मंगलवार, 31 मई 2016

व्यंग्य-राग (१०) फीतों के रंग / डा. सुरेन्द्र वर्मा

(पूर्वाभास में प्रकाशित – २७.३.१६)   फीतों के रंग जूतों के हिसाब से बदलते रहते हैं. काले जूतों में काला फीता ही फबता है. ब्राउन जूते में ब्...

हमसे तो पशु अच्छे हैं - डॉ. दीपक आचार्य

9413306077 www.drdeepakacharya.com हम इंसान हैं या पशु, हममें इंसान के कौनसे गुण हैं और पशुओं से हमारी कितनी समानता है?  कभी फुरसत पाकर इस...

अंतहीन / कहानी / अपर्णा शर्मा

आनंद वर्मा बॉस के साथ कुछ जरूरी बातों में उलझे थे। तभी उनके मोबाइल की घंटी बजी। जेब से मोबाइल निकाल कर बगैर नम्बर देखे ही स्विच ऑफ कर दिया।...

सोमवार, 30 मई 2016

हथियार की तरह हो रहा तारीफ का इस्तेमाल - डॉ. दीपक आचार्य

9413306077 www.drdeepakacharya.com वो जमाना चला गया जब किसी को नेस्तनाबूद करना हो तो अस्त्र-शस्त्र जरूरी हुआ करते थे। अब पूरी दुनिया नए दौ...

जड़ों से कटती पत्रकारिता की भाषा - वीणा भाटिया

एक समय था जब लोग कहते थे कि भाषा सीखनी हो तो अखबार पढ़ो। लेकिन आज एकाध अपवाद को छोड़ दें तो अधिकांश अखबारों में जो भाषा इस्तेमाल में लाई जा...

व्यंग्य राग (९) बटन दबा – सीटी बजा / डा. सुरेन्द्र वर्मा

साहित्यकार तो थे ही, वे भाषण-वीर भी थे | पदानुसार भी वे व्याख्याता ही थे | कम्प्यूटर और इंटरनेट विषय पर उनका व्याख्यान चल रहा था | बोले, आज...

शोध व अन्य लघुकथाएँ / दिलीप भाटिया

  चरित्र     संस्कार शाला के प्रधान बोले, ''देखिए, हमारे गुरूजी ने यह चरित्र निर्माण की पुस्तक लिखी है, आप को इसी पुस्तक में से ब...

रविवार, 29 मई 2016

ऋतुराज सिंह कौल की चित्र कविताएँ

ऋतुराज सिंह वास्तविक बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं. आप कमाल की चित्रकारी करते हैं, कमाल का कार्टून बनाते हैं और कमाल की कविताएँ लिखते ह...

लाइव कहानी पाठ - नकलची बंदर व अन्य कहानियाँ - उषा छाबड़ा

उषा छाबड़ा ने बच्चों के लिए तथा अन्य कथा कहानियाँ व सामग्री के  बहुत से वीडियो व ऑडियो यूट्यूब व साउंडक्लाउड में अपलोड किए हैं. बेहद प्रोफ़े...

किसी के नहीं होते मुद्राभक्षी भिखारी - डॉ. दीपक आचार्य

9413306077 www.drdeepakacharya.com जानवरों के बारे में कहा जाता है कि जिसके मुँह खून लग जाता है वह फिर उसे कभी छोड़ता नहीं, उसके जीवन का लक...

विशेष दिन नहीं, प्रतिदिन हो पर्यावरण की चिंता / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष   ० आदतों में परिवर्तन से होगा संरक्षण अपने पर्यावरण को सहेजना या उसे अनुकूल बनाये रखना हमारे के लिए को...

ठंडी चाय / कहानी / यशोधरा विरोदय "यशु "

देहरादून का कैण्ट इलाका है; शान्त, सुन्दर….. और ऊपर से मौसम की मेहरबानी । आज तो सुबह से ही रूक रूक कर बारिश हो रही है। सड़कें थोड़ी गीली, थ...

शबनम शर्मा की ताज़ा कविताएँ

नए ख्वाब आज मैं गुजरी उस सड़क से कराहती सी आवाज़ थी आई मैदान वो रोया, पीपल चीखा ‘‘बोलो मेरे बच्चे कहाँ है भाई?’’     इक्के-दुक्के बच्चे बैठे...

शबनम शर्मा की 3 नई लघुकथाएँ

पढ़ाई आज दिव्या दोपहर में अपने कमरे में गई, लेकिन अभी शाम के 8 बजने को आये, बाहर नहीं निकली। ये बच्ची हमारे पड़ोस में ही रहती है। मैं अपना क...

व्यंग्य / रूठे-रूठे पिया, मनाऊँ कैसे ? / गोविन्द सेन

मुझे रूठना आता है, लेकिन मनाने की कला नहीं जानता। जबसे कम्प्यूटर देवता मेरे जीवन में आये हैं, उनका संग-साथ पसंद करने लगा हूँ। कम्प्यूटर देव...

व्यंग्य-राग (८) बयानों का बयावान / डा. सुरेन्द्र वर्मा

बयान देने के लिए सिर्फ ज़बान की आवश्यकता होती है. जो भी ज़बान पर आया दे मारा. बयान हो गया. चाहें तो इसे लिखकर दे दें या ज़बानी कह दें. ज़बानी क...

व्यंग्य-राग (७) अथ मूर्ख नामा डा. सुरेन्द्र वर्मा

दुनिया मूर्खों से भरी पड़ी है | एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं | कुछ अक्लमंद लोग मूर्खों से इतना परहेज़ करते हैं कि वे उनकी शक्ल नहीं तक नहीं देखना ...

सादगी ही असली बाकी सब पाखण्ड - डॉ. दीपक आचार्य

9413306077 www.drdeepakacharya.com   आदमी जैसा है वैसा ही दिखता है, जो कुछ अपने पास है वहीं दिखाता है, अपने पास जो हुनर है उसी का प्रदर...

मौत का आह्वान फिर-फिर - डॉ. दीपक आचार्य

9413306077 www.drdeepakacharya.com हम सारे के सारे लोग चाहते तो यह हैं कि अमर बने रहें, मौत कभी आए ही नहीं। और कुछ नहीं तो कम से कम शतायु ...

शुक्रवार, 27 मई 2016

विजयश्री पाने जरूरी है आध्यात्मिक और दैवीय ऊर्जा - डॉ. दीपक आचार्य

9413306077 www.drdeepakacharya.com दुनिया का हर महान कार्य तभी संभव है जबकि हमारे पास दैवीय और आध्यात्मिक ऊर्जा का संबल हो अथवा किसी ऎसे व...

दोहे / अनन्त आलोक

झिलमिल काली ओढ़नी, मुखड़े पर है धूप | जग सारा मोहित हुआ , तेरा रूप अनूप || *** कश्मीरी हो सेब ज्यों , हुआ तुम्हारा रूप | छुअन प्रेमिका सी लगे...

एक्स्ट्रा हूँम ........ ? / व्यंग्य / सुशील यादव

अपने देश में इन दिनों कोई भी प्रोडक्ट 'एक्स्ट्रा हूँम 'के बिकता नहीं ।ग्राहको के दिलों को आजकल तूफानी ठंडा जब तक न मिले,उनको अपनी ह...

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