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May 2016
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(पूर्वाभास में प्रकाशित – २७.३.१६)

 

फीतों के रंग जूतों के हिसाब से बदलते रहते हैं. काले जूतों में काला फीता ही फबता है. ब्राउन जूते में ब्राउन फीता ही डाला जाता है. किरमिच के स्पोर्ट्स जूते प्राय: सफ़ेद और पीले रंग के होते हैं, उनमें, ज़ाहिर है क्रमश: सफ़ेद और पीले फीते पड़ते हैं. किस्सा कोताह, जिस रंग का जूता उसी रंग का फीता. असल बात मैचिंग की है. जूते और फीते की यह मैचिंग साड़ी के फ़ाल की तरह कठिन तो नहीं होती, लेकिन उसी की तरह ज़रूरी तो होती ही है. दफ्तर के लिए मैं तैयार हो रहा था. जैसे ही जूता कसने लगा की फीता टूट गया. मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ कि मुझमें इतनी ताकत कहाँ से आ गई कि वह जूते के फीते जैसी मज़बूत चीज़ तोड़ दे. ऐसा होना तो नहीं चाहिए. अत: मैंने अनुमान लगाया कि हो न हो इस्तेमाल से फीता ही कमजोर पड़ गया होगा. मुझे दफ्तर जाना था सो इस मुद्दे पर सोच विचार ज्यादह नहीं कर सकता था. तात्कालिक समस्या यह थी कि दूसरा काला फीता कहाँ से आए कि उसे डाल कर जूता पहन लिया जाए. मरता क्या न करता, फटे-पुराने ब्राउन जूतों में से ब्राउन रंग का एक फीता निकाला गया और उसी को काले जूते में पिरो कर काम चलाया गया. दफ्तर में खूब भद्द उडी. काले जूते में ब्राउन फीता, वाह! क्या ‘मैच’ है!

कितनी दादागीरी है. अगर जूते के रंग के हिसाब से आपने फीते का चुनाव नहीं किया तो आपकी भद्द होने में कभी कोताही नहीं होगी. आप चाहें इसे ज़बरदस्ती कहे या फीताशाही. लेकिन है तो है !

फीते के रंग तो तरह तरह के होते ही हैं, काम के हिसाब से उसके कई प्रकार हैं. अभी हमने जूते के फीतों की बात की, लेकिन गोटे-किनारों की तरह कपड़ो के हाशिए पर लगने वाले सूत या रेशम की पतली पट्टी के रूप में भी फीते ही होते हैं; और निवाड़ की वह पतली धज्जी भी फीता ही होती है जिससे फाइलें, बांधी जाती हैं. वह दफ्तर ही क्या जिसमें फाइलें न हों और वो फाइल ही क्या जो फीते से न बंधी हो.

इस बात का संकेत पहले ही दिया जा चुका है कि फीते के रंग और प्रकार के साथ आप कोई समझौता नहीं कर सकते. अधिकतर फ़ाइलों में निबाड़ का फीता होता है जो बेहद मज़बूत होता है. उसे खोला तो जा सकता है लेकिन तोड़ा नहीं जा सकता. खोल कर फ़ाइल का आकार बढाया तो जा सकता है लेकिन तोड़ कर फ़ाइल का वज़न कम नहीं किया जा सकता. वैसे भी हर फ़ाइल का अपना वज़न होता है. वह फ़ाइल ही क्या जिसमे वज़न ही न हो ! फ़ाइल के वज़न के हिसाब से ही फीता तोड़ने का जुगाड़ बैठाने के लिए दफ्तरों में पैसा लिया जाता है.

फाइलों के फीते अधिकतर लाल रंग के होते हैं. ये लाल रंग के क्यों होते हैं, ये आजतक किसी को पता नहीं चला. इस पर रिसर्च होनी चाहिए. वे यदि लाल रंग के न भी हों तो भी उन्हें लाल रंग का ही माना जाता है – फाइलों के फीतों के लाल रंग का इतना आतंक है ! इसीलिए तो इसे ‘लाल फीताशाही’ नाम से नवाज़ा गया है. लाल रंग, जैसा कि आप सभी जानते हैं, एक उभयमुखी, क्या कहते हैं उसे अंग्रेज़ी में, ‘अम्बीवलेंट’, रंग है – एक साथ प्रेम का प्रतीक भी है और आतंक का द्योतक भी है. लाल फीते वाली फाइलें दफ्तर को बड़ी प्रिय होती हैं, वे बाबुओं को “प्रसन्न” कर देती हैं. उनमें यह ताकत होती है की वे प्रसन्न कर सके. लेकिन वे डराती भी खूब हैं. उनके मज़बूत फीते को तोड़ने की हिम्मत जुटाना कोई आसान काम नहीं है. बड़ा जोखिम है. लेकिन बहुतेरे ऐसे उत्साही और साहसी लोग होते हैं जो यह जोखिम उठा लेते हैं. पकडे गए तो जोखिम की कमाई की रकम से ही भरपाई भी कर देते हैं. ऐसे लोगों की संख्या आजकल दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है. भारत के विकास में उनका बड़ा योगदान है. सुना है आजकल सरकार सख्त फीतों के साथ बेरहम होती जा रही है और उनका रंग बदलने क पर आमादा है. वह लाल फीताशाही समाप्त करना चाहती है. एक बड़े दफ्तर के बाबू से मेरी मुलाकात हुई. कहने लगे सरकार के चाहने से क्या होता है? लाल फीताशाही तो सनातन है और हमेशा बनी रहेगी. दफ्तर तो आखिर हम चलाते हैं.

दफ्तर बाकायदा चल रहे हैं. फाइलों के फीते आज भी लाल हैं. तथास्तु.

- डा. सुरेन्द्र वर्मा १०, एच आई जी १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद २११००१

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हम इंसान हैं या पशु, हममें इंसान के कौनसे गुण हैं और पशुओं से हमारी कितनी समानता है?  कभी फुरसत पाकर इस बात पर थोड़ी गंभीरता के साथ हम चिन्तन कर लें और इंसानों की तुलना पशुओं से करने लगें तो पता चलेगा कि आजकल के इंसानों की तुलना में पशु लाख गुना अच्छे हैं।

हम जिस दैनिक जीवनचर्या, परंपराओं, आदर्शों और सिद्धान्तों की बात करते हैं उन मामलों में पशु इंसानों से कहीं अधिक श्रेष्ठ दिखते और अनुभवित होते हैं। दैनंदिन जीवन की ही बात कर लें तो पशुओं का रोजाना का पूरी तरह क्रम निर्धारित बना हुआ है। पशुओं में न बेवक्त खान-पान है, न अनावश्यक जागरण, और न ही हमारी तरह वे वृत्तियां जो हमें भोग-विलास और आरामतलबी की ओर प्रवृत्त करने लगी हैं।

पशुओं का शयन और जागरण निर्धारित है। बेवक्त वे न बोलते हैं न भ्रमण करते हैं। उनके अपने कोई गुट नहीं हैं, न ऎसे संगठन हैं जहां अहो रूप -अहो ध्वनि का माहौल हो। खान-पान के मामले में भी पशु हमसे लाख दर्जा अच्छे हैं। शहर की आबोहवा और इंसानों की झूठन खा-खा कर आवारा हो गए जानवरों की बात हम नहीं कर रहे हैं बल्कि उन पशुओं की बात कर रहे हैं जो वाकई पशु कहे जाते हैं।

हम लोग सूरज के उगने के बाद काफी देर तक सोये रहते हैं। हमें पता ही नहीं कि उगते सूरज का रंग कैसा है, प्रभात की हवाएं कैसी होती हैं, संध्या की लालिमा किस तरह की होती है। यों हम बात-बात पर उलाहना देते हुए लोगों को जानवरों के नाम पर डाँट दिया करते हैं लेकिन जरा उन जानवरों की अच्छाइयों को भी देखें जिनका नाम लेकर हम किसी को कुत्ता, गधा, सूअर, उल्लू, मेंढ़क, चूहा, बंदर, भालू, कछुआ, लोमड़ी, हाथी आदि तमाम प्रकार के जानवरों को याद करते रहते हैं।

पशु कभी चिल्लाते नहीं, न ही कहीं इकट्ठा होकर बिना वजह किसी की निन्दा करते रहते हैं, किसी की पेढ़ी पर देर रात तक बैठकर गप्पे नहीं हाँकते, तरह-तरह का पुराना और सड़ा बासी माल नहीं खाते। किसी पशु को कभी तम्बाकू, गुटखा खाते या भंग-दारू का पान करते देखा है? दारू पीकर चिल्लाते और बकवास करते देखा है? कभी नहीं, क्योंकि पशु हमसे अधिक सभ्य है। 

उसे यदि इंसानों की भाषा में बोलना आता तो वे गांवों की चौपालों से लेकर दिल्ली के इण्डिया गेट तक हमारे बारे में सच-सच बताते हुए इतनी क्रान्ति कर डालते कि हमारा जीना हराम हो जाता। पशु कभी रिश्वतखोरी, जमाखोरी, भ्रष्टाचार, दहेज, गुण्डागिर्दी की सोच भी नहीं सकते।

पशुओं में एक-दूसरे को नीचा दिखा कर सिंहासन पर कब्जा कर डालने की नीयत भी नहीं होती। कोई पशु सरकारी या गैर सरकारी जमीन पर कभी अतिक्रमण नहीं करता। किसी को लूटता नहीं, लूट-खसोट में उसका विश्वास नहीं।

पशु कभी झूठ नहीं बोलते। उनकी मुखमुद्रा और व्यवहार से उनके भीतर की थाह आसानी से पायी जा सकती है। इंसान के बारे में ऎसा नहीं हैं। पशु एक ही मुँह लेकर चलता है, और आदमी सौ-सौ मुखौटों के साथ चलता रहता है।

इंसान आजकल जो कुछ कर रहा है वह पशुओं से भी गया-बीता हो गया है। विश्वास तो यही किया जाता था कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन आदि सारे कामों के सिवा एक बुद्धि होने के कारण इंसान पशुओं से श्रेष्ठ और सामाजिक है लेकिन इस बुद्धि का आसुरी इस्तेमाल करने की आदत ने इंसान को लाचार और पशुओं से भी हीन बना दिया है।

जिस बुद्धि के कारण उसे पशुओं से श्रेष्ठ माना गया था उसी बुद्धि की वजह से इंसान पशुओं से भी गया-बीता हो गया है। दुर्बुद्धि का भरपूर दुरुपयोग करते हुए आज का इंसान जो कुछ कर रहा है वह इंसानियत के साथ धोखा तो है ही, आदमी ने पशुओं से भी अपने आपको नीचे गिरा लिया है।

हम सारे आसुरी कर्म करने के लिए स्वतंत्र हो गए हैं। जब चाहें दूसरे पालों और बाड़ों में छलांग लगा देते हैं और पूरा शहद चाट लेने के बाद, झूठन-खुरचन तक को चट कर जाने के बाद पाले बदल डालते हैं।

हमारे लिए कोई मर्यादा नहीं है जिसे जब सूझ पड़े, जब हूक उठ जाए, वो उस कर्म में जुट जाता है। हमारे बहुत से कामों का कोई मौसम नहीं रहा। इस मामले मेंं हम पशुओं से भी सौ गुना आगे निकल गए हैं। जब कभी कहीं मौका मिलता है सब कुछ कर गुजरते हैं। पशुओं जितना धैर्य और संयम भी अब हम नहीं रख पाते हैं।

बहुत से लोग पशुओं से भी बदतर जिन्दगी जी रहे हैं। उनका न कोई समय निश्चित है, न अनुशासन। सब कुछ फ्री-स्टाईल है। हमें अब अपनी मर्यादाओं के बाड़े में रहना भी पसंद नहीं है। दूसरों के बाड़ों में ताक-झाँक से लेकर घुसपैठ तक में हमें आनंद आने लगा है।

ईमानदारी के साथ अपनी तुलना करने लगें तो हमें सच्चे मन से पूरी लज्जा और शर्म से लबालब भर यह स्वीकार करने को राजी होना ही पड़ेगा कि हम जो कुछ कर रहे हैं, जिस दोहरी-तिहरी और आसुरी मानसिकता में जी रहे हैं, जो कुछ कर रहे हैं उस स्थिति में हर मामले में पशु हमसे बेहतर हैं।

कम से कम उन पशुओं में अहंकार तो नहीं है, वे जैसे भी हैं, उसी रूप में स्वीकारते हैं, लाल-नीली-पीली बत्तियों के प्रभाव में आकर अपने आपको भुलाते नहीं क्योंकि उनका विश्वास इन रंगों की बजाय प्रकृति के शाश्वत रंगों में होता है। पशु प्रकृतिस्थ रहा करते हैं न कि एयरकण्डीशण्ड माँदों में, इसलिए उन्हें जगाने के लिए कागज के लाल-हरे-नीले-काले टुकड़ों या मुद्राओं की खनक की जरूरत भी नहीं पड़ती।

भगवान ने उन्हें यदि इंसानी भाषा नवाज दी होती तो आज हालात कुछ और ही होते। अपने आपको जानें और इंसान बनने-बनाने का यत्न करें। हममें से अधिकांश लोग ऎसे हैं जिनके बारे में लोग कह भले न पाएं, मगर महसूस जरूर करते हैं कि हम पशुओं से भी गए-बीते हैं, हमसे तो पशु अच्छे हैं।

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आनंद वर्मा बॉस के साथ कुछ जरूरी बातों में उलझे थे। तभी उनके मोबाइल की घंटी बजी। जेब से मोबाइल निकाल कर बगैर नम्बर देखे ही स्विच ऑफ कर दिया। दो घंटे बाद दफ्तर से निकल कर मोबाइल देखा तो उनके दोस्त विजय की तीन मिस्ट कॉल थी। वो अभी फोन मिलाते कि विजय ने फिर फोन किया- “हैलो, आनंद, भाई, इतना स्विच ऑफ क्यों रखते हो? मैं पिछले दो घंटे से बराबर ट्राई कर रहा हूँ।”

“हाँ बोलो क्या बात है?”

“आज शाम का क्या कार्यक्रम है ?”

“कुछ विशेष नहीं।”

“ठीक है तब आज रात का खाना तुम लोग हमारे साथ लोगे। ऋतु बहुत दिनों से कह रही है।”

“नहीं भाई शान्ति कहीं जाना नहीं चाहती। मैं कोई वादा नहीं कर सकता।”

“भाभीजी से मैं खुद बात कर लूंगा। तुम बस समय से घर पहुँच जाओ।”

“ठीक है।” आनंद ने मोबाइल जेब में रख लिया। तभी बस आई और वह उसमें सवार हो गया। खिड़की के पास वाली सीट ले बैठ गया और बस के अंदर के माहौल से निर्लिप्त हो बाहर देखने लगा। बस ने शीघ्र ही रफ्तार पकड़ ली और आनंद के विचारों ने भी। ठीक एक साल पहले का घर का खुशहाल माहौल उसकी नजरों में घूम गया। हँसते खेलते बच्चे और सदा गुनगुनाती मुस्कुराती बीवी। उसे सब याद आने लगा। परन्तु इस खुशहाल परिवार को ऐसा ग्रहण लगा कि उसका साया अब इस जीवन में तो हटना मुश्किल है। डर है कि कहीं वह अगली पीढ़ियों और अगले जन्म भी पीछा न करे। घर में कदम रखते ही मन बोझिल हो जाता है। समझ नहीं आता पत्नी को कैसे दिलासा दे। परिवार को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी उसी की थी। वह न दे सका। अब पछतावे के अलावा कुछ नहीं है।

आनंद ने घर में प्रवेश किया। छोटे बेटे ने नमस्ते कर उसका स्वागत किया। आनंद का मन हल्का हुआ। आज पत्नी के चेहरे पर भी उदासी कुछ कम थी। वह पानी ले आई। थोड़ी घरेलू बातों के बाद पत्नी ने कहा- “मैं चाय बनाती हूँ।”

आनंद को जरा सहारा मिला। वह बोला- “नहीं तुम जल्दी से बच्चों के लिए कुछ बना दो और तैयार हो जाओ। हमें विजय ने खाने पर बुलाया है।” पत्नी शांत रही और चलने की तैयारी करने लगी।

आनंद और शांति विजय के यहाँ पहुँचे तो विजय और ऋतु ने उनका स्वागत किया। पुरूषों में वही दफ्तर और राजनीति की बातें छिड़ गई। महिलाएँ इनसे शीघ्र ही ऊब कर अपने घरेलू विषयों पर बातें करने लगी। साथ ही खाने की तैयारी भी हो रही थी। विजय के बच्चे अंकल आण्टी के अधिक दिनों में आने की शिकायत कर रहे थे। ऋतु ने कहा- “आप लोग इतने दिनों में आए और तब भी बच्चों को साथ नहीं लाए हो। मैंने तो सभी को आने के लिए कहा था।”

शांति- “छोटे बेटे की तबियत ठीक नहीं है। इसीलिए नहीं आए और हम भी जल्दी ही लौटेंगे।”

ऋतु खाने की तैयारी में जुट गई। वह मदद के लिये कभी बच्चों और कभी विजय को छोटे-छोटे काम सौंप रही थी। साथ ही शान्ति से बातें भी कर रही थी शीघ्र ही खाना तैयार हो गया। सबने रूचकर खाया। खाने के कुछ देर बाद चाय का दौर चला। बच्चे अपने टी.वी. कार्यक्रमों में व्यस्त हो गए और बड़े ड्राईंग रूम में चाय की चुस्कियाँ लेने लगे।

अनायास ही आनंद के मुँह पर अपनी बेटी का नाम आ गया। जबकि विजय और ऋतु उसका जिक्र कर शान्ति को दुःखी नहीं करना चाहते थे। पर अब जब जिक्र छिड़ ही गया तो ऋतु ने आहिस्ता से पूछा- “भाई साहब अनुभूति का कुछ पता लगा क्या?”

