगता है, अखबारों के प्रबन्धन पर बाजारवाद इस कदर हावी हो गया है कि वे भाषा के साथ खिलवाड़ पर उतर आए हैं। भूलना नहीं होगा कि हिंदी के विकास में पत्रकारिता की बहुत बड़ी भूमिका रही है। आधुनिक हिंदी के निर्माता कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जिस पत्रकारिता की शुरुआत की, वह जन आकांक्षाओं और स्वातंत्र्य चेतना से जुड़ी हुई थी। यद्यपि उस समय हिंदी का वर्तमान स्वरूप बन नहीं पाया था, पर उसकी नींव भारतेंदु एवं उनके मंडल में शामिल लेखकों-पत्रकारों ने डाल दी थी। उस नींव पर हिंदी पत्रकारिता में एक ऐसी भाषा विकसित हुई जिसमें वह ताकत थी कि वह गंभीर से गंभीर मुद्दों को सहजता के साथ अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम थी। हिंदी का सहज जातीय रूप अखबारों के माध्यम से सामने आया और आम लोगों तक इसकी पहुंच बनी। यह भाषा सर्वग्राह्य भी हु…

व्यंग्य राग (९) बटन दबा – सीटी बजा / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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साहित्यकार तो थे ही, वे भाषण-वीर भी थे | पदानुसार भी वे व्याख्याता ही थे | कम्प्यूटर और इंटरनेट विषय पर उनका व्याख्यान चल रहा था | बोले, आज कम्प्यूटर ने आम आदमी को भी साहित्यकार बना दिया है | जिसे देखो कविता करने लगा है, किसी भी बात पर अपना विरोध दर्ज करने के लिए अपनी सटीक टिप्पणियाँ वाट्सएप और फेसबुक पर डालने लगा है | अभी तक सामान्य जन केवल मौखिक रूप से स्थितियों और लोगों पर तंज कसते थे, अब ‘ब्लोग’ पर व्यंग्य लिखने लगे हैं | ये एक बड़ी भारी साहित्यिक क्रान्ति हुई है | एक मनचला विद्यार्थी हाथ उठाकर खडा हो गया. कहने लगा सच तो यह है सर, आज कम्प्यूटर की दुनिया लम्बा चौड़ा भाषण देने और बड़े बड़े निबंध लिखने के लिए भी हतोत्साहित करती है. अपनी बात थोड़े में और सटीक कहिए और चलते बनिए| बात अच्छी लगे तो “लाइक” का बटन दबाइए और आगे बढ़ जाइए | न अच्छी लगे तो चुप रहिए | मन करे तो अपनी व्यंग्य की भड़ास निकालने के लिए उस पर भी “लाइक” का ही बटन दबा दीजिए | कौन देखता है ! इसमे संदेह नहीं, बड़ी विचित्र है कम्प्यूटर की दुनिया | इसमें कुछ भी आभासित हो सकता है | पूरी दुनिया ही आभासी है | सच झूठ लगता है और झूठ सच…

शोध व अन्य लघुकथाएँ / दिलीप भाटिया

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चरित्र
    संस्कार शाला के प्रधान बोले, ''देखिए, हमारे गुरूजी ने यह चरित्र निर्माण की पुस्तक लिखी है, आप को इसी पुस्तक में से बच्चों को समझाना होगा, अलग से अपना ज्ञान नहीं बखानेंगे'' प्रशिक्षु जयन्त ने विनम्रता से कहा, ''श्रीमान चरित्र तो हममें ही नहीं है, मात्र भाषण देने से क्या होगा? मैं तो इन बच्चों की आदतें सही कर पाया, सही रास्ते पर जीवन जीने के नियम बतला पाया, यही बहुत होगा।''
विधवा
    संजना बोली, ''मम्मीजी, करवा चौथ की पूजा करवाइए ना'' मम्मीजी बोली, ''बहू में पूजा में कैसे बैठ सकती हूँ, अपशकुन होगा'' संजना बोली, ''नहीं मम्मीजी, मां मां होती है, न सुहागन, न विधवा, करवा चौथ की पूजा में अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद तो मैं आप से ही लूंगी, पुरानी सोच छोड़िए मम्मीजी, जल्दी आइए पूजा में'' भीगी पलकों से मम्मीजी संजना की पूजा करवा रहीं थीं।
स्नेह
    पांच वर्षीया नन्ही गुड़िया मम्मी से पूछती, ''मम्मी, आशीष अंकल हमेशा मेरे लिए चाकलेट गिफ्ट लेकर आते हैं, मैं उनके लिए क्या कर सकती हूँ?'' मम्मी बोली, '…