आनंद ने नकारात्मक सिर हिलाया। कुछ देर सब मौन रहे। विजय ने कुछ सांत्वना देने के ख्याल से कहा- “हमें हार नहीं माननी चाहिए आनंद। अपना प्रयास जारी रहना चाहिए।”

“और क्या प्रयास किया जाय? कितना प्रयास किया जाय? कुछ सुराग मिले, कोई उम्मीद नज़र आए तभी तो आगे प्रयास संभव है। हम जो कर सकते थे कर चुके।”

“नहीं हमें बराबर पुलिस, मीडिया और समाज सेवी संस्थाओं से सम्पर्क बनाए रहना चाहिए।”

शान्ति ने गर्दन नीचे झुका ली। उसकी आँखों से कुछ बूंद आंसू टपक गए। जिन्हें उसने चुपचाप पोंछ लिया। आनंद की आँखों के कोर भी गीले हो गए। उनकी बेटी अनुभूति जो स्नातक की छात्रा थी एक वर्ष पहले अपहरण कर ली गई थी। तमाम कोशिशों के बाद भी वे उसका पता नहीं लगा पाए। यही दुःख शान्ति और आनंद को रात दिन कचोटता रहता था। उन्होंने लगभग सभी रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालों से किनारा कर लिया था। क्योंकि हर जगह वही जिक्र होता, जो शान्ति के लिए कई दिनों की बेचैन का सबब बन जाता था।

विजय ने शांन्ति को समझाते हुए कहा- “भाभीजी आप धैर्य रखें। मुझे पूरा यकीन है कि हमारी बच्ची एक दिन सकुशल घर लौटेगी।”

आनंद ने कप मेज पर रखते हुए गंभीर स्वर में कहा- “तुम उसके घर लौटने की बात कहते हो। पता नहीं अभी तक जिंदा भी है या नहीं?”

शान्ति सिर झुकाए हुए ही गम्भीर स्वर में बोली- “मरने की खबर ही मिल जाती तो तब भी कलेजा ठण्डा हो जाता अधिक डर तो इसी बात का है कि जिंदा है तो पता नहीं किस हाल में कहाँ किन हाथों में...।” इतना कहकर शान्ति सुबकने लगी।

विजय और ऋतु उन्हें दिलासा देते रहे। कपों में अधपी चाय ठण्डी हो गई। आनंद और शान्ति उठकर खड़े हो गए। आनंद व ऋतु उन्हें छोड़ने सड़क तक आए, सभी लगभग मौन थे ।

आनंद और शान्ति की आँखों से छलका दुःख और मेहमानों के जाने के बाद के सूनेपन से उत्पन्न सन्नाटा विजय के घर में देर रात्रि तक पसरा रहा। अगली सुबह सब कुछ कार्य कलाप सामान्य तरीके से होने लगे। परन्तु शाम को विजय के घर लौटने पर चाय पीते वक्त ऋतु ने अनुभूति का जिक्र छेड़ दिया। वह शान्ति के दुःख से दुःखी थी और उसके हाव-भाव से लग रहा था कि दिन में उसने शायद इस मसले पर गम्भीरता से विचारा होगा और कई बार भावुक हुई होगी। ऋतु ने चाय का घूट पीते हुए गम्भीर भाव से कहा- “भले लोगों की ही भगवान क्यों परीक्षा लेता है। बेचारी शान्ति की हालत देखी नहीं जाती। न जाने किस ने किस जन्म का बैर निकाला है इन लोगों से।”

“कुछ स्पष्ट भी तो नहीं है कि किसी ने जान बूझकर साजिश रची है या बच्ची ही नादानी कर गई।”

“ऐसा तो सोचना ही व्यर्थ है। अनुभूति जैसी समझदार लड़की ऐसा गलत कदम उठाएगी, विश्वास नहीं होता। यह सब इन्ही बेखौफ लोगों का काम है जो भोली-भाली लड़कियों को बहका फुसलाकर या डरा धमकाकर गलत रास्ते पर डालने का धंधा कर रहे हैं। वे ही जगह-जगह कितनी ही शर्मनाक और खौफनाक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। इस सब में उन्हें मोटा पैसा जो मिल जाता है और हमारी पुलिस तो उन्हें खुली छूट देती ही है। मरना हर तरह से औरत को ही है।”

“ऐसी घटनाओं के पीछे औरत का लोभ और मंद बुद्धि भी कम जिम्मेदार नहीं है। वह स्वयं लालच में फंसती है और स्वयं को भौंड़े तरीके से प्रस्तुत कर रही हैं।”

“पर उस प्रदर्शन को देखने और बोली लगाने वाला पुरूष है। पुरूष का क्षणिक सुख और पैसे का दंभ उसे बाजारू भड़कीली औरत की तरफ ले जाता है। आज विश्व पटल पर औरत को इस नजर से देखने का पुरूष का हक बलवती होता जा रहा है। मूल में धन है। जो धन पहले स्थानीय स्तर पर औरत के शोषण का कारण था आज वह अन्तर्राष्ट्रीय रूप ले चुका है। धनाढ्य देशों के नागरिक पर्यटन के बहाने गरीब देशों में जाय या स्वदेश में ही विदेशी माल का भोग करें उनके लिए दोनों हाल में पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं।”

“फिर भी मर्यादाओं को संजोना औरत का दायित्व है क्योंकि अधिक पश्चताप वह स्वयं ही करती है। तब जिन हालातों को बर्दास्त नहीं कर पाती उनको न्यौता ही क्यों देती है।”

“तुम ऐसा कैसे कह सकते हो? औरत हालातों को न्यौता देती है? अभी कुछ दिनों पहले एक धनी तानाशाह ने सुन्दरियों के लिए एक भोज का आयोजन किया था। इसमें शामिल होने के लिए सुन्दरियों की फीगर, वेट, हाइट और कलर जैसे सौन्दर्य के मानक निर्धारित किए थे।”

“और सुन्दरियों ने देश समाज, धर्म और साम्प्रदायिक मान्यताओं को धता बताकर वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इतना ही नहीं नारीत्व की मर्यादाओं को ठेंगा दिखाते हुए मेजबान की निगाहों में आने को उसका भरपूर मनोरंजन किया।”

“जहाँ तक भागीदारी और जिम्मेदारी का सवाल है। वह किसी एक के माथे नहीं मढ़ सकते हैं। आज समाज के विविध पक्ष इस सम्बन्ध में गैर जिम्मेदार रवैया अपना रहे हैं। जिसकी चर्चा की आवश्यकता है वहाँ मौन, जहाँ दण्ड की आवश्यकता है वहाँ उदार, जहाँ निगरानी की जरूरत है वहाँ आँखे बंद किए है। मीडिया ने तमाम अचर्चित विषयों को चर्चा का विषय बना दिया है। जिसका असर नकारात्मक अधिक हो रहा है। साल भर के बालक से नब्बे साल तक के बूढ़े को एक जैसा मनोरंजन परोसा जा रहा है।”

“टॉप टैन सबको एक से कार्यक्रम जो परोस रही है। हर जगह तो उन्हीं का राज है। हीरो तो बेचारे बराबर के ठुमके लगाकर भी पिछड़ रहे हैं।” स्त्री अपनी परिभाषा बदल रही है। चंद दशकों पहले ममता दया, धर्म की वाहिका आज माता-पिता की हत्या जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम दे रही है।

“यह एक लम्बी बहस है। मूल प्रश्न यह है कि तमाम प्रयासों योजनाओं और गतिविधियों के बाद भी वैश्यावृत्ति का धंधा बंद क्यों नहीं हो रहा है? क्यों बार-बार मासूम लड़कियों को उठाकर उसमें झोंक दिया जाता है और फिर वहाँ से लौटने के उसके सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं।”

“निश्चित यह एक गम्भीर सवाल है और यह स्थिति किसी भी देश समाज के लिए शर्मनाक है। पर खाली यह उम्मीद लिए रहना कि पुरूष ही नारी का पूरा उद्धार कर देगा बेमानी है। इस संबंध में महिला को स्वयं भी सीमाएं, तय करनी होंगी। एक दूसरे की मदद को आगे आना होगा। पूरी सुरक्षा आत्म नियंत्रण में ही निहित है अन्य कोई भी उसे नहीं दे सकता है।”

ऋतु ने सहमति में सिर हिलाया- “हूँ, किसी एक दो दोष देना या उसी से पूरे हालत पर काबू पा लेने की उम्मीद रखना ठीक नहीं। दोनों ही पक्षों को अपने-अपने ढंग से कार्य करना होगा और दोनों का उद्देश्य एक ही बना रहना भी जरूरी है।”

बच्चे खेल खत्म कर लौट आए थे। उनके शाम के नाश्ते का समय हो गया था। ऋतु उठकर रसोई में चली गई। बच्चे पापा को दिन भर की घटनाओं का ब्यौरा देने और अपनी फरमाइशे करने लगे।

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लेखिका

clip_image002डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

शिक्षा - एम. ए. (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी. एड., एम. फिल., (इतिहास), पी-एच. डी. (इतिहास)

प्रकाशित रचनाएं - भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस. एस. पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994

खो गया गाँव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010

पढो-बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2014

चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विरासत में मिली कहानियाँ (कहानी संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

मैं किशोर हूँ (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं एवं कहानियाँ प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।

सम्पर्क -

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई .जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514 दूरध्वनिः + 91-08005313626 ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

(अपर्णा शर्मा)

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वो जमाना चला गया जब किसी को नेस्तनाबूद करना हो तो अस्त्र-शस्त्र जरूरी हुआ करते थे। अब पूरी दुनिया नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ आदमी का मानसिक कवच इतना अधिक कोमल और मक्खनिया हो गया है कि मामूली आघात तक को सहन कर पाने की स्थिति में नहीं है।

इसके कई सारे कारण भी हैं।  आदमी कम समय में पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर लेना चाहता है, जितना अधिक हो सके अपने नाम करवा लेना चाहता है और चाहता है कि वह रातों रात बहुत बड़ा बादशाह या वैभवशाली बन जाए, चाहे इसके लिए उसे किसी भी तरह का शोर्ट कट या अवैध मार्ग क्यों न अपनाना पड़े।

और यही कारण है कि नाजायज रास्तों से सब कुछ पा जाने की दौड़ में आगे बढ़ने की जद्दोजहद में आदमी आत्मविश्वासहीन हो गया है, आत्मा की मौलिक ताकत खो चुका है। और इस सबका असर ये हो रहा है कि उसके संकल्पों और सिद्धान्तों का ह्रास होता जा रहा है।

यही कारण है कि आदमी छोटी सी अनचाही पर व्यथित हो जाता है, आपा खो बैठता है और वैसी हरकतें करने लगता है जो आदमी को शोभा नहीं देती।

आदमी की इस कमजोर मनःस्थिति के कारण उसके उन्मूलन और विनाश के लिए अब किसी हथियार की जरूरत नहीं होती। इसके लिए उसके मानसिक धरातल को छिन्न-भिन्न करने के दूसरे  सामान्य प्रयास ही काफी है।

अब आधुनिक संचार की तमाम प्रणालियां उपलब्ध हैं जिनका इस्तेमाल कर कुछ भी किया जा सकता है। बढ़ते जा रहे विश्व की तर्ज पर अब लोग भी जबर्दस्त शातिर होते जा रहे हैं।

आजकल लोग सीधे विरोध की बजाय इन-डायरेक्ट गेम खेलने लगे हैं और इसके लिए अब हथियार के तौर पर नवाचारों का प्रयोग हो रहा है। अब किसी को ठिकाने लगाना हो तो उसकी बुराई न करें, बल्कि उसकी तारीफ ही तारीफ करते रहें।

जमाने भर में अधिकांश लोग नकारात्मक सोच वाले बनते जा रहे हैं और इस स्थिति में जब भी किसी की तारीफ होती है, सामने एक ऎसा वर्ग तैयार हो जाता है जो स्वाभाविक रूप से शत्रु हो जाता है।

जैसे-जैसे तारीफ होती है, सार्वजनीन आदर-सम्मान, पुरस्कार, अभिनंदन आदि का क्रम ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता है, स्वतः पैदा हो जाने वाले शत्रुओं की संख्या में भी उत्तरोत्तर बढ़ोतरी होती चली जाती है। इसलिए कई अति बौद्धिक लोग अब इस परंपरा में सिद्ध होते जा रहे हैं।

अब तो किसी अच्छे इंसान को अपनी प्रतिस्पर्धा से हटाना हो या अपना रास्ता साफ करना हो तो उसकी खिलाफत करने की जरूरत नहीं है। जो लोग उसके निर्णायक हों, निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हों उन लोगों की ऎसी तारीफ ऊपर तक पहुंचा दो कि बिना किसी बाधा के आदमी रास्ते से भी हट जाए और हमारा इच्छित लक्ष्य भी हमें प्राप्त हो जाए।

जो लोग तारीफ करते हैं उनके बारे में शाश्वत सत्य यही नहीं है कि तारीफ सच ही है बल्कि आजकल तारीफ का अर्थ बदलता जा रहा है और तारीफ करने वाले की मानसिकता या शुचिता का कोई पैमाना नहीं रहा। अब जो तारीफ करता है वह सच्चे मन से तारीफ करे, यह जरूरी नहीं है। उसकी तारीफ हथियार का भी काम कर सकती है। अब तो पता ही नहीं चलता कि कौन सही तारीफ कर रहा है और कौन हथियार चला रहा है।

जहाँ जो तारीफ करे, उसके मुगालते में न रहे, बल्कि यथार्थ के धरातल पर आकर सोचें और उस मूल कारण को तलाशें जो तारीफ की वजह है। आजकल तारीफ के पैमाने भी बदलने लगे हैं। जरा बच के रहियो, तारीफ से भी, और तारीफ करने वालों से भी। पता नहीं कौनसी तारीफ कब हो जाए, और अपना कबाड़ा कर डाले।

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एक समय था जब लोग कहते थे कि भाषा सीखनी हो तो अखबार पढ़ो। लेकिन आज एकाध अपवाद को छोड़ दें तो अधिकांश अखबारों में जो भाषा इस्तेमाल में लाई जा रही है, वह पूरी तरह जड़ों से कटी हुई है। अखबारों से भाषा सीखना आज संभव नहीं रह गया है। अखबारों की भाषा लगातार विकृत होती चली जा रही है। ऐसा लगता है, अखबारों के प्रबन्धन पर बाजारवाद इस कदर हावी हो गया है कि वे भाषा के साथ खिलवाड़ पर उतर आए हैं। भूलना नहीं होगा कि हिंदी के विकास में पत्रकारिता की बहुत बड़ी भूमिका रही है। आधुनिक हिंदी के निर्माता कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जिस पत्रकारिता की शुरुआत की, वह जन आकांक्षाओं और स्वातंत्र्य चेतना से जुड़ी हुई थी। यद्यपि उस समय हिंदी का वर्तमान स्वरूप बन नहीं पाया था, पर उसकी नींव भारतेंदु एवं उनके मंडल में शामिल लेखकों-पत्रकारों ने डाल दी थी। उस नींव पर हिंदी पत्रकारिता में एक ऐसी भाषा विकसित हुई जिसमें वह ताकत थी कि वह गंभीर से गंभीर मुद्दों को सहजता के साथ अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम थी। हिंदी का सहज जातीय रूप अखबारों के माध्यम से सामने आया और आम लोगों तक इसकी पहुंच बनी। यह भाषा सर्वग्राह्य भी हुई।

हिंदी पत्रकारिता की एक खासियत रही है कि इस क्षेत्र में हिंदी के बड़े लेखक, कवि और विचारक आए। हिंदी के बड़े लेखकों ने संपादक के रूप में अखबारों की भाषा का मानकीकरण किया और उसे सरल-सहज रूप देते हुए कभी उसकी जड़ों से कटने नहीं दिया। लेकिन गत सदी के पिछले दशक से अखबारों की भाषा का चरित्र बदलने लगा और वह अपनी जड़ों से कटने लगी। यह नब्बे का दशक था, जब अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की प्रवृत्तियों का जोर बढ़ने लगा था। इस दौर में बाजारवाद का दबाव बढ़ने लगा और संभवत: इसी से अखबारों की भाषा में विकृतियां सामने आने लगीं। यद्यपि इस दौरान हिंदी में संपादकों की वह पीढ़ी मौजूद थी, जो बाजारवाद के दबाव को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। गौरतलब है कि विद्वान संपादकों की इस पीढ़ी ने भाषा के विकास, उसके मानकीकरण और अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के लिए उसे सक्षम बनाने में महती भूमिका निभाई थी। लेकिन जब बाजारवादी ताकतों की दखलन्दाजी बढ़ती गई और पूंजी का सत्ता विचार और चिंतन पर हावी हो गई तो लंबे संघर्ष के बाद स्तरीय जनभाषा का जो ढांचा विकसित हुआ था, उसे चरमरा कर ढहते भी देर नहीं लगी।