ऋतुराज सिंह कौल की चित्र कविताएँ

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ऋतुराज सिंह वास्तविक बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं. आप कमाल की चित्रकारी करते हैं, कमाल का कार्टून बनाते हैं और कमाल की कविताएँ लिखते हैं. लघु व्यंग्य भी धमाकेदार लिखते हैं. इनके फ़ेसबुक वाल (https://www.facebook.com/rituraj.singhkaul) से साभार कुछ चित्र कविताएँ: जख़्म का नमकीन होना गरजती धूप आँखों का पानीतुम्हारी आँखों का पानी मर गया
इसलिए नज़र फेर लेता हूँ
की जब नज़र मिले तो
तुम शर्मिंदा न हो गर्दन तोड़ लेता है भूख ठूंसता हूँ जहर बो दूं मैं किसान हूँ पानी खरोंचता हूँ मैं

लाइव कहानी पाठ - नकलची बंदर व अन्य कहानियाँ - उषा छाबड़ा

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उषा छाबड़ा ने बच्चों के लिए तथा अन्य कथा कहानियाँ व सामग्री के  बहुत से वीडियो व ऑडियो यूट्यूब व साउंडक्लाउड में अपलोड किए हैं. बेहद प्रोफ़ेशनल गुणवत्ता और मनोरंजक तरीके से ये तैयार किए गए हैं. जिसके लिए वे बधाई की पात्र हैं.उनके द्वारा एक कहानी नकलची बंदर का पाठ आप नीचे दिए यूट्यूब वीडियो से देख सुन सकते हैं -अन्य कहानियाँ देखने सुनने के लिए उषा छाबड़ा के यूट्यूब चैनल पर जाएँ. इनके यूट्यूब चैनल की लिंक  है -https://www.youtube.com/channel/UC6pf777vk_qQ7iU6qqzGWWAऑडियो में भी बहुत सी सामग्री है, जिन्हें सुनना चाहें तो इस कड़ी पर जाएँ -http://www.ushachhabra.com/Portfolio/

किसी के नहीं होते मुद्राभक्षी भिखारी - डॉ. दीपक आचार्य

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9413306077 www.drdeepakacharya.comजानवरों के बारे में कहा जाता है कि जिसके मुँह खून लग जाता है वह फिर उसे कभी छोड़ता नहीं, उसके जीवन का लक्ष्य ही खून का चस्का होकर रह जाता है। कुत्ता एक बार पागल होकर किसी को काट खाता है, उसके बाद वह मरते दम तक पागल ही बना रहता है जब तक कि वह खुद न मर जाए या कोई मार न डाले। बाघ भी जब किसी इंसान का खून पी लेता है फिर उसे दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता, वह एक के बाद एक इंसान का शिकार करता ही रहता है और उसकी गति-मुक्ति फिर दूसरे लोगों को ही करनी पड़ती है। न कुत्तों का पागलपन  दूर किया जा सकता है, न नरभक्षी शेरों की आदत को कभी नहीं छुड़वाया जा सकता। वह तो खून पियेगा ही। आदमी भी काफी हद तक ऎसा ही होता जा रहा है।  कोई भूखा-प्यासा और दीन-हीन भीख मांगे तो बात समझ में आती है लेकिन ऎसे-ऎसे लोग भीख मांग रहे हैं जिन्हें किसी चीज की कोई आवश्यकता नहीं है। केवल एक ही धुन सवार है और वह है दौलत जमा करने की। यह अलग बात है कि ये लोग केवल धन-संपत्ति जमा ही जमा करने का काम करते रहते हैं, यह धन उनके किसी काम नहीं आता। धन की तीन ही गतियां हैं। या तो छापा पड़ जाता है और जिन्दगी …