नब्बे के दशक से ही अखबारों की भाषा के हिंग्लिशीकरण का दौर शुरू हुआ और भाषा के संस्कार बिगड़ने लगे। अंग्रेजी और हिंदी शब्दों के मेल से एक अजीब तरह की विकृत खिचड़ी भाषा सामने आने लगी। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि अखबारों में आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल करना जरूरी है और आम लोगों की बोलचाल में अंग्रेजी शामिल हो गई है। लेकिन इस तर्क का कोई ठोस आधार नहीं था। अखबारों में पहले भी बोलचाल की हिंदी का ही प्रयोग हो रहा था, न कि तत्सम शब्दावली वाली क्लिष्ट हिंदी या सरकारी अनुवाद वाली हिंदी का। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो सहजता के साथ अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने में शामिल करती रही है और इस तरह से समृद्ध होती रही है। इसमें दो राय नहीं है कि गत दशकों में हिंदी पर अंग्रेजी का काफी प्रभाव पड़ा है और आम जनजीवन में घुल-मिल चुके अंग्रेजी के शब्द हिंदी लेखन में सहज तौर पर शामिल हो गए हैं। लेकिन हिंदी का हिंग्लिशीकरण अलग ही चीज है। इसमें जानबूझकर अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी में ठूंसा जाने लगा है, जिससे उसका रूप अजीब ही होने लगा है और उसके सहज प्रवाह में बाधा पहुंची है। यह एक कृत्रिम भाषा है जिसे कतिपय अखबार जोर-शोर से आगे बढ़ा रहे हैं। इस तरह से वे भाषा का विजातीयकरण करने के साथ नई पीढ़ी के भाषा-संस्कार को विकृत करने की कोशिश भी कर रहे हैं। कुछ अखबार तो खबरों के शीर्षक के साथ अजीब प्रयोग करते हुए अंग्रेजी के शब्द रोमन में ही दे देते हैं। इस मामले में हाल के दिनों में आईं वेबसाइटें आगे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी के स्वरूप को बिगाड़ने का काम अखबारों से ज्यादा वेबसाइटों ने किया है। वाकई हिंदी के साथ अंग्रेजी का यह मेल अजीबोगरीब लगता है। लेकिन एक फैशन के रूप में इसे बढ़ावा दिया जा रहा है।

दूसरी तरफ, समय के साथ अखबारों की भाषा में अशुद्धियां भी बढ़ी हैं। लेखन में व्याकरण के नियमों की अवहेलना या तो जानबूझकर की जाती है या जानकारी के अभाव में। वाक्य-निर्माण में अशुद्धियां साफ दिखाई पड़ती हैं। विराम चिह्नों के प्रयोग को गैरजरूरी समझा जाने लगा है। खास बात यह भी है कि प्राय: सभी अखबारों ने अपनी अलग स्टाइल-शीट बना रखी है। एक ही शब्द अलग-अलग अखबार अलग-अलग तरीके से लिखते हैं और उसे औचित्यपूर्ण भी ठहराते हैं। इससे पाठकों में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। भूलना नहीं होगा कि हमारी परंपरा में छपे हुए शब्द को प्रमाण माना जाता है। ऐसे में, नई पीढ़ी गलत को ही सही समझ ले तो उसका क्या दोष! भूलना नहीं होगा कि हिंदी पत्रकारिता का एक दौर वह भी रहा है जब संपादक अखबार में छपे हर शब्द की शुद्धता के प्रति स्वयं आश्वस्त होते थे और किसी प्रकार की गलती को गंभीरता से लिया जाता था। गलती के लिए भूल-सुधार प्रकाशित करने की परंपरा थी, पर अब वह संस्कृति लुप्त ही हो चुकी है। यह हिंदी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

हिंदी पत्रकारिता के साथ एक विडंबना यह भी है कि सरकारी कामकाज की तरह यहां भी हिंदी अनुवाद की ही भाषा बनी हुई है। जो सामग्री सहजता से हिंदी में उपलब्ध है, उसे भी अंग्रेजी से अनुवाद कर प्रकाशित किया जाता है। यह हिंदी भाषा और समाज के पिछड़ेपन की ही निशानी कहा जा सकता है। लगता है, अपने औपनिवेशिक अतीत से अभी तक हम उबर नहीं पाए हैं। भूलना नहीं होगा, प्रेमचंद ने अंग्रेजी को ‘गुलामी का तौक’ कहा था। यह एक बड़ा सवाल है कि अंग्रेजी की गुलामी या कहें उसके प्रति विशेष पर गैरजरूरी आकर्षण से हम कब उबर पाएंगे।

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साहित्यकार तो थे ही, वे भाषण-वीर भी थे | पदानुसार भी वे व्याख्याता ही थे | कम्प्यूटर और इंटरनेट विषय पर उनका व्याख्यान चल रहा था | बोले, आज कम्प्यूटर ने आम आदमी को भी साहित्यकार बना दिया है | जिसे देखो कविता करने लगा है, किसी भी बात पर अपना विरोध दर्ज करने के लिए अपनी सटीक टिप्पणियाँ वाट्सएप और फेसबुक पर डालने लगा है | अभी तक सामान्य जन केवल मौखिक रूप से स्थितियों और लोगों पर तंज कसते थे, अब ‘ब्लोग’ पर व्यंग्य लिखने लगे हैं | ये एक बड़ी भारी साहित्यिक क्रान्ति हुई है | एक मनचला विद्यार्थी हाथ उठाकर खडा हो गया. कहने लगा सच तो यह है सर, आज कम्प्यूटर की दुनिया लम्बा चौड़ा भाषण देने और बड़े बड़े निबंध लिखने के लिए भी हतोत्साहित करती है. अपनी बात थोड़े में और सटीक कहिए और चलते बनिए| बात अच्छी लगे तो “लाइक” का बटन दबाइए और आगे बढ़ जाइए | न अच्छी लगे तो चुप रहिए | मन करे तो अपनी व्यंग्य की भड़ास निकालने के लिए उस पर भी “लाइक” का ही बटन दबा दीजिए | कौन देखता है !

इसमे संदेह नहीं, बड़ी विचित्र है कम्प्यूटर की दुनिया | इसमें कुछ भी आभासित हो सकता है | पूरी दुनिया ही आभासी है | सच झूठ लगता है और झूठ सच लग सकता है | फेस बुक पर डाली गई अपनी नागवार सेल्फी पर आपको ढेरों ‘लाइक’ मिल सकते हैं और आपकी ललितकविता के लालित्य पर अंगूठा दिखाया जा सकता है | कितना ही नियम-विरुद्ध लिख दें, कोई विह्सिल बजाने वाला नहीं है, मानो सबने “सकातात्मक सोच” की कसम खा रखी है. लेकिन कुछ नकचढे, जिनके खून में ही तिनिया निकालना होता है, “लाइक” की इस आभासी व्यवस्था से काफी नाराज़ और दुखी हैं | अरे, हमारी नापसंदगी के लिए भी तो कोई न कोई बटन होना चाहिए | यह क्या, पसंद है तो भी लाइक, नापसंद है तो भी लाइक | बटन दबाना है तो बस लाइक पर ही दबा सकते हैं | और कोई विकल्प है ही नहीं | अब तो इलेक्शन में भी ‘नाटो’ बटन स्वीकार कर लिया गया है | कम्प्यूटर में भी कुछ इसी प्रकार का नकारात्मक बटन ज़रूरी है. स्वनामधन्य प्रूफ-रीडर-नुमा आलोचक आखिर कहाँ जाएं ! बिना उनके यह दुनिया कितनी सूनी सूनी और सपाट हो जाएगी. ज़रा इस पर भी तो गौर कीजिए. जहां देखो स्माइली, हर तरफ लाइक – ये भी भला कोई बात हुई ! प्रजातंत्र के लिए विरोध ज़रूरी है. भारत में तो विरोध का नाम ही प्रजातंत्र है | और इंटरनेट पर विरोध के लिए कोई प्रतीकात्मक स्थान तक नहीं ! बड़ी ज्यादती है !

गूगल अब थोड़ा थोड़ा मन बना रहा है | सोचा जा रहा है कि लाइक के साथ साथ अब अब ‘डिसलाइक’ का विकल्प भी दिया जाए | नकचढो की नकारात्मकता की खुजली का भी कुछ न कुछ इलाज किया जाए. डिसलाइक के बटन की संभावना ने ही पैदाइशी आलोचकों के पेट में गुद्गुदी मचाना शुरू कर दी है. गूगल को वे एडवांस में धन्यवाद दे रहे हैं | कितना खुशगवार होगा वह दिन जब ‘डिसलाइक’ का विकल्प हाथ लग जाएगा | फेसबुक और वाट्सएप पर खुशी की लहर दौड़ गयी है | सुन्दर से सुन्दर सेल्फी पर ‘डिसलाइक’ बटन न दबाया तो कहना !

कहा गया है कि ‘लाइक’ का एक विकल्प सीटी बजाना (विह्सिल) भी हो सकता है. मुझे लगता है, यह ज्यादह अच्छा रहेगा क्योंकि सीटी बजने वाले बटन में हमेशा थोड़ी अस्पष्टता की गुंजाइश रहेगी | अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में सुन्दर लड़की को देखकर लडके सीटी मारते हैं वहीं खेल (जैसे फुटबाल) में नियम विरुद्ध खेल होने पर भी सीटी बजा दी जाती है. विह्सिल का विकल्प हमेशा भ्रम में रखेगा कि यह खुशी का इज़हार है या फिर यह फाउल के लिए है. और इसी में सीटी बजाने वाले की सफलता का राज़ है. वैसे यह बात तय है कि सीटी हो या नापसंदगी, विह्सिल हो या डिसलाइक, दोनों ही असहमति के हथियार की तरह ही आभासी दुनिया मे प्रयोग होंगे | लाइक का एकछत्र राज ख़त्म हो जाएगा |

 

चरित्र


    संस्कार शाला के प्रधान बोले, ''देखिए, हमारे गुरूजी ने यह चरित्र निर्माण की पुस्तक लिखी है, आप को इसी पुस्तक में से बच्चों को समझाना होगा, अलग से अपना ज्ञान नहीं बखानेंगे'' प्रशिक्षु जयन्त ने विनम्रता से कहा, ''श्रीमान चरित्र तो हममें ही नहीं है, मात्र भाषण देने से क्या होगा? मैं तो इन बच्चों की आदतें सही कर पाया, सही रास्ते पर जीवन जीने के नियम बतला पाया, यही बहुत होगा।''

विधवा


    संजना बोली, ''मम्मीजी, करवा चौथ की पूजा करवाइए ना'' मम्मीजी बोली, ''बहू में पूजा में कैसे बैठ सकती हूँ, अपशकुन होगा'' संजना बोली, ''नहीं मम्मीजी, मां मां होती है, न सुहागन, न विधवा, करवा चौथ की पूजा में अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद तो मैं आप से ही लूंगी, पुरानी सोच छोड़िए मम्मीजी, जल्दी आइए पूजा में'' भीगी पलकों से मम्मीजी संजना की पूजा करवा रहीं थीं।

स्नेह


    पांच वर्षीया नन्ही गुड़िया मम्मी से पूछती, ''मम्मी, आशीष अंकल हमेशा मेरे लिए चाकलेट गिफ्ट लेकर आते हैं, मैं उनके लिए क्या कर सकती हूँ?'' मम्मी बोली, ''तुम अभी बहुत छोटी हो, जब बड़ी हो जाए, तब जो मन में हो वह करना'' आशीष अंकल जब भी घर आते, तो कहती, ''अंकल, यहीं पर खाना खाकर ही जाऐंगे, अंकल को खाना खिलाए बिना मैं जाने ही नहीं दूंगी।'' निर्मल स्नेह से आशीष की पलकें भीग जाती थीं।

राखी


    नवम्बर महीने में पाठिका मनीषा दीदी के यहां से जब कैलाश राखी बंधवा कर आया, तो लौटते में दो तीन दिन मनीषा दीदी की मम्मी के यहां भी रूकना था, वे बोली, ''अभी कौन सा राखी का मौसम है?'' कैलाश बोला, ''नानीजी, दीदी की स्नेह ममता प्यार भरी राखी तो मेरे लिए अनमोल आशीर्वाद है'' जब तक राखी का धागा स्वतः ही नहीं गल गया कई महीनों तक कैलाश की कलाई में वह राखी बंधी रही।

तिलक


    पुरूषोत्तमजी बोले, ''संध्या तो आपकी बेटी समान है, परसों हम लड़के वालों के यहां तिलक का दस्तूर लेकर जा रहे हैं, आप तो परिवार के सदस्य समान हैं, चलना ही है।'' राजकिशोर बोले, ''जी, मुझे गरीबों के यहां जाकर रहने खाने के लिए भार नहीं बनना'' पुरूषोत्तम बोले, ''पर उनका तो करोड़ों का व्यापार है, गरीब कैसे?'' राज किशोर बोले, ''इतना होते हुए भी तिलक में 11 लाख रूपए नगद मांग रहे हैं, मांगने वाला गरीब ही होता हैं।''

भामाशाह


    स्कूल कमेटी में वार्षिक उत्सव में मुख्य अतिथि के चयन पर निर्णय हेतु मंथन चल रहा था, ''स्कूल के भामाशाह दान दाता यशपालजी को बुलाते हैं, स्कूल के बच्चों के प्रति उनका स्नेह भी है।'' कमेटी अध्यक्ष बोले, ''नहीं, यशपालजी तो बेवकूफ हैं, वे तो निःस्वार्थ दान हेतु अगले वर्ष फिर आ जाऐंगे, हम तो बिजली घर के प्रबंध निदेशक को बुलाऐंगे, सरकारी फंड से कुछ देने की घोषणा तो कर ही जाऐंगे।''

जीवन


    रेखा नाराज़ थी, ''पिछले महीने ही तो मम्मीजी को आपने खून दिया था, एक महीने बाद ही झूठ बोलकर आज मेरे लिए फिर एक बोतल खून दे दिया, अपना भी तो ख्याल रखों।'' नीहार बोला, ''मेरा ख्याल रखने के लिए तुम दोनों हो ना, मुझे तो मम्मी का भी जीवन बचाना था, तुम्हारा भी, तुम दोनों स्वस्थ रहो, मां की सेवा करना मेरा कर्त्तव्य है, तुम्हें भी स्वस्थ रखना मेरा प्रेम है'' रेखा भीगी पलकें पोंछ रही थी।

शोध


    श्रीवास्तवजी के मित्र सलाह दे रहे थे, ''शोध रिसर्च पी.एच.डी. से क्या मिलेगा? क्यों पैसा लगा रहे हो बेटी की रिसर्च में? नौकरी करवाते'' श्रीवास्तवजी बोले, ''बंधु नौकरी तो कभी भी कर लेगी, पी.एच.डी. की डिग्री तो उम्र भर कभी भी सहायक ही होगी, रिसर्च में लगा पैसा खर्च नहीं, निवेश है, पूंजी है, स्थायी सम्पत्ति है, मुझे गर्व है कि मेरी बेटी डा. मिली से पहचानी जाएगी।'' पापा को सुनकर डा. मिली पलकें पोंछ रही थी।

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दिलीप भाटिया (Dileep Bhatia), रावतभाटा 323307, मो. न. : 09461591498,
ई-मेल : dileepkailash@gmail.com <mailto:dileepkailash@gmail.com>

ऋतुराज सिंह वास्तविक बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं. आप कमाल की चित्रकारी करते हैं, कमाल का कार्टून बनाते हैं और कमाल की कविताएँ लिखते हैं. लघु व्यंग्य भी धमाकेदार लिखते हैं. इनके फ़ेसबुक वाल (https://www.facebook.com/rituraj.singhkaul) से साभार कुछ चित्र कविताएँ:

जख़्म का नमकीन होना

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गरजती धूप

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आँखों का पानी

तुम्हारी आँखों का पानी मर गया
इसलिए नज़र फेर लेता हूँ
की जब नज़र मिले तो
तुम शर्मिंदा न हो

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गर्दन तोड़ लेता है

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भूख ठूंसता हूँ

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जहर बो दूं

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मैं किसान हूँ

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पानी खरोंचता हूँ मैं

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उषा छाबड़ा ने बच्चों के लिए तथा अन्य कथा कहानियाँ व सामग्री के  बहुत से वीडियो व ऑडियो यूट्यूब व साउंडक्लाउड में अपलोड किए हैं. बेहद प्रोफ़ेशनल गुणवत्ता और मनोरंजक तरीके से ये तैयार किए गए हैं. जिसके लिए वे बधाई की पात्र हैं.

उनके द्वारा एक कहानी नकलची बंदर का पाठ आप नीचे दिए यूट्यूब वीडियो से देख सुन सकते हैं -

अन्य कहानियाँ देखने सुनने के लिए उषा छाबड़ा के यूट्यूब चैनल पर जाएँ. इनके यूट्यूब चैनल की लिंक  है -

https://www.youtube.com/channel/UC6pf777vk_qQ7iU6qqzGWWA

 

ऑडियो में भी बहुत सी सामग्री है, जिन्हें सुनना चाहें तो इस कड़ी पर जाएँ -

 

http://www.ushachhabra.com/Portfolio/

9413306077

www.drdeepakacharya.com

जानवरों के बारे में कहा जाता है कि जिसके मुँह खून लग जाता है वह फिर उसे कभी छोड़ता नहीं, उसके जीवन का लक्ष्य ही खून का चस्का होकर रह जाता है। कुत्ता एक बार पागल होकर किसी को काट खाता है, उसके बाद वह मरते दम तक पागल ही बना रहता है जब तक कि वह खुद न मर जाए या कोई मार न डाले।

बाघ भी जब किसी इंसान का खून पी लेता है फिर उसे दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता, वह एक के बाद एक इंसान का शिकार करता ही रहता है और उसकी गति-मुक्ति फिर दूसरे लोगों को ही करनी पड़ती है। न कुत्तों का पागलपन  दूर किया जा सकता है, न

नरभक्षी शेरों की आदत को कभी नहीं छुड़वाया जा सकता। वह तो खून पियेगा ही। आदमी भी काफी हद तक ऎसा ही होता जा रहा है।  कोई भूखा-प्यासा और दीन-हीन भीख मांगे तो बात समझ में आती है लेकिन ऎसे-ऎसे लोग भीख मांग रहे हैं जिन्हें किसी चीज की कोई आवश्यकता नहीं है।

केवल एक ही धुन सवार है और वह है दौलत जमा करने की। यह अलग बात है कि ये लोग केवल धन-संपत्ति जमा ही जमा करने का काम करते रहते हैं, यह धन उनके किसी काम नहीं आता। धन की तीन ही गतियां हैं। या तो छापा पड़ जाता है और जिन्दगी भर की कमायी हुई प्रतिष्ठा के साथ सम्पत्ति भी चली जाती है। या नष्ट हो जाता है अथवा चोर-डकैत चुरा ले जाते हैं।  इसे ही कहते हैं धन भी गया और धरम भी। बड़े-बड़े भिखारी बेशर्मी के साथ सामने आ रहे हैं।

गली-मोहल्लों, चौराहों-तिराहों से लेकर सब तरफ भिखारी ही भिखारी नज़र आ रहे हैं। कोई छुपा रुस्तम भिखारी है, कोई दिखता है, कोई  ऊपर से दिखता नहीं पर होता सुपर भिखारी है।  इंसान की पूरी जिन्दगी में वह तभी तक मानवीय, ईमानदार, संवेदनशील और समाज या देश के लिए उपयोगी बना रहता है जब तक कि वह पैसों का अंधा दास न हो, भिखारी न हो।

एक तरफ व्यक्ति की जिन्दगी के सारे संस्कार, चरित्र, मर्यादाएं, कुटुम्ब के प्रति आत्मीयता, प्रेम-सद्भाव, सामाजिक सौहार्द और माधुर्य और दूसरी तरफ केवल और केवल दौलत। जब तक हराम का पैसा अपने पास नहीं होता है तभी तक वह इंसान कहलाने लायक रहता है।

जैसे ही हराम का पैसा आने लगता है, भ्रष्टाचार और रिश्वत का पैसा घर में प्रवेश कर जाता है, मुफतिया भोग-विलास और लजीज खान-पान मिलने लगता है, सब कुछ पराया ही पराया आनंद देने लगता है तब इंसान मुद्राभक्षी हो जाता है।

एक बार जो कोई आदमी मुद्राभक्षी हो जाता है फिर उसे वापस सामान्य इंसान बनाना असंभव है। इस तरह के इंसान के लिए पूरी दुनिया, रिश्ते-नाते, मर्यादाएं, चरित्र, संस्कार, ईमानदारी और संवेदनशीलता सब कुछ समाप्त हो जाता है।

उसकी पूरी की पूरी जिन्दगी दौलत के लिए समर्पित हो जाती है, दूसरा कुछ सूझता ही नहीं। दिन के उजाले की बात हो या फिर रात के सपनों की, उसे धन-सम्पदा ही दिखती है और हर काम से लेकर प्रत्येक इंसान तक को एटीएम समझता है जिससे कार्ड के बिना भी किसी न किसी प्रकार से गुमराह कर, दबाव डाल कर या प्रलोभन देकर पैसों की उगाही का धंधा चलता रहे।

इन लोगों के जीवन का हर कर्म, व्यवहार और स्वभाव सब कुछ मुद्राओं के बाजारों की तरह बन जाता है जहां सिर्फ वही बात सुनी, बोली और समझी जाती है जिसमें मुद्रा की खनक या नोटों की फडफड़ाहट की ध्वनि निकलती हो।

इन लोगों के लिए वे ही सारा समाज, घर-परिवार और कुटुम्ब गौण हो जाता है और ये उन लोगों से निकटस्थ आत्मीय और सहजात जैसे हो जाते हैं जिनसे लेन-देन का कारोबार बना रहता है। इस मामले में इन सारे के सारे असामाजिकों को सामाजिक होते हुए देखा जा सकता है। इनका अपना एक समाज बन जाता है जिसमें दो-तीन तरह के लोग होते हैं। लाने वाले, देने वाले और पाने वाले। इनके सिवा और किसी की न जरूरत पड़ती है न अन्य किसी को स्वीकारा जाता है।

इन संबंधों में न जात-पात देखी जाती है, न कोई ऊँच-नीच, न छोटा-बड़ा। समरसता और समानता का इससे बड़ा कोई उदाहरण दुनिया भर में कहीं  भी देखने को नहीं मिलता जितना इन मुद्राभक्षी कबीलों में। जो एक बार मुद्राभक्षी हो जाता है वह किसी को भी बेच या खरीद सकता है। चाहे समाज हो या देश।

इन लोगों को मुद्रा चाहिए होती है और इसके लिए कुछ भी करने-करवाने को हर क्षण तैयार रहते हैं। इन भिखारियों को मुद्रा दे दो, फिर सब कुछ लूट ले जाओ, इनके बाप का क्या जाता है, भुगतना तो समाज और देश को पड़ता है।

असली असामाजिक और देशद्रोही तो ये भिखारी हैं जो जमीर बेचकर दुनिया का सब कुछ खरीदने और बेचने की ताकत पा लिया करते हैं। कोई इस मुगालते में न रहे कि ये हमारे अपने हैं, ये किसी के नहीं हो सकते। यहां तक कि अपने भी नहीं। कोई मुद्रा का लोभ-लालच दिखाये तो ये अपने शरीर के अंग तक गिरवी या पीपीपी मोड पर रख दें या बेच डालें।  हे राम ! इन भिखारियों को हमारे मुल्क में ही क्यों पैदा किया होगा?

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5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष

 

० आदतों में परिवर्तन से होगा संरक्षण

अपने पर्यावरण को सहेजना या उसे अनुकूल बनाये रखना हमारे के लिए कोई एवरेस्ट चढऩे जैसा कठिन कार्य नहीं है। अपने आसपास हो रहे प्रकृति विरूद्ध कार्य को रोकना अथवा ऐसा करने वालों को टोकना या ही इस महान कार्य की शुरूआत मानी जा सकती है। वास्तव में हो तो ऐसा रहा है कि हम सब कुछ गलत होता देख रहे है, और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर रहे है। जिस दिन हम गलत कार्य को होते न देखने की प्रतिज्ञा ले लेेंगे, उस दिन से हमारा पर्यावरण सुधार की राह पर बढ़ चलेगा। इसकी शुरूआत हमें उस स्थान से करनी होगी, जहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग हमें मिले और हम अपने पर्यावरण की चिंता उन पर भी डालना शुरू कर दें। जहां तक मैं समझता हूं इस अभियान की शुरूआत विद्यालयों और महाविद्यालयों से की जानी चाहिए। वर्तमान परिदृश्य हमें दिखा रहा है कि प्रतिदिन हमारे देश के शाला परिसरों में प्लास्टिक की थैलियां लाखों की तादाद में फेंकी जा रही है। ये थैलियां कैसे आ रही है? इस पर चिंतन जरूरी है। बच्चों द्वारा अपने लंच बाक्स के स्थान पर जंकफुड का इस्तेमाल इसका सबसे बड़ा कारण है। अब तो बच्चे पानी भी पाऊच में लेकर आने लगे है। हमें इसे रोकने बच्चों के टिफिन में रोटी-सब्जी से लेकर घर पर बनाये जाने वाले अन्य प्रकार के भोजन की अनिवार्यता पर बदलना होगा। पानी के लिए शालाओं में ही पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी। बच्चों को प्लास्टिक की बॉटल में पानी न लाने अथवा पाऊच का उपयोग न करने की हिदायत भी दी जा सकती है। उन्हें यह समझाया जा सकता है कि पानी कांच की बोतल या फिर ठंडा रखने वाली स्टील की बॉटल में लाया जा सकता है। यह शुरूआती प्रयास संतुलन के लिए बीजारोपण का कार्य कर सकता है।

पाठ्यक्रम में शामिल पर्यावरण विषय की गंभीरता को समझना होगा

हमारे बिगड़ते पर्यावरण को चिंता के चश्में से देखते हुए पर्यावरण विदों ने विद्यालयीन पाठ्यक्रम से लेकर महाविद्यालयों तक इसे अनिवार्य विषय में रूप में शामिल किया है। इस विषय की गंभीरता उस समय खत्म हो गई, जब इसमें पास होना जरूरी नहीं बल्कि शामिल होना जरूरी बना दिया गया। हमारी पाठ्यक्रम निर्माता समिति ने भला किस सोच के साथ ऐसा किया, कि विषय का महत्व ही समाप्त हो गया? आज की ज्वलंत समस्या से प्रत्यक्ष संबंध रखने वाले उक्त विषय को हर स्थिति में अनिवार्य करना ही जागरूकता की अच्छी कड़ी मानी जा सकती है। हमारे पर्यावरण को प्राणियों के अनुकूल बनाने में हमारा योगदान जो सहयोग कर सकता है, उससे कहीं अधिक सकारात्मक परिणाम हमारी वर्तमान पीढ़ी दे सकती है। यदि बच्चों के दिमाग में इस बात को बैठा दिया जाए कि पर्यावरण ही उनके विकास का मार्ग तय करेगा, तो ऐसी कोई ताकत नहीं, जो पर्यावरण संतुलन की स्थिति को टाल सके। बच्चों को शालेय स्तर पर उनके आसपास फल-फुल रहे पौधों के संरक्षण की विधि से परिचित कराना एक अच्छा कदम हो सकता है। उन्हें अलग-अलग वर्गों में बांटते हुए क्यारियों की देखभाल कर जिम्मा दिया जा सकता है। बदले में उन्हें उसी तरह अंक प्रदान किए जा सकते है जैसे की विज्ञान संकाय के बच्चों को प्रायोगिक तौर पर दिये जाते है। जिन क्यारियों में अधिक जीवित पौधे और हरियाली का सामंजस्य पाया जाए, उन क्यारियों के रखवाले छात्रों को ‘पर्यावरण मित्र’ अथवा ऐसे ही उत्साहित करने वाले अवार्ड दिये जा सकते है। इस प्रकार की शैक्षणिक गतिविधि बच्चों को पेड़ पौधों से स्नेह का पाठ पढ़ा सकती है।

बागवानी की शिक्षा घरों से

दुनिया में बढ़ रही भीड़ के चलते घरों के दायरे भी सिमटते जा रहे है। ऐसे में घरों में हरियाली के लिए स्थान बनाना बड़ा ही दुष्कर कार्य लगने लगा है। पर्यावरण को बचाने और उसकी शुद्धता को विकार में परिवर्तित न होने देने का संकल्प हरियाली से मित्रता के रूप में सामने लाया जा सकता है। इसके लिए ‘विंडो गार्डिनिंग’ एक अच्छी पहल हो सकती है। लटकाने वाले गमलों का प्रयोग भी काफी राहत दे सकता है। जब से शहरों में महानगरों की तर्ज पर फ्लैट संस्कृति का उदय हुआ है, तब से पर्यावरण अथवा हरियाली के लिए बड़ी समस्या भी सामने आई है। ग्राऊंड फ्लोर के फ्लैट में उपलब्ध खाली जगह पार्किंग का स्थान ले रही है, तो छतों की गगनचुंबी ऊंचाई पानी की समस्या से जुझ रही है। ऐसी विकट स्थिति में फ्लैट में रहने वाले लोगों को शुद्ध और ठंडी हवा के लिए ‘विंडो गार्डिनिंग’ और गमलों को लटकाकर हरियाली रखने वाली विधा को अमल में लाना ही हितकर होगा। बागवानी की शिक्षा बच्चों को अनिवार्यत: दी जानी चाहिए। यह विषय भी पहले पाठ्यक्रम में शामिल था, किंतु विकास की अंधी दौड़ और पेड़ पौधों की संस्कृ़ति से भागने की आदत ने उसे भी बेमौत मार डाला है। हमारी भारतीय संस्कृति ने हमें पर्यावरण से जोड़े रखने के लिए ही तुलसी, पीपल, बरगद, आंवला आदि पेड़ पौधों की पूजा अर्चना की पाठ पढ़ाया था। आज भी पर्यावरण की शुद्धता में तुलसी का योगदान सबसे अधिक है। हमें अपने घरों में अपने गमला रखने की क्षमता के अनुसार बागवानी को प्रोत्साहन देना शुरू करना होगा। नगर प्रशासन को भी इसे अनिवार्य बनाते हुए प्रत्येक घर में कम से कम गमलों की संख्या तय करने का नियम बना देना चाहिए।

तीन सौ पैंसठ चौबीस का फार्मुला ही बचा सकता है पर्यावरण

पर्यावरण बचाने अथवा गर्म पृथ्वी को ठंडा करने की हमारी चिंता कोरी बहस बनकर न रह जाए। वर्ष में एक दिन विश्व पर्यावरण दिवस मना लेने से हम अपनी प्राकृतिक संपदा को नहीं बचा पाऐंगे। वर्ष के पूरे 365 दिन और 24 घंटे हमें पर्यावरण की देख-रेख में देने होंगे। हमें इस बात का बराबर ख्याल रखना होगा कि हम कोई ऐसा कार्य दिनभर में न करे, जिससे हमारी पृथ्वी प्रदूषित होकर पर्यावरण में विष घोलने का काम करें। जीवन की जिस भाग दौड़ में हम स्वस्थ जीवन के मायनों को भुल चुके है उन पर पुन: लौटना ही पर्यावरण की चिंता हो सकती है। हम वह काम कर रहे है जो हिंदी साहित्य में कालीदासजी पर व्यंग्य रूप में कहा जाता रहा है। जिन हरे भरे पेड़ पौधों ने हमें सुरक्षित और स्वस्थ जीवन प्रदान किया, हम उसे ही काट रहे है। अपनी मजबूत पर्यावरणीय नींव को जड़ से उखाडक़र हम वास्तव में क्या पाना चाहते है? उसकी भयावह तस्वीर आज हमें परेशान करने लगी है। विकास के नाम पर हमनें अपनी सोच को बदल डाली, किंतु यह भुल गए है कि सच क्या है। पहले हमारी सोच थी कि हमारे अपने अस्तित्व के लिए पेड़ पौधों, जंगल-नदियों-तालाबों, वन्य प्राणियों, पशु-पक्षियों का होना नितांत जरूरी है। अब हमारी सोच स्वार्थ परता में लिप्त होकर यहीं तक सिमट कर रह गई है कि पेड़-पौधों, जंगल और नदी-तालाबों को पर्यावरण के लिए बचाना जरूरी है। आज भी हम यदि यह नहीं समझ पा रहे है कि प्रतिदिन पर्यावरण और पृथ्वी की रक्षा का संकल्प हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए तो वह दिन दूर नहीं जब न तो पर्यावरण ही बच पाएगा और न ही हमारी पृथ्वी। पृथ्वी पर आग बरसेगी और हमारा अस्तित्व इस दुनिया से मिट जाएगा।

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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देहरादून का कैण्ट इलाका है; शान्त, सुन्दर….. और ऊपर से मौसम की मेहरबानी । आज तो सुबह से ही रूक रूक कर बारिश हो रही है। सड़कें थोड़ी गीली, थोड़ी शुष्क है जिन पर एकाध गाड़ियाँ चल रही हैं । शाम के 6 बज चुके हैं और मंदिर वाली गली के कोने में नेगी ढाबे पर इस वक्त हलचल बढ़नी शुरू हो गई है , चाय और समोसे की खुशबू ने यहां बारिश के मौसम का रंग जमा रखा है । इसके सामने सड़क पर अभी अभी एक कॉलेज की बस रूकी है जो गली के गर्ल्स हॉस्टल की है । बस से एक एक कर लड़कियाँ उतर रही हैं ..... कुछ ने छाते निकाल रखे हैं, तो कुछ ने स्टोल से सिर ढक रखा है और सम्भलती हुई कदम रख रही हैं, वँही कुछ चमकती आँखों के साथ इस खुशनुमा मौसम का मजा लेने सड़क पर निकल आई हैं । आखिर में दो लड़कियाँ इत्मीनान से बस ड्राइवर को बाय करती हुई बाहर आती हैं... और बस से उतरते ही उसमें एक तेज कदमों से चल कर दुकान के टिन शेड के नीचे पहुंच जाती है , दूसरी सड़क पर रूक कर दोनों बाहें फैलाए ....“वाउ! क्या माइन्ड ब्लोईंग मौसम है यार ....बिलकुल नाईन्टिज के गानों के जैसे ...” । “हां जरूर लेकिन अभी ईपी निकाल कर और इक्कीसवीं सदी में आ जाइए स्वाति मैडम” किनारे खड़ी लड़की ने हंसते हुए कहा । स्वाति ने झट से अपने कान से ईयरफोन निकाला और मोबाईल,ईपी दोनो को बैग के साईड पाकेट में डालते हुए उसके पास पँहुच कर बोला “लो आ गई इक्कसवीं सदी में ... लेकिन इस मौसम में चाय समोसे तो बनते हैं ..रिचा” । रिचा स्वाति के कन्धे पर हाँथ रखते हुए … “हाँ तो चलो मैने कब मन किया” ।

दोनों दौड़कर नेगी ढाबे पर पहुँचती हैं ... स्वाति… “भैया दो चाय और दो समोसे .....’पनीर वाले’..” तेज आवाज में आर्डर देती है । ढाबे वाला.. “बैठिए अभी भिजवाते हैं”। दोनों ढाबे के अन्दर बने कमरे में बैठ जाती हैं ...जँहा दो चार लोग और बैठे हैं, सामने एक लड़का बैठा है ..सर नीचे है और नजरे अपने मोबाईल के स्क्रीन पर । कमरे में लड़कियों की आवाज और हँसी से सबका ध्यान उनकी तरफ आ चुका है सिवाए उस लड़के के । यहाँ लड़कियों के नान स्टाप बातों का सिलसिला शुरू हो चुका है .... स्वाति… “कल सण्डे है यार... असाइनमेंट बनाना है “। रिचा ... “हाँ पर मुझे शॉपिंग के लिए मार्केट भी जाना है, एक दिन की तो आउटिंग मिलती है हमें” । स्वाति.. “ हाँ यार मुझे भी टेलर के पास जाना है वो लास्ट वीक ड्रेस दी थी ना ऑल्टर करने.. उसे लेना है” । लड़कियाँ जिस जगह ,जिस शहर पहुँचे..सबसे पहले वहाँ के टेलर से जान पहचान हो जाती है।