विशेष दिन नहीं, प्रतिदिन हो पर्यावरण की चिंता / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष ० आदतों में परिवर्तन से होगा संरक्षणअपने पर्यावरण को सहेजना या उसे अनुकूल बनाये रखना हमारे के लिए कोई एवरेस्ट चढऩे जैसा कठिन कार्य नहीं है। अपने आसपास हो रहे प्रकृति विरूद्ध कार्य को रोकना अथवा ऐसा करने वालों को टोकना या ही इस महान कार्य की शुरूआत मानी जा सकती है। वास्तव में हो तो ऐसा रहा है कि हम सब कुछ गलत होता देख रहे है, और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर रहे है। जिस दिन हम गलत कार्य को होते न देखने की प्रतिज्ञा ले लेेंगे, उस दिन से हमारा पर्यावरण सुधार की राह पर बढ़ चलेगा। इसकी शुरूआत हमें उस स्थान से करनी होगी, जहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग हमें मिले और हम अपने पर्यावरण की चिंता उन पर भी डालना शुरू कर दें। जहां तक मैं समझता हूं इस अभियान की शुरूआत विद्यालयों और महाविद्यालयों से की जानी चाहिए। वर्तमान परिदृश्य हमें दिखा रहा है कि प्रतिदिन हमारे देश के शाला परिसरों में प्लास्टिक की थैलियां लाखों की तादाद में फेंकी जा रही है। ये थैलियां कैसे आ रही है? इस पर चिंतन जरूरी है। बच्चों द्वारा अपने लंच बाक्स के स्थान पर जंकफुड का इस्तेमाल इसका स…

ठंडी चाय / कहानी / यशोधरा विरोदय "यशु "

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देहरादून का कैण्ट इलाका है; शान्त, सुन्दर….. और ऊपर से मौसम की मेहरबानी । आज तो सुबह से ही रूक रूक कर बारिश हो रही है। सड़कें थोड़ी गीली, थोड़ी शुष्क है जिन पर एकाध गाड़ियाँ चल रही हैं । शाम के 6 बज चुके हैं और मंदिर वाली गली के कोने में नेगी ढाबे पर इस वक्त हलचल बढ़नी शुरू हो गई है , चाय और समोसे की खुशबू ने यहां बारिश के मौसम का रंग जमा रखा है । इसके सामने सड़क पर अभी अभी एक कॉलेज की बस रूकी है जो गली के गर्ल्स हॉस्टल की है । बस से एक एक कर लड़कियाँ उतर रही हैं ..... कुछ ने छाते निकाल रखे हैं, तो कुछ ने स्टोल से सिर ढक रखा है और सम्भलती हुई कदम रख रही हैं, वँही कुछ चमकती आँखों के साथ इस खुशनुमा मौसम का मजा लेने सड़क पर निकल आई हैं । आखिर में दो लड़कियाँ इत्मीनान से बस ड्राइवर को बाय करती हुई बाहर आती हैं... और बस से उतरते ही उसमें एक तेज कदमों से चल कर दुकान के टिन शेड के नीचे पहुंच जाती है , दूसरी सड़क पर रूक कर दोनों बाहें फैलाए ....“वाउ! क्या माइन्ड ब्लोईंग मौसम है यार ....बिलकुल नाईन्टिज के गानों के जैसे ...” । “हां जरूर लेकिन अभी ईपी निकाल कर और इक्कीसवीं सदी में आ जाइए स्वाति …

शबनम शर्मा की ताज़ा कविताएँ

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नए ख्वाबआज मैं गुजरी उस सड़क से
कराहती सी आवाज़ थी आई
मैदान वो रोया, पीपल चीखा
‘‘बोलो मेरे बच्चे कहाँ है भाई?’’
    इक्के-दुक्के बच्चे बैठे हाथों में
    मोबाइल था भाई,
    मैदानों की सारी खुशियाँ इस
    डिबिया ने बेचकर खाई।
घास उग आई, कूड़ा भर गया
कहाँ रह गई अब वो माँ जाई
जो कहती थी अपने लल्ला को
पल भर जा क्यूं न हवा मैदान की खाई?
    खड़ी रही मैं मूक सी मूर्त
    देती क्या मैं उसे जवाब
    पूछते हैं जब मेरे ही बच्चे
    खेल मैदान के, उनका ख्वाब
    टी.वी., मोबाइल आज के खेल
    रुक गई भईया बच्चों की रेल।