बातें करती हुई थोड़ी देर में स्वाति को महसूस होता है कि मौसम तो पहले से ही ठण्डा है, कमरे में फैन ने बेकार ही शोर मचाए है..क्यों ना उसे बन्द ही कर दे....ये सोचती हुई स्विच बोर्ड पर नजर घुमाई तो देखा कि उसके बगल में सामने वाला लड़का बैठा है। स्वाति ने हल्की स्माईल के साथ उस लड़के से कहा … “एक्सक्यूज मी ! आप वो फैन ऑफ कर देंगे प्लीज..” जिस पर उसने सीधे स्वाति को कोई प्रतिक्रिया न देते हुए, ढाबे पर काम करने वाले एक लड़के को फैन ऑफ करने का इशारा कर दिया। यह देख स्वाति सोच रही है कि खुद भी तो कर सकता था ..दो कदम की दूरी पर ही तो स्विचबोर्ड है , तभी ढाबे वाला लड़का एक कप चाय और एक प्लेट बन्द मख्खन लड़के के टेबल पर रखने के बाद फैन बन्द करता है और लौटने लगता है तो उसे टोकती हुई स्वाति ने कहा..“क्यों भैया हमारी चाय कहाँ है”? लड़का… “वो अभी गर्म हो रही है” । सवालिया लहजे में स्वाति ने फिर पुछा... “अच्छा, उधर तो दे दी” । लड़का रूकते हुए.. “जी.. वो भइया थोड़ी ठण्डी चाय पीते है ना इसलिए उनको दे दी ..आप की अभी ले आते हैं”। “ओके”..होठों को गोल घुमाते हुए स्वाति ने मुँह बनाकर बोला ।

स्वाती ने सामने वाले लड़के की तरफ देखा पर वँहा तो कोई रिएक्शन ही नहीं है..जैसे कुछ सुना ही ना हो..किसी से कोई मतलब नहीं ..। उसने अपना मोबाईल टेबल पर एक साइड रखा और चाय पीने लगा। स्वाति की नजरे अभी भी उस पर है । ये देख रिचा ने धीरे से कहा .. “क्या बात है, अच्छा लग रहा है क्या” ? स्वाति ... “अच्छा है पर उतना भी नहीं जितना कि ऐटिट्यूड दिखा रहा है” कहते हुए पीछे मुड़कर ढाबे वाले को आवाज लगाई ... “भैया समोसे भी गर्म ही लाना ..ठण्डी चाय और समोसे का कोई मजा नहीं है”। अबकी उस लड़के ने एक शान्त नजर डाली सामने बैठी लड़कियों पर और फिर चाय की शिप लेते हुए बन्द खाने लगा .. तो स्वाति भी रिचा से बातों में व्यस्त होने का थोड़ा बहाना सा करने लगी.. “तो असाइनमेंट की कापी ले ली तूने” । रिचा … “नहीं अभी खरीदनी है यार, और हाँ वो उसके टापिक दे देना मुझे, मै नोट नहीं कर पाई….रावत सर भी ना एक बार जो डिक्टेट कर देते हैं दुबारा रिपीट ही नहीं करते” । “हूँ..... ले लेना, लिख लिए हैं मैंने” ...स्वाति ने कहा ।

सब बातें चल रही हैं पर रह रह कर उसका ध्यान सामने बैठे लड़के पर ही जा रहा है। अबकी स्वाति ने एक ऑब्जरवेशन वाली नजर उस पर डाली....सामान्य नैन नक्श और औसत कद काठी का लड़का है, ड्रेसिंग और हेयर स्टाईल से भी डिसेंट लग रहा है ...चेहरे पर भाव तो सौम्य है लेकिन स्वभाव से अड़ियल लग रहा है। स्वाति बाते तो रिचा से कर रही है पर मन ही मन उस लड़के के ऑब्जरवेशन में लगी है इस बीच उसके चाय समोसे कब के आ चुके ये उसे पता ही नहीं चला। “ऐटिट्यूड तो ऐसे है जैसे कि रजवाड़े से आए हैं...हमममम पर मुझे क्या करना है जो भी है” ....ये सोचते हुए फाईनली अपना ध्यान उधर से हटा कर सामने रखे चाय और समोसे पर लगाया । तभी तीन लड़के और ढाबे में एंट्री करते हैं और सामने बैठे लड़के को देख तेज आवाज लगाते है ...अबे यँहा बैठे हो! ..पास आ कर “अच्छा बेटा अकेले अकेले चाय और बन्द” कहते हुए एक उसकी बगल में बैठ गया।

लड़के ने बन्द वाली प्लेट उसकी तरफ आगे बढाते हुए कहा कि “कॉल की थी पर तुम्हारा पता ही नहीं चला , दूसरे ने बन्द का टुकड़ा लेते हुए “हाँ यार वो मैंने अभी देखा” । बाकी दो लड़के ढाबे में रखे छोटे फ्रिज को खोल कर कोल्ड ड्रिंक निकाल रहें हैं जिन्हें देख कर ढाबे वाला लड़का दौड़ कर आया है और “पूछता है क्या चाहिए आप लोगों को” ..। “कुछ ना भाई, जो चाहिए वो ले लेंगे.. अपनी ही दुकान है क्यों नेगी भैया! । इस पर ढाबे वाला मुस्कराते हुए बोला , “बिल्कुल भाईयों आप का ही है”। लड़कों की आवाजों और शोरगुल के बीच स्वाति और रिचा चुप सी हो गई हैं। दोनों खामोशी से समोसे खाए जा रही हैं। दो चार मिनट के शोरसराबे के बाद लड़के अब बाहर निकलने लगते हैं और जाते हुए कुछ समोसे उठाकर बोलते हैं.. “भैया हिसाब में लिख लेना”।

सामने वाला लड़का अभी भी अपनी जगह पर है ..अब उसने पर्स से पैसे निकाले हैं और टेबल पर रख दिया फिर अपना सेलफोन पॉकेट में डालते हुए जाने के लिए उठता है लेकिन ये क्या अबकी स्वाति उसे देख कर चौक गई , चेयर के बगल में रखे वॉकर को आगे कर जब उसने अपना पहला कदम बढाया तो स्वाति का चेहरा स्तब्ध रह गया और लड़का वॉकर के सहारे चलते हुए उसके बगल से निकलकर आगे बढ गया। स्वाति भी झट से पीछे मुड़ती है और उसे जाते हुए देख रही है ....वॉकर के सहारे चलते हुए चाल भले ही थोड़ी टेढीं है पर उसके कदम बिल्कुल सधे हुए हैं। पल भर पहले जिसको लेकर उसने ना जाने कितने पूर्वाग्रह पाल लिए थे ,अब उसी के लिए दिल पिघल सा गया है ..जैसे जैसे वो दूर जा रहा है वैसे ही दिल में उतरता जा रहा है ।

क्या लाजवाब बन्दा है! उसे देख कर लगता ही नहीं कि उसकी लाइफ में ऐसी कोई दिक्कत होगी, और एक यँहा.. अगर राह चलते वक्त कभी सैन्डल टूट जाए तो मन उलझन में आ जाता है, कुछ कदम भी चलना मुश्किल हो जाता है और दूसरा ये शख्स है जो बैशाखी के सहारे जिंदगी के सफर को तय कर रहा है लेकिन चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं है ...फिजिकली चैलेन्जड होते हुए भी गजब का व्यक्तित्व लिए हुए है। जी में आ रहा है कि दौड़कर जा उससे सारी बोल आए, उन सब उलटी सीधी बातों के लिए जो उसने मन ही मन सोच लिए थे उस लड़के के लिए ..या फिर उससे कुछ बात ही कर ले ..अरे ऐसे बन्दे से दोस्ती कर लेनी चाहिए। मन में चल रही ऐसी उधड़ बुन और धड़कते दिल पर आखिर में स्वाति ने इस विचार के साथ लगाम लगाई कि ऐसे बिन्दास व्यक्ति को किसी के दोस्ती के एहसान या किसी सहानुभूति और तारीफ की जरूरत नहीं है।

बगल में बैठी रिचा को भी स्वाति के मनोस्थिति का एहसास हो चला है और उसने ध्यान हटाने के लिए बोला कि ..“चाय पी लो… ठंडी हो गई”। स्वाति, आँखों की नमी को रिचा की नजरों से बचाते हुए जल्दी से चाय की कप उठा कर पीने लगती है और महसूस करती है कि अब ये ठंडी चाय भी उसे लाजवाब लग रही है।

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यशोधरा विरोदय  "यशु " 

मकान संख्या -501

डॉ शकुंतला मिश्र यूनिवर्सिटी आवास

लखनऊ , यूपी

 

ई -मेल yashuvirodai08@gmail.com

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नए ख्वाब

आज मैं गुजरी उस सड़क से
कराहती सी आवाज़ थी आई
मैदान वो रोया, पीपल चीखा
‘‘बोलो मेरे बच्चे कहाँ है भाई?’’
    इक्के-दुक्के बच्चे बैठे हाथों में
    मोबाइल था भाई,
    मैदानों की सारी खुशियाँ इस
    डिबिया ने बेचकर खाई।
घास उग आई, कूड़ा भर गया
कहाँ रह गई अब वो माँ जाई
जो कहती थी अपने लल्ला को
पल भर जा क्यूं न हवा मैदान की खाई?
    खड़ी रही मैं मूक सी मूर्त
    देती क्या मैं उसे जवाब
    पूछते हैं जब मेरे ही बच्चे
    खेल मैदान के, उनका ख्वाब
    टी.वी., मोबाइल आज के खेल
    रुक गई भईया बच्चों की रेल।


 


दरवाज़े पर खड़ी लड़की
ससुराल से प्रताड़ित,
मन से बेचैन,
शरीर से शिथिल,
काम की मारी,
घर से निकाली गई,
इक म़द़म सी आस,
दिल में दबाए,
भारी कदमों से मायके
के दरवाजे पर खड़ी
इन्तज़ार करती
उसे अन्दर बुलाए जाने का
देखकर भाँप लिए गए हालात,
शुरु हो गई सबकी दलीलें
भाई, भाभी के डर से,
माँ, पिता के डर से,
कोने में खड़ी ताकती रही,
गूंगी, बहरी व मूक सी,
याद आया उसे वो ज़माना,
जब वो आई थी ब्याही
इस चौखट में,
परीक्षा की घड़ियाँ समाप्त
होने का नाम ही न ले रही थी,
हर नज़र वक्त ये ही चीखता,
‘‘देखते हैं कैसे कर पाएगी?’’
चुपचाप अंधेरे मुँह उठना,
देर को सोना, हर किसी
की ज़रूरतों को पूरा करना
फिर भी यही सुनना, ‘‘चार
रोटी खायेगी, तो कुछ काम तो करे।’’
अविरल आँसू बहे हैं उसके।
धीरे-धीरे, विश्वास की चाल,
माँ ने बेटी का हाथ पकड़ा,
अन्दर लाई, बिठाया और कुछ समझाया
भारत की नारी जब लाँघती चौखट
तो नहीं आती लौटकर कभी,
उसे बनानी है अपनी वह दहलीज़,
चली गई वापस बटोर कर आँसू,
लेकर हिदायतें वह अपने घर,
देखते रह गये भाई, बापू व
उस मकान की दिवारें।

 


वो खेल का मैदान
खेलते थे हम कभी,
कबड्डी, फुटबाल,
लम्बी दौड़ व लंगड़ी टाँग,
बैठते थे घंटो, बतियाते
थे सब बातें,
कभी लड़ पड़ते, तो कभी
सुलझे से मुस्कुराते।
    होते ही शाम, निकल पड़ते, सब
    एक-दूसरे को बुला-बुलाकर,
    पहुँच जाते इस मैदान में
    व देखते कौन नहीं आया,
    भेजते छुटकू को उसे घर से बुलाने
    ग़र बीमार होता तो पूछने जाते,
    वरन् पकड़ ले ही आते।
सारा मैदान खुशी के मारे,
ठहाके भरता, गिर जाता कोई
तो उसे मरह़म भी करता
हो जाता अंधेरा, पर खत्म
न होता खेल, बनाते रहते
चलाते रहते वो नन्हें अपनी रेल।
    घर से कई संदेशे आते
    अंधेरा घिर आया, घर वापस आओ
    ‘‘बस 2 मिनट और, अभी आता हूँ।’’
    कह लौटा देते, भईया वापस जाओ।

 

 

मैं क्या हूँ?
ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव में,
नज़र आईं, ज़िन्दगी की संकरी
गलियाँ, पथरीले रास्ते,
भीगी छत और गरम लू से
कई हादसे।
क्यूँ आखिर क्यूँ, सबकी उम्मीदें
टिक जातीं इक औरत पर,
चाहते, वह वही करे, जो वो चाहें,
बोले सिर्फ वो शब्द, जो उन्हें भाएं,
पहने वो कपड़े, खाये वो खाना,
जाए उस जगह, सोचे वो सोच,
जो सदैव उनके हक में हो,
नहीं उसका हँसना-रोना-सोना
भी प्रतिबंधित है, कुछ भी तो
अपना नहीं, टटोलती हूँ खुद को,
अनगिनत सवाल खड़े हो जाते
मेरे सामने लगता इस जन्म में
तो खुद से मुलाकात न होगी
क्योंकि मैं एक औरत हूँ
फिर भी कभी वक्त मिला
तो बताऊँगी, सोचूँगी कि
‘‘मैं क्या हूँ?’’

 

 

 

 

माँ का घर
दूर अति दूर से
आई बेटी,
घर के आँगन में आते ही,
बन जाती नन्हीं चिड़िया।
माँ आज भी पुकारती उसे,
उसी नाम से, जो सहेजा था
उसके पैदा होने से पहले।
पुकार माँ की
ले आती अपने संग
अनगिनत यादें,
जिन्हें रखा है उसने
संभालकर दिल के तहखाने में,
भाई का उसका नाम बिगाड़कर
बुलाना,
मुहल्ले वालों का उस नाम
को छोटा करना
और बापू का साथ में
‘बेटा’ लगाकर बुलाना।
कितनी चिढ़ जाती थी
जब पता चला था
कॉलेज में दोस्तों को
उसका वो नाम।
क्यूँ तड़पी है आज
जब पुकारा माँ ने
ले उसका वो बचपन
का नाम,
क्यूँ सुनना चाहती है
बार-बार वो
बचपन का उसका वो नाम।

शबनम शर्मा ] अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.
मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

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पढ़ाई

आज दिव्या दोपहर में अपने कमरे में गई, लेकिन अभी शाम के 8 बजने को आये, बाहर नहीं निकली। ये बच्ची हमारे पड़ोस में ही रहती है। मैं अपना काम निबटाकर बाहर निकली, तो उसकी मम्मी से राम सलाम हुई। वो मुझे आज कुछ खिन्न सी नज़र आई। मैंने कारण पूछा तो उसने बताया कि उसकी बेटी का रिज़ल्ट आया है, वो अपनी कक्षा में प्रथम आई है। उसने आगे पढ़ने की इच्छा प्रकट की है। लेकिन उनकी जाति में ज़्यादा पढ़े-लिखे लड़के नहीं मिलते। वो मुझसे पूछने लगी, ‘‘बताओ, बहनजी, अब ऐसे हालात में अगर मैं उसे पढ़ा दूँ, तो ये सारी उमर इस घर पर ही बैठी रहेगी, आज दोपहर से कमरा बंद करके बैठी है, रोये जा रही है। न कुछ खाया, न नीचे आई है।’’ उसकी बात सुनकर मुझे एक झटका लगा। मैं अपनी पड़ोसिन को अपने घर ले आई। वह बहुत दुविधा में थी। घर वालों का दबाव, बच्चे का प्यास, उसका भविष्य सब कुछ उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। मैंने कुछ देर इधर-उधर की बातचीत करके उन्हें सहज करने की कोशिश की, फिर कहा, ‘‘देखो दिव्या की मम्मी, हम और आप बरसों से अपनी गृहस्थी चला रहे हैं, कितने उतार-चढ़ाव इसमें देखने पड़ते हैं। आप मुझे बताओ कौन सा रिश्तेदार मदद करने या हमारी समस्या को सुलझाने आया? और हाँ, हम किसकी गृहस्थी में कुछ निपटाने गये? सबको अपनी-अपनी ज़िन्दगी खुद ही निपटानी होती है। दिव्या आपकी बेटी है और आजकल बेटा-बेटी में क्या फर्क? उसे पढ़ाओ और एक अच्छा अफ़सर बनाओ, बिन जाति-पाति देखे अनगिनत रिश्ते आएँगे। एक अच्छा लड़का देखकर शादी कर देना। अगर आपकी जाति में लड़के नहीं पढ़ते, तो इसमें दिव्या का क्या कसूर? वो लाखों में एक है। आगे आपकी मर्जी।’’ वो एकटक मेरी ओर देखती रही और मेरा हाथ थामकर तेज़ी से अपने घर की ओर ले गई व भरी आँखों से दिव्या के कमरे तक। दरवाज़ा खटखटाया, दिव्या ने दरवाज़ा खोला। आँखें सूजी, चेहरा पीला हुआ पड़ा था। माँ ने उसे बाँहों में भरा और बोली, ‘‘बेटी, पोंछ दे अपने आँसू, मैं तुझे पढ़ाई कराऊँगी, भले ही लोग कुछ भी कहें। तेरी आंटी ने मेरी आँखें खोल दी।’’ दिव्या खुशी से और भी ज़ोर से रोने लगी और बोली, ‘‘सच माँ, थैंक यू आँटी, थैंक यू।’’

 

 

दान

सिद्धू वकील शहर के जाने-माने वकीलों में गिने जाते हैं। बड़ा बंगला, भले बच्चे, सुशील बीवी, क्या नहीं है उनके पास। उनके घर में नाती हुआ। मैं भी नन्हें मेहमान को देखने चली गई। घर में चारों ओर रौनक ही रौनक। उसके ननिहाल से भी लोग आए हुए थे। अन्दर वाले कमरे में भीड़ थी। सिद्धू जी बाहर वाले बड़े कमरे में बैठे किताबें पलट रहे थे। मुझे देखकर उन्होंने अपने कमरे में बैठने को कहा। चारों ओर किताबें ही किताबें। बड़ा सोफा, कुछ कुर्सियाँ, मेज़ सब कुछ था वहाँ। औपचारिकता ही बातचीत खत्म हुई। मैंने उन्हें बधाई दी और बात आगे बढ़ाने लगी। पूछ ही बैठी, ‘‘सिद्धू साहब, आपके पिताजी का भी यही व्यवसाय रहा?’’ ‘‘नहीं, वो एक जुलाहे हैं, उन्होंने कड़ी मेहनत करके मुझे पढ़ाया। मैं बचपन से पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन घर की परिस्थितियाँ अनुकूल न थीं। मेरी 2 बहनें, दादा-दादी और एक बुआ भी हमारे साथ थी। पिताजी अकेले कमाने वाले थे। रात-दिन काम करते। मैं भी समय मिलते ही उनकी मदद करता। साथ-साथ मैंने पढ़ाई भी की। वकालत की पढ़ाई के लिये पैसे न थे। पिताजी ने अपनी दुकान बेच दी, माँ ने अपने इक्के-दुक्के गहने। मैं वकील बन गया, मेरा काम भी अच्छा चल निकला। मैंने प्रण किया कि मुझे जो भी कुछ आयेगा उसमें से 10ः मैं उन बच्चों के लिए रखूँगा जो पैसे की कमी के कारण पढ़ नहीं पाते। भगवान का शुक्र है मैं आज कुछ कर पाया। मैंने ट्रस्ट बनाया है, मेरे साथ और लोग भी जुड़े हैं। मैंने कक्षा 1 से 8 तक का स्कूल खोला है। किताबें, खाना, वर्दी सब फ्री हैं। करीब 700 बच्चे हो गये हैं और मुझे सुकून है। कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं।’’ उनके इस निर्णय पर मुझे बहुत खुशी हुई।

 

 

परीक्षा

लाजवंती की शादी को मात्र 6 बरस ही हुए थे कि उसके पति सुरेश की तबीयत खराब हो गई। सुरेश को पता चला कि उसे कैंसर है, उसकी चिन्ता बहुत बढ़ गई। सोचले लगा, उसके बाद उसके परिवार की परवरिश, उसकी दो बहनों की शादी, उसकी माँ की देखभाल, सब सोचकर वह काँप उठा। पत्नि को पता चला तो वह उसे सांत्वना देने लगी कि सब परमात्मा पर छोड़ दो, जो होगा वह उसकी मर्ज़ी से ही होगा। लाजवंती हर काम में बहुत ही सुलझी औरत थी, परन्तु पढ़ी-लिखी न थी, इस बात की चिन्ता सुरेश को खाये जा रही थी। घर की पूरी ज़िम्मेदारी लाजवंती पर आने वाली थी। उसके मेहनती स्वभाव को देखकर सुरेश ने उससे बात करने की सोची। उसे बुलाकर कहने लगा, ‘‘लाजवंती, तुम एक बुद्धिमान, कुशल स्त्री हो, समय अच्छा नहीं है, सोचता हूँ, क्या अच्छा हो कि तुम दसवीं की परीक्षा दो और कोई नौकरी करो, मेरे बाद तुम्हें सबको संभालना है।’’ सुनकर लाजवंती फफक़ पड़ी, ‘‘मैं अनपढ़ गंवार जिसे अ नहीं आता वो दसवीं करेगी, आपने सोच भी कैसे लिया?’’ उसकी पूरी रात सुरेश की बात सोचते-सोचते निकल गई। काले दिन व लम्बी रातें नज़र आने लगी। सुबह उठकर उसने अपनी छोटी बेटी जो नर्सरी में जाती थी, की किताब उठाई, पन्ने पलटने लगी कि आँखों से आँसू रुक ही न रहे थे। सुरेश ने उसे देखा व पास आकर बोला, ‘‘अरे वाह, ये आज से ही शुरु कराता हूँ।’’ उसने किताब के चित्र व अक्षर उसे पढ़ाये। सलेट पर अ-आ, 1-2-3 लिखकर दिया। 2-3 दिन में उसने मेहनत व लगन से अच्छे परिणाम दिय। वह किताबों को पढ़ने व समझने लगी। मात्र 3 सालों में उसने दसवीं की परीक्षा दे डाली व उर्त्तीण हुई। इसके बाद जे.बी.टी. की। इस दौरान सुरेश भी बहुत बीमार रहने लगे और उनका निधन हो गया। लाजवंती पर ज़िम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा। उसे सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई। जैसे-तैसे अपना फ़र्ज निभाया। आज उसके बच्चे अपनी-अपनी ज़िन्दगी जी रहे हैं। परन्तु उसका जीवन हमें हमेशा एक अलग सी सीख देता रहेगा कि इन्सान ग़र कुछ चाहे तो क्या नहीं हो सकता।

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शबनम शर्मा

अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. - १७३०२१

मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

मुझे रूठना आता है, लेकिन मनाने की कला नहीं जानता। जबसे कम्प्यूटर देवता मेरे जीवन में आये हैं, उनका संग-साथ पसंद करने लगा हूँ। कम्प्यूटर देवता मेरे पिया बन गए हैं। इनका और मेरा सम्बन्ध दिन-ब-दिन प्रगाढ़ होता जा रहा है । इनके बिना मेरा जिया नहीं लगता। इनके बिना जीने की कल्पना से ही मैं सिहर जाता हूँ ।

हफ्ते भर से कम्प्यूटर देवता रूठे हुए हैं, आप कल्पना कर सकते हैं कि मुझ पर क्या गुजर रही होगी। मेरी बेचैनी चरम बिन्दु पर है। चिंता के सागर में डूबा हुआ हूँ । कम्प्यूटर देवता को कैसे मनाऊँ? सूझ नहीं रहा । झुँझलाता हूँ । श्रीमती जी हौसला देते हुए कह रही हैं-‘रूठा है तो मना लेंगे । इसमें अपसेट होने की जरूरत क्या है।’

अब श्रीमती जी को क्या बताऊँ कि कम्प्यूटर देवता का रूठना मेरे लिए प्राणघातक है । अपसेट क्यों न होऊँ । कम्प्यूटर देवता ने मुझे गुलाम बनाकर कितना बड़ा धोखा दिया है । अब हाथ से लिखना छूट गया है । यदि ये ऐसे ही रूठे रहे तो मेरे तो प्राण ही निकल जायेंगे।

छह महीने का कड़ा परिश्रम करके टाइप करना सिखा था। एक-एक करके अपना सारा साहित्य टाइप करके कम्प्यूटर देवता पर भरोसा कर उनके हवाले कर दिया था । वही साहित्य जो नाचीज की जन्म भर की कमाई थी । ये अलग बात है कि सुधी पाठक इसे पढ़ना गवारा नहीं करते । दूसरों के लिए वह भले ही कूड़ा-करकट था, लेकिन नाचीज के लिए अनमोल धन था।

हमने सुना था कि दुनिया पेपरलेस होने जा रही है। हमने सोचा कि कम्प्यूटर देवता के पास हमारा साहित्य सुरक्षित रहेगा । हम झाँसे में आ गए। हमारी मति मारी गई। हमने सुन्दर और सुवाच्य, हाथ से कागज पर लिखा अपना सारा साहित्य ठण्ड में अग्नि देवता को समर्पित कर दिया।

एक साहित्यिक मित्र ने बताया कि कृतिदेव की बजाय यूनिकोड पर लिखना आसान है। बस रोमन में लिखते जाओ, देवनागरी में कन्वर्ट होता जाएगा । जब प्रयोग किया तो वाकई इसे बेहद आसान पाया । हमें बात जम गई। सोचा, क्यों न कृतिदेव में टाइप किया हुआ सारा यूनिकोड में कन्वर्ट कर लूँ । फिर क्या था। इस मिशन में मैं जी जान से जुट गया ।

क्लिक पर क्लिक करता गया । कम्प्यूटर देवता को मेरी यह छेड़खानी पसंद नहीं आयी। नाराज होकर उन्होंने मेरे सारे साहित्य को एक अज्ञात लिपि में बदल दिया । जब मैं छेड़खानी से बाज नहीं आया तो उन्होंने मेरा साहित्य ही गायब कर दिया । अनजाने में मैंने अपने ही हाथ से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली । लगा मेरे जन्म भर की पूँजी एकाएक खो गई हो ।

साहित्यिक मित्रों के अलावा मेरे कुछ धार्मिक मित्र भी हैं जो अक्सर मुझसे रूठे रहते हैं । हमने अपने एक धार्मिक मित्र को अपने पिया [कम्प्यूटर देवता] के रूठने की समस्या बताई । उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा-‘धर्म-वर्म कुछ मानते नहीं । पूजा-पाठ करते नहीं । मुहूर्त देखकर कम्प्यूटर देवता की स्थापना की नहीं । रक्षा सूत्र भी बाँधा नहीं । कम्प्यूटर देवता रूठेंगे नहीं तो क्या खुश होंगे । यह तो होना ही था ।’ मैं खामोशी से उनकी लताड़ सुनता रहा । आखिर में शायद उन्हें मेरा दयनीय चेहरा देख दया आ गई । बोले-‘चल टेंशन मत ले । एक देवतुल्य सुधारक को भेजता हूँ ।’

पलक पावड़े बिछाकर हमने देवतुल्य सुधारक की प्रतीक्षा की । आकर उन्होंने रूठे हुए कम्प्यूटर देवता का निरीक्षण करके कहा-‘सर! आपने तो कम्प्यूटर देवता को कुछ अधिक ही नाराज कर दिया है । पूरा फार्मेट करना पड़ेगा । सभी फ़ाइलें करप्ट हो गई हैं । अच्छा वाला एंटी वायरस डालना होगा ।आपका साहित्य कम्प्यूटर देवता वापस कर देंगे, इसकी गारंटी तो नहीं दे सकता । हाँ, पूरी कोशिश जरूर करूँगा ।’ उनकी बहुत सारी बातें मुझ मतिमंद की समझ में नहीं आ रही थी । आज तक सुना था कि अफसर और बाबू ही करप्ट होते हैं । लेकिन सुधारक जी बता रहे थे कि फ़ाइलें करप्ट हो गई हैं ।

खैर ! अब हमने सब देवतुल्य सुधारक पर छोड़ दिया है । सच्चे मन से प्रार्थना कर रहे हैं कि कम्प्यूटर देवता मान जाएँ और हमें हमारा साहित्य यथावत लौटा दें ताकि हम सुख से मर तो सकें।

-राधारमण कालोनी, मनावर, जिला-धार [म.प्र.] पिन-454446 मोब.09893010439

बयान देने के लिए सिर्फ ज़बान की आवश्यकता होती है. जो भी ज़बान पर आया दे मारा. बयान हो गया. चाहें तो इसे लिखकर दे दें या ज़बानी कह दें. ज़बानी कहने में ज्यादह सुविधा रहती है. ज़रुरत पड़े तो बयान पलटा जा सकता है. कहा जा सकता है कि मैंने यह कहा ही नहीं था. मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है. राजनीति में यह खेल धड़ल्ले से खेला जाता है.

वैसे बयान कई तरह के होते हैं. अदालती बयान तथ्यों का वह विवरण है जो वादी या प्रतिवादी द्वारा लिखकर या ज़बानी प्रस्तुत किया जाता है.यह बेशक तथ्यों का विवरण कहा तो जाता है लेकिन खुदा ही जानता है कि यह कितना तथ्यों का विवरण है और कितना झूठ का पुलंदा है. एक बयान तहरीरी होता है. यह वह लिखा हुआ बयान है जो अदालत में किसी बयान के जवाब में दाखिल किया जाता है. इसी तरह एक ताईदी बयान भी होता है जो दूसरे के बयान की पुष्टि करने वाला कथन है | अब यह अदालत का काम होता है कि बयान, बयान तहरीरी या बयान ताईदी की जांच पड़ताल करे |

अरबी और फारसी में बयान साहित्यशास्त्र की एक शाखा भी है | हिन्दी में साहित्य की ऐसी कोई शाखा नहीं है | यहाँ साहित्य में अधिकतर बयानबाज़ी होती भी नहीं | यहाँ बयानों के बड़े बड़े पुलंदे हैं जिन्हें “वाद’ कहते हैं.| छायावाद, प्रगतिवाद, रहस्यवाद, प्रयोगवाद इत्यादि वास्तव में बयानों के पुलंदे ही हैं |

राजनीतिक बयान अलग ही किस्म के होते हैं. इन्हें पुलंदों में बांधा नहीं जा सकता | ये फ्री- फ्लोटिंग हैं. जैसी लहर होती है वैसे ही, उसी दिशा में, बयान तैरते रहते हैं | और क्योंकि राजनीति में कई लहरें कई दिशाओं में साथ साथ लहराती रहती हैं इसलिए वहां बयानबाजी भी सुनिश्चित नहीं की जा सकती | अलग अलग राजनैतिक दलों के अलग अलग बयान होते हैं, एक ही राजनैतिक दल में कई एक-दूसरे को काटते-लांघते, बयान हो सकते हैं. यहाँ तक कि एक ही व्यक्ति का बयान एक सा नहीं रहता | सुविधानुसार वह उसे तोड़ता मरोड़ता रहता है | राजनीति की यही खूबसूरती है | यही उसके आकर्षण का केंद्र है | आप न तो किसी बयान को पकड़ सकते हैं न पकडे बैठे रह सकते है | राजनीति का एक बड़ा मूल्य स्वतंत्रता है, बयानों की स्वतंत्रता |

राजनीति में बयानों का कोई व्याकरण नहीं बनाया जा सकता | यहाँ संज्ञाएँ क्रियाओं में और क्रियाएं संज्ञाओं में तब्दील हो जाती है. बयान कभी भी हाथापाई पर उतर सकते हैं, ओर हाथापाई कभी भी बयान बन जाती है | लोकसभा और विधान सभाओं मे यह तबदीलियाँ आप आसानी से देख सकते हैं | कब बयान देते देते वहां के माननीय कुरसी, मेजों और माइक आदि, को बयानों का क्रिया रूप बना लें कुछ कहा नहीं जा सकता | और कब ये क्रियाएं शांत होकर संज्ञाएँ बनकर बयानों की शक्ल ले लें कुछ कहा नहीं जा सकता | बयानों की भाषा के सन्दर्भ में भी कोई नियम सुनिश्चित नहीं किया जा सकता. एक समय था जब बयानों के सन्दर्भ में संसदीय और असंसदीय भाषा में अंतर किया जाता था, आज जिस तरह राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र को परिभाषित करते समय कहा जाता है कि अर्थशास्त्र या राजनीतिशास्त्र वह है जो अर्थशास्त्री या राजनीतिशास्त्री करते हैं, उसी तरह अब यह भी कहा जाने लगा है कि जो भाषा सांसद या विधायक बोलते हैं वही संसदीय भाषा है. मुझे इसमें कोई तार्किक दोष नज़र नहीं आता.

जंगल में जिस तरह पेड़ बिना किसी पूर्व योजना के उग आते हैं और पूरा एक जंगल खडा कर देते हैं उसी तरह राजनैतिक बयान होते हैं. कौन सा बयान कब, कहाँ, कैसे, कौन उगा दे- किसी को कुछ पता नहीं है. सामान्य आदमी स्वयं को बयानों के बयावान में खडा पाता है.

- सुरेन्द्र वर्मा

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दुनिया मूर्खों से भरी पड़ी है | एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं | कुछ अक्लमंद लोग मूर्खों से इतना परहेज़ करते हैं कि वे उनकी शक्ल नहीं तक नहीं देखना चाहते | ऐसे लोगों को एक महामूर्ख ने कहा है कि उन्हें अपने को किसी अकेली अंधी कोठारी में बंद कर लेना चाहिए | बल्कि उन्हें तो अपना आईना तक फोड़ देना चाहिए |

ऐसा नहीं है कि बुद्धिमान लोग मूर्खता नहीं करते | लेकिन वे बस, शुरू शुरू में ही मूर्खता करते हैं | बाद में संभल जाते हैं | किन्तु बाद में जब वे मूर्खता करते हैं तो वह छोटी-मोटी मूर्खता नहीं होती | वह हिमालयी- मूर्खता होती है |

किसी बड़े पद पर यदि कोई मूर्ख बैठा दिया जाता है तो एक पहाड़ पर बैठे इंसान की तरह उसे नीचे सब लोग बौने दिखाई देने लगते हैं | और मज़ा यह है कि नीचे के लोगों को वह भी बौना ही दीखता है !