दरवाज़े पर खड़ी लड़की
ससुराल से प्रताड़ित,
मन से बेचैन,
शरीर से शिथिल,
काम की मारी,
घर से निकाली गई,
इक म़द़म सी आस,
दिल में दबाए,
भारी कदमों से मायके
के दरवाजे पर खड़ी
इन्तज़ार करती
उसे अन्दर बुलाए जाने का
देखकर भाँप लिए गए हालात,
शुरु हो गई सबकी दलीलें
भाई, भाभी के डर से,
माँ, पिता के डर से,
कोने में खड़ी ताकती रही,
गूंगी, बहरी व मूक सी,
याद आया उसे वो ज़माना,
जब वो आई थी ब्याही
इस चौखट में,
परीक्षा की घड़ियाँ समाप्त
होने का नाम ही न ले रही थी,
हर नज़र वक्त ये ही चीखता,
‘‘देखते हैं कैसे कर पाएगी?’’
चुपचाप अंधेरे मुँह उठना,
द…

शबनम शर्मा की 3 नई लघुकथाएँ

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पढ़ाईआज दिव्या दोपहर में अपने कमरे में गई, लेकिन अभी शाम के 8 बजने को आये, बाहर नहीं निकली। ये बच्ची हमारे पड़ोस में ही रहती है। मैं अपना काम निबटाकर बाहर निकली, तो उसकी मम्मी से राम सलाम हुई। वो मुझे आज कुछ खिन्न सी नज़र आई। मैंने कारण पूछा तो उसने बताया कि उसकी बेटी का रिज़ल्ट आया है, वो अपनी कक्षा में प्रथम आई है। उसने आगे पढ़ने की इच्छा प्रकट की है। लेकिन उनकी जाति में ज़्यादा पढ़े-लिखे लड़के नहीं मिलते। वो मुझसे पूछने लगी, ‘‘बताओ, बहनजी, अब ऐसे हालात में अगर मैं उसे पढ़ा दूँ, तो ये सारी उमर इस घर पर ही बैठी रहेगी, आज दोपहर से कमरा बंद करके बैठी है, रोये जा रही है। न कुछ खाया, न नीचे आई है।’’ उसकी बात सुनकर मुझे एक झटका लगा। मैं अपनी पड़ोसिन को अपने घर ले आई। वह बहुत दुविधा में थी। घर वालों का दबाव, बच्चे का प्यास, उसका भविष्य सब कुछ उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। मैंने कुछ देर इधर-उधर की बातचीत करके उन्हें सहज करने की कोशिश की, फिर कहा, ‘‘देखो दिव्या की मम्मी, हम और आप बरसों से अपनी गृहस्थी चला रहे हैं, कितने उतार-चढ़ाव इसमें देखने पड़ते हैं। आप मुझे बताओ कौन सा रिश्तेदार मदद करने या हमारी…

व्यंग्य / रूठे-रूठे पिया, मनाऊँ कैसे ? / गोविन्द सेन

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मुझे रूठना आता है, लेकिन मनाने की कला नहीं जानता। जबसे कम्प्यूटर देवता मेरे जीवन में आये हैं, उनका संग-साथ पसंद करने लगा हूँ। कम्प्यूटर देवता मेरे पिया बन गए हैं। इनका और मेरा सम्बन्ध दिन-ब-दिन प्रगाढ़ होता जा रहा है । इनके बिना मेरा जिया नहीं लगता। इनके बिना जीने की कल्पना से ही मैं सिहर जाता हूँ । हफ्ते भर से कम्प्यूटर देवता रूठे हुए हैं, आप कल्पना कर सकते हैं कि मुझ पर क्या गुजर रही होगी। मेरी बेचैनी चरम बिन्दु पर है। चिंता के सागर में डूबा हुआ हूँ । कम्प्यूटर देवता को कैसे मनाऊँ? सूझ नहीं रहा । झुँझलाता हूँ । श्रीमती जी हौसला देते हुए कह रही हैं-‘रूठा है तो मना लेंगे । इसमें अपसेट होने की जरूरत क्या है।’ अब श्रीमती जी को क्या बताऊँ कि कम्प्यूटर देवता का रूठना मेरे लिए प्राणघातक है । अपसेट क्यों न होऊँ । कम्प्यूटर देवता ने मुझे गुलाम बनाकर कितना बड़ा धोखा दिया है । अब हाथ से लिखना छूट गया है । यदि ये ऐसे ही रूठे रहे तो मेरे तो प्राण ही निकल जायेंगे। छह महीने का कड़ा परिश्रम करके टाइप करना सिखा था। एक-एक करके अपना सारा साहित्य टाइप करके कम्प्यूटर देवता पर भरोसा कर उनके हवाले कर दिया था…