हमारा प्रजातंत्र जनता का राज है | ज़ाहिर है, जनता में बुद्धिमानों की बजाय अधिकतर लोग मूर्ख ही होते हैं | और बुद्धिमान भी मूर्खता करने से बाज़ नहीं आते | हम मूर्खों में से ही अपना नेता चुनते हैं और बाद में खुद ही रोते हैं कि हम बड़े मूर्ख हैं जो ऐसा नेता चुन लिया | ऐसी गलती न करने की हम कसम खाते हैं लेकिन बार बार यही गलती कर बैठते हैं, क्या किया जाए, मूर्ख जो ठहरे | हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम अपने को मूर्ख बनाएं, लेकिन दूसरों को मूर्ख बनाने में हम खुद ही बन बैठते हैं |

एक मूर्ख और एक धूर्त में फर्क करना बड़ा कठिन होता है | जो वास्तव में मूर्ख है वह सच्चा मूर्ख होता है, धूर्त नहीं होता | वह कभी धूर्त बनने की कोशिश करे तो भी मूर्ख ही बन जाता है | मुश्किल तब आती है कि जब एक धूर्त अपनी धूर्तता कारगर करने के लिए एक मूर्ख का सफल अभिनय करने लगता है और लोग,जो कि अधिकतर मूर्ख ही होते हैं, उसके जाल में फंस जाते हैं | धूर्तों की सफलता मूर्खों पर ही आश्रित है | मुझे हमेशा मूर्खों से डर बना रहता है क्योंकि मैं कभी स्वयं को आश्वस्त नहीं कर पाता कि सामनेवाला मूर्ख है या धूर्त |

मूर्खों का भी एक प्ररूप-शास्त्र (टाइपोलाजी) है | सभी मूर्ख एक ही कोटि के नहीं होते | मूर्खता में वे भी कम और अधिक होते हैं | मूर्खता की मात्रा में अंतर रहता है | हर मूर्ख को अपनी प्रशंसा के लिए कोई न कोई उससे थोड़ा अधिक मूर्ख मिल ही जाता है | शायद शेक्सपियर ने ही महानता के बारे में कहा था कि कुछ लोग जन्म से महान होते हैं, कुछ महान बना दिए जाते हैं, और कुछों पर महानता थोप दी जाती है | वस्तुत: वह महानता के बारे में नहीं, मूर्खता के बारे में यह बयान देना चाह रहा था | लोक-लाज से बेचारा कह नहीं पाया | वरना लोग उसे ही मूर्खों की किसी न किसी कोटि में डाल ही देते |

आदमी मूर्ख पैदा हुआ है और ताउम्र मूर्ख ही बना रहता है | बच्चों की मूर्खताएं बचपना कहलाती हैं, जवानी की मुर्खता दीवानगी होती है (गधा-पचीसी) | और बुढापे की नासमझी तो मूर्खता से भी गई-बीती है| मेरा पोता मोबाइल हाथ में लिए मुझसे कह रहा था, बाबा आप तो समझते ही नहीं हैं ! मैंने कहा, तुम ठीक कह रहे हो | जब मैं बच्चा था, मेरे पिता मुझसे कहते थे, इतनी बार बताया तू समझता क्यूँ नही है | बड़ा हुआ तो यही जुमलेबाजी मुझे अपने स्कूल और कालेज के अध्यापकों से सुननी पड़ती थी | विवाह के बाद पत्नी ने मुझे समझाने में कोई कोर-कसर नहीं रखी | पर मैं मूर्ख का मूर्ख | अब मेरा बेटा और मेरे बेटे का बेटा कहता है, आप समझते क्यों नहीं बाबा ! हम तो जन्मजात और ताउम्र मूर्ख ही ठहरे, समझें कैसे?

एक अप्रेल करीब है | करीब क्या, बस आ ही गया समझो | क्या आपने मूर्ख दिवस के लिए तय्यारी कर ली है? दूसरों की मूर्खताओं पर हंसने की नहीं | खुद अपनी मूर्खताओं पर हंसने की तय्यारी ! दरअसल हम हर चीज़ में इतनी अधिक समझदारी बरतने लगे हैं कि यही समझ नहीं पाते कि हम मूर्खता कर रहे हैं | अभी पिछले मूर्ख दिवस की बात है | एक कार बनाने वाली कम्पनी ने ३१ मार्च को घोषणा की कि कल जो भी आफिस-कर्मचारी आफिस की बजाय सबसे पहले कार्यालय में अपनी हाजिरी लगाने पहुंचेगा उसे पुरानी कार के बदले कम्पनी एक नई कार देगी | हर किसी के समझदार मन ने कहा की कम्पनी अप्रेल-फूल बना रही है | लेकिन एक कर्मचारी मूर्ख बनने के खतरे को जानते हुए भी सच जानने के लिए कम्पनी के आफिस पहुँच गया और उसे कम्पनी की नई कार मिल गई !

स्वयं को हमेशा सही समझना सबसे बड़ी मूर्खता है | लेकिन स्वयं को हमेशा बेवकूफ समझना भी कम मूर्खता नहीं है | सुकरात ने एक बार कहा था, जो जानकार है और समझता है कि वह जानकार है वही वस्तुत: समझदार है | ज़ाहिर है, इसका विलोम, जो नहीं जानता और समझता है कि वह जानता है सर्वाधिक मूर्ख है | मूर्ख बेचारा अपनी मूर्खता देख नहीं पाता | लोगों को उसे कहना पड़ता है कि तुम मूर्ख हो, लेकिन वह अपने कान भी तो नहीं देख पाता ! पर असली मुद्दा तो यह है कि क्या कोई ऐसा है जो अपना कान देख सके ? यही वजह है कि हर कोई एक दूसरे को ही मूर्ख बताता है |

- सुरेन्द्र वर्मा

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आदमी जैसा है वैसा ही दिखता है, जो कुछ अपने पास है वहीं दिखाता है, अपने पास जो हुनर है उसी का प्रदर्शन करता है तभी वह असली इंसान माना जा सकता है। सच्चे इंसान की यही पहचान है। वह दोहरे-तिहरे चरित्र और सैकड़ों मुखौटों का इस्तेमाल करने वाला व्यभिचारी-व्यवहारी नहीं होता।

यह वही इंसान कर सकता है जिसे मनुष्य होने पर गर्व हो तथा इस बात का पूरा और पक्का भान हो कि इंसान के रूप मेंं उसके क्या कर्तव्य हैं, क्या अधिकार हैं तथा भगवान से उसे इंसान का शरीर देकर क्यों पैदा किया है।

यह सहजता और व्यक्तित्व की शुचिता वे ही लोग रख सकते हैं जो कि प्रकृति के करीब हों। सच्चे, अच्छे और श्रेष्ठ इंसान की यही पहचान है कि वह सहज, सरल और सादगी पसंद होता है।

जिन लोगों में सरलता, सहजता और सादगी का अभाव है, वे चाहे अपने आपको कितना ही बड़ा, महान और लोकप्रिय व ईश्वर तुल्य मान लें, एक सामान्य आदमी से भी गए बीते होते हैं।

कारण साफ है कि एक आम इंसान भोला-भाला, शुद्ध हृदय का और निरपेक्ष दिमाग का होता है जबकि जिन लोगों को हम महान, अमर और सार्वभौम सम्राट मानकर पूजते हैं वे लोग पूरी तरह डुप्लीकेट होते हैं जैसे कि चाईना का माल हो। इनकी कोई गारंटी नहीं।

जो मौलिकता लिए हुए हो, जिसमें सादगी हो वही संसार में पूरी मस्ती के साथ मुक्त होकर जी सकता है। जो लोग सादगी से  जितना अधिक दूर रहते हैं वे अपने आत्म तत्व से भी दूर रहते हैं और इस कारण भले ही ये लोग कितने ही मनोहारी, आकर्षक और प्रभावशाली दिखें, लुभावनी पैकिंग मेंं कैद सड़े, बासी और पुराने माल की तरह ही होते हैं।

इन लोगों को जीवन भर अपने बनावटी स्वभाव को बरकरार रखने के लिए बहुरूपियों, स्वाँगियों, मदारियों और जमूरों की तरह बन-ठन कर रहने को विवश रहना पड़ता है।  अपने शरीर और मन-मस्तिष्क पर जाने कितनी सारी मटमैली या शौख चटख रंगों वाली चादरों के आवरण बनाए रखनी की मजबूरी में जीते हैं और यह तक भूल जाते हैं कि वे इंसान भी हैं।

आजकल सादगी गायब होती जा रही है। हर इंसान अपनी औकात से बहुत कुछ आगे बढ़-चढ़ कर दिखना और दिखाना चाहता है इसलिए सादगी का स्थान ले लिया है दिखावों, भोग-विलास के स्थलों, कृत्रिम आनंद देने वाले पात्रों और आडम्बरों ने।

इसमें आदमी का अपनापन और मौलिकता खत्म होती जा रही है और वह मशीनी या कठपुतलिया जिन्दगी जी रहा है।  बिसलरी का पानी चाहिए, आलीशान होटलों का खान-पान चाहिए और जो कुछ चाहिए वह मुफतिया हो। आनंद सारे हमारे पाले में हों और खर्च करें दूसरे।

पराये और बिना मेहनत के पैसों पर मौज उड़ाने का जो शगल चल रहा है वह सादगी को हमसे दूर ही करता जा रहा है। जितना आदमी प्रकृति और सादगी से दूर रहेगा उतना दिखेगा भले अच्छा लेकिन होगा नहीं।

सादगी को अपनाने वाले इंसानों की अखण्ड मौज-मस्ती का आनंद ही कुछ अलग है। इसे वे लोग कभी नहीं जान पाएंगे जिनकी सादगी गिरवी पड़ी है और जो हवाओं में उछालें मार रहे हैं।

जो हवाओं मेंं उड़ कर आसमान की ऊँचाइयां पाने को उतावले हैं उन्हें हवाएं ही ठिकाने लगा देंगी, इनके लिए चिन्तित न हों।

जीवन में आनंद को बरकरार रखना चाहें तो अपने व्यक्तित्व में सादगी को अपनाएं, सहजता और सरलता लाएं तभी जीवन सफल भी है और निरापद भी।

जीने का मजा वही ले पाएगा जो सादगी से भरा होगा। जो सादगी को त्यागेगा वह भटकता ही रहेगा। सादगी छोड़ने वाला हर इंसान चरित्र, नैतिकता, सिद्धान्त, संवेदनशीलता, मानवीयता और अपरिग्रह त्यागने वाला होगा। और इसलिए उसे अपनी मौलिकता में जीने का स्वभाव मिल जाता है। इस कारण से दुनियावी आडम्बरों और दिखावों की उसे कोई जरूरत नहीं पड़ती।

सादगी से ही समाज और ईश्वर को पाया जा सकता है। इसलिए जीवन के हर कर्म और व्यवहार में सादगी को अपनाएं और आजीवन मौज-मस्ती का वरदान पाएं।

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हम सारे के सारे लोग चाहते तो यह हैं कि अमर बने रहें, मौत कभी आए ही नहीं। और कुछ नहीं तो कम से कम शतायु तो हो ही जाएं। और हमारी आयु ही न बढ़ें बल्कि काले-घने और लम्बे बाल भी हों, हीरो-हीराईनों और अप्सराओं सा सौंदर्य भी बना रहे, स्लिम भी बने रहें, कानों से सुनते भी रहें, आँखों से देखते भी रहें, चलते-फिरते और भ्रमण करते रहें, खाने-पीने और जमा करते रहने का सामथ्र्य भी दिनों दिन बढ़ता रहे, दिमाग भी चलता रहे और शरीर की तमाम ज्ञानेन्दि्रयां-कर्मेन्दि्रयां भी अपना काम करती रहकर भरपूर आनंद देती रहें।

इस सवार्ंंग सेहत को हमेशा बनाए रखने के लिए कुछ लोग वाकई मेहनत करते हैं, संयमित जीवन जीते हैं, नियमित योगाभ्यास भी करते हैं और अपने जीवन को सात्विक, पवित्र और आनंददायी बनाए रखने के परंपरागत नुस्खों और पुरखों की दी हुई सीख पर अमल करते हैं।

बहुत से लोग अपने आपको सेहतमंद और हर प्रकार से दुरस्त रखने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन इन लोगों का अपनी कर्मेन्दि्रयों पर कोई नियंत्रण नहीं है। सारी कर्मेन्दि्रयां स्वच्छन्द और उन्मुक्त भोग के लिए  हमेशा उतावली रहती हैं और इस चक्कर में सेहत गंवा बैठते हैं।

अधिकांश लोगों का खान-पान और दिनचर्या सब कुछ गड़बड़ा गया है। शहरों में अस्सी फीसदी और गांवों-देहातों में आधे से ऊपर लोग अब परंपरागत सेहतमंद दिनचर्या भुला बैठे हैं। अमरत्व और सेहत-सौंदर्य आदि सब की भरपूर और अपरिहार्य चाहत के बावजूद हम सभी लोग जो कुछ कर रहे हैं उससे तो साफ-साफ लगता है कि हम सब बड़ी ही प्रसन्नता और हर्ष के साथ मौत को अपनी ओर आकर्षित करते हुए काल का आह्वान करने में दिन-रात जुटे हुए हैं।

और देख भी रहे हैं कि काल किस तरह से हमारे बीच से उन लोगों तक को उठा ले जा रहा है जिनकी मौत की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। प्राकृतिक और दैवीय आपदाओं से होने वाली जन-धन हानि को छोड़ दिया जाए तब भी इंसान के व्यक्तिगत जीवन से लेकर परिवेश तक की सभी प्रकार की आपदाओं के मूल में इंसान ही है जिसने प्रकृति से भी नाता तोड़ लिया है और अपनी श्रेष्ठतम परंपराओं से भी, जिनके सहारे हमारे पूर्वज शतायु हुआ करते थे और मरते समय तक प्रसन्न, स्वस्थ और मस्त रहा करते थे।

अकाल मृत्यु जैसी बातें बहुत कम सुनी जाती थीं और आयु पूर्णता पर स्वाभाविक मृत्यु ही देखी जाती थी। अब सब कुछ उल्टा हो गया है। आयु पूर्णता पर स्वाभाविक मृत्यु की घटनाएं बहुत कम देखी जाती हैं, जबकि  अल्पायु में मौत का माहौल हमेशा बना ही रहने लगा है। 

बहुत छोटी-छोटी उम्र वे लोग हमारे बीच से जा रहे हैं जिन्हें अभी बहुत अधिक जीना था। आजकल किसी का कोई भरोसा नहीं रहा, कोई कब हमारे बीच से उठ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। इस अनचाहे बदलाव के लिए कोई और नहीं बल्कि हम ही जिम्मेदार हैं।

सोच तो रहे हैं हम लम्बी पारी की, और काम ऎसे कर रहे हैं कि विकेट जितना जल्दी हो उखड़ जाए। और लोग देखते ही रह जाएं।  बीज से लेकर फसलें तक रसायनों से तरबतर हैं, जात-जात के केमिकल्स आ गए हैं जो कि फसलों की उत्पादकता को कई गुना बढ़ा रहे हैं मुनाफे से मालामाल भी कर रहे हैं मगर गुणवत्ता का सत्यानाश करने के साथ ही घातक अवस्था तक जहरीले हो गए हैं।

पानी और मिट्टी सब कुछ बिगड़ गया, हवाओं का भी नहीं रहा भरोसा अब। खान-पान से लेकर सब कुछ बासी खा-पी रहे हैं, कितना पुराना कोई माल है, कितना सड़ा हुआ बासी है, इसका किसी को कोई पता नहीं है। सब कुछ पैकिंग माल पर ही जिन्दा हैं।

सेवा, समाज, देश और परोपकार के सारे के सारे भाव समाप्त हो गए हैं और इनका स्थान ले लिया है धंधे ने।  इस धंधे में कोई मरे, कोई बीमार हो जाए, इससे किसी को कोई सरोकार नहीं है।  माल बनाने वाले भी धंधेबाज हैं और बेचने वाले भी।

हम सभी ने जैसे ठान ही रखा कि मरकर ही मानेंगे और इसके लिए हर दिन मौत का सामान उपयोग में लाते हैं, वह हर हरकत करते हैं जिससे मौत हमारे निकट जल्दी आए। जो लोग रात को देर तक जगते हैं और सवेरे देर तक सोये रहते हैं, दिन में सोते रहते हैं, न नहाने का समय है, न खाने का।

ऎसे लोगों का त्रिदोष से ग्रसित हो जाते हैं वात, पित्त और कफ असंतुलित हो जाता है और इस वजह से  ये लोग बीमार हो जाते हैं, असाध्य बीमारियां घेर लेती हैं, और अन्ततः ऎसे लोगों और इनके परिवार वालों का पैसा इन्हीं पर खर्च होता रहता है लेकिन सब कुछ करने के बावजूद कोई इन्हें बचा नहीं पाता।

कुछ दैवीय, ज्योतिषीय और पूर्वजन्मार्जित दोषों व पापों या वास्तविक शारीरिक और मानसिक समस्याओं को छोड़ दिया जाए तो शेष सारी की सारी बीमारियों और विपदाओं के लिए हम ही दोषी हैं, इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकारने में हमें पीछे नहीं रहना चाहिए।

जब तक हमारी दिनचर्या हमारी संस्कृति, शास्त्रों और परंपराओं के अनुकूल नहीं होगी तब तक हमें दीर्घायु, यशस्वी और लोक प्रतिष्ठ होने की कल्पना को छोड़ देना चाहिए।  आज हम सब कुछ होते हुए भी न मनचाहा खा- पी सकते हैं, न बिना दवाइयों, चश्मों और मशीनों से रह सकते हैं।