व्यंग्य-राग (८) बयानों का बयावान / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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बयान देने के लिए सिर्फ ज़बान की आवश्यकता होती है. जो भी ज़बान पर आया दे मारा. बयान हो गया. चाहें तो इसे लिखकर दे दें या ज़बानी कह दें. ज़बानी कहने में ज्यादह सुविधा रहती है. ज़रुरत पड़े तो बयान पलटा जा सकता है. कहा जा सकता है कि मैंने यह कहा ही नहीं था. मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है. राजनीति में यह खेल धड़ल्ले से खेला जाता है. वैसे बयान कई तरह के होते हैं. अदालती बयान तथ्यों का वह विवरण है जो वादी या प्रतिवादी द्वारा लिखकर या ज़बानी प्रस्तुत किया जाता है.यह बेशक तथ्यों का विवरण कहा तो जाता है लेकिन खुदा ही जानता है कि यह कितना तथ्यों का विवरण है और कितना झूठ का पुलंदा है. एक बयान तहरीरी होता है. यह वह लिखा हुआ बयान है जो अदालत में किसी बयान के जवाब में दाखिल किया जाता है. इसी तरह एक ताईदी बयान भी होता है जो दूसरे के बयान की पुष्टि करने वाला कथन है | अब यह अदालत का काम होता है कि बयान, बयान तहरीरी या बयान ताईदी की जांच पड़ताल करे | अरबी और फारसी में बयान साहित्यशास्त्र की एक शाखा भी है | हिन्दी में साहित्य की ऐसी कोई शाखा नहीं है | यहाँ साहित्य में अधिकतर बयानबाज़ी होती भी नहीं | यहाँ…

व्यंग्य-राग (७) अथ मूर्ख नामा डा. सुरेन्द्र वर्मा

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दुनिया मूर्खों से भरी पड़ी है | एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं | कुछ अक्लमंद लोग मूर्खों से इतना परहेज़ करते हैं कि वे उनकी शक्ल नहीं तक नहीं देखना चाहते | ऐसे लोगों को एक महामूर्ख ने कहा है कि उन्हें अपने को किसी अकेली अंधी कोठारी में बंद कर लेना चाहिए | बल्कि उन्हें तो अपना आईना तक फोड़ देना चाहिए | ऐसा नहीं है कि बुद्धिमान लोग मूर्खता नहीं करते | लेकिन वे बस, शुरू शुरू में ही मूर्खता करते हैं | बाद में संभल जाते हैं | किन्तु बाद में जब वे मूर्खता करते हैं तो वह छोटी-मोटी मूर्खता नहीं होती | वह हिमालयी- मूर्खता होती है | किसी बड़े पद पर यदि कोई मूर्ख बैठा दिया जाता है तो एक पहाड़ पर बैठे इंसान की तरह उसे नीचे सब लोग बौने दिखाई देने लगते हैं | और मज़ा यह है कि नीचे के लोगों को वह भी बौना ही दीखता है ! हमारा प्रजातंत्र जनता का राज है | ज़ाहिर है, जनता में बुद्धिमानों की बजाय अधिकतर लोग मूर्ख ही होते हैं | और बुद्धिमान भी मूर्खता करने से बाज़ नहीं आते | हम मूर्खों में से ही अपना नेता चुनते हैं और बाद में खुद ही रोते हैं कि हम बड़े मूर्ख हैं जो ऐसा नेता चुन लिया | ऐसी गलती न करने की हम कसम खाते हैं ले…