ये हमारे लिए वेन्टीलेटर ही हैं, जो हमसे दूर हो जाएं तो हम कहीं के नहीं रहें, सीधे ऊपर पहुंच जाएं या निःशक्तों की तरह बैठे रहें। भारतीय संस्कृति का अनुगमन ही हमें इन हालातों से बचा सकता है। इस बात को स्वीकार कर अपने आप में बदलाव लाएं या तैयार रहें कभी भी ऊपर जाने के लिए। ईश्वर हमारी रक्षा करे।

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दुनिया का हर महान कार्य तभी संभव है जबकि हमारे पास दैवीय और आध्यात्मिक ऊर्जा का संबल हो अथवा किसी ऎसे व्यक्तित्व का पृष्ठबल हो जो कि धर्म-अध्यात्म, संस्कारों और चरित्र बल से भरा-पूरा या सिद्ध हो तथा जगत के कल्याण की भावना से ही जीने वाला हो, ईश्वरीय दूत की तरह काम करने वाला हो तथा जिसे किसी से कोई राग-द्वेष न हो।

रामायण और महाभारत हो या फिर किसी भी युग का कोई सा महासंग्राम। दैवीय उपासना से दैवीय ऊर्जा की प्राप्ति और अपने आपको हर मामले में श्रेष्ठ सिद्ध करने की कला मिलती है और यही हम सबके लिए प्रेरणा, शक्ति सामथ्र्य और विजयश्री वरण करने का सर्वश्रेष्ठ और अलौकिक माध्यम अनुभवित होता है।

अकेले इंसानों की भीड़ के आधार पर हम सफलता या संघर्ष में विजय प्राप्त नहीं कर पाते हैं। इस लिहाज से हम सभी के लिए यह जरूरी है कि जीवों और जगत के कल्याण के लिए पहले जगदीश्वर से ताकत प्राप्त करें और उसके बाद मानवोचित कर्मों में अपने आपको लगाएं। 

आजकल हमारी तमाम प्रकार की असफलताओं का मूल कारण यह है कि हम लोग दैवीय ऊर्जाओं के बिना जीवन संघर्ष में उतरते हैं और अन्ततः पग-पग पर आत्मविश्वासहीन होकर हताशा और निराशा के भंवर में घिर जाते हैं और असफल होकर या तो जीवन के बहुआयामी रंगमंचीय रणक्षेत्र से पलायन कर जाते हैं अथवा लम्बे समय तक अवसाद में रहकर दुःखी रहने लगते हैं।

आसुरी भावों से भरे लोगों के लिए आसुरी शक्तियां केन्द्र होती हैं जबकि सज्जनों के लिए दैवीय शक्तियां केन्द्र बिन्दु होती हैं। जो इस केन्द्र से जितना अधिक निकट होगा उतना उपास्य के घेरे में अधिक पास होगा और उसे उपास्य देव की कृपा सहजता से प्राप्त होती रहेगी। आभामण्डल अभेद्य कवच के रूप में कार्य करेगा और हर तरह से संरक्षित और सुरक्षित रहेगा।

हममें से किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि जिन लोगों को हम अपना मान बैठे हैं, जो भीड़ हमारे इर्द-गिर्द जमा रहती है, हमारा जयगान भी करती है और परिक्रमाएं भी, वह पूरी की पूरी  हमारी अपनी ही है। जिन लोगों को हम अब तक अपना मानते रहे हैं उनमें भी बहुत सारे लोग ढुलमुल, स्वार्थी, बिकाऊ, स्वाभिमानशून्य और गुलाम की तरह होते हैं। ये लोग इंसान न होकर वस्तु के रूप में स्वीकारे जाते हैं। और वस्तु के बारे में साफ है कि हर वस्तु बिकाऊ होती है और इसे कोई भी खरीद या बेच सकता है।

दुनिया भर में जो जंगल के जंगल साफ हो गए हैं उनमें लोहे की कुल्हाड़ी का दोष नहीं था, उन हत्थों का दोष ही था जो लकड़ी के बने थे।  आजकल सभी जगह यही हो रहा है। कौन कब किसका हत्था बनकर किस को काट डाले, यह पता ही नहीं चलता।

फिर आजकल हत्थे भी ऎसे लुभावने हो गए हैं कि सभी को भ्रम होता है कि ये चमकदार मनोहारी खिलौने होंगे, मगर जब घाव कर जाते हैं, पूरा का पूरा तना काटकर अधमरा कर दिया करते हैं तब जाकर इनकी असलियत का पता लगता है।

सदियों का इतिहास गवाह है कि इन्हीं हत्थों की खातिर गुलामी का दंश हमने भुगता, और आगे भी न जाने क्या-क्या होने वाला है। हरियाली को बचाना है तो पहले कुल्हाड़ी से पाणिग्रहण कर चुके लकड़ी के हत्थों को इकट्ठा कर सामूहिक होली जलानी होगी, उनकी भस्म को प्रवाहित करनी होगी, तभी जंगल भी सुरक्षित रहेंगे, पक्षियों की चहचहाहट भी बनी रहेगी, पशुओं की उन्मुक्त विचरण परंपरा भी जारी रह सकेगी और जीव मात्र को सुकून मिलता रहेगा।

इनके साथ ही यह भी जरूरी है कि दैवीय शक्तियों का आवाहन कर उनसे ऊर्जा और विजयश्री का वरदान मांगे। इनके साथ ही जगत और जीव मात्र के कल्याण के लिए निष्काम कर्मयोग को अपनाएं फिर देखें कि किस तरह विजयश्री हमारे चरण चूमती है, सकारात्मक महापरिवर्तन की भावभूमि रचती है और बदलाव का ऎसा दौर प्रकट कर देती है कि जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। 

आज के युग में महावीर हनुमान की उपासना की जानी चाहिए क्योंकि वे ही चिरंजीवी देवताओं में से एक हैं जिनकी कृपा से हमें बल, बुद्धि, विद्या को देते हैं और क्लेश तथा विकारों का उन्मूलन करते हैं। वर्तमान में हर तरफ आसुरी भावों का बोलबाला है, नज़र लगने का डर सबको सताता अनुभवित होता है, मामूली कामों से लेकर सार्वजनीन कामों तक मेें अड़चनें आने लगी हैं।

खासकर बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय कर्मों और लोक कल्याणकारी गतिविधियों में अवरोधों का तांता लगा रहता है। इन सारी स्थितियों में संघे शक्ति कलौयुगे‘’ के साथ ही महावीर हनुमानजी की उपासना करें। किसी भी श्रेष्ठ कर्म के आरंभ में वैयक्तिक और सामूहिक रूप से नाम जप तथा हनुमान चालीसा के पाठ होने चाहिएं।

सैकड़ों-हजारों की संख्या में जहां कहीं समागम होता है वहां मात्र दस बार ही हनुमान चालीसा के पाठ हो जाने से ब्रह्माण्ड में ऎसी अपरिमित परमाण्वीय शक्ति का उदय होता है जो कि दुनिया में कुछ भी कर सकती है।

इसलिए जीवन में व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर हनुमान चालीसा के पाठ को नियमित दिनचर्या में शामिल करें और किसी भी प्रकार के श्रेष्ठ कार्य के आरंभ से लेकर अंत तक यदि यह क्रम जारी रहे तो आशातीत एवं ऎतिहासिक सफलता पायी जा सकती है।

सिद्धों का यही अनुभव रहा है। इसे हम सभी को स्वीकारना और आजमाना चाहिए। बिना आध्यात्मिक और दैवीय शक्तियों के कहीं भी कोई पार नहीं पा सकता।

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झिलमिल काली ओढ़नी, मुखड़े पर है धूप |
जग सारा मोहित हुआ , तेरा रूप अनूप ||
***
कश्मीरी हो सेब ज्यों , हुआ तुम्हारा रूप |
छुअन प्रेमिका सी लगे, ये जाड़े की धूप ||
**
रामदुलारी रो रही, चूल्हे पर धर नीर |
बच्चों से कब तक कहे, बेटा धरियो धीर||
**
मोटे चावल में मिला , दिया जरा सा नीर |
माँ के हाथों से बनी, बिना दूध की खीर ||
**
वासंती रुत आ गई , ले फूलों का हार |
नव यौवन नव यौवना , कर लो आँखें चार ||

**

अम्मा को लिख भेज दो , थोड़ी दुआ सलाम |

उसके तन मन को लगे , ज्यों केसर बादाम ||

**

बूढ़ी अम्मा रो रही , शहर हो गया गाँव |

ना बरगद का पेड़ है , ना पीपल के छाँव ||

**

मामा तेरे खेत में , उगते लाखों लाल |

झिलमिल झीलमिल खेत है, तू भी मालामाल ||

**

तन गंगा में धो लिया , धुला न मन का पाप |

मन मंदिर को धो सखा , हो तन निर्मल आप ||

**

ईश्वर तेरे नाम से , लगा रहे हैं भोग |

पेट बढ़ाये जा रहे , खाते पीते लोग |१०|

अनन्त आलोक

साहित्यालोक , बायरी डॉ ददाहू

जिला सिरमौर हिमाचल प्रदेश

173022 Email: anantalok1@gmail.com

मोब :9418740772

अपने देश में इन दिनों कोई भी प्रोडक्ट 'एक्स्ट्रा हूँम 'के बिकता नहीं ।ग्राहको के दिलों को आजकल तूफानी ठंडा जब तक न मिले,उनको अपनी हलक में कुछ फंसा सा लगता है ।

एक पर एक फ्री ,बाय वन गेट वन ,अप टू फिफ्टी परसेंट आफ,......माल बेचने के इन नुस्खों को देखकर ,यूँ लगता है दूकानदार मानों खुद के लुटने के लिए दूकान सजाये हैं ।आओ हमें लूटो ।जिसमे जितनी कूबत है उतनी लूटे.... ।

वे "रमता जोगी बहता पानी ,माया महाठगनी हम जानी" जैसे वैराग्य भाव से’; मानो संसार को सब कुछ मिटटी के मोल बेच के चल देना चाहते हैं ।

अपना परलोक-सुधारने का नुस्खा उन्हें "अप टू फिफ्टी परसेंट आफ में" बखूबी नजर आता है ।वे ‘तत्व-ग्यानी’ जीव लगते हैं ।एक-बारगी सोचने में लगता है ‘बपुरा’ क्या बचा पायेगा ....?जितने में खरीदा है, उससे कम कीमत में ढकेल कर अपने बच्चो को किसी अनाथाश्रम के स्कूल में तो नहीं डालना चाहता ....?

ग्राहक चकराए रहता है ।उसको आफ और डिस्काउंट का गणित आज तक समझ नहीं आया । कभी सोचता है सेकंड का माल होगा ,कभी मेंयुफेक्च्रिन डिफेक्ट होने का डर सताता है । इन सब के बावजूद , वो अपने-पास पडौस को भी खींच लाता है।सेल है भाई चूको मत ।माल में कोई एब नहीं। खरा है एकदम .....। इस बहाने वो अपने भ्रम को भी परख लेता है चलो अगर अब ठगा रहे हैं तो मै किस खेत की मूली हूँ किसी के हाथ तो उखडूगा ही । कहीं बड़े बड़े शो –रूम में जा के ठगाने से तो अच्छा है, साल भर की जरूरत की इकट्ठी खरीद यहीं कर ले ।

ये तो दूकानदार हुए ,उधर प्रोडक्ट बनाने वाले भी बढ़- चढ़ के एक्स्ट्रा माल पकड़ा रहे हैं।टी- ट्वंटी के खेल में ट्वेंटी परसेंट एक्स्ट्रा ।यानी एक्स्ट्रा हूँम ....।मजे से खाइये ...

हमने इधर राजनीति में ‘तपास’ किया ,उधर भी यही सब लागू है ।सरकार बनाने और गिराने के खेल में एक विज्ञापन जो छपा नहीं होता, मगर सबके पढने में मजे-मजे आ जाता है वो है'हार्स ट्रेडिंग'का..... ।कौन सा घोड़ा कितने का बिकाऊ है ।कितना दौड़ेगा ...?चलते-चलते दचके तो नहीं मारेगा ।विश्वसनीय रहेगा या नहीं ,ये सब खरीद-फरोक्त करने वालो के दिमाग में आने वाली सामान्य सी बातें हैं ।

चुनावी-रैली में भीड़ जुटाने वाला ठेकेदार, जनता को 'एक्स्ट्रा हूँम 'के प्रलोभन में चुनावी-सभा तक खींच लाता है ।चुनावी-सभा का प्रचारक, वक्ता और खुद कैंडिडेट वादों का’ ‘एक्स्ट्रा मटेरियल’ बिखराने लग जाते हैं ।हम जीते तो ....ये कर देगे ....वो कर देगे, जैसा दिवा- स्वप्न जनता की जेहन में ठूस-ठूस कर बिठा दिया जाता है ।उनके गडाए इस ‘एक्स्ट्रा-कील’ को अपोजीशन पूरे पाच-साल कोस-कोस के निकालते रहता है ।

'एक्स्ट्रा-हूँम' का इंजेक्शन;मरीजों को कुछ हास्पिटल में एहतियात के तौर पर’ सख्ती से मगर बाकायदा लगाया जाता है ।आप एक के पास गये नहीं कि वो चार को दावत में बुला लेता है । डा.सा,ये ताजा मरीज हार्ट की शिकायत ले के आया है ।आप बी.पी. टेस्ट कर लो ,दवे जी एक्सरे ले लेंगे ,तिवारी जी शुगर खून पेशाब जांच लेंगे ,कार्डियोलाजिस्ट से अञ्जिओग्राफि करवा लेंगे ।सबके हिस्से में मरीज को बाँट के भरी भरकम फीस का जुगाड़ कर लेते हैं ।

कलकत्ता में, पुल-हादसा कंस्ट्रकशन कम्पनी और सरकारी विभाग में लेन-देन या हिस्सा-बटवारे का दिल दहलाने वाला सीन, अत्याचार से कम अगर लगता हो तो कहो ...?'एक्स्ट्रा हूँम' पाने के चक्कर में आरक्षण भर्ती इंजीनियर ने जाने क्या दिमाग चलाया कि, पुल को बिठा डाले ।‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाला किस्सा तो याद है न ......अब देखे इल्जाम किसके सर जाता है ?

अपनी सरकार के दिमाग में ‘देश-भक्ति, जनसेवा ‘ वाली पुलिसिया उक्ति ‘थानेदार के उसूलो’, की तरह जम के बैठ गई है । थानेदार नए शहर का चार्ज लेता है तो हप्ते दो हप्ते रात्री-कालीन गश्त या राउंड में निकलता है । रास्ते में जो भी मिल जाता है, उसे अनाचारी,दुराचारी अत्याचारी समझने की भूल कर ही बैठता है । इस कृत्य में उसके गाँठ का कुछ जाता भी नहीं उलटे, सेटलमेंट फीस के नाम पर कुछ कमाई हो जाती है ।

यहाँ आरक्षण की मांग करने वाला सत्याग्रही, और कालेज-स्टूडेंट आतंक वादी चेहरे नजर आते हैं., तो इसमें नजरिये का दोष नहीं वरन व्यवस्था का है । कहने वाले डार्विन-थ्योरी ‘स्ट्रगल फार को ऐक्सिसटेंस’ को भी याद कर लेते हैं । जो नारा कल तक ‘हक’ मागने वालों का होता था ,कि जो ‘हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा’ ,अब यही सरकारी नारा सा लगता है । इसे चाहे सत्ता की तरफ से समझे, या वर्दी की तरफ से जाने । नारा अपने आप में सब कुछ कहने के काबिल है ।

इस देश की विडंबना है कि आर्थिक-अपराधों को फलने-फूलने देने के लिए बैंक ,उसके अधिकारी ,नेता का दबाव सब कुछ एक साथ काम करते हैं । फंसने पर अपराधी को नेताओं का संरक्षण मिलना या दिया जाना,जैसे एक परंपरा की तरह निर्वाह किया जता है । अपराधी द्वारा , लोन में लिए नान-रिफंडेबल मनी की बंदर-बाट,उस मनी से दी गई पार्टी और पार्टी फंड में दिए चंदे कि बदौलत ‘एक्स्ट्रा-सपोर्ट’ की नीव रखी जाती है । इस बुनियाद की ‘एक्स्ट्रा अंडर हैण्ड डीलिंग ‘भी आप ही आप निर्धारित हो जाती है ।

मेरे गाव में नत्थू नाम का मेरा पडौसी है । वो अपने निजी काम से दो चार दिन के लिए आने की खबर भिजवाया था । पडौसी धर्म के नाते उसे स्टेशन में लिवाने पहुचा ।सामान्य औपचारिकता बाद शिष्टाचार-वश मैंने उससे पूछा ....और उधर गाव में क्या चल रहा है ...?उसने तपाक से कहा ....’फ़ाग’ चल रहा है .....?मुझे उससे यूँ मजाक की अपेक्षा नहीं थी,वो भी उस वक्त जब मैं देश और देश की हालत पर ट्रेन आने के इंतिजार में गंभीरता से जाने क्या-कुछ सोच रहा था , लिहाजा उसे मेरी मुद्रा कुछ सख्त होते देखी। वो तुरन्त समझ के बोला गुरुजी ...कन्फुज मत होइए फाग इधर शहरों वाला नहीं, जो टी-वी विज्ञापन में आजकल छाया है । हमारे गाँव देहात में .होली है न ...सब ‘फाग’ में मस्त हैं ।वो वाला फाग...... । गुरुजी क्या बताएं ,आप की कमी फाग गाते समय सबको शिद्दत से खलती है, क्या गाते थे “पहिरे हरा रंग के साडी ,वो लोटा वाले दुनो बहिनी”...... ।मजा आ जाता था ।

मै 'एक्स्ट्रा हूँम ' वाला टेस्ट, नत्थू की बातों में पा के अपनी फाग वाली धुन में मानो खो सा गया ।

सुशील यादव

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