सादगी ही असली बाकी सब पाखण्ड - डॉ. दीपक आचार्य

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9413306077 www.drdeepakacharya.comआदमी जैसा है वैसा ही दिखता है, जो कुछ अपने पास है वहीं दिखाता है, अपने पास जो हुनर है उसी का प्रदर्शन करता है तभी वह असली इंसान माना जा सकता है। सच्चे इंसान की यही पहचान है। वह दोहरे-तिहरे चरित्र और सैकड़ों मुखौटों का इस्तेमाल करने वाला व्यभिचारी-व्यवहारी नहीं होता। यह वही इंसान कर सकता है जिसे मनुष्य होने पर गर्व हो तथा इस बात का पूरा और पक्का भान हो कि इंसान के रूप मेंं उसके क्या कर्तव्य हैं, क्या अधिकार हैं तथा भगवान से उसे इंसान का शरीर देकर क्यों पैदा किया है। यह सहजता और व्यक्तित्व की शुचिता वे ही लोग रख सकते हैं जो कि प्रकृति के करीब हों। सच्चे, अच्छे और श्रेष्ठ इंसान की यही पहचान है कि वह सहज, सरल और सादगी पसंद होता है। जिन लोगों में सरलता, सहजता और सादगी का अभाव है, वे चाहे अपने आपको कितना ही बड़ा, महान और लोकप्रिय व ईश्वर तुल्य मान लें, एक सामान्य आदमी से भी गए बीते होते हैं। कारण साफ है कि एक आम इंसान भोला-भाला, शुद्ध हृदय का और निरपेक्ष दिमाग का होता है जबकि जिन लोगों को हम महान, अमर और सार्वभौम सम्राट मानकर पूजते हैं वे लोग पूरी तरह डु…

मौत का आह्वान फिर-फिर - डॉ. दीपक आचार्य

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9413306077 www.drdeepakacharya.comहम सारे के सारे लोग चाहते तो यह हैं कि अमर बने रहें, मौत कभी आए ही नहीं। और कुछ नहीं तो कम से कम शतायु तो हो ही जाएं। और हमारी आयु ही न बढ़ें बल्कि काले-घने और लम्बे बाल भी हों, हीरो-हीराईनों और अप्सराओं सा सौंदर्य भी बना रहे, स्लिम भी बने रहें, कानों से सुनते भी रहें, आँखों से देखते भी रहें, चलते-फिरते और भ्रमण करते रहें, खाने-पीने और जमा करते रहने का सामथ्र्य भी दिनों दिन बढ़ता रहे, दिमाग भी चलता रहे और शरीर की तमाम ज्ञानेन्दि्रयां-कर्मेन्दि्रयां भी अपना काम करती रहकर भरपूर आनंद देती रहें। इस सवार्ंंग सेहत को हमेशा बनाए रखने के लिए कुछ लोग वाकई मेहनत करते हैं, संयमित जीवन जीते हैं, नियमित योगाभ्यास भी करते हैं और अपने जीवन को सात्विक, पवित्र और आनंददायी बनाए रखने के परंपरागत नुस्खों और पुरखों की दी हुई सीख पर अमल करते हैं। बहुत से लोग अपने आपको सेहतमंद और हर प्रकार से दुरस्त रखने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन इन लोगों का अपनी कर्मेन्दि्रयों पर कोई नियंत्रण नहीं है। सारी कर्मेन्दि्रयां स्वच्छन्द और उन्मुक्त भोग के लिए  हमेशा उतावली रहती हैं और इस चक्कर …

विजयश्री पाने जरूरी है आध्यात्मिक और दैवीय ऊर्जा - डॉ. दीपक आचार्य

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9413306077 www.drdeepakacharya.comदुनिया का हर महान कार्य तभी संभव है जबकि हमारे पास दैवीय और आध्यात्मिक ऊर्जा का संबल हो अथवा किसी ऎसे व्यक्तित्व का पृष्ठबल हो जो कि धर्म-अध्यात्म, संस्कारों और चरित्र बल से भरा-पूरा या सिद्ध हो तथा जगत के कल्याण की भावना से ही जीने वाला हो, ईश्वरीय दूत की तरह काम करने वाला हो तथा जिसे किसी से कोई राग-द्वेष न हो। रामायण और महाभारत हो या फिर किसी भी युग का कोई सा महासंग्राम। दैवीय उपासना से दैवीय ऊर्जा की प्राप्ति और अपने आपको हर मामले में श्रेष्ठ सिद्ध करने की कला मिलती है और यही हम सबके लिए प्रेरणा, शक्ति सामथ्र्य और विजयश्री वरण करने का सर्वश्रेष्ठ और अलौकिक माध्यम अनुभवित होता है। अकेले इंसानों की भीड़ के आधार पर हम सफलता या संघर्ष में विजय प्राप्त नहीं कर पाते हैं। इस लिहाज से हम सभी के लिए यह जरूरी है कि जीवों और जगत के कल्याण के लिए पहले जगदीश्वर से ताकत प्राप्त करें और उसके बाद मानवोचित कर्मों में अपने आपको लगाएं।  आजकल हमारी तमाम प्रकार की असफलताओं का मूल कारण यह है कि हम लोग दैवीय ऊर्जाओं के बिना जीवन संघर्ष में उतरते हैं और अन्ततः पग-पग पर …

दोहे / अनन्त आलोक

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झिलमिल काली ओढ़नी, मुखड़े पर है धूप |
जग सारा मोहित हुआ , तेरा रूप अनूप ||
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कश्मीरी हो सेब ज्यों , हुआ तुम्हारा रूप |
छुअन प्रेमिका सी लगे, ये जाड़े की धूप ||
**
रामदुलारी रो रही, चूल्हे पर धर नीर |
बच्चों से कब तक कहे, बेटा धरियो धीर||
**
मोटे चावल में मिला , दिया जरा सा नीर |
माँ के हाथों से बनी, बिना दूध की खीर ||
**
वासंती रुत आ गई , ले फूलों का हार |
नव यौवन नव यौवना , कर लो आँखें चार || ** अम्मा को लिख भेज दो , थोड़ी दुआ सलाम | उसके तन मन को लगे , ज्यों केसर बादाम || ** बूढ़ी अम्मा रो रही , शहर हो गया गाँव | ना बरगद का पेड़ है , ना पीपल के छाँव || ** मामा तेरे खेत में , उगते लाखों लाल | झिलमिल झीलमिल खेत है, तू भी मालामाल || ** तन गंगा में धो लिया , धुला न मन का पाप | मन मंदिर को धो सखा , हो तन निर्मल आप || ** ईश्वर तेरे नाम से , लगा रहे हैं भोग | पेट बढ़ाये जा रहे , खाते पीते लोग |१०| अनन्त आलोक साहित्यालोक , बायरी डॉ ददाहू जिला सिरमौर हिमाचल प्रदेश 173022 Email: anantalok1@gmail.com मोब :9418740772

एक्स्ट्रा हूँम ........ ? / व्यंग्य / सुशील यादव

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अपने देश में इन दिनों कोई भी प्रोडक्ट 'एक्स्ट्रा हूँम 'के बिकता नहीं ।ग्राहको के दिलों को आजकल तूफानी ठंडा जब तक न मिले,उनको अपनी हलक में कुछ फंसा सा लगता है । एक पर एक फ्री ,बाय वन गेट वन ,अप टू फिफ्टी परसेंट आफ,......माल बेचने के इन नुस्खों को देखकर ,यूँ लगता है दूकानदार मानों खुद के लुटने के लिए दूकान सजाये हैं ।आओ हमें लूटो ।जिसमे जितनी कूबत है उतनी लूटे.... । वे "रमता जोगी बहता पानी ,माया महाठगनी हम जानी" जैसे वैराग्य भाव से’; मानो संसार को सब कुछ मिटटी के मोल बेच के चल देना चाहते हैं । अपना परलोक-सुधारने का नुस्खा उन्हें "अप टू फिफ्टी परसेंट आफ में" बखूबी नजर आता है ।वे ‘तत्व-ग्यानी’ जीव लगते हैं ।एक-बारगी सोचने में लगता है ‘बपुरा’ क्या बचा पायेगा ....?जितने में खरीदा है, उससे कम कीमत में ढकेल कर अपने बच्चो को किसी अनाथाश्रम के स्कूल में तो नहीं डालना चाहता ....? ग्राहक चकराए रहता है ।उसको आफ और डिस्काउंट का गणित आज तक समझ नहीं आया । कभी सोचता है सेकंड का माल होगा ,कभी मेंयुफेक्च्रिन डिफेक्ट होने का डर सताता है । इन सब के बावजूद , वो अपने-पास पडौस को …

